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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Wednesday, September 29, 2010

Young Uttarakhand Career Guidance Camp - Report

इस कैंप की विस्तृत जानकारी देने से पहले मैं पूरी यंग उत्तराखंड टीम और पूरे उत्तराखंड वाशियों की तरफ से अपने उन सभी भाई, बहिन, माता-पिता और बुजुर्गों को श्रन्धाजली अर्पित करता हूँ जिन्होंने उत्तराखंड और देश के अन्य शहरों में चल रही प्राकृतिक आपदा में अपनी जान गवाईं है. भगवान् सभी मृत आत्माओं को स्वर्ग में शांति प्रदान करे.

कैरियर गाईडेंस कैंप

दिल्ली स्थित उत्तराखंडी प्रवासियों की एक सामाजिक संस्था "यंग उत्तराखंड " समय समय पर विभिन्न प्रकार के सामाजिक कार्यों का क्रियान्वयन करती रहती है जिसका उधेश्य केवल उत्तराखंड के जन समूह का सर्वागीण विकास करना है. यंग उत्तराखंड उत्तराखंड की लोक संस्कृति, साहित्य, समाज और उत्तराखंड के लोक कल्यांर्थ हेतु समय समय पर अपनी कार्यक्षमतानुसार विभिन्न प्रकार के कार्यक्रम आयोजित करती रहती है. इसी कड़ी में एक सामजिक कार्य जिसको "करियर गाईडेंस कैंप" का नाम दिया गया का आयोजन समय समय पर उत्तराखंड के दूरस्थ ग्रामीण क्षत्रों के विद्यालयों में आयोजित करता है, जिसका उधेश्य आने वाली नौजवान पीढ़ी जो अभी अपने शैक्षिक अवस्था में हैं, को शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में उपलब्ध विभिन्न अवसरों से परिचित करवाना है.

हर वर्ष की भांति भी इस वर्ष यंग उत्तराखंड संस्था द्वारा गत १८ सितम्बर २०१० को पौड़ी जिल्ले के जी आई सी इंटर कॉलेज में एक कैरियर गाईडेंस कैंप का आयोजन किया गया. झे एक श्लोक याद आ रहा है, जो अपने आप में एक सभ्य और शैक्षिक समाज के लिए बहुत कुछ कह जाता है.

न चोरहार्यं न च राजहार्यम
न भ्रातभाज्य न च भारकारी
ब्यये कृते वर्धत एव नित्यं
विद्या धनं सर्व धनं प्रधानम


वास्तव में विद्या रुपी धन का जिस्तना ब्यय किया जाय उसका वर्धन उतना ही होता जाता है. इसी विद्या रुपी धन को बाटने के लिए यंग उत्तराखंड संस्था इसका आयोजन कैरियर गाईडेंस कैंप के रूप में आयोजित करती है.

उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यालयों में कैरियर गाईडेंस कैंप की आवश्यकता क्यों?

आज के सूचना प्रोद्योकिकी युग को देखकर ऐसा प्रतीत होता है कि आज हम सभी दुनिया में क्या घट रहा है, क्या क्या नयी टेक्नोलोजी आ रही है, सभी लोग इससे परिचित होंगे. जहाँ कंप्यूटर, मोबाइल, टी वी ने आज हमारे घरों में अपनी पहुच बना दी है जो कि आज हमारी दैनिक दिनचर्या का एक अभिन्न अंग भी बन गया है. ये प्राय देखने को मिलता है कि दिल्ली और देश के अन्य बड़े शहरों में निवास करने वाले सक्षम लोगों के घर बच्चा बाद में जन्म लेता है और उसके मनोरंजन की सामाग्रियों का जुटना पहले ही शुरू हो जाता है. भारत के बड़े शहरों में रहने वाले उच्च और माध्यम वर्ग के अभिवावक जहा बच्चे के जन्म के बाद ही उसके भविष्य, उसकी शिक्षा और उसके कैरियर के लिए चिंतित दिखाई देते है यकीन मानिए ऐसा हमारे उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों के अभिवावकों में ऐसी अनुभूति बहुत कम देखने को मिलती है. जहाँ बड़े शहरों में अभिवावकों द्वारा बच्चे के नर्सरी में दाखिला लेने के बाद ही उनको एक लक्ष्य बोधित कराया जाता है कि बेटा/बेटी आगे चलकर तुम्हे अमुक चीज बननी है और हमारा नाम रोशन करना है, वही हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा कुछ नहीं दिखाई देता है. बच्चा स्कूल में दाखिला लेता है, बच्चा स्कूल में क्या करता है, क्या पढता है, इसकी सुध लेने की शायद कोइ भी अभिवावक कोशिश करता होगा मैं ये निश्चित होकर नहीं कह सकता. शायद ये जागरूकता की कमी है या कोई अन्य कारण, इस पर मंथन की सक्थ आवश्यकता है. एक ग्रामीण वातावरण में पला बढ़ा होने के कारण और वही से शिक्षा ग्रहण करने के अपने अनुभव के आधार पर मैं इतना जरूर कह सकता हूँ कि हमारे ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों को इतना पता जरूर होता है कि ८वी कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद ९वीन में साईंस लेना है (भले वो उस काबिल हो या न हो), १०वी और १२वी में प्रथम आना है, किसी का उद्देश्य केवल १०वी १२वी को पास करना होता है, आगे जाकर बी ऐ, बी एस सी और एम् ऐ, ऍम एस सी करना है और उसके बाद बी एड. यही उनका कैरियर गोल होता है. जो मेरा अनुभव कहता है, वो बस यही कहता है . अब आप लोग समझ सकते हो कि क्यों हमको इन क्षेत्रों में कैरियर गाईडेंस कैंप लगाने की आवश्यकता है.

