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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, February 25, 2009

यंग उत्तराखंड कवि सम्मलेन समारोह - २००९ (Kavi Sammelan )

यंग उत्तराखंड कवि सम्मलेन समारोह(Kavi Sammelan )




"बेटी"


कलि हूँ में गरीब घर की,
आस पर जी रही है,

में भी अपने संग एक कलि और देखना चाहती हूँ,
ओ कहते है, एक से भले दो और दो से भले चार,

में बड़ी होई जब फिर मुझे समझ आया,
क्या कमी थी मेरी में जो सीचे गये चार
ना मुझे मिला ना ऑरों को फिर में अपने खुशियों को तोड़ती गई
में अकली खुशी मागती तो और देखते रह जाते,

मुझे मालूम ही नहीं था क्या होगया है,
मुझे मालूम ही नहीं था क्या होगया है,

क्या था, कौन था, मुझे कुछ पाता नहीं था,
मुझे पूछ गया टीक है, मुझे मालूम नहीं था टिक क्या होता है,
सर हिला दिया है उनके सामने ओ समझ वैठे खुश है,

में सोचती गई और दिन बड़ते गये,
मेरा सोचना पूरा नहीं होवा और ओ दिन आ गये
में भी थोडी खुश होई, फिर देखा और भी तीन थे
फिर सोचा में तो आपने दिन गिन रही हूँ, तुम भी गिनो

ना जाने क्या हो गया में समझ ना सकी,
अभी तो में खिलती होई कलि हूँ, क्यों मुझे मुरझा रहे हो,

फिर याद आया यही कसूर था मेरा "बेटी"

रचिता: गायत्री
दिनक: २६.०२.२००९

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लोकतंत्र

मैने देखा है उसे,
अधिकारियों द्वारा शोषित होते हुए
हर शिकायत पर प्रताड़ित होते हुए
फिर भी खुद को वह
काम मे व्यस्त रखता रहा।

मैने देखा है उसे,
पुलिस से बर्बरतापूर्वक पिटते हुए
बदन पर जख्म आंखों से खून बहाते हुए
फिर भी वह हर ज़ुर्म को
सहता रहा वह नियति समझकर।

मैने देखा है,
सियासी झंडों को उसकी छाती मे गते हुए,
कभी उसके कफ़न को झंडे की शक्ल लेते हुए
मगर वह ख़ामोश रहा,
क्योंकि उसे बेजान कर दिया गया था।

ये सब देखकर
मै चुप न रह सका, पूछ बैठा
कौन हो तुम और क्यों इतने सशक्त होकर भी
मजबूर हो खुद को मिटाने के लिए?
बोला, मै लोकतंत्र्र हूं पर राजनीति के हाथों मै भी मजबूर हूं।


हेमचन्द्र कुकरेती

विपणन प्रभाग
भारत इलेक्टॉनिक्स लि.
बलभद्रपुर, कोटद्वार246149
पौड़ी ग़वाल
उत्तराखंड

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औंण वाला अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस पर याद करा
नौंनी (भ्रूण हत्या)


औंण द्या बाबाजी, मैं बी हीं दुनियाँ मा

खेलण द्या बाबाजी, मैं बी माँ का गोद मा।

जनी भैजी खेलदा, गौं-गल्यों मा

खेलण द्या बाबाजी, मैं बी गौं-गल्यों मा।

जोलु बाबाजी, मैं बी स्कूल

कबी न जोलु क्वी काम भूल

करलु बाबाजी, तुमारी पूरी मदत

रौलु बाबाजी,सदानी तुमारा साथ

बंटौलु हमेशा हर-काम मा हाथ

करलु मेहनत जीवन सफल बंणौंण मा

औंण द्या बाबाजी, मैं बी हीं दुनियाँ मा।

न समझ्या बाबाजी , मैं तें पराया धन

लगाला जु थोड़ा बी मैं पर अफड़ू मन

त करलु तुमारू नौं उज्जवल समाज मा

औंण द्या बाबाजी, मैं बी हीं दुनियाँ मा।।



देवेन्द्र कैरवान (शोध सहायक , आई.आई.टी , मुम्बई)
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‘‘यनु हो मेरु उत्तराँचल’’

चला अपणा उत्तराँचल तैं हम प्यारु बणौला
दुनिया मा हम भी अपणी इक पहचाण बणौला
लोगू मा प्यार–मोहब्बत हो जख
दुःख–विपदा मा इक दूसरा कू सारु हो जख
चला अपणा उत्तराँचल तैं हम प्यारु बणौला
दुनिया मा हम भी अपणी इक पहचाण बणौला
फूलू मा कान्डा न होन जख
भूखों गरीबों तैं क्वी न सतौं जख
चला अपणा उत्तराँचल तैं हम प्यारु बणौला
दुनिया मा हम भी अपणी इक पहचाण बणौला
इक–दूसरा तै पुछण वाला हो जख
गाली–गलौच़ लडै–झगड़ा कू नौवूं न हो जख
बेटी–ब्वारी तैं पूरु सम्मान मिलु जख
चला अपणा उत्तराँचल तैं हम प्यारु बणौला
दुनिया मा हम भी अपणी इक पहचाण बणौला
पढ़ियां –लिख्यां लोग़ अनपढ़ौं तैं शिक्षा बांटू जख
रोजगार की कमी न हो जख
बेरोजगार दग्गड़या न भटकू जख
चला अपणा उत्तराँचल तैं हम प्यारु बणौला
दुनिया मा हम भी अपणी इक पहचाण बणौला
गौवूं –खोला मा दीदी–भूलि मिलिजुलि काम करु जख
सुख–सर्मिधि कू उजालू हो जख
चला अपणा उत्तराँचल तैं हम प्यारु बणौला
दुनिया मा हम भी अपणी इक पहचाण बणौला

