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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, April 29, 2009

एक दोस्त तो मिले!

तेरे शहर की भीड़ मैं,
गुम हो के रह गई दोस्ती,
आओ इस खुदगर्ज शहर में फिरसे नए दोस्त बनायें.
मौत का बहम इस शहर में,
मौसम और हवा में घुटन सी,
अब कहाँ जाके साँस ली जाये.

पेड़ सब नंगे फकीरों की तरह सहमे से,
बस तपिश है खुदगर्जी की,
कैसे धुप सही जाये.
आस्तीनों में चलो फिरसे सांप ही पाले जाएँ,
आओ इस शहर में एक मित्र बनायें.

यूँ तो हजारों मित्र बनाना कोई करिश्मा नहीं,
करिश्मा तो ये है कि एक ऐसा दोस्त बने,
जो साथ हो उस वक्त तुम्हारे,
जब छोड़ सब तुम्हे दूर हो जाएँ.
आओ एक ऐसा दोस्त बनायें,
सच बस एक ऐसा दोस्त बनायें.

स्वरचित)
मोहन सिंह भैंसोरा,
सेक्टर-९/८८६, रामाक्रिशनापुरम,
नई दिल्ली -११००६६.