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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, July 10, 2009

कल्च्वाणी

"कल्च्वाणी" जी हाँ अपणा पहाड़ कू कल्च्वाणी आप लोग जाणदा ही होला. मेरु कल्च्वाणी सी मतलब छ संस्कृति कू नाश. भौंकुछ करि करिक आज हम कथ्गा दूर पोंछिग्यौं.....सब्बि धाणी कू कल्च्वाणी करि करिक....नौं भी टिंकू,रिंकू,पिंकी धर्यल्यन......अन्ग्रेजु की संस्कृति प्यारी होयिं छ आज.....विकास हो पर अपणी संस्कृति कू नाश भलु निछ......प्यारू उत्तराखंड हमन अपणी पछाण कायम रखण का खातिर लिनी...... संस्कृति कू नाश न हो.....पछाण कायम रौ सदानि....


"कल्च्वाणी"

कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,
कर्यालि हमन सब्बि धाणी.......

चौक मा नि छन,
बल्दु की जोड़ी,
पाल्नु छोड़्याली,
भैंसी अर गौड़ी,
लेन्टरदार मकान बणौणा,
पुराणी पथाळ की कूड़ी तोड़ी,
हरा भरा बणु मा आग लगैक,
सुखैयालि छोया ढुंग्यौं कू पाणी.

कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,
कर्यालि हमन सब्बि धाणी.......

लाणु पैन्नु अंग्रेजी ह्वैगि,
हाथु हाथु मा धरयां मोबाइल,
एक्का हैक्का देखि खुश नि छन,
काळा होयां छन सब्ब्यौं का दिल,
मन्ख्वात मरिगि मति हरिगि,
रौ रिवाज छोड़ी छोड़ी,
पहाड़ की संस्कृति कू,
कर्यालि कल्च्वाणी.

कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,
कर्यालि हमन सब्बि धाणी.......

कूड़ी पुन्गड़ी बांजा पड़िं छन,
गौं गौं मा सूखिगी धारा कू पाणी,
प्यारा पहाड़ सी दूर ह्वैक,
चूकिगी आज सब्बि धाणी,
हे पहाड़ का मन्ख्यौं तुम्न,
प्यारा पहाड़ की कदर नि जाणी,
तभी ता कन्ना छौं हम,
कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,कल्च्वाणी,
कर्यालि हमन सब्बि धाणी.......

(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
10.7.2009