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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, March 9, 2010

सरलता ….

गीली लकड़ी
सुलगता चूल्हा
फून्कनी से फूंकते-फूंकते
आंसुओं की धार |
पीसती चक्की
गोदी में नन्ही
पाँव हिलाकर उसे सुलाती
उड़ते आटे से सफेद बाल |
गोबर से सने हाथ
रोता नन्हा
कोहनी से थपथपाती
पोंछती उसकी नाक |
भरी दोपहरी
पसीने से नहाती
खेत गुडाई
गीतों की तान |
कास माँ..... जैसी
सरलता ………
उधार ही मिल जाये
तो जीवन धन्य हो जाये |

copyright@*****विजय कुमार 'मधुर'