विपिन पंवार "निशान"

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मेरु और मेरी जन्मभूमि कु दर्द (गढ़वाली भाषा में कविता)



मन च आज मेरु बोलंण लग्युं जा
घर बौडी जा तौं रौत्याली डंडी कांठियों मा

मेरु मुलुक जग्वाल करणु होलू
कुजणी कब मैं वख जौलू कब तक मन कें मनौलू

अपणा प्राणों से भी प्रिय छ हम्कैं ई धारा
किलै छोड़ी हमुन वु धरती किलै दिनी बिसरा

इं मिट्टी माँ लीनी जन्म यखी पाई हमुन जवानी
खाई-पीनी खेली मेली जख करी दे हमुन वु विराणी

हमारा लोई में अभी भी च बसी सुगंध इं मिट्टी की
छ हमारी पछाण यखी न मन माँ राणी चैन्दि सबुकी

देखुदु छौं मैं जब बांजा पुंगडा ढल्दा कुडा अर मकान
खाड़ जम्युं छ चौक माँ, कन बनी ग्ये हम सब अंजान

याद ओउन्दी अब मैकि अब वु पुराणा गुजरया दिन
कन रंदी छाई चैल पैल हर्ची ग्यैन वु अब कखि नी छिंन

याद बौत औंदन वू प्यारा दिन जब होदू थौं

काली चाय मा गुडु कु ठुंगार
पूषा का मैना चुला मा बांजा का अंगार

कोदा की रोटी पयाजा कु साग
बोडा कु हुक्का अर तार वाली साज

चैता का काफल भादों की मुंगरी
जेठा की रोपणी अर टिहरी की सिंगोरी

पुषों कु घाम अषाढ़ मा पाक्या आम
हिमाला कु हिंवाल जख छन पवित्र चार धाम

असुज का मैना की धन की कटाई
बैसाख का मैना पूंगाडो मा जुताई

बल्दू का खंकार गौडियो कु राम्णु
घट मा जैकर रात भरी जगाणु

डाँडो मा बाँझ-बुरांश अर गाडियों घुन्ग्याट
डाँडियों कु बथऔं गाड--गदरो कु सुन्सेयाट

सौंण भादो की बरखा, बस्काल की कुरेडी
घी-दूध की परोठी अर छांच की परेडी

हिमालय का हिवाँल कतिकै की बगवाल
भैजी छ कश्मीर का बॉर्डर बौजी रंदी जग्वाल

चैता का मैना का कौथिग और मेला
बेडू- तिम्लौ कु चोप अर टेंटी कु मेला

ब्योऊ मा कु हुडदंग दगड़यो कु संग
मस्क्बजा की बीन दगडा मा रणसिंग

दासा कु ढोल दमइया कु दमोऊ
कन भालू लगदु मेरु रंगीलो गढ़वाल-छबीलो कुमोऊ

बुलाणी च डांडी कांठी मन मा उठी ग्ये उलार
आवा अपणु मुलुक छ बुलौणु हवे जावा तुम भी तैयार

Vijay Butola
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पहाड़ का दर्द कौन करेगा दूर, जिस उत्तराखण्ड को लिया था पहाड़वासियों ने, देखो और पढो इस कविता को, उनके और अपने सपने हो रहे हैं चूर-चूर.........

"छुटदु जाणु छ"

लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हाथु सी छुटदु जाणु छ......

बित्याँ बीस सालु बिटि,
बारा लाख उत्तराखंडी,
पलायन करि-करिक,
रोजगार की तलाश मां,
देश का महानगरू जथैं,
अपणी जवानी दगड़ा लीक,
बग्दा पाणी की तरौं,
कुजाणि क्यौकु सरक-सरक,
प्यारा उत्तराखण्ड त्यागि,
आस अर औलाद समेत,
कूड़ी पुन्गड़ि पाटळि छोड़ि,
कूड़ौं फर द्वार ताळा लगैक,
कुल देवतौं से दूर देश,
नर्क रूपी नौकरी कन्नौ,
दूर भाग्दु जाणु छ.

बलिदानु का बाद बण्युं,
प्यारु उत्तराखण्ड राज्य,
हाथु सी छुटदु जाणु छ.....

आंकडों का अनुसार बल,
राज्य विधान सभा मां,
पलायन की परिणति का कारण,
पहाड़ की आठ घट्दि सीट,
घट्दु पहाड़ कू प्रतिनिधित्व,
हम तैं, यनु बताणु छ.
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हाथु सी छुटदु जाणु छ......

खान्दि बग्त टोटग उताणि,
मति देखा मरदु जाणी,
बिंगि लेवा हे लठ्याळौं,
छौन्दा कू भि होयिं गाणि,
अब नि जावा घौर छोड़ि,
जख छ, छोया ढ़ुंग्यौं कू पाणी.

समळि जावा अजौं भी,
बग्त यू बताणु छ,
लड़ि भिड़िक लिनि थौ जू,
हाथु सी छुटदु जाणु छ......

जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
2.3.2009 को रचित
दूरभाष: ९८६८७९५१८७
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कवि तो कवि होता है... सोच लेता है "भौंकुछ" ...तुमारी नजर मां.... पर यू ही होण....जू कि कविता मां लिख्युं छ...अनुभूति का रूप मां....

"अनुभूति"

अपनी कलम से,
कालजयी रचनाएँ लिखकर,
काल को कैद करने वाला,
कवि एक दिन अचानक,
गिर पड़ा धरती पर,
बेजान होकर.

