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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, July 10, 2009

खड़ु उठा धौं लाठ्याळौं

खड़ु उठा धौं लाठ्याळौं, कनु द्वफरु ह्वैगि?
तुमुतैं त अजौं रातै पड़ी छ.
लोग त कनु कै वक्त ऊठितैं, चंद्रलोक तक पौन्छिग्यन!
अर तुम ए द्वफरा तक-फ़सोरि तैं स्ययाँ छैं.
दुनियाँ का लोग त रत्ब्वाणि मा ऊठिक-
बतेरा काम करिग्यन/अग्नै पौन्छग्यन.
अर तुम ए अपणा कोदा/झंगोरा देखि तैं खुश ह्व्वयां छैं.
दुनियाँ तैं देखा ऊ क्या कन्यां छन, कख जाण्या छन.
तुम भि ऊँ छौंपणैं कोशिस करा.
नींत छूटि जैल्या-पिछ्ड़्यां का पिछ्ड़्यां.
पढै-लिखै का ऊज्याला सी खूब देखा,
अर तब चला रास्ता फुन्डु-सरासर,
पौंछी जैल्या दुनियाँ की तरौं-
स्वर्ग की सीड़्यौं जथैं/विकास का रस्तै तिर्प,
सुख का कोणा जथैं/खुशि का तप्पड़ जथैं.

(सर्वाधिकार सुरक्षित)
डॉ. सुरेंदर दत्त सेमल्टी
पुजारगांव(चन्द्रबदनी),
पो.ओ. पुजारगांव,
पट्टी.चन्द्रबदनी]
टेहरी गढ़वाल(उत्तराखंड)
मेरे कवि मित्र की रचना("जिग्यांसू")