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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, August 20, 2009

चला जन प्रभू कि इछा

भुला ग्याडुकु नयु नयु ब्यो ह्वे । कुछ दिन तक भुलाजी गोल अर दर्शन दुर्लभ ! जै मा पुछा .. " हे भै , ग्याडु क्वी अता पता

वी बोला .. " पत नी .! " ब्वारी जी थै पूछा त , वो, शर्मै की मुन्ड फ़रकै कि चुप चाप, बिना कुछ बुल्या, चली जांदा रैनी !

मी से नि रयायु त एक दिन , मिन सोची कि आज त, ग्याडु थै , जरुर मीली कि ऒ ! स्यु जनी ब्य्खुन ह्वे ! मी वेका
घॊर जनि चली ! छ्ज्ज्मा व्वारी जी छा खुट्टा धुणा ! जनि ऊन, मै देखियु । मुंड्मा कु सपुगु स्या उदू खैची मुख ठ्कै सेवा लगै ! मिन बोली " चरंजीव रा बाबा ..! खुऊब छ्या ! "

व्वारी बोली " ___ हां जी , मित खूब छॊ प र------"
मिन बोली " -- पर, पर क्या बाबा ?

" बुनै , तुम्हारा भुला ओरु कि तबियत ठीक नी .. "
" है ." . क्य हुया उथै ? बडी हैरानी का साथ मिन ऊ से पूछी !

व्वारी बुन बैठीनी " _ क्यन बुन जी .. तीन चार दिन बिटि उकाणा छि ... उकाणा ’/////// "
मिन बोली " बबा , उकाणु त तुमन छॊ , अर, उकाणू वोच ? ... इत बकिबात ह्वेगे !" चला जन वेकि इछा ।

पाराशर गौड
अगस्त १९ दिन्मा २.२३ पर