लेखनी लिखती थी उनके,
मन के भाव समझ कर,
छूट गई हाथों से,
जो कि है बेखबर.

शोक में डूबे परिजन,
आँखों में अश्रु की धारा,
कवि मित्र अर्थी को उनकी,
दे रहे कंधे का सहारा.

शमशान में चिता सजी,
धधक उठि जलती ज्वाला,
पंचतत्व में विलीन हुए,
सूनी हुई "कविशाला"

जगमोहन सिंह जयाड़ा, जिग्यांसू
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
2.3.2009 को रचित
दूरभाष: ९८६८७९५१८७
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दोस्तों मैं इस कवि सम्मेलन में दूसरी रचना स्वरुप पुनः एक और अपनी गढ़वाली हास्य कविता प्रस्तुत कर रहा हूँ | जिसका शीर्षक है दूसरा ब्यो कु विचार|


दूसरा ब्यो कु विचार (गढ़वाली हास्य कविता )



एक दिन दगडियो आई मेरा मन माँ एक भयंकर विचार
की बणी जौँ मैं फिर सी ब्योला अर फिर सी साजो मेरी तिबार
ब्योली हो मेरी छड़छड़ी बान्द जून सी मुखडी माँ साज सिंगार
बीती ग्येन ब्यो का आठ बरस जगणा छ फिर उमंग और उलार

पैली बैठी थोऊ मैं पालंकी पर अब बैठण घोड़ी पकड़ी मूठ
तब पैरी थोऊ मैन पिंग्लू धोती कुरता अब की बार सूट बूट
बामण रखण जवान दगडा ,बूढया रखण घर माँ
दरोलिया रखण काबू माँ न करू जू दारू की हथ्या-लूट

मैन यु सोच्यु च पैली धरी च बंधी कै गिडाक
खोळी माँ रुपया दयाणा हजार नि खापौंण दिमाक
फेरो का बगत अडूनु मैन मांगण गुन्ठी तोलै ढाई
पर डरणु छौं जमाना का हाल देखि नहो कखी हो पिटाई

पैली होई द्वार बाटू ,बहुत ह्वै थोऊ टैम कु घाटू
गौं भरी माँ घूमी कें औंण, पुरु कन द्वार बाटू
रात भर लगलू मंड़ाण तब खूब झका-झोर कु
चतरू दीदा फिर होलू रंगमत घोड़ा रम पीलू जू

तब जौला दुइया जणा घूमणा कें मंसूरी का पहाडू माँ
दुइया घुमला खूब बर्फ माँ ठण्ड लागु चाई जिबाडू माँ

ब्यो कु यन बिचार जब मैन अपनी जनानी थैं सुणाई
टीपी वीँन झाडू -मुंगरा दौड़ी पिछने-२ जख मैं जाई
कन शौक चढी त्वै बुढया पर जरा शर्म नि आई
अजौं भी त्वैन जुकुडी माँ ब्यो की आग च लगांई

नि देख दिन माँ सुप्नाया, बोलाणी च जनानी
दस बच्चो कु बुबा ह्वै गे कन ह्वै तेरी निखाणी
मैं ही छौं तेरी छड़छड़ी बान्द देख मैं पर तांणी
अपनी जनानी दगडा माँ किले छ नजर घुमाणी

तब खुल्या मेरा आँखा-कंदुड़ खाई मैन कसम
तेरा दगडी रौलू सदानी बार बार जनम जनम


रचनाकर :- विजय सिंह बुटोला

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‘‘देख रहा हूँ मैं’’

आज देख रहा हूँ मैं
उन्नति पर उन्नति कर रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
अवन्नति की ओर भी जा रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
समन्दर की गहराईयों तक पहुँच रहे है लोग
आज देख रहा हूँ मैं
आसमाँ की ऊँचाईयों में उड़ रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
अन्य ग्रहों में जीवन की खोज कर रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
खुले आसमाँ के नीचे भी सो रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर रहें हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
पानी की बूँद के लिए भी तड़प रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
देश को उन्नति की ओर ले जा रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
देश को कंगाल करने की कोशिश कर रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
प्यार-मोहब्बत, भाईचारे की बात कर रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
पर्दे के पीछे बुराईयों की दुकान चला रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
अपनी संस्कृति, समाज को भूल रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
झूठ को सच्च साबित कर रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
आपस में झगड़ रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
खून की नदियां भी बहा रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
भूख से तड़प रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
सुख की खोज में भाग रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
दुःख को भूल गये हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
मन्दिर, मस्जिद, गुरुद्वारे जा रहे हैं लोग
आज देख रहा हूँ मैं
भगवान के घर को भी तोड़ रहे हैं लोग
आज लिख रहा है ‘‘निशान’’
कितना बदल गया है इन्सान

विपिन पंवार ‘‘निशान’

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मेरा अपना ये अनुभव है कि ईश्वर न ही किसी मंदिर-मस्ज़िद कि बपौती है और न ही किसी पूजा-नमाज़ का मोहताज़.
ईश्वर हमारे चारों तरफ मौजूद है, हर तरफ बिखरा पड़ा है...बस हमारे दृष्टि बदलने कि देर है!
मैंने ईश्वर को कहाँ - कहाँ महसूस किया है उसी पर यह कविता!



