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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, April 27, 2009

जंगल जलते हैं

जल रहे हैं जंगल,
क्योंकि, ठहरे जो सरकारी,
कभी बचाते थे ग्रामवासी,
अब नहीं है भागीदारी.

हक्क हकूक उनके नहीं रहे,
अतीत का गवाह है तिलाड़ी,
ढंडक ने जन्म लिया था,
वन अधिकारी थे खिलाड़ी.

रैणी, चमोली में जंगल को,
स्व. गौरा देवी ने कटने से बचाया,
पेड़ों से चिपक कर,
वन ठेकेदार को दूर भगाया.

सीमाओं की रक्षा करके,
जो रिटायर हो जाते,
वन सरंक्षण व आग से रक्षा में,
उन्हें क्यों नहीं लगाते?

जमीन पर जो वृक्ष नहीं लगे थे,
आग लगने पर जल जाते,
नुकसान हो गया है दुगना,
वे तो यही बताते.

अन्तोगत्वा मन में,
ख्याल यही है आता,
हर साल "जंगल जलते हैं",
कौन है उनको बचाता.

सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास:संगम विहार,नई दिल्ली
(23.4.2009 को रचित)