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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, September 29, 2010

दयब्तौ की खोज !

बोड़ी चौकम छे बैठी ! आंदा जान्दो दगड छे बच्याणी , कि तैबेरी , मेल्या खोलै रामचन्देरी वाख्म एकी बोड़ी से छुई लगाद लगाद पूछंण बैठी

"... हे जी , तुमल भी सुणी ? "
बोड़ी बोली .. "--- क्या ?"

".. ह्या , बुने, क्वाठा भीतर का वो जेवोर , जौकु नौ .... कने लियु उकु नौ " ! बिन्गैकी की बुलद "------ जौक नौ, स्युजू तुमरा देलम बैठुच ! "
बोड़ील वे जाने देखी आर बोली .. " वो कुता सिंह ..! ."

"हांजी, हां ...! " वी--- वी .... "
वीजने घूरी की बोड़ी बोली " ----- कनु क्या ह्वे कुता सिंह थै ? "
" -----सुणम.. आई कि, उकु नाती घोर च बल औणु , अपना दादा प्रददौ कि कुड़ी थै दिखनो अर अपणा नार्सिंग देब्तो कि पुजाई कनु ? "

"---हाँ --- हाँ !" ददल ,त, नि खोजी आज तक अपणी गौंकु बाटु, अपणी पुगाड़ी - पटुली ! ताखुँदै राई ता जिन्दगी भर ! बोई बाटु हेरी २ मोरीगे ! कुड़ी धुर्पाली उजड़ी गीनी !

न उ आयु अर ना नौनी ! द्वी पड़ी तक कैल भी याख्की शुद्ध नि ले ! बोड़ील , सांस लेकी अर वेकि कुड़ी जाने हेरी बोली .... " ब्वारी .. मित बुनू छो कि, यु नर्सिंग इनी ताखुन्दा बस्या लुखो थै भी नाचे नाचे घोर बुलादु ना त कनु छायू ! पैल, ये सबी नौकरी खुज्यणु तखुन्द गिनी ! अर, अब , वो सबी ..., ये जनि अपणा अपणा दय्बतो थै खुज्यानु घोर ऐ जांदा ना..., त , हे पणमेस्वरा .. मी भी त्वेमा सबा रुपया चढाई ध्युलू ! चला , भलु ह्वे वे द्याब्तो जैल वेका नाती पर अपणु रंग दिखाई ! अर वो घर बाड़ी ह्वे !


पराशर गौर
दिनाक ४ अगस्त २०१० स्याम ६ ५३ पर