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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, November 2, 2009

नाक की प्रतीत !

बात नाक की च साब ! इन बुल्दन की अगर नाक न हो त लोक ............ उ भी खै दीन ! अगर दिखै भी जा त , आजकाल कत्कै इन कना भी छन ! जोंकी नाक ही नी उकी क्या प्रतीत ? बुल्दा कुछ अर करदा कुछ ! बोडी छझा का किनर खाडू ह्वैकी छै चिलाणी !

दिसा फिरागत का बाद जनि मै घोर छो आणू त, बोडी का बचन सुणी मैन पूछी ........
" बोडी जी...! यु सूबैर-- सूबैर लेकी, केकु च यु हल्ला हुणू ?

वा बुन बैठी ... यु मचोद्ल ... सन ५२ बिटी अर आज पट २००० हजार ह्वैगीं ! यु नेताओं न , सदान हम थै ठगा ही च ! बड़ा बड़ा भाषणों माँ बोली की अपणो राज्य मिलालो त उत्तराखंड नौ राखला ! मिलदी अप्ण याखा का नौ जावनु थै काम मिलालू ! बिजली पाणी की समस्या से मुक्ती ! युका बुल्या पर हमन अपणी नाक ( मुझाफर नगर की वो शर्नाक घटना) रखी ! अर जब राज्य मिली त .............

यूँ हमरी नाक गिरीबी धरी दे अर अपणी नाक उंची कानी शुरू के दे .."
मी पुछ्णु छो .. जों की नाक नी,, उकी, प्रतीत ही क्या ?

पराशर गौड़
रात १६ अक्तूबर ०९ ९.४१ पर