जी आई सी नौगाँव खाल कैरियर गाईडेंस कैंप - संक्षिप्त परिचय:

जैसा मैंने पहले कहा कि गत १८ सितम्बर २०१० को यंग उत्तराखंड संस्था द्वारा जी आई सी नौगाँव खाल पौड़ी गढ़वाल में एक कैरियर गाईडेंस कैंप का आयोजन किया गया जिनमे प्रतिभाग करने वाले लोगों के नाम इस प्रकार है -


१. सर्व श्री चंद्रकांत नेगी जी
२. सर्व श्री विपिन पंवार
३. सर्व श्री मनु रावत
४. सर्व श्री सुशील सेंदवाल
५. श्रीमती कीर्ति सेंदवाल
६. सर्व श्री आशीष भाटिया
७. सर्व श्री आशीष पांथरी
८. सुभाष काण्डपाल


यंग उत्तराखंड की ८ सदस्यीय टीम में १७ सितम्बर २०१० रात्रि १० बजे दिल्ली से अपनी यात्रा शुरू की जिसमे ३ वर्षीय एक छोटी से बच्ची ( सर्व श्री सुशील सेंदवाल जी की बिटिया) भी शामिल थी जो हमारी इस जोखिम भरी यात्रा का साक्षी बनी

चिर सजग आंखें उनींदी, आज कैसा ब्यस्त बाना
जाग तुझको दूर जाना
अचल हिमगिरी के ह्रदय में आज चाहे कंप हो ले
या प्रलय के आंसुओं में मौन अलसित ब्योम रो ले
आज पी आलोक को डोले तमीर की घोर छाया
जाग या विद्युत शिखाओं में निठर तूफ़ान बोले
पर तुझे है नाश पथ पर चिह्न अपने छोड़ जाना जाग तुझको दूर जाना



कवि की इन पंक्तियों का स्मरण करते हुए, ये जानते हुए भी कि आजकल उत्तराखंड में सफ़र तय करना उचित नहीं है, प्राकृतिक आपदाओं से विप्पित उत्तराखंड जहाँ तहां केवल त्राही ही त्राही नजर आ रही है फिर भी यंग उत्तराखंड की ८ सदस्यी टीम चल पडी अपनी मंजिल की ओर. कई प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं से गुजरते हुए (जिसका वर्णन रिपोर्ट के अंत में जरूर करूँगा) टीम १२ बजे के लगभग जी आई सी नौगाँव खाल के प्रांगण में पहुची, जहा पर विद्यालय के प्रधानाचार्य द्वारा अपने विद्वान गुरुजन वर्ग और और विद्यालय के छात्रों के साथ यंग उत्तराखंड टीम का स्वागत किया गया.


प्रारंभिक स्वागत के उपरांत सभी टीम सदस्य कैंप की तैयारी में जुट गए. कुछ समय बाद १०वी और १२वी के छात्रों को एक सभागार में एकत्रित कर टीम के वरिष्ट सदस्य माननीय श्री चंद्रकांत नेगी जी द्वारा यंग उत्तराखंड संस्था का परिचय छात्र छात्रों और विद्वत गुरुजन वर्ग के साथ करवाया. तदुपरांत श्री नेगी जी ने कैरियर गाईडेंस कैंप की और छात्रो को कैरियर के प्रति सजग रहने की मह्तता पर प्रकाश डाला.

