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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, March 23, 2017

श्री सत्यनारायण व्रत कथा” (गढ़वाली म)”

कृष्ण कुमार ममगाईं 
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( श्रीमान भीष्म कुकरेती जी का ईं कथा थैं publish करना का सुझाव (face book comment in Group - उदयपुर-ढांगू " मेरी जन्मस्थली" ) का संदर्भ मा पूरी कथा गढ़वाली छंद म फेस बुक पटल पर प्रस्तुत कन्नु छौं । प्रस्तुति थैं फ़ेसबुक पर संकलन करना हेतु मेरी बिटिया रेणुका मैठानी (ग्राम झैड़) कू स्प्रेम आभार। )
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा (संक्षिप्त गढ़वाली अंक)
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ध्यान एवं पूजा :
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ॐ श्री गणेशायः नमः ।
 श्री नादबुद भैरवायः नमः ॥
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ॐ ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी
 भानुः शशी भूमिसुतो बुधश्च,
गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतव:
 सर्वे ग्रहाः शान्तिकरा भवन्तुः ।।
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ॐ अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तम् येन चराचरम
यत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरुवे नमः ।
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श्री सत्यनारायण व्रत कथा - गढ़वाली म
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प्रथम अध्याय:
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शुभ घड़ी एक दिन नैमिशारण्य मां
पुछदना शौनकादिक ऋषी सूत मां ॥
क्या कथा वरत क्या नेम धर्म ह्वलो
पाप संसार को जां से कुछ कम ह्वलो ॥
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बोलि सूतन कथा जो कही विष्णु ना
घूमि नारद गई छौ जबरि धाम मां ॥
होया खुश विष्णु नारद से सब सूंणि की
अर बता सब कथा सत्य–नारैंण की ॥
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जू करलु ईं कथा छल कपट छोड़ि की
पालु सुख शांति ये लोक परलोक की ॥
पुछद नारद कि कनु वरत, क्या रीत चा
कैन कैरी किलै वरत, क्या मीलि चा ॥
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ब्वल्द भगवान यां से खतम हूँद सब
सोक संताप, हर डौर हर रोग चा ॥
पूरि हूंदा सभी इच्छा सौभाग्य की
चाहे सन्तान, धन धान्य कल्याण की ॥
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हूंद पूरी जबरि जै कि मनकामना
वरत भक्ती से कैरा तई साम मां ॥
पिंजरि सवया चढ़ै घौर बांमण बुलै
सूंणा सुन्दर कथा सत्यनारैण की ॥
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कैरा कीर्तन भजन सब्बी भै-बन्ध गण
सुमिरा भगवान थैं कैरा सब शांत मन ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा प्रथमोध्याय समाप्त ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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दूसरा अध्याय:
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कैरि कैना कथा पैलि सुण आज यो
काशिपुर मां छौ बांमण स्यु निरधन बड़ो ॥
देखि नी साक्यो दुख तैकु भगवानना
बुढ्या बांमण बणीं बोलि नारैणना ॥
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घुमदि दुख मां किलै सुद्दि गंगजांणु छै
कत्था नारैण की क्यों तु करदू नि छै ॥
फिर बता सब नियम फल धरम बरत का
अर बतै सब मेरू द्यबता ह्वा लापता ॥
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फिकर से उंणदो पापी रहे रात भर
किरपा नारैण की भीख चौगुणि मगर ॥
फिर कथा कैरि अर सदनि करदू रया
अर कथा कैरि कैरि कि बैकुन्ठ गा ॥
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पूछि सौनक ऋष्युन फेर श्री सूत मां
कैरि कै कैन यो बरत संसार मां ॥
सूंणा विष्णु का मुख की कहीं सूत की
अर रचीं कृष्ण की च फलीं दूब सी ॥
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एकदां जब स्यु बांमण घणां ऐश मां
छौ कनू कत्था भै बन्धु का बीच मां ॥
प्यासु आया लकड़हारु तै द्वार पर
लेकि आनन्द परसाद गा घार पर ॥
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भोल करना कथा तैन प्रण यो करे
बिठगि लखड़ौं कि ब्यचणां कु सिर मां धरे ॥
किरपा नारैण की ह्वा कमाई डबल
भोग परसाद ले की कथा का सकल ॥
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यां का परताप से पुत्र सन्तान पा
ख्याति बैभव करी ऐश बैकुन्ठ गा ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा द्वितीयोध्याय समाप्त ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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तीसरा अध्याय:
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भद्रशीला नदी को किनारो छयो