नादां है वो ये जिसने कहा है
मंदिर-ओ-मस्ज़िद में ख़ुदा है
लाल है फूलों में वही
वही पेड़ों में हरा है
छाँव के सुकूं में वो
वही सूरज में जला है
दरिया की रवानी है वो
वो पहाड़ों में खडा है
बच्चों में खेलता है वही
वही पसीनों में बहा है
खनक है चूडियों की कहीं
कहीं हया में छिपा है
वस्ल1 के एहसास में है
वही जुदाई में छिपा है
बाप के माथे की शिकन
मां के होटों की दुआ है
आहत2 के नाद में वो
वही अनाहत3 में बजा है
दैर4-ओ-हरम5 में ही नहीं
सब ख़ुदा, सब में ख़ुदा है

-सतीश पन्त

[1.वस्ल : मिलन
2.आहत नाद : सांसारिक ध्वनियाँ (in brief)
3.अनाहत नाद : ॐ, आमीन, अल्लाह (in brief)
4.दैर : मंदिर
5.हरम : मस्ज़िद]

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और यह ग़ज़ल जिसका पहला और आखिरी शेर ईश्वर की तलाश को समर्पित है, और दो शेर इंसान की खुद की क्षमताओं की अनभिज्ञताओं पर:



ख़ुद को किया तलाश तो उसका पता मिला
दैर-ओ-हरम1 में था ही नहीं वो ख़ुदा मिला

अपने ग़म-ओ-ख़ुशी भी बाहर ढूँढता फिरे
हरेक शख्स क्यों ख़ुद से ख़फा मिला

है रास्ता नहीं, न मन्ज़िल का ही पता
ख़ुद क़ायनात होके क्या ढूँढता मिला

ऐलान-ए-उपनिषद हो या मंसूर की सदा*
बन गया ख़ुदा वो जिसे भी ख़ुदा मिला

- सतीश पन्त

(1.दैर-ओ-हरम: मंदिर व मस्जिद
2.क़ायनात : सृष्टि
*ऐलान-ए-उपनिषद here refers to the mahavakya of the upanishads अहम् ब्रह्मास्मि...मैं ही ब्रह्म हूँ...
mansoor was a muslim faqir who used to say अनल हक़ ...मैं ही सत्य हूँ...मैं ही अल्लाह हूँ...
so ऐलान-ए-उपनिषद = अहम् ब्रह्मास्मि
मंसूर की सदा = अनल हक़)

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आज अचानक दिल ने दस्तक दी,

आज अचानक दिल ने दस्तक दी,
पुरानी यादो को ताज़ा कर एक हवा दी,
कहाँ से चले थे और कहाँ पहुँच गए,
क्या सोचा और क्या कर गए?
वादियों की गोद में जो बचपन बीता था,
शहर की भीड़ में वो आज गुमनाम है,
जिनसे बिछड़ने में कभी डर लगता था,
आज उन्ही के लिए हम अनजान हैं,
अपना प्रदेश छोड़ा , छोड़ी अपनी माटी,
उनसे हम दूर हुए, जहाँ से सीखी परिपाटी,
आज भावः विभोर मन उदास हो आया है,
बीती यादो में आज अपना बचपन याद आया है,
याद आता है वो बचपन जब पाटी पर लिखा करते थे,
और बात बात पर रूठ कर माटी से लिपटा करते थे,
बढ़ते बच्चे जब पड़ने लगे अ आ बाराखडी,
फ़िर वही एक उदासी मन में आने लगी ,
की पढ़ लिखकर जायेंगे कहाँ, और कहाँ करेंगे नौकरी,
इसी सोच और पीड़ा ने न जाने कब बड़ा बना दिया,
और गाँव की माटी ने परदेश के लिए विदा कर दिया,
शहर के हालत भी देखे और देखि यहाँ की ज़िन्दगी,
पर रस न आई वो बानगी और बन्दिगी,
अब तो बस रह रह कर यही विचार आता है,
की कब लौट चले अपने पहाडो पर,
जो मेहनत की और पसीना बहाया है यहाँ पर,
अपने मुल्क में जाकर उसी को बनाये अपना सहारा I
Vivek Patwal

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Syad Tum

Sayad tere bina mere jindage main koie nahi,
Eshi ehsaas se jiye jate hain.
Tumhi to fal ho mere achaiyeion ka,
Eshi viswaas per jiye jate hain.
Kuch tum maaf karna, kuch log maaf karenge,
Sayad eshi ahsaas per galtiyanaa kiye jate hain.
Moot aaye to en galtiyoon se dur hoon,
Per tum se dur ho jayenge, eshi ehsaas se dar jate hain.
“Tanhanaa“ ki jindage kati tanhanaa, sayad inhi galtiyoon ke karan,
Per saath tum ho es dům per hi, Hum hamesaa galtiyanaa kiye jate hain.


Ashish Panthari
Tanhanaaa.............
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Aaj kal ka pyaar


Wo,
Wo Dil ki gahraiyoon se ejhaar karte hain,
Har tesree ko apna payar kahte hain..
Wo (tesra) marta he aapke mohabat ko'
Wo har baar nayaa khail samaj kar suru karte hain.....

Humne jab rang deke es muhabaat ke,
Dar lagne laga payar se,
Ab halat ye hai,
Har kinare (konee) main ek pyaar panapta dikta hai,
Aaj kahin or, kal kahini or, or apani hi sadi ke din kahini or dikte hain ............