तदुपरांत श्रीमती कीर्ति सेंदवाल जी ने कंप्यूटर शिक्षा के बारे में छात्रों को विस्तृत जानकारी प्रदान की. कंप्यूटर क्षेत्र में शिक्षा और रोजगार के अवसरों पर विस्तृत जानकारी प्रस्तुत करते हुए छात्रों को कंप्यूटर क्षेत्र में कैरियर बनाने के लिए प्रेरित किया. साथ ही साथ चिकित्सा के क्षेत्र में शिक्षा और कैरियर के बारे में छात्रों को विस्तृत जानकारी प्रदान की. छात्र बड़ी तन्मयता और नोटबुक को साथ लेकर श्रीमती कीर्ति सेंदवाल जी को सुन रहे थे और मैं बीच में देख रहा था कि कई बच्चे साथ साथ में अपनी नोटबुक में कुछ कुछ बातें नोट कर रहे थे, जो कि एक अच्छा संकेत दिखाई दे रहा था.


तदुपरांत श्री चंद्रकांत नेगी जी ने छात्रों को आत्म विश्वास के महत्व के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की और और छात्रों को अपना आत्म विश्वास बढाने के लिए प्रेरित किया.
तदुपरांत श्री सुशील सेंदवाल जी ने छात्रों को प्रबंधन क्षेत्र (मैनेजमेंट) में शिक्षा और रोजगार की असीम संभावनाओं के बारे में अवगत करवाया. इसके साथ ही श्री सेंदवाल जी ने आज के प्रतियोगी युग में अंग्रेजी शिक्षा का ज्ञान और उसके महत्व के बारे में छात्रों को विस्तृत जानकारी प्रदान की.


तदुपरांत श्री आशेष भाटिया जो मूलरूप से उत्तराखंडी न होकर भी जिन्होंने हमारे कैंप को ज्वाइन किया. श्री आशीष भाटिया जी ने आई आई टी के टोपर और आई आई टी कानपुर के स्वर्ण पदक विजेता रहे है. श्री आशीष भाटिया जी ने इंजीनियरिंग क्षेत्र में शिक्षा और रोजगार के बारे में छात्रों को विस्तृत जानकारी प्रदान की. साथ ही साथ में विभिन प्रकार की इंजीनियरिंग प्रतिगोगी परीक्षाओं की तैयारी किस प्रकार करनी चाहिए इसकी जानकारी भी छात्रों को प्रदान की. सभी छात्र बड़ी तन्मयता होकर श्री भाटिया जी को सुन रहे थे और मैं देख रहा था कि कैंप के बाद भी कई छात्र ब्याक्तिगत रूप से श्री भाटिया जी से कैरियर के बारे में गुफ्तगू कर रहे थे.

तदुपरांत श्री आशीष पांथरी जी ने विभिन प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बेसिक शैक्षिक योग्यता और प्रतियोगी फॉर्म के बारे में विस्तृत जानकारी प्रदान की

तदुपरांत टीम के अन्य सदयों द्वारा एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता का आयोजन किया गया

सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता आयोजन का उधेश्य:

छात्रों को वर्तमान सम सामयिकी पर नजर रखने और विभिन प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने की ओर मुखरित और प्रेरित करने के लिए यंग उत्तराखंड टीम ने अपने सदस्यों और विद्यालय के गुरुजन वर्ग की देख रेख में २५ मिनट की एक छोटा सी प्रतियोगिता परीक्षा का आयोजन किया. इस प्रतियोगी परीक्षा में सबसे अधिक अंक प्राप्त करने वाले जो तीन छात्र थे उनके नाम इस प्रकार है:

1st पवन पांथरी
2nd. प्रीतम बिष्ट
3rd. विनीत नौटियाल

विजेता छात्रों के उत्साह वर्धन हेतु पारुतोशिक रूप में हर एक बच्चे को एक एक शील्ड प्रदान की गयी जो कि हर एक बच्चे के लिए प्रेरणा का काम करेगी, ऐसा हमारा विश्वास है


छात्रवृति प्राप्त करने वाले छात्र:

यंग उत्तराखंड संस्था द्वारा कुछ आर्थिक रूप से अक्षम छात्रों को आर्थिक मदद के रूप में छात्रवृति प्रदान की गयी जिनके नाम इस प्रकार है:

१. विनीत नौटियाल (12th)
२. प्रकाश सिंह (11th)
३. हिना (11th)
४. कुलदीप सिंह (11th)
५. श्रवण सिंह (11th)

इसके अलवा यंग उत्तराखंड द्वारा कैरियर से सम्बन्धित पुस्तकें स्कूल के पुस्तकालय को दान दी

हम भगवान् से प्रार्थना करते है कि इन बच्चों का भविष्य उज्जवल हो और सुख समृधि का इनके घर में वास हो.

