बाँध दो बहिना बड़े प्यार से,
आज मुझे तुम राखी,
भाई बहिन के प्यार का प्रतीक,
क्या है दुनिया में बाकी.
बचपन बीता तुम संग बहिना,
खाया खूब हँसाया,
बाँध दो बहिना राखी मुझको,
आज रक्षा बंधन है आया.
कर कामना राजी ख़ुशी की,
आज ख़ुशी है छाई,
लग रहा है स्वर्ग से सुन्दर,
मेरे घर प्यारी बहिना आई.
बांधी राखी आज बहिना ने,
रक्षा कवच है राखी,
भाई बहिन के प्यार का प्रतीक,
क्या है दुनिया में बाकी.
रक्षा करे तेरी माँ चन्द्रबदनी,
तू है मेरी प्यारी बहना,
कहता है कवि "जिग्यांसू"
बहिन तुम सदा सुखी रहना.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
5.8.2009
Thursday, August 6, 2009
प्यारी ब्वै का पास
ऊंचि-ऊंचि डांड्यौं मा हरयुं ह्वैगि घास,
टक्क लगिं मेरी कब जौलु मैं,
प्यारी ब्वै का पास....
घुगति घुराणी मन मेरु उदास,
गौळा मा बाडुळि लगणी,
कब जौलु मैं, प्यारी ब्वै का पास....
रैबार अयुँ छ ब्वैकु,
नि होंणु त्वैन उदास,
जब आला त्यौहार,
बुलौलु त्वैतैं पास.....
कब आला त्यौहार,
लग्युं छौं सास,
रंगमत ह्वैक जौलु,
प्यारी ब्वै का पास.....
ऊंचि-ऊंचि डांड्यौं मा हरयुं ह्वैगि घास,
टक्क लगिं मेरी कब जौलु मैं,
प्यारी ब्वै का पास....
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
4.8.2009
टक्क लगिं मेरी कब जौलु मैं,
प्यारी ब्वै का पास....
घुगति घुराणी मन मेरु उदास,
गौळा मा बाडुळि लगणी,
कब जौलु मैं, प्यारी ब्वै का पास....
रैबार अयुँ छ ब्वैकु,
नि होंणु त्वैन उदास,
जब आला त्यौहार,
बुलौलु त्वैतैं पास.....
कब आला त्यौहार,
लग्युं छौं सास,
रंगमत ह्वैक जौलु,
प्यारी ब्वै का पास.....
ऊंचि-ऊंचि डांड्यौं मा हरयुं ह्वैगि घास,
टक्क लगिं मेरी कब जौलु मैं,
प्यारी ब्वै का पास....
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
4.8.2009
ढोल दमाऊँ
उत्तराखण्ड की संस्कृति का प्रतीक है,
बजाते हैं औजि, जब होता है शुभ काम,
देवालयों में भी बजता है,
और बजता है, जहाँ हैं चार धाम.
ढोल का अपना साहित्य है,
जिसे कहते हैं ढोल सागर,
ढोल की तालों का विवरण है जिसमें,
जैसे गागर में हो सागर.
औजि ढोल बजाकर, सांकेतिक भाषा में,
एक दूसरे से बात करते थे,
बजाते थे जब, तब ढोल की तरंगों से,
पेड़ झूमते और पात झरते थे.
उत्तराखण्ड के हर गाँव में,
बजाते हैं औजि, मस्त होकर,
शबद,रांसू,नौबत,फाग अर् धुयाँळ,
नाचते हैं उत्तराखंडी,
प्यारे पहाड़, कुमौं अर् गढ़वाळ.
जरूरत है आज इसके,
अस्तित्व बचाने की,
हो रहा है लाचार,
अपना रहे हो जिनको,
वो अपनी संस्कृति के,
नहीं हैं हो सकते आधार.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
4.8.2009
बजाते हैं औजि, जब होता है शुभ काम,
देवालयों में भी बजता है,
और बजता है, जहाँ हैं चार धाम.
ढोल का अपना साहित्य है,
जिसे कहते हैं ढोल सागर,
ढोल की तालों का विवरण है जिसमें,
जैसे गागर में हो सागर.
औजि ढोल बजाकर, सांकेतिक भाषा में,
एक दूसरे से बात करते थे,
बजाते थे जब, तब ढोल की तरंगों से,
पेड़ झूमते और पात झरते थे.
उत्तराखण्ड के हर गाँव में,
बजाते हैं औजि, मस्त होकर,
शबद,रांसू,नौबत,फाग अर् धुयाँळ,
नाचते हैं उत्तराखंडी,
प्यारे पहाड़, कुमौं अर् गढ़वाळ.