Ashish Panthari
Tanhanaa..........
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"पहाड़ प्रेमी"


में तो एक ग्वाला हूं,
मुझे तो लीलाएं करना पसन्द है,
कही पे काफल,कही पे बुरांश, कही पे करोंदे है,
मुझे तो इन सब से खेलने का मन है,

मैने तो सोच भी नहीं है,
में ना जाऊं कही,
एक दिन तुम भी मुझे याद करोगे,
में तो लिपटा रहूँ अपनी माटी से,

ना कहना मेरे से कभी भी छोड़ दे माटी,
में माटी प्रेमी हूं मुझे जीना यहं,
मेरे लिए सब कुछ यह है,
में तो माटी प्रेमी हूं,

गायत्री
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अपड़ा गौं की सैर


जाण च भई जाण च , मिन त गौं जाण च,
आफ़िस बिटी छुट्टी ल्याली, अब त बस जाण च।

दिल मा उमंग च, मिन त गौं जाण च ,
मन मा तरंग च, अब त बस जाण च ।

आफ़िस बिटी जल्दी ऐग्यों, और समान पैक करी,
सारु समान पैक हुवेगी , अब त बस जाण च ।

गौं जाण की रट मा ,बितगी रात अधनिन्द मा,
फ़िर सुबेरी बस पकड़ी , और गौ कु तै निकल पड़ी ,

आज जाण मिन अपड़ा घर, सोची तै शुरु हुवेगी सफ़र,
ऋषिकेश पहुँची कन मिलदु सुक, लग्दु जन ऐगिनी हम अपड़ा मुल्क ।

यख बिटी शुरु हुवे पहाड़ कु सफ़र, मन मा बढ़ण लगी खुशी की लहर,
कि आज त मिन जाण च , जाण च अपड़ा घर ।

खिड़की बिटी देखण लग्युँ, भैर कु हाल,
तब्रया पहुँच ग्याँ हम आगराखाल ।

कैन तख खाणु खायी, कैन पकोड़ी और चा,
कैन भुटवा कु मजा लिणी, त कैन ठंडी हवा ।

सबुन खायी पेट भर, फ़िर शुरु हुवेगी गौं कु सफ़र ।

चम्बा मा हिमाल देखी , मन और गुदगुदाई ,
फ़िर पता नि कब औलु यख, सोचण लग्यु भाई ।

टिहरी पहुँची देखी बदल्युँ थौ नजारु,
जख तक थौ राजा कु महल, सब जल मा समाई ।

थोड़ी ही देर मा, मेरु गौं भी ऎ ग्यायी,
बस सी उतरयुँ मी, और ली जोर की अँगड़ाई ।

पहुँची ग्यों मैं देवभूमी, पहुँची ग्यों मैं स्वर्ग मा
पहुँची ग्यों मैं अपड़ा गौं, यख बिटी जाण अब कखी ना ।

नि चांदा भी , जाण पड़लु खैर ,
फ़िर औलु कन्नु कु तै, मी "अपड़ा गौं की सैर" ।


सन्दीप काला
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मेरे अपने

जब मैं सोचता हूँ मेरे अपनों के बारे में

तो उलज जाता हूँ मैं इसी प्रश्न में,

कौन हैं मेरे अपने?

जो अपना लेते हैं मुझे दुःख में भी

या जो लगे रहते हैं मुझे रौंदने में।।

प्रश्न दर प्रश्न मेरे मन में उत्पन्न होते हैं

क्या खून के रिश्ते वाले ही अपने होते हैं?

या होते हैं वे सभी अपने

जो छुपा रखते हैं मुझे हर पल अपनी पलकों में।।

क्या एक ही माता के पेट से जन्मा भाई

अपना होता है?

जो लगा रहता है मुझे हर दम कुरेदने में,

सोचता हूँ कभी

क्या वे मोहल्ले के लोग अपने नहीं हैं?

जो बिछा देते हैं खुद को मेरे रास्ते में ।।


देवेन्द्र कैरवान ( शोध सहायक आई.आई.टी ,मुम्बई)

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प्रिय मित्रो,

अभी अभी मैंने एक और कविता की रचना की है, जिसमे मैंने अपने कवि मन की व्यथा को पहाड़ से हमारे पलायन के प्रभाव को के रूप में प्रस्तुत किया है | आशा है आप को पसंद आयेगी ?

प्रस्तुत है मेरी कविता जिसका शीर्षक है ---------------है धरा तुम्हे पुकार रही |



है धरा तुम्हे पुकार रही

जन्मभूमि निरंतर तुम्हे तुम्हारी है रही पुकार
सूने पड़े है खेत-खलिहान खाली है गौं-गुठियार

हैं निर्जन वो गलियाँ जंहा पथिको को थी कभी भरमार
राहें जाग रही है बाट जोहे है उन्हें पदचिन्हों का इंतजार

गिने चुने जन ही शेष है सन्नाटा पसरा हुआ है चहूँ और
ताक रही है धरती ऐसे मानो की जैसे रुग्ण व्यक्ति ताके भोर

अविरल बहते नदी-नाले भी मुड़ गए अनजान राहों पर
जंगल-पहाड़ भी मौन खड़े है आँखे उनकी भी हैं तर

खेतों-खलिहानों में भी अब बाँझपन कर चूका है घर
ये इनके वक्षो पर नमी नहीं है ये अशरुओ से तर-तर

फूलो ने भी महकना छोड़ा साथ ही फलों के वृक्ष भी हुए बाँझ
ये धरती भी करती है प्रतीक्षा तुम्हारे आने की प्रात: हो या साँझ

घुघूती भी अब नहीं बासती आम की डालियों पर
कलरव छोड़ा चिडियों ने जैसे ग्रहण लगा हो इस धरा पर

जंगल और पहाड़ की आँखे लगी है उन राहों पर
घसेरियां जहा खुदेड़ गीत लगा याद करती थी अपना प्रियवर

चैत महीने के कोथिगो व् मेलों की न रही वो पहिचान
धुल-धूसरित हुई संस्कृति खो गया कही लोककला का मान

काफल-बुरांस के पेड़ अब लाली नहीं फैलाते नहीं हो रहे प्रतीत
सोचो तो जरा कभी क्योँ बिसराया हमने पहाड़ क्यों छोड़ी वो प्रीत

हे शैलपुत्रो बुला रही है ये धरती तुम्हे आओ करो इसका पुन: श्रंगार
चार दिन के इस जीवन में कभी तो समय निकालो दो इसको अपना प्यार

ये जन्मभूमि हमारी माता है इसका हमसे अटूट नाता है
बिसरे तुम उसे जो तुम्हे बरबस बुलाये क्या ये तुमको भाता है ?

