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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Tuesday, August 25, 2009

उतराखंड

दीनदयाल जी उत्तराखंड का बना कुछ भी कनु तैयार रैंदा रैनी ! त जिन्दगी उंकी उत्तराखंड उत्तराखंड रट्द रट्द बीती ! कुई जलसा , कुई जलूस नि छोडू ! कई दिन भूक हड़ताल माँ बैठिनी ! उंकी एक ही तमना रा की, कैभी कीमत पर उत्तराखंड मिली जा , दगडा दगडी एक औरी भी तमना छा की जब उत्तराखंड मिली जालू त उ एक बुवारी गडवाल बिटि त हैंकी कुमो बिटि कारला ताकि घर में ही एक उत्तराखंड दिखये देलू !

उत्तराखंड मिलत सै पर इनी ना ! दीनदयाल जी तीन नौना में से सबसे छोटू की लाश पर ! दुव्वी नौना कु उन ब्यु करी जन उन सोची छा ! पैली पैली त , दीदी भूली आपस माँ खूब रैनी , भैली उकी बात एक दुसर निसमझदी छै ! कभी कभी सानियुन आपस माँ बात करी खुश ! बाद बाद माँ एक हैंकी सासू जी सी शिकैत करदी रैनी , की , मेरी बात या नि बिगदी आर ना वीकी मी ! हम थाई अनग द्यावा बस ! हम नि राइ सकदा ये किच किचमा !

सससुरल समझाई --" बाबा तुम द्वी मीली जुली रावा ! क्युओ छा एक ही भित्रा द्वी काना ..... अर भी भाषा बोली लेकी .." मेरो सपना छो की मई अपणो घर थाई ही उत्तराखंड बणाई की , एक मिशाल कयाम करुलू पर यख त आज बोली भाषा लेकी अलंग बन्ट्वारु मांगना ना छा त भोल पहनावा से मंगल्या ! परस्यु कुछ पर ..

द्वीयुंन बोली ...." जी हम थै उउत्तराखंड से क्या लीण , हम थै आप , बस, द्वी खंड दे द्युआ ! थै मैल्य खंड अर वी थै तैलया खंड ! आपे बात भी रैजाली अर हमारू काम भी हुवै जालू !

पराशर गौड़ २५ अगस्त रात ११ ४१ पर