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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, May 28, 2009

ब्वारी का बोल

सासुन जब सुणिन,
तब कन्दुड़ि फर हाथ धरि,
बोन्न बैठि,
हे ब्वारी,
न बोल मैकु बुरा बोल,
मैं माणदु छौं आज जमानु तेरु,
पर कुछ मर्यादा कू ख्याल कर,
तेरी कुबानी की बातु सुणि सुणिक,
मेरी मुण्डळी मा,
ऊठण लग्युं छ,
मुंडारु अर जर.

नौनियाळ मैंन खौरि खैक,
तंग हाल मा पाळि पोषी,
पढौण लिखौण का खातिर,
नाक की नथुलि बेचि खोसी.

डोला ढस्कैक ल्हयौं त्वै,
अपणा नौना कू,
ज्व थै मेरी आस,
अब सब कुछ तेरु ही छ,
न कर मैकु निराश.

तेरी मैं सासू तू मेरी प्यारी ब्वारी,
कर टौल पात तू,
भलि ब्वारी की अन्वारी,
तब हमारू परिवार सुखि रलु,
खूब खाणी बाणी होलि हमारी.


सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
२५.५.२००९