यंग उत्तराखंड संस्था को इस कैंप के सफल आयोजन के लिए दी गयी धन राशी देने वाले दानी दाताओं की सूची:



यंग उत्तराखंड अपने उन तमाम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष आर्थिक रूप से सहायता करने वाले उन सभी दानी दाताओं और एक शब्द में कहों तो सहयोग कर्ताओं का दिल से धन्याबाद करते हैं जिनके सहयोग के बिना शायद ये काम मुश्किल ही नहीं नामुमकिन था.

१. सर्व श्री चंद्रकांत नेगी जी - 5000
२. सर्व श्री गणेश बिजल्वान - 5000
३. सर्व श्री सौरभ नाकोटी - 1000
४. प्रकाश सिंह बिष्ट - 500
५. श्रीमती अलका गोदियाल भट्ट - 2000
६. सर्व श्री जय गुसाई -500
७. गुप्त दान -1000
८. सर्व श्री सुभाष कुकरेती -500
९- सर्व श्री विजय पाल सिंह - 500
१०. श्रीमती अनीता डिमरी -5000
११. सर्व श्री जसदेव सिंह नेगी -1000
१२. सर्व श्री दीपक -500
१३. सर्व श्री आशीष पांथरी 1000
१४. सर्व श्री निर्मल पांडे-500
१५. सर्व श्री प्रताप थाल्वाल 151
१६. सर्व श्री शांतनु सिंह -1000
१७. सर्व श्री पंकज पटवाल -500
१८. सर्व श्री सुशील सेंदवाल - 500
१९. सर्व श्री हेमेन्द्र गुसाई -5000





कुछ पंक्तियाँ याद आ रही है-

तन से सेवा कीजिये, मन से भले विचार
धन से इस संसार में, करिए पर उपकार.


ऐसी वैचारिक और परोपकारी सोच रखने वालों की आज भी हमारे समाज में कमी नहीं है. एक बार पुनह इन सभी सहयोगकर्ताओं का सहृदय धन्यावाद

समापन समारोह:

कैंप के समापन पर यंग उत्तराखंड टीम के वरिष्ठ सदस्य श्री चंद्रकांत नेगी जी द्वारा विद्यालय परिसर एवं आदरणीय प्रधान्चार्य महोदय और समस्त गुरुजन वर्ग को पूरी संस्था की ओर से धन्यबाद प्रेषित किया गया जो कि उन्होंने संस्था को इस विद्यालय परिसर भी कैंप लगाने का अवसर प्रदान किया. प्रत्युतर में विद्यालय के प्रधानाचार्य द्वारा सभी सदस्यों को धन्यबाद दिया और संस्था द्वारा संचालित ऐसे सामाजिक कार्यों की भूरी भूरी प्रंशंसा की. प्रधानाचार्य महादोय ने भविष्य में भी ऐसे ओर कैंप लगाने का निवेदन संस्था से किया और संस्था के उज्जवल भविष्य की कामना की.



अंतत:

कवि मथिलीशरण जी की २ पंक्तियाँ याद आ रही है-

मैं यहाँ नहीं संदेशा स्वर्ग का लाया
इस पृथिवी को ही स्वर्ग बनाने आया


कितनी बड़ी बात मथिलीशरण गुप्त जी ने इन २ पंक्तियों में कही है, अगर हम सभी लोग इन पंकित्यों का अर्थ समझ ले और उसको आत्म सात करने की कोशिश करें तो जरूर एक दिन यह पृथिवी स्वर्ग बन जाएगी, न कोई भूखा सोयेगा, ना कोई पानी के लिए तरसेगा, न कोई जाड़े की कंपकपाती ठण्ड में ठिठुरता हुआ नजर आएगा, न कोई बच्चा अशिक्षित रहेगा, न कोई केवल इसलिए अपनी मृत्यु को प्राप्त करेगा कि इलाज के लिए उसके पास पैसा नहीं था. एक सभ्य समाज बनेगा, एक संस्कारित समाज बनेगा, एक दयावान समाज बनेगा और सबसे बड़ी बात एक आदर्श राष्ट्र का निर्माण होगा जिसमे ये सभी गुण समायोजित होंगे.

इस प्रकार के शिवरों का आयोजन समाज में एक चेतना जगाने के लिए और एक सुसंस्कृत और शैक्षिक समाज बनाने के लिए इस आशा के साथ किया जाता है कि आने वाली पीढ़ी और समाज को इसका १०गुना होके ब्याज मिले अर्थात उनको इसका १० गुना होके लाभ मिले.

