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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, March 23, 2017

श्री कुलानन्द भारतीय जी की मृत्यु और गढ़वाली साहित्यकारों द्वारा अपनों की ही अवहेलना

भीष्म कुकरेती 
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               गढ़वाली भाषा के विकास के मध्य युगीन कवि स्व श्री कुलानन्द भारतीय जी का देहावसान 9 जनवरी दिल्ली में हुआ किन्तु मुझे भी कल  ही पता चला की वरिष्ठतम कवि अब इस दुनिया में नही रहे।  उनके मुंडित -कुटुंब की नातिन श्रीमती शोभा कोटनाला ने मुझे यह दुखद समाचार कल मेल से दिया।  
  वास्तव में सन 2009 -10 में मैंने गढ़वाली कवियों के बारे में लिखना शुरू किया तो मैंने इधर उधर से पता लगाया और मुझे उनके बारे में सूचना मिली कि श्री कुलानन्द भारतीय जी अब भग्यान हो गए हैं।  मैंने इंटरनेट में अंग्रेजी लेख में उनके Late  Kulanand  Bhartiya लिख दिया।  श्रीमती शोभा कोटनाला का मेल आया कि श्री भारतीय जी ज़िंदा हैं।  श्रीमती कोटनाला ने ही बताया कि जन्म से वे भारद्वाज थे किन्तु कभी भी उन्होंने जाती नही लिखी। 
और अब इतनी देर बाद हमे पता चला कि सिंह युग के स्तम्भ नही रहे और दुःख यह है कि किसी भी गढ़वाली साहित्यकार को नही पता कि भारतीय जी हमारे मध्य नही रहे।  स्व जग्गू नौडियाल की मृत्यु का समाचार भी किसी गढ़वाली साहित्यकार ने नही दिया था अपितु उनकी मृत्यु के बाद मैंने उनसे contact किया तो सूचना उनके परिवार से मिली। प्रश्न यह उठता है हम नई पीढ़ी के साहित्यकार अपने पुरानी पीढ़ी की अनदेखी क्यों करते हैं 
श्री  कुलानन्द जी को उनके खण्डकाव्य 'डौळया' के लिए गढ़वाली काव्य में जाना जाता है।     
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Kulanand Bhartiya: A politician and Asian Garhwali Poet of Story oriented long Poetry  

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 40

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
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           Kulanand Bhardwaj Bhartiya is a multitalented personality. Most of the Garhwalis know late Kulanand Bhartiya as famous Garhwali social worker and politician of Delhi. Kulanand Bhartiya was representing Shaktinagar region of Delhi as politician.
            However, Kulanand Bhartiya has been publishing his poems in regional periodicals. Critics praise his famous storied long poem  (Khand Kavya ) ‘Daulya’ for his story narration and subject of discussion on the so called benefits of migration and to search employment in Garhwal only. 
Kulanand Bhartiya was born in a Himalayan village Jamni, Malla Salt of Kumaon border of Garhwal on 24th May 1926. 
              Kulanad is famous in Garhwali literature for his Khandkavya (storied long poem) ‘Daulya’. The poems are in lyric form and are very pleasure some. The story surrounds two illiterate friends of a Garhwali village who come to Delhi in search of job. One of two takes job in different hotels. Another fellow gets job as butler with a learned professor. This fellow with professor study in night schools and become manger with a private firm after gaining higher education through night schools. Time comes, when the illiterate fellow wants to marry his daughter with the son of his friend but the educated fellow goes to village for marrying his son that there would be link with Garhwal.
           Small epic ‘Daulya’ is effective so many variables between the life of cities and villages, the changing psychology of villagers towards working in the village, the desire of village youth for work in cities and their escaping psychology for easy works available in villages. The poet depicted successfully the life and confusion, confrontation, frustration of villagers and city workers simultaneously in ‘Daulya’.
According Bahuguna (1981) , Kualanand Bhartiya uses imagery tool in depicting geography of Garhwal and simple Salani dialects in his poetry.

काळी  को रैबार 

रचना --कुलानन्द भारतीय (1926 , जामणी सल्ट दुशांत) 

काळी  द्याखनौऴया राम मालुम ह्वेई।  दिल्ली जाम 
दौड़ी दौड़ी वख काळी आई घास काटणु छोड़ आई 
आवाज वींल नौऴया थैं देइ द्यूरा !   ऊँथैं जाणदा ह्वैला। 
दिल्ली  ऊँथैं जरूर पैला म्यारु रैबार भेजी दियां 
भली  समझैक बोली दियां खामू पीमू रमू यख 
द्वी साल ह्वैगे तुम नि आया ब्याऊ कैरीक क्या मिल पाया।  
दिन रात मीत कटदू घास ब्वै बाब तुमरा नि गडदा बाच 
दड़िमा की डाळी फूली ग्याई आमूं की डाळी पर बौर आई 
सरसों खेती फूली ग्याई पर मेरी दुनिया बांजी रै ग्याई। 
द्यूरा ! ऊंमा बोली दियां ये साल घौर जरूर अयाँ 
चिट्ठी पत्री भेजदी रयां खयाँ पियाँ भलीक रयाँ 
कातिग तुम घर अयाँ मंगसिर मिथैं दिल्ली लिजैंयाँ   


साभार --शैलवाणी अंग्वाळ )
Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai, 2016