जगा इच्छाशक्ति, आओ लौट चले इसकी जीवनदायिनी गोद में यही तो हमारी माता है
ले संकल्प करो सृजन इस धरा का अब कर्ज चुकाने का समय शुरू हो जाता है

Written By: Vijay Singh Butola
Dated: 04-03-2009 @ 11:00

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अपना देश अपना गांव

बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
चेहरे पर खुशियों का
मन में नई–नई उमंग का
बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
गांव की सोंधी–सोंधी ठंडी हवा का
अमृत जैसे साफ़ स्वच्छ जल का
बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
घने जंगलों में पक्षियों के मधुर स्वर का
चारों तरफ़ खुला आसमां, उन बर्फ़ीली चोटियों का
गांव में अपने बचपने का
मां के आंचल में ममता का
मां के हाथों बने हुए खाने का
बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
बीते दिनों के हर इक लम्हों का
बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
बगीचे में पेड़ों की ठंडी–ठंडी छांव का
उन मीठे–मीठे रसीले फलों का
बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
गांव की मर्मस्पर्शी मिट्टी का
बचपन की हर इक जगह का
दोस्तों के संग खेलने का
बहुत दिनों बाद एहसास हुआ
परदेश से देश लौटकर
बीते उन हर इक पहलुओं का।

Vipin Panwar "Nishan"
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BHOOL NA JAANA

JO KIA PRAN TUMNE
MUJHKO KI DHAARAN TUMNE
IS PRAVAAHINI KO TIYAG KAR
US SAAGAR ME MIL NA JAANA
DEKHO KANHI TUM MUJHE
BHOOL NA JAANA

TUMHARE HI VISHVAS PAR
AUR TUMHAARE UTSAH PAR
ME JAATA HU LENE TAARE
TUM CHAND ME KHO NA JAANA
DEKHO KANHI TUM MUJHE
BHOOL NA JAANA

MERI POOJA MERE PUSHP
TUM KISI DEV PAR NAA CHADHANA
KIYUNKI TUM HEE HO MERE AARADHIA
TUM MERE LIYE VARNIYA
TUM MUJHKO NA THUKRANA
DEKHO KANHI TUM MUJHE
BHOOL NA JAANA

Naveen Payaal
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PAYA HE TUMHE

ATHAK PARYAS KE
AUR BAHUT PARITAP KE
ANANTAR
PAYA HE TUMHE

JEEVAN BHAR DHUNDA
LEKAR DEEP MAN ME
TUM MILE RASHMI BAN
AAYE SUDHA BAN JEEVAN ME
KAI SADIO KE BAAD
PAYA HE TUMHE

TUM POONAM TUM JIYOTSNA
TUM HEE HO MERE MANTHAN
AUR CHAH NAHEE NAVEEN
MIL GAYAA SAB JEEVAN ME
EK JEEVAN BITAAKAR PURA
PAYA HE TUMHE

ATHAK PARYAS KE
AUR BAHUT PARITAP KE
ANANTAR
PAYA HE TUMHE

Naveen Payaal
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Nari sakti ko samarpit
This poem is dedicated to Kalpana Chawala

"Kalpana"

Har kalpana ki kalpana main dundte hain kalpanawon ko,
Or har kalpana se ek naye kalpana janam lete hai,
Ek “Kalpana” nai kalpana ki, Or sakar kiya kalpana ko,
Apni kalpana se naow kalpana ka adahar diya “ Kalpana” nai,
Kal kaya thaa, Aaj kaya hai, Sab kalpana hi to hi hai,
Es kalpana ki kalpana main naow sanchar kiya “Kalpana” nai,
Ab “Kalpana” ka naam hoga ab sabki kalpanaoow main,
Jo jite hain kalpanaoow ke liye,
Wo to mare v to sirf apni kalpanaoow ke liye.


Main sochta hoon wo ek kalpana hi thee,
Jo aab sirf kalpana ban ka rah gayee,
Kaash jo jita hai sirf kalpanaoow ki liye,
Wo mare v to kalpanaoow ke liye.


He kudaa us “Kalpana” ki kalpana ko,
ab sirf kalpana hi maat bana denaa,
Uski kalpana ko saakar karne ko,
ab har wakat sakti hamko kalpanaoow main dena.

“ JO PASS THAA, WO DUR HO JAYE TO HAMKO GAAM NAHI,
PASS THA MOTI, GUM HO JAYE, TO UMEED HO KAM NAHI,
DUND LENGE HUM SAHARA, SAHARA TERA KAM NAHI.......”