रास्ता है लम्बा
मंजिल है दूर
मिलके चलेंगे मिलके जरूर
हम हैं नए नयी है सोच हम चलेंगे तान के जोश
अब हमें कोई दर नहीं
जब मिलकर चलते है हम सभी



इसी आशा के साथ कि अभी हमारी मंजिल बहुत दूर है, हमें अपने समाज को बहुत कुछ लौटाना है जिसने आज हमें इतना सब कुछ दिया, कहते है कि मात्री और पित्र ऋण को कभी भी नहीं चुकाया जा सकता है, उसी प्रकार हमारे उपर एक और ऋण है वो है हमारी इस जन्म और कर्म भूमि का ऋण जो हम कभी नहीं चुका सकते बस अपनी तरफ से केवल एक कोशिश जरूर कर सकते है. आप सभी लोगों से विनती है कि इस कारवां में तन मन और धन जुड़िये और एक नयी चेतना का विकास समाज में प्रज्वलित करें.

हमारा मकसद केवल कैरियर गाईडेंस कैंप तक ही सीमित नहीं है,. हम उत्तराखंड के उज्जवल भविष्य के लिए और उत्तराखंड के जन समूह, उत्तराखंड की लोक संस्कृति,साहित्य और समाज के लिए हर वो कार्य अपनी क्षमतानुसार करना चाहते है, जिसमे लोक हित छिपा हो, जिसमे उत्तराखंड का विकास निहित और और जिसमे एक सभ्य समाज की परिकल्पना कल्पित हो. आप सभी सदस्यों का अमूल्य योगदान इसमें वांछनीय है.

अंत में कवि की इन पंक्तियों के साथ छोड़े जा रहा हूँ कि जरूर कल एक सबेरा होगा और हर प्रकाशमयी सबेरे के साथ हमारे साथ नव चेतना से परिपूर्ण, अपनी मातृभूमि और जन्मभूमि के लिए समर्पित भाव से काम करने वाले लोग जुड़ते जायेंगे और एक नया सामाजिक कारवां बनता जायेगा.

देख दुर्भाग्य धीरज न खोना,
शीघ्र शौभाग्य फेरा लगेगा
रात्रि जितनी अँधेरी रहेगी भोर उतना उजेरा लगेगा



आपके बहुमूल्य सुझावों और प्रतिक्रियाओं का हमेशा तहे दिल से स्वागत किया जाता है. इस कैंप के बारे में भी यदि आपके पास कुछ सुझाव है तो जरूर हम तक पहुचाएं, निश्चित रूप से आपके सुझाव आने वाले सामाजिक कैरियर गाईडेंस कैंप में सहायता प्रदान करेंगे. इस कैंप के बारे में ज्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए यंग उत्तराखंड डिस्कसन फोरम पर आएये.वहा पर आप कैंप से समबन्धित फोटोस और वीडियोज का आनंद ले सकते है.


http://www.younguttarakhand.com/community/index.php
http://www.younguttarakhand.com/
जय हिंद जय उत्तराखंड
सुभाष काण्डपाल

आवा गढ़वाळी सिखला -१३

Let us Learn Garhwali -13
Bhishma Kukreti
व्याकरण (Grammar )
अविकारी पद (अव्यय )
गढवाली मा अविकारी श्ब्दुं भरमार च . अविकारी शब्द चार किस्मों होंदन पण गढवाली मा पांच किस्मौ अव्यय होंदन
१- क्रिया विशेषण
१अ - कालवाचक ------ अब्बी, ब्याळी /ब्याले , भोळ, अज्युं , एकदां , कैबरी -कैबरी
१ब - स्थानवाचक ------अगने, ऐंच , ढीस, मळथूण , मथि, मूड़
१ स - रीतिवाचक ----- ठंडो - मठों/ ठnडु -मठु , अन्कैक /औंकैक , घल्ल
1 ड़ - प्रश्नवाचक -----किले, क्थ्गा, कख
१ इ- परिमाणवाचक -- अति, थुपडोंन , इच्छि, बिंडि
१ फ -कारणवाचक - यान, इलै
१ ग - स्वीकार्वाच्क --योअ, हूँअ , हो
1 ह - निषेधवाचक - ऊंह , अहाँ , कर्तना ,
२- सम्बन्ध वोधक
ऐथर, बगैर, सी, दगडे ,
३- स्म्मुच्च्य वोधक
3a - संयोजक ----- अर, बि,
३ब - वियोजक -- चा, निथर
३स - विरोध दर्शक --- पर
३ द - परिमाण दर्शक -- यान /इलै
3 ई - कारण वाचक - किलेक़ि
३ फ - उद्देश्य वाचक - जनकी /ज्याँक़ि
३ ग - संकेत वाचक ---- जु, त
h - व्याख्या वाचक -- हैंकि ऩा ! यानी क़ि !
४ - विस्मयबोधक
स्या !, दयार ! , चूचो ! यूँ ! हे राम दा ! हैं ! ह्व़ा !
५ - अनुकार मूलक
टळपळ- टळपळ, ख्ल्तं , खीं -च्वी, पुल्ल - पुल्ल , सड़म. द्ड्म, च्यां