जरूरत है आज इसके,
अस्तित्व बचाने की,
हो रहा है लाचार,
अपना रहे हो जिनको,
वो अपनी संस्कृति के,
नहीं हैं हो सकते आधार.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
4.8.2009
कभी ऐसा हो सकता है
जब लोग कहेंगे यहाँ गंगा बहती थी,
खूब सूरत तटों पर उसके,
श्रध्दालुओं की स्नान के लिए,
पूजा पाठ हेतु मंदिरों में,
बहुत भीड़ रहती थी.
खूब सूरत धार्मिक शहर,
इसके किनारों पर,
जहाँ लगते थे मेले,
लुप्त हो चुकी अब गंगा,
रह गए हैं अकेले.
आज पथ भूली गई,
या रूष्ट होकर सूख गई,
जिसकी बहती थी अविरल धारा,
प्रकृति का प्रकोप हुआ,
या इंसान ने उसको मारा.
जो भी होगा भविष्य में,
आज गाय को खोल दिया है,
और पवित्र गंगा को,
बांधों में बाँध कर,
त्रस्त होकर मरने के लिए,
जहर घोल दिया है.
सोचो! कभी इसका परिणाम,
गंगा और मानवता के लिए,
घातक हो सकता है,
ये है कवि "जिज्ञासू" की अनुभूति,
"कभी ऐसा हो सकता है"
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
3.8.2009
खूब सूरत तटों पर उसके,
श्रध्दालुओं की स्नान के लिए,
पूजा पाठ हेतु मंदिरों में,
बहुत भीड़ रहती थी.
खूब सूरत धार्मिक शहर,
इसके किनारों पर,
जहाँ लगते थे मेले,
लुप्त हो चुकी अब गंगा,
रह गए हैं अकेले.
आज पथ भूली गई,
या रूष्ट होकर सूख गई,
जिसकी बहती थी अविरल धारा,
प्रकृति का प्रकोप हुआ,
या इंसान ने उसको मारा.
जो भी होगा भविष्य में,
आज गाय को खोल दिया है,
और पवित्र गंगा को,
बांधों में बाँध कर,
त्रस्त होकर मरने के लिए,
जहर घोल दिया है.
सोचो! कभी इसका परिणाम,
गंगा और मानवता के लिए,
घातक हो सकता है,
ये है कवि "जिज्ञासू" की अनुभूति,
"कभी ऐसा हो सकता है"
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
3.8.2009
पुनर्जन्म
कल्पना में हो गया,
बन गया मैं बाघ,
पहुंचा फिर उत्तराखंड में,
अपने गाँव को भाग.
देखा मुझे मेरे पोते ने,
हल्ला खूब मचाया,
भगाओ इस बाघ को,
यहाँ कहाँ से आया.
नहीं भागा मैं गाँव से,
बैठा, जहाँ लगता मंडाण,
मारा सबने लाठी से,
हो गया मैं हन्टाण.
मूक हो सब कुछ सहा,
सबका था मैं पित्र,
बहुत बूढा था उनमें,
मेरा एक प्रिय मित्र.
उसने रोका सबको,
करो न ऐसा काम,
"पुनर्जन्म" हुआ हो,
किसी पित्र का,
रहा हो यही ग्राम.
बात मान ली ग्रामवासियौं ने,
जैसा बूढे प्रिय मित्र ने बताया,
फिर तो क्या था हर ग्रामवासी,
मेरे लिए खाना पीना लाया.
खूब खाया पिया मैंने,
जाने को कदम बढाया,
आने देना इस बाघ को,
सबने सोचा, मन बनाया.
फिर तो क्या था,
जाता रहता, अपने प्यारे गाँव,
देख प्रेम ग्रामवासियौं का,
रूकते नहीं मेरे पांव.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
31.7.2009
बन गया मैं बाघ,
पहुंचा फिर उत्तराखंड में,
अपने गाँव को भाग.
देखा मुझे मेरे पोते ने,
हल्ला खूब मचाया,
भगाओ इस बाघ को,
यहाँ कहाँ से आया.
नहीं भागा मैं गाँव से,
बैठा, जहाँ लगता मंडाण,
मारा सबने लाठी से,
हो गया मैं हन्टाण.
मूक हो सब कुछ सहा,
सबका था मैं पित्र,
बहुत बूढा था उनमें,
मेरा एक प्रिय मित्र.
