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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, August 25, 2009

अब हार नही मानूँगा!

अब हार नही मानूँगा!
चाहे पथ पर कितने रोड़े आएँगे!
सुख की मंज़िल पा लूँगा में!
भाग्य में दुख कितने जोड़े जाएँगे!
आँसुओं का सैलाब पलने दूँगा मैं सीने में..
अपनी मंज़िल को पाने तक...
प्रतीक्षा कर लूँगा मैं,
पतझड़ से बहार आने तक,
नई हँसी पहनेंगे अधर..
बहा के सब अतीत के आँसू!
अभी तो उत्साह भी है, विश्मय भी!
घरौंदे की कौन सी नींव चुनूँ??
कैंसे मैं दीवार रखूं, कि दुख की आँधी से बचा सकूँ!
कुछ ऐसे ही, कुछ वैसे ही,जीवन का नवनिर्माण करूँ,
बनने दूं अभी छालों को, एक दिन फोड़े जाएँगे!
अब हार नही मानूँगा!
चाहे पथ पर कितने रोड़े आएँगे!
सुख की मंज़िल पा लूँगा में!
भाग्य में दुख कितने जोड़े जाएँगे!
अनसुना मैं उनकी हँसी को कर दूँगा!
योग्यता अपनी बेबसी को कर दूँगा!
और अपनी जीत की चकाचौंध से,
रंग उनके चेहरों का हर लूँगा!
टीस को अपनी शक्ति बना लूँगा,
जब घाव मेरे छेड़े जाएँगे!
अब हार नही मानूँगा!
चाहे पथ पर कितने रोड़े आएँगे

Copy Right@ Umesh Gusain