सीएम वंश की असंतुष्टि

लोक के तंत्र में ‘सीएम’ वंशीय प्राणियों की असंतुष्टि का असर क्लासरूम तक में पहुंच चुका था। मास्टर जी बेंत थामे थे। मगर, बेंत का मनचाहा इस्तेमाल न कर पाने से वे बेहद असंतुष्ट भी थे। विधायिका और कार्यपालिका नामना कक्षा के छात्र मास्साब की बेंत से बेखौफ उनके हर आदेश का ‘अमल’ निकालकर प्रयोग कर रहे थे। सो मुछों पर ताव देकर मास्साब ने छात्रों से ‘सीएम’ वंश की असंतुष्टि पर निबन्ध तैयार करने को कहा। फरमान जारी होते ही कक्षा में सन्नाटा सा पसर गया। क्योंकि वे छात्र भी एक सीएम (कामनमैन) वर्ग से जो जुड़े थे। सभी छात्र निबन्ध पत्र की कापी तैयार करने के लिए मुंडों को जोड़कर बौद्धिक चिंतन में मशरूफ हो गये। निश्चित ही छात्रों ने भी अपनी ज्ञान ग्रन्थियों को खोलकर काफी कुछ लिखा। इस काफी कुछ से सार-सार के संपादित अंश सैंदिष्ट हैं।
‘सीएम’ वंश की धराओं का भूगोल समाज सापेक्ष संस्कृति में दो पंथों में विभक्त है। एक निगुण धारा। जोकि ‘कामनमैन’ के रूप में यथास्थिति वाद पर किंकर्तव्यविमूढ़ है। निगुण इसलिए, क्योंकि ‘सीएम’ इनके लिए कुछ भी अच्छा कर दे ये उसका गुण नहीं मानते हैं। तो दूसरा सगुण मार्गीय ‘चीफ मिनिस्टर’ पंथ। जोकि हाईकमान की नित्य पाद् पूजा के निहितार्थ को जानता है। वह अपनी मूल बिरादर वंश की अपेक्षा हाईकमान को ही तरजीह देता है। आखिर कुर्सी के नीचे पद का गलीचा हाईकमान का ही है।
भेद-विभेद के बावजूद दोनों पंथ एक दूसरे के पूरक भी हैं और यदाकदा विरोधी भी। एक वोट देता है, दूसरा वोट मांगने के साथ ही छीनता भी है। एक उत्तरोत्तर विकास की अभिलाषा में बार-बार ठगा जाता है। दूसरा ‘ठग’ कला में उत्तरोत्तर पारंगतता हासिल करता है। नतीजा कि ‘माया महा ठगनी....’ की अर्थवत्ता के बाद भी एक महीन रेखा में दोनों आपस में बंधे रहते हैं। इस रेखा का प्रतिकाकार कभी गाढ़ा हो उठता है और कभी फासलों में अनपेक्षित दूरी भी बना डालता है। निगुण पंथी जहां सतत् विकास के दावों की हकीकत जानने के बाद भी दलीय निष्ठाओं के चलते संतुष्ट होने का प्रयास करता है। तो सगुण मार्गी विकास के लिए ‘बांक’ भर देने से संतुष्ट नहीं होता। बल्कि बांक देने की परंपरा पर अविश्वास भी जाहिर करता है। यही वक्त होता है। जब सगुण ‘सीएम’ निज तुष्टि का राजफाश करने की बजाय ‘असंतुष्टि राग’ को ‘तोड़ा’ बनाकर यथासमय ‘बिलम्बित’ ताल की संगत में गाता चला जाता है। और दूसरा सीएम महज इसलिए तुष्ट कि पहला ‘सीएम’ असंतुष्ट तो है। हालांकि आमतौर पर यह रणनीतिकारों की मत सम्मति का भाव नहीं है।