Ashish Panthari
Tanhanaaa ....
02/02/2003
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जागो उठो म्यरा उत्तराखान्दियो,

जागो उठो म्यरा उत्तराखान्दियो,
यो करमु देवी तुमुके पुकारना छ,
घर छोड़ी बे प्रदेश भाजी गया,
क्या यो धर्तिम तुमर लिजी नौकरी नि छ,
आँख खोलिबे देखो, हाथ चले बे देखो,
थ्वद मेहनत कबे ले देखो,
यो चन्द्र सिंह और मलेथा को जनम भूमि छ,
य हथम हाथ धरी बे सुन्ये न देखो,
जो धर्तिम कभे आनाजो बोरी पैद हंछि
आज ऊँ तुमर उदेखल बंजर ह्वेगी,
जो जन्गोऊ में कभे डंगर पलिछी,
आज ऊँ कन्क्रीतो शमशान बनी गी,
बिन मेहनते ये सड़क बॉर्डर तक नि नहा गे,
और बिन मेहनते यो बिजुली पैद नि हगे,
को कून्छ की इन पहाडो में रोजगार नि छ,
जरा हाथ बड़े बे देखो, सब द्वार खुली छ.
जागो उठो म्यरा उत्तराखान्दियो,
यो करमु देवी तुमुके पुकारना छ,
घर छोड़ी बे प्रदेश भाजी गया,
क्या यो धर्तिम तुमर लिजी नौकरी नि छ,

Vivek Patwal

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रफ़्तार

रफ़्तार की भी कुछ अलग ही बात होती है
विकास की बात आये तो
रफ़्तार "मंत्री" होती है
या तो विकास रफ़्तार से होता है
या विकास की रफ़्तार धीमी होती है

अभी कुछ दिन पहले
एक सज्जन हमसे टकराए
रफ़्तार कुछ ज्यादा थी
इसलिए क्षमा भी न कह पाए

ए गए हर दिन ये सब तो होता ही है
इस शहर की रफ़्तार भी कुछ
अजीब सी हो गयी है
गावों से पलायन रफ़्तार से हो रहा हैं
उन्ही गांवों में सूनापन
रफ़्तार से बढ़ रहा है

रफ़्तार से जंगल शहर बन रहे हैं
इंसान नमक प्राणी
रफ़्तार से नदी नालों को
गन्दगी दूषित कर रहे हैं

रफ़्तार से सड़कों पर
वाहनों की की जमात बढ़ी है
इसी जमात के चलते
हर चौराहे पर हमने
जिंदगी जीने की कहानी गढ़ी है

आज दुनिया की हर अवाम हैरान है
बढती हुई इस रफ़्तार से परेसान है
सुनाने में तो आता है के पानी कभी कहानी बन जायेगी
बिन पानी के उसी की कहानी
जानते हुए हर जिम्मेदार नागरिक आज कहाँ है.


रचनाकार.
धीरेन्द्र सिंह चौहान॥ "देवा"

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शौणु भाई जी कु ब्व्ग्ठया !!!

शौणु भाई जी कु ब्व्ग्ठया
आज बल बाघ न मारी
खुजौण लाग्यां छीन भाई बंध सभी
देखा आज सारियों का सारी...

यखनि मिली तख नि मिली
बवन लाग्यां छन सभी भाई
रुमुक पव्डी गे अर खुज्योरू के वे
घर माँ परेशां पुरी कुटुम्दारी ...

शौणु भाई जी की ब्वे भट्याणी
घर अवा सभी रात पव्डी ग्यायी
मेरा शौणु का बखरा यानि गैन
नि के होली हमुन कभी कैकी भल्यारी॥


अब ता ब्व्ग्ठया मिली गे घर भी ल्ये गैनी
सची मरयूं पाई।
झटपट जगे आग अर सजे गैनी परात।
भली करी भाडयायी।

पडोश माँ प्रधान जब तोन सुंणी
अपुदु थैलू भी लीक आयी
ब्व्ग्ठया देखि और सोची बिचारी
तब बीस बाँट लगाई

में थे भी क्या चेनू छो
मिन भी दौड़ लगाई
एक बाँट उधार करी की
चुपचाप अपुडा घर आयी

यन भी होन्दु च दग्द्यों कभी
सोचिदी सोचिदी बखरू पकाई
प्वेटीगी भरी की टुप स्ये गयों
आज इनु बखुरु खाई॥


रचनाकार.
धीरेन्द्र सिंह चौहान॥ "देवा"
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"उसके जाने के बाद"

उसका गुड्डा आज भी मेरे कमरे की दीवार पर लटकता है,
उसे देखने को मन आज भी भटकता है,
उसकी चाँदी के पायल की रुन-झुन,
आज भी सुनता है मन,
भटकता है मन, भटकता है मन.
महसूस करता हूँ आज भी अपनी तोंद पर गर्मी उसके गालों की,
और, उसके कान पकड़ मेरे, मरोड़-२ कर सो जाने की,
याद आती है उसकी, उसकी जिद की, उसके हठ की,
उसके गले मैं बांहें डाल झूल जाने की,
और,
मेरे न चाहने वाली चीजों को दिलवाने की,
उसके दोनों होंठ सिकोड़ रूठ जाने की,
और,
फिर मेरे मनाने की,
मुझे ये चाहिए, मुझे वो देना,
देना सितारों जड़ा घाघरा और देना चन्द्रहार,
मुझे विदा करने के बाद भी योंही करना प्यार,
हा! याद आती है, उसकी हर बात बार-बार.

आँगन की मैनाएँ हैं ये बेटियाँ,
एक दिन उड़ जाती हैं.
बहुत याद आती है, सच बहुत याद आती हैं.

सचमुच अनमोल है विधाता तेरा उपहार,
पर प्रभु इतना और कर उपकार,
बेटियाँ दे जिनको, दे उनको धन, धान्य और सामर्थ अपार.

मोहन सिंह भैन्सोड़ा बिष्ट,
ग्राम-भैन्सोड़ा वाया सोमेश्वर,
अलमोड़ा, उत्तराखण्ड
निवास:सेक्टर-९/८८६, रामकृष्णा पुरम, नई दिल्ली-1100२२.
रचना: स्वरचित

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“शब्दु की कमी”

कविता लिखणू छौं।
लिखणूं छौं पर कुछ शब्दु की कमि चा
कविता कुछ बांजि लगणीं चा
कख छिन शब्द?

