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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, April 23, 2017

गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया.

व्यंग्य - नरेंद्र कठैत 


गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया.
कट्यां दूबलै धौंणि मा कुर्सी डाळी वून बोलीक्य रख्यूं ये पाड़ मा?हमुन् पूछीक्य नी ये पाड़ मा।
वून एक किनारा थूकी जबाब देअजि कुछ नै है।
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हमुन् अगनै तौंकी टोन मा बोलीकुछ क्या नै है इस पाड़ मेंक्य सांस लेणू को खुली हवा नै हैछोया-मंगरों को ठण्डु पाणि नै हैमाटै कि साफ सुथरी गन्ध नै हैगौं-गौळा नजीक है। आस-पड़ोसआबत-मित्र है। याँ से बक्कि क्य चैये?
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अजि हवापाणिमाटा ही सब्बि धणी नै होता  जिन्नगी बढ़ाणे के लिए हौरि धाणि बि चैये। असली चीज है रुजगार। वो तो है ही नै 
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किसनै बोला रुजगार नै है?
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काँ है तब?
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क्य नैपाळि अर् बिहारि पाड ़मा तमाखू खैणी चबाणै आता है। सि बि त् रुजगार करता है। खाता हैकमाता हैबच्यूं-खुच्यूं नेपाळबिहार भिज्ता है।
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सि त् मिनत मजूूर है।
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हम बि त् भैर मिनत मजूर है। होटलू मा भाण्डा मंजाता है।  पहरा पर डण्डा बजाता है। साब लोग त् इणती-गिणती का है। पर ये बोलो कि खाणे-कमाणे को बि सगोर चए।
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अजि सगोर तबि त् हैगा जब कुछ रस्ता रैगा। बिना रस्ता का सगोर को काँ पैटाओगे।
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अच्छा जेे बताओ संकराचार्य जीले बदरीनाथ अर् केदारनाथ जाके कै करा?
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कन कै कराउन नै धरम को मजबूत करा। धरम का पाड़ा सिखाया।
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पर ये त् नै बोला था कि भगवान के ऐथर जो रुप्यों कि थुपड़ि देवे सणी अगनै गाडो। अमीर अलग अर् गरीब अलग लैन में लगावो। 
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तब अमीर अर् गरीब की लैन किनै लगाई?
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रूजगार नै। अर् जरा इन बि बताओक्य भगवान के नौ पर होटल ढ़ाबा संकराचार्य जीन् खोला? 
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तब वो होटल ढ़ाबा किनै खोला?
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रुजगार ने।
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सूणों ज्यां-ज्यां से सड़क बदरीनाथकेदारनाथ जाते है वां सि लेके भगवान तक करोड़ो को रुजगार होते हंै। अब त् भगवान जी कु परसाद बिदेसूं बि जाते है।
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कन क्वे?
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रुजगार से।
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अजि ये काम सबका बस का नै है?
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किनै का नै है?
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हमारा बस का त् नै है।
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बस जे ही तो बात है कि पाड़ आधा त् करम कना का बाद बि सरम से नै खाता है। अर् आधा करम से नै धरम सि जादा खाते है।
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पर पाड़ में सब्बि धाण्यूं कि सुबिधा नै है। 
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जै दिन तुम गौं छोड़ कै सैर में गये थे तिस दिन बि तुमनें इन्नी बोला था कि पाड़ में सुबिधा नै है। पर सैर मा  के तुमनें क्य फरकाया। सैर मा ऐकी बि तुम गौं पर चिब्ट्यां राया। साक भुज्जी से लेकी चुन्नू झंगर्याळ तक गौं बिटि मेटि-माटि सैर में लाया।अल्लू तुमनंे गौं मा बि थींचा अर् सैर मा बि थींचता है। गौं का प्याज तुमनें मीट्ठू नै चिताया अर् सैर के पिर्रा प्याज ने तुमको घड़ि-घड़ि रुलाया। अब तुमी जबाब देवो तुमनें सैर में क्य फरकाया?
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भै नौनो को पढ़ाया लिखाया रुजगार लगाया। 
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नौनौ को पढ़ायाक्य पढ़ाया बोलो तोता जन रटाया अर् कबोतर जन उड़ाया। नौना तुमारि भोणी छोड़ी दुन्ये भगलोणी मा ग्याया। तुमुन् तो सर्रा जिन्नगी दौड़ लगायाहाय तोबा मचायाअर् आखिरी दां क्य कमायाखप-खप्प जिकुड़ा पर बलगमका कुटेरा।
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पर भुल्ला !गौं मा अबि बि सब्यता नै है। जंगलीपना है।
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भैजीजाँ तक सब्यता का बात है तो सब्यता तो तुमनंे बि जम्मा नै सीखा। बोलो कैसे?
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कैसे?
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बुरू तो नै माणेगा।
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नै- !
अपड़ि फेमिली का बिलौज बिटाळ के कन्धौं तक लिजाणा सब्यता तो नै है। अर् जाँ तक जंगल को सवाल है। चला माण गये गौं मा जंगली लोग रैता है। पर जंगल छोड़ के सैर मा एके बगीचा त् तुमनें बि नै लगाया। हियाँ स्याम-सुबेर तुम दुबलू छंट्याताहै। गौं उजाड़ कै सैर लायाअब दुयूंकि निखाणी कैके काँ जैंगे।
तौंने बोलादिल्लीडेरादूण जैगैं।
झूठ क्यांे कु बुलणा हैसि गये हैं। पर आज बि तख अगर तौं दुन्या के चैबाटे में छौळ लगता है तो पुजाणे घौर आता है। भैजीसात धारों को पाणि त् हमनंे बि पबित्रर माणा है अर् स्यो हमको खप बि जाता है। पर ताँ से अगनै खरण्यां पाणि पर तोजम्मा बि बरकत नै है। अब अगर सि आता है तो कोई चिन्ता नै है...... तिनके उपर का परोख्या पाणि हमनंे अबि तक समाळी रखा है।
(अड़ोस-पड़ोस -व्यंग्य संग्रह)


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Thanking You with regards

B.C.Kukreti