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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, February 1, 2009

लोक बाराखड़ी

लोक बाराखड़ी प्रस्तुति : दिग्पाल सिंह नेगी

क - कंचनी डाळी कु वासुनि कन।
ख- खाते पीते राम भजन।
ग- गंगा जी मा स्नान कन।
घ- घरों-घरों की बात नि सुण।
ङ्- गंगा जी गन्दी नि कन।
च-चंचल नारी कू संग नि कन।
छ- छलिया मुख की बात नि सुण।
ज- जंगलू मा वासु नि रैण।
झ- झूठि मुटी बात नि करण।
ञ- येनी बात कैमू नि बोलण।
ट- टम्का पैस गांठि मा रखण।
ठ- ठगा आदिम दगड़ी सौदा नि कन।
ड- डगड्यनी ढुंगी मा खुटो नि रखण।
ढ- ढवाली बात कभी नि कन।
ण- णखदि नरमी कु वास नि कन।
त- ताता रोस मा झगड़ा नि कन।
थ- थता थुमा सब दगड़ी कन।
द- दया धर्म सदा रखण।
ध- धरती माता की सेवा करण।
न- नकली बात कभी नि बोन।
प- पढ़ण-लेखण पर ध्यान देण।
फ- फंचा आदिम की बात सुण।
ब- बांगी लकड़ी कांधी मा नि रखण।
भ- भरियाँ भवन की चोरी नि कन।
म- मंगण आदिमू की बात नि सुण।
य- यनि-यनि बात मन मा रखण।
र- राम नाम सदा भजण।
ल- लंगी लंगी डाळी कू टुक नि काटण।
व- वखला मा नारियों दगड़ी बात नि कन।
ह- हल लगोण मा सरम नि कन।
स- साधु, संन्तो की सेवा करण।
ा- सनातन धर्म की सेवा करण।
भा- सासू ससुर की सेवा कन।
क्ष- अक्षरों पर ध्यान देण।
त्र- त्रणी तार भगवान करद।
ज्ञा- ज्ञानी यानी एकी तरह बणण।