कुछ त कमि च!
शब्द कख्वे लौं?
क्या शब्द हरचि गैनि?
ह् वे सक्द।

पर कख हरचिनि शब्द?
दबे गे होला कखि!

हांऽ अब याद आणि चा!
शब्द दबेणां छिन डंडळयूं, तिबरियूं,
कुछ शब्द चौका तीर,
कुछ कुलणा पैथर,
अर कुछ शब्द दै-ददों दगड़ चलि गैनि।

हांऽ
अब आ याद!
कुछ शब्द अभि बच्यां छिन!
गौं कि कुछ तिबरी अभि भी सजीं छिन
मीं ऊं शब्दु खौज्यांदु
जु बच्यां छिन
फिर नई कविता सजांदु।
मि जरा शब्द लयांदु

रचना –संजय पाल © (स्वरचित)
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"कुछ कर् यूं चा"

नौनु अबरि दां भि फेल ह् वेगे
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

नौनि भि चंचल ह् वेगे भारि
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

गौड़ु अजकाल अंक्वै दूध नीच दीणूं
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

नौनों कु बुबा रोज दारु पैकि चा आणु
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

बरखा भि अब उन नि हूणी
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

खेति-पाति भि अब नि होणी चा
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

सर् या-सर् या डांडा छिन खिसकणा
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

गौं का कूड़ा टुटणां छिन
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

कलम भि झणि क्या-क्या लिखणी चा अजकाल
जरुर कैकु कुछ कर् यूं चा

मेरि समझ मा नि औणि
कैकु होलु यु कुछ कर् यूं?

रचना –संजय पाल © (स्वरचित)

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बहुत समय पहले मैंने अपने मन के भावों को तुकबंध करने की कोशिश की और वही कविता/गीत आज मैं आप पाठकों के सामने रख रहा है. निजी ब्यास्तता के कारण आज मैं तो न तो बोर्ड को अपना समय दे पा रहा हूँ और न ही अपनी कविता के लिए.

तो जनाब एक छोटी सी पेशकश मेरी तरफ से, आशा है कि आप इस कविता के माध्यम से समझ जायेंगे कि मैं क्या सन्देश इस कविता के माध्यम से देना चाहता हूँ .

हाथ जोड़ीक करले पूजा,
मुंड झुके दे आज तू
कुछ नि होलु ए मनखी,
छोड़ी दे घमंड तू II


यखी तेरी माया रोली,
धन सगुणी पुंगणी हे
मुटठी बोटीक आयी इख,
हाथ पसारी जोलु हे II


ना बडू यख ना छोटु कोई,
देह सब समान च
धर्म सबका अपना अपना,
खून सबको लाल च II


पंच तत्त्वौं की काया तेरी,
ना कर अभिमान तू
इक भी त्त्वैते छोड़ी दयोली,
ह्व्वे जालु हे खाक तू II



भूखे की भूख मिटे दे,
प्यासे की प्यास तू
दुखियारौं को दुख मिटे दे,
कमैं ले इ पुन्या तू II



ना कर तू ईश्या द्वेष,
वाणी को हराश तू
चार घड़ी की सांस तेरी,
बांट ले खुशियां तू II


धन्यबाद
आपका बन्धु
सुभाष काण्डपाल

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meri taraf se bengali mai kavita

प्रतिख्खा


जानी ना कोथाय गिये पौड्बो
आमी सुकन पातार मतौ
कौबे आकाशे कौबे धूलाये
आमी कौरबो विचरण
आमी प्रतिख्खा करबो से पलेर
जे पल हौबे आमार यात्रार

पूनम चौहान
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बोर्ड मा कविता लिखणू छौं अच्छी चा त धन्यवाद पर हां यु कुछ म्यारु ही कर्यूं चा :-)

ईं बात पर एक कविता प्रस्तुत कनु छौं ज्वा कि म्यारा स्वर्गीय पिताजी श्री सुरेन्द्र पाल जी की प्रकाशित कविता संग्रह "चुंग्टि" बिटि चा. "कविता"
(रचना - स्वर्गीय श्री सुरेन्द पाल)


एक श्रीमान जि मीं थै पुछण बैठिन्
हे भै! कविता क्यांकु ब्वदन?
तुम कवि छौ, कविता लिख्दां
मी बि बता, कविता कन्कै लिख्दन्?

मिन् बोलि -
भुला! न त म्यार् बुबन् कविता लिखि
न म्यारा ददा हि कवि छा
पर हाँ!
वूं बाब्-दादों कै मुख बटि झड्यां उ शब्द
जु हर्चान साक्यूं बटि
अर् दबे गेनि वूं खंद्वरु पुटग
जु कबि नौ खम्भा तिबरि हुदि छै

जख् हमरा पुरणा घुंडा घुर्स-घुर्सी
रुंदा हैंस्दा छा
वूं कु वो रुयूं, हैंस्यूं ब्वल्यूं बच्ययूं
खौजिकि
वूं शब्दु कि माळा गंठ्याणू छौं
त्वैथैं सुणाणू छौं

अगर या कविता चा, त् मि नि जण्दु
त्यारै सौं तू बि जै ले
वे खंद्वार पुटग् खुजेले
एक-एक ढुंगि पर इनि
सौ-सौ कविता लेखिले


Dhanyabad
Sanjay Pal
Vill-Garhmonu (Gahad), P.O.Pokhrikhet, Patti-Khatsun,
Pauri Garhwal

Presently residing in Delhi



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Thanking You
With Regards
Young Uttarakhand Community Board.