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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, April 27, 2009

मन का ऊबाल

जूता नहीं है संस्कृति,
कुंठित मन का है ऊबाल,
ख़बरों में हैं छा गए,
कुछ ज्यादा इस साल.

नेताओं पर अगर पड़ें,
उन्हें नहीं मलाल,
ख्याति है मिल जाती,
सुखद रहते हाल.

अगर कोई हमारी तरफ,
थोडा सा उठाये,
हम ना समझ को तो,
तुंरत गुस्सा आये.

बनाया था किसी ने,
पाँव में दर्द न होय,
उसे पता नहीं था,
ऐसा करेगा कोय.

एक विज्ञापन देखा,
लिखा था "जूतों का मेला",
देख रहा था बस में बैठा,
दिल्ली, सराय कालेखां पर अकेला.

सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिग्यांसु"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास:संगम विहार,नई दिल्ली
(27.4.2009 को रचित)
दूरभाष: ९८६८७९५१८७