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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, May 28, 2009

बाटु

बाटु उजाड़ि,
सड़क बणि,
खुद लगणी छ,
वे बाटा की,
कनुकै बिंगौंण,
तुम सणि......

जै बाटा फुंड,
हिटदु हिटदु,
बाळापन का,
दिन बितैन,
पुराणा फीफल की,
चौंरी मा बैठि,
दग्ड़्यौं दगड़ी,
छ्वीं लगैन.

बाटु उजाड़ि........

बिराणा बाटा,
भलु नि हिटणु,
सैणि सड़क,
सभ्यता कू नाश,
अपन्णु बाटु ही भलु छ,
जैमा हिटीक,
आस ही आस.


सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
27.5.2009