असंतुष्टि को प्रायः गति व प्रगति का कर्ता माना जाता है। जब कुर्सी वाला सीएम राग असंतुष्ट की प्रस्तुति से विभोर हो तो, जन्मना ‘असंतुष्ट’ सीएम (कामनमैन) निश्चित ही अपने असंतुष्टि के शेयरों को ‘दलाल पथ’ में भुनाने की कोशिश करता है। हालांकि वहां भी उनके धड़ाम होने में देर नहीं लगती। सो आखिर में उसे वोटों की बिकवाली का सहारा लेकर अपना अस्तित्व गांठने का इंतजाम हर हाल में करना होता है। लिहाजा दूसर ‘सीएम’ की अपेक्षा कामनमैन के मौजूं असंतोष में विस्मय जैसा कुछ भी उभरकर नहीं आता।
क्लासरूम में जहां सभी छात्र निबन्ध के बंधैं को निपुण जुलाहे की भांति तांत-तांत बुन रहे थे। तो वहीं मास्साब रूटीन चैकिंग में सभी कापियों से सार-सार गह रहे थे। कि, कामन सीएम की संगत के चिरंतन ठौर चाय-काफी हाऊस हुआ करते हैं। जहां वे अपनी दलीय निष्ठाओं के साथ तुर्की बा तुर्की धोबी पछाड़ का दांव आपस में हमेशा खेलते हैं। इस दौरान यदि तर्क-वितर्क की गेंद हाफबॉली हुई तो समझो लगा छक्का और ‘सुदामा’ की गेंद हुई तो गई जमुना में। हालांकि तब भी सचिव ब्रांड रेफरी उनका रन काउंट नहीं करता है। वहीं गेंद यदि बाऊंस हुई तो दूसरा सीएम अक्सर बल्ले के साथ खुद को भी लाइन से हटा लेता है। ऐसे में इन अड्डों पर बौद्धिक जुगाली का माहौल तापमान के सेल्सियस बढ़ा देता है। निष्कर्षतः तेल कितना पिरोया गया, इसमें कामनमैन के सरोकार भले ही झाग बनाने तक ही सीमित रहते हों। मगर ‘संजयों’ को मालूम है कि, कई बार इस तेल का असर ‘वियाग्रा’ से भी मारक होता है। उधर ‘सीएम’ जानते हैं कि, उनका ‘राग असंतुष्ट’ बंदरों को बंटवारे के बाद भी उन्हें संतुष्ट रखेगा। क्योंकि उनका काम भी सिर्फ तुष्ट रखना है। पुष्ट रखना कदापि नहीं। असंतुष्ट रथ के सारथी ‘सीएम’ की दिशा दशा का वर्णन करते हुए छात्रों ने लिखा कि, इस वर्ग का प्राणी राजभोग की विलासिता में तो संतुष्ट रहता है। किंतु, वैभव की कुर्सी के पायों की स्तंभन शक्ति के लिए ‘वियोगी होगा.....’ की शैली में हमेशा असंतुष्टि के विराट दर्शन देता है। ताकि निगुण सीएम अपनी तुष्टि के सपनों को उनकी तुष्टि से ‘मैच’ न कर सके।
निबन्धीकरण के दौरान छात्रों की कापियों से मास्टर जी का टेपीकरण अभियान जारी था। वे छात्रों के ‘सीएम’ ज्ञान से अविभूत भी नजर आ रहे थे। लेकिन वे भी संतुष्टि के अपने भावों को सगुण ‘सीएम’ की तरह चेहरे पर आने से रोके हुए थे। मास्साब निबन्ध का निष्कर्ष जानना चाहते थे। परन्तु, छात्रों ने भी उतावलेपन की बजाय ‘वेट एण्ड वाच’ के लक्षणों को ही अपनी आखिरी पंक्तियों में उद्धृत किया।