राजा राणी दगड़ि उल्लकामुख छयो ॥
छा कना कत्था सी सत्यनारैण की
आया लाला तबरि एक कक्खी बटी ॥
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तैन सूंणी कथा पाय परसाद चा
पूछि क्या वरत अर यांकु क्या अर्थ चा ॥
पुत्र पांणू कनू छौं बता राजना
ईं कथा से उ मिलदा जु नी भागमां ॥
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पकड़ि नौका अपड़ि लाला गा घार कू
जिकुड़ि अकतांणि छै जननि मां ब्वनु कू ॥
छै नि सन्तान तैकी न आशा रती
नाम छौ तैकि पत्नी को लीलावती ॥
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ब्वल्द सैरी कथा करद उचणो भलो
ह्वैलि सन्तान फिर मी भि कत्था कलो ॥
सूंणि भगवानना आश बच्चा कि ह्वा
माह दस बाद इक नौनि ना जन्म पा ॥
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नौनि कल्लावती छै बढ़दि रात दिन
ब्वलद मां नामकरणा कि पूजा का दिन ॥
उचणो धरयूं छयो कामना पूर्ण ह्वा
सत्यनारैण को बरत अब कैरि द्या ॥
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लाला लाला छयो खर्च कनमा कदो
ब्वलद ब्यो का समय ईं का कत्था कलो ॥
बीत्या दिन नौनि होया जवान जबा
भेजि इक दूत ब्यो खोजणा को तबा ॥
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लाला कंचनपुरा को मिली एक गा
फिर दमोदांणि ब्यो की भि झट बाजि गा ॥
सौदाबाजी से भगवान नाराज छा
पूजा करना कु ये वक्त स्यू बिसिरी गा ॥
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लालाजी अर जवांई चल्या तब खुशिम
कैरि ब्यापार इक नगरि रत्नापुरिम ॥
राजा तैकू छयो चन्द्रकेतू भलो
दैव परकोप राजा को डाका पड़्यो ॥
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चोर सब राज को धन उठाई लया
रांदु जख लाला तख छोड़ि सब भागि ग्या ॥
लीग्या पकड़ी सिपै राजा का तौं दुयुं
अर उठै लाया सामान तौंकू ज्वड़यूँ
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यख त रुंदन दुई जेलु की सीख मां
वख त घौरम डकैती पड़ी बीच मां ॥
घर मां लीलावती नौनि बुक्की रया
भीख मंगदा भिखारी उ दर दर गया ॥
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एक दिन जब कला भीख कू जांणि छै
रस्ता बामण का घर मां कथा हूंणि छै ॥
पंहुचि घर देर से वा कथा सूंणि की
पूछि मांन किलै देर मूं आंणि छै ॥
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सुणद ही वरत की बात आ होश मा
छौ धरयूं हमना उचणों कभी जोश मा ॥
हैंका दिन स्वारा भार्यूं सहित स्या दुखी
करद नारैण को वरत हूंणूं सुखी ॥
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मंगद अपणों पती अर पती बेटि कू
करलु फिर वरत मेरा मिली जाला जू ॥
सत्यनारैण इतगा मां ही खुश होया
चन्द्रकेतू उ राजा का सुपन्या गया ॥
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राजा थैं अपड़ि गलती कु अहसास ह्वा
वैन धन धान्य देकी सि द्वी छोड़ि द्या ॥
खुलनि बेड़ी मिल्यो माल मय सूद का
छन इ किस्सा वे नारैण का रूप का ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा तृतीयोध्याय समाप्त: ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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चौथा अध्याय:
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ह्वैकि खुश द्वी का द्वी जब चल्या घौर कू
साथ मां छै टनाटन भ्वरीं नाव जू ॥
फिर परीक्षा हे नारैण तू धन्य छै
रूप मां जोगि का इबरि पुछणू कु ऐ ॥
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त्यारा पुछदा हि ब्वलदन उ अभिमान मा
घास पत्ता भ्वर्यां छन हमरि नाव मा ॥
बोलि इन होलु अर जोगि रस्ता लगे
तैका जाँदा हि गरि नाव हलि हवे गये ॥
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घास पत्ता भ्वर्यां जब द्यखिनि नाव मा
चौरु चलि गे झटगि देनि फिर भाग ना ॥
भगनि अकतैकि वे जोगि का पैथर
धन्नि बरमन्ड तौना खुटौं ऐथर ॥
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माफ़ि मांगी त भगवान ना बोलि दे
मेरि पूजा बिमुख ह्वे तु इन कैरि दे ॥
अब तु रूंणु छै फिर करदु मी माफ त्वे
मेरि पूजा करी की तु फिर घौर जै ॥
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जांद वापस त फिर नाव देखी भ्वरीं
करद तन मन से पूजा छै हालत डरीं ॥
एकदां फिर दशा तैकि ह्वा टपटपी
पौंचि ग्या अब गवां पास बिन्डि दिन बटी ॥
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भेजि रैबार एक दूत का हाथ मां
किरपा नारैण की लीला छै पूजा मां ॥
छोड़ि तैन कथा सत्यनारैण की
पाय जब सूचना अपड़ा पति आंण की ॥
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ब्वल्द बेटिम तु परसाद थैं खैकि ऐ
जांदु मी द्यखणुकू त्यारा बाबू जवैं ॥
भागि ब्वै ऐथर नौनि पैथर बटी
छोड़ि परसाद स्या भी कथा से उठी ॥
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कोप भगवान कू इक दफा फेर हवा
तैंकु बाबू उतरि अर पती डूबि ग्या ॥
छौयु मातम फकत रूंण कू ही अबा