उसने रोका सबको,
करो न ऐसा काम,
"पुनर्जन्म" हुआ हो,
किसी पित्र का,
रहा हो यही ग्राम.
बात मान ली ग्रामवासियौं ने,
जैसा बूढे प्रिय मित्र ने बताया,
फिर तो क्या था हर ग्रामवासी,
मेरे लिए खाना पीना लाया.
खूब खाया पिया मैंने,
जाने को कदम बढाया,
आने देना इस बाघ को,
सबने सोचा, मन बनाया.
फिर तो क्या था,
जाता रहता, अपने प्यारे गाँव,
देख प्रेम ग्रामवासियौं का,
रूकते नहीं मेरे पांव.
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
31.7.2009
Monday, August 3, 2009
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
न चाहती धन-दौलत न कोई गहना
आकर पास बैठ, दो बोल मीठे सुनाना
अब न बनाना फिर से कोई बहाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के खेत-खलियान तुम्हें बुलाते हैं
कभी खेले-कूदे अब क्यों भूले कहते हैं
जरा अपना बचपन का स्कूल देखते जाना
अपने बचपन के दिनों को याद करना
भूले-बिसरे साथियों की सुध लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव-घर छोड़ अब तू परदेश जा बसा है
बिन तेरे घर अपना सूना-सूना पड़ा है
बूढ़ी दादी और माँ का भी यही कहना है
अपने परदेशी नाती-पूतों को देखना है
आकर घर हसरत उनकी पूरी करना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

खेती-पाती में अब लोगों का मन कम लगता है
गाँव में रहकर उन्हीं शहर का सपना दिखता है
उजडे घर, बंजर खेती आसूं बहा रहे हैं
कब सुध लोगे देख आसमां पुकार रहे हैं
आकर अपनी आखों से हाल देखते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना

गाँव के बूढे बुजुर्ग याद करते रहते हैं
सभी नाते रिश्तेदार भी पूछते रहते हैं
क्यों नाते रिश्तों को तुम भूल गए हो!
जाकर सबसे दूर परदेशी बने हुए हो
आकर सुबकी खबर सार लेते जाना
राह ताक रही है तुम्हारी प्यारी बहिना
अबकी बार राखी में जरुर घर आना
कविता रावत
भोपाल
संघर्ष की सुखद अनुभूति
आशा और निराशा के बीच
झूलते-डूबते-उतराते
घोर निराशा के क्षण में भी
अविरल भाव से लक्ष्य प्राप्ति हेतु
आशावान बने रहना बहुत मुश्किल
पर नामुमकिन नही
होता है इसका अहसास
सफलता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी

झूलते-डूबते-उतराते
घोर निराशा के क्षण में भी
अविरल भाव से लक्ष्य प्राप्ति हेतु
आशावान बने रहना बहुत मुश्किल
पर नामुमकिन नही
होता है इसका अहसास
सफलता की सीढ़ी-दर-सीढ़ी

चढ़ने के उपरांत
चिर प्रतीक्षा चिर संघर्ष के बाद
मिलने वाली हर ख़ुशी बेजोड़ व अनमोल है
क्योंकि इसकी सुखद अनुभूति
वही महसूस कर सकता हैजिसने
हर हाल में रहकर अपना सघर्ष जारी रखकर
कोशिश की सबको साथ लेकर
निरंतर बने रहने की
चिर प्रतीक्षा चिर संघर्ष के बाद
मिलने वाली हर ख़ुशी बेजोड़ व अनमोल है
क्योंकि इसकी सुखद अनुभूति
वही महसूस कर सकता हैजिसने
हर हाल में रहकर अपना सघर्ष जारी रखकर
कोशिश की सबको साथ लेकर
निरंतर बने रहने की
कभी भाग्य के भरोसे नहीं बैठे
लगे रहे कर्म अपना मानकर
और सफलता के मुकाम पर पहुचे
सगर्व, सम्मान
तभी तो कहा जाता है
आदमी अपने भाग्य से नहीं
अपने कर्म से महान होता है
छोटी-छोटी लड़ाईयां जीतने के बाद ही
कोई बड़ी जंग जीतता है
लगे रहे कर्म अपना मानकर
और सफलता के मुकाम पर पहुचे
सगर्व, सम्मान
तभी तो कहा जाता है
आदमी अपने भाग्य से नहीं
अपने कर्म से महान होता है
छोटी-छोटी लड़ाईयां जीतने के बाद ही
कोई बड़ी जंग जीतता है
कविता रावत
भोपाल
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