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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, December 2, 2009

खंतडी मुडै छुई

रातिकू खाण-पीणा बाद
जनि हम द्वी झाण पवाडा
सुरक ऱजॆ , मुखं धैरी
खुस-पुश - खुश-पुश बच्याण बैठा
किलैकी ...........
भैरम ब्योई छेई सीई !

वा, बोली...............,
यैसुका साल
खेती-पाती बटवालण क बाद
तुमुन क्या सोची ?
मी थै दगडी लिजैल्या
य घारे रो ?

भाग्यानु का , सी छी
कुई खुच्ली पर त,
कुई पीठम छीन झुंटा खीना
मेरी दा , त ............. ,
बिधातल भी पट
आखी बुजिदी !

क्या छा सुचणा ?
कुछ बुल्ल्या भी य इनी ..
छी भै, युका दगड भी
उफ़ .......... ,
कुनस युका भी, जू
गिचु तक नि उफर्दा !

सुणु छो, सुणु छो
दगडा-दगडी सुचुणु भी छो
जू .. त्वे दगडी लिजोलू त
बोई कु क्या ह्वालू ?
इनकारा , की , मि थै छ्वाडा
उथै ही लिजाव इबरी
उकी दों खूब सोची
अर हमरी दा पीठ किलै ?

छई- साथ साल ह्वेगी ब्यो कया
भैका सो , ......,
सुनी डनड्याली अर
खालि भितरी मी , खाणु आन्द !
अरै ...,
नि समझ, नि समझ उलटा
ब्योईल कतका जी बचण
कखी , निरसे -फटगवसे` जालित ?
प्रभात पुछुलू बोई थै
क्या ?
जू ब्याललित , नि लीजो ..
त.... क्या ?
नि लिजोल . औरी क्या ... ? !

दिखादै दिख्द....
बियाणा धारम एगी
व, पाणी की चली गे
अर मी.....खंताडी पर मारी अंग्वाल;
सुचूणु रों , लीजो की, नि लीजो ?

खैर ........बिखुन्दा खाद बगत
बोई ल बोली ' बीटा ..
खेती-पाती संभालेगी
गोर बचुरु नि न

एक काम कैर ......
ब्वारी थै तखूंद ली जा
हवा पाणी भी बदली जालू अर
दिबा दैणी होई जाली त
क्या पता मी नाती कु मुख देखि सैकु ?
मिन वीक तरफ देखी
अर वींन मेरी तरफ
लगद जन बुलिद दिब्ल हमरी
बात सुणी याली छीई !

पराशर गौर
२७ नंबर ०९ ४.३० बजे स्याम
न्यू मार्किट कैनाडा