डूबि गै छौ जंवै, नाव, कमयूं सबा ॥
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नौनि कल्ला त रुवे रुवे कि बेहोश हवा
हूंदु छौं मी सती ब्वल्द जब होश आ ॥
लाला अर लीला म्योली लगाणा छया
माया भगवान की छै ऐड़ाणा छया ॥
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अंत मां सोचि किरपा च नारैण की
माफि मांगी कि तौना स्यु उचणो करी ॥
देखि नी साक्यु फिर दुख यु भगवान ना
कैनि आकाशवाणी सि असमान मां ॥
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तां थैं सूणी कलाबेटि फिर घौर गा
खैकि परसाद तैंना पती अपणो पा ॥
लाला इक बार फिर हवा अमन चैनमा
अर प्रभू प्यार का आंसु छा नैन मा ॥
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करद रैनी कथा तब सि तै दिन बटी
आंद छै जब भि संगरांद, पूरण-मासी ॥
पांदा रैनी सभी सुख कथा करदा छा
सब कथा कैरि सूंणिं कि बैकुन्ठ गा ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा चतुर्थोध्याय समाप्त: ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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पांचवां अध्याय:
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फिर बता सूतना त्वंगध्वज की कथा
पाय वेना भि दुख जब नि परसाद खा ॥
करदा छा ग्वेर छोरा कथा बोण मा
द्याय परसाद तै थैं भि तख औंण मा ॥
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खाय नी तैन परसाद अपमान का
घरमा सौ नौना अर धन खतम होई गा ॥
ऐकि फिर तैन ग्वैरुम करैकी कथा
खैकि परसाद पैनी जु कुछ खोइ छा ॥
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फिर नियम से कथा सदनि करदू रया
अर कथा कैरि का वो भि बैकुन्ठ गा ॥
बोलि सूतन हे सौनक रिष्यूं सूंण अब
जन्म अगल्यो कथा कैरि छै जौन तब ॥
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आया बामण सतानन्द सुदामा बणीं
पाय मुक्ती कृष्ण की दगड़ि छै घणीं ॥
भील गुहराज बणिं स्यू लकड़हारु छौ
सेवा रामै करी तैन भी मोक्ष पौ ॥
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उल्लकामुख जनमि राजा दशरथ छयो
रंगनाथै दया से छौ स्यो भी तरयो ॥
बणद मोरध्वज साधु लाला छौ जू
नौना थैं काटि भगवान थैं दींद ऊ ॥
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आरि ना काटि इक फाँक द्यबता चढ़ा
कैरि इनु त्याग वैना भि खुद मोक्ष पा ॥
पैदा होया मनू छौयु त्वंगध्वज्ज जू
भगति भारी करी गाय बैकुण्ठ स्यू ॥
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ईं तरह या कथा चा सकल रूप मा
ह्वैलि जै बिरधि कैरलु जु जै रूप मा ॥
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इति श्री स्कन्द पुराणे रेवा खण्डे
श्री सत्यनारायण ब्रत कथा पंचमोध्याय समाप्त: ॥
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अच्युतम् केशवम् नाम नारायणम्
जानकी नायकम् रामचन्द्रम् भजे ।
श्री धरम् माधवम् गोपिका बल्लभम्
कृष्ण दामोदरम् वासुदेवं हरे ॥
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स्तुति एवं आरती – श्री सत्यनारायण ब्रत कथा (गढ़वाली)
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आदिदेव जै श्रीधरम् हरि विष्णु रूप जै माधवम्
सत्य नारायण जै तेरी रूप शंकर व्यापकम् ॥
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सर्वदा कल्याण करदा विप्र देव गौ रक्षकम्
सत्य आश्रय दीन हीन कु जगत्कारण सुन्दरम् ॥
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भाग दक्षिण गंगा छविमय बाम भाग च प्रिय रमा
जैंकि सुन्दरता से सुन्दर, स्याम सुन्दर तक छन॥
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नाम सत्य कु संकटों मा मधुर भाव से जो भजे
लोक नायक मुक्ति दायक कस्ट संकट सब हरे ॥
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निराश्रय हो इच्छा दुरलभ कर मनन सकलाश्रयम्
सहज मन जन सकल सुणदा भक्ति प्रिय विश्वाम्भरम् ॥
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बेद, ब्राह्मण, वैश्य, साधू, तुंगध्वज भक्ती करे
लोकनायक की कृपा से अमर सब अब तक रहे ॥
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सृष्टि सृजन, सृष्टि पालन, सृष्टि भारम् वाहनम्
भक्त अर भक्ती के प्रिय प्रभु जयति जय गुणसागरम् ॥
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देव मुनि सास्वत बोलें अकंटक सत्यहि प्रियम्
पुत्र पौत्र च भक्ति मुक्ती पूर्ण दे नारायणम् ॥
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सत्य नारायण कथाष्टक शब्द सुरसरि मंगलम्
सुमिरि कर ही पाप नाशै दींद फल हरि वांछितम् ॥
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[{(.....महा शिवरात्रि पर्व की बहुत बहुत शुभ कामनाएं).....}]
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Of and By कृष्ण कुमार ममगांई
ग्राम मोल्ठी, पट्टी पैडुल स्यूं, पौड़ी गढ़वाल
[फिलहाल दिल्लि म]