मुण्ड निखोळु

गौळा फर हरेक मनखी का,
बध्याँ छन बंधन,
जौंका फेर मा अल्झ्युं छ,
यीं दुनियाँ का जाळ मा,
कुछ मनखी पहाड़ का हम,
प्रदेश मा रूमणाणा छौं,
मन भटकणु छ कखि,
वे प्यारा कुमौं अर गढ़वाल मा.

रात दिन सोचणा छौं,
कब निब्टलि प्रदेश की जिंदगी,
तब जौला "मुण्ड निखोळु" करिक,
अपणा प्यारा मुल्क,
रौला सुखि हाल मा,
देवभूमि उत्तराखंड का,
प्यारा कुमौं अर गढ़वाल मा.

जागणा होला हमतैं,
अपणा मुल्क का प्यारा,
घन्ना, मंगतु अर मोळु,
हमारा मन भी उलार छ,
कब होलु "मुण्ड निखोळु".

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(यंग उत्तराखंड और मेरा पहाड़ पर प्रकाशित और सर्वाधिकार सुरक्षित)
दिनांक: ७-९-२०१०

देवभूमि तेरा दर्द

तिस्वाळे हैं गाँवों के धारे,
नदियाँ हैं तो प्यासे लोग,
कैसे बुझेगी पर्वतजनों की तीस?
देखो कैसा हैं संयोग.

प्राकृतिक संसाधन बहुत हैं,
मनमोहक प्रकृति का सृंगार,
पलायन कर गए पर्वतजन,
जहाँ मिला उन्हें रोजगार.

रंग बिरंगे फूल खिलते हैं,
जंगलों में पक्षी करते करवल,
वीरानी छा रही गावों में,
कम है मनख्यौं की हलचल.

जंगल जो मंगलमय हैं,
हर साल जल जाते हैं,
कितने ही वन्य जीव,
अग्नि में मर जाते हैं.

पुंगड़े हैं बंजर हो रहे,
कौन लगाएगा उन पर हल?
हळ्या अब मिलते नहीं,
बैल भी हो गए अब दुर्लभ.

पशुधन अब पहाड़ का,
लगभग हो रहा है गायब,
छाँछ, नौण भी दुर्लभ,
घर्या घ्यू नहीं मिलता अब.

ढोल दमाऊँ खामोश हैं,
ढोली क्यों उसे बजाए,
हो रहा है त्रिस्कार उसका,
परिजनों को क्या खिलाए.

नदियों को है बाँध दिया,
गायों को है खोल दिया,
देवभूमि की परंपरा नहीं,
हे मानव ऐसा क्यों किया?

हे पर्वतजनों चिंतन करो,
सरकार अपनी राज्य है अपना,
"देवभूमि तेरा दर्द" बढ़ता ही गया,
साकार नहीं सबका सपना.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, मेरा पहाड़, यंग उत्तराखंड पर प्रकाशित)
(१६.८.२०१०)दूरभास: 09868795187
जन्मभूमि: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल

दयब्तौ की खोज !

बोड़ी चौकम छे बैठी ! आंदा जान्दो दगड छे बच्याणी , कि तैबेरी , मेल्या खोलै रामचन्देरी वाख्म एकी बोड़ी से छुई लगाद लगाद पूछंण बैठी

"... हे जी , तुमल भी सुणी ? "
बोड़ी बोली .. "--- क्या ?"

".. ह्या , बुने, क्वाठा भीतर का वो जेवोर , जौकु नौ .... कने लियु उकु नौ " ! बिन्गैकी की बुलद "------ जौक नौ, स्युजू तुमरा देलम बैठुच ! "
बोड़ील वे जाने देखी आर बोली .. " वो कुता सिंह ..! ."

"हांजी, हां ...! " वी--- वी .... "
वीजने घूरी की बोड़ी बोली " ----- कनु क्या ह्वे कुता सिंह थै ? "
" -----सुणम.. आई कि, उकु नाती घोर च बल औणु , अपना दादा प्रददौ कि कुड़ी थै दिखनो अर अपणा नार्सिंग देब्तो कि पुजाई कनु ? "

"---हाँ --- हाँ !" ददल ,त, नि खोजी आज तक अपणी गौंकु बाटु, अपणी पुगाड़ी - पटुली ! ताखुँदै राई ता जिन्दगी भर ! बोई बाटु हेरी २ मोरीगे ! कुड़ी धुर्पाली उजड़ी गीनी !

न उ आयु अर ना नौनी ! द्वी पड़ी तक कैल भी याख्की शुद्ध नि ले ! बोड़ील , सांस लेकी अर वेकि कुड़ी जाने हेरी बोली .... " ब्वारी .. मित बुनू छो कि, यु नर्सिंग इनी ताखुन्दा बस्या लुखो थै भी नाचे नाचे घोर बुलादु ना त कनु छायू ! पैल, ये सबी नौकरी खुज्यणु तखुन्द गिनी ! अर, अब , वो सबी ..., ये जनि अपणा अपणा दय्बतो थै खुज्यानु घोर ऐ जांदा ना..., त , हे पणमेस्वरा .. मी भी त्वेमा सबा रुपया चढाई ध्युलू ! चला , भलु ह्वे वे द्याब्तो जैल वेका नाती पर अपणु रंग दिखाई ! अर वो घर बाड़ी ह्वे !


पराशर गौर
दिनाक ४ अगस्त २०१० स्याम ६ ५३ पर

बसगाळ्या बरखा

चौक मा चचेन्डी, तोमड़ी लगिं,
कुयेड़ी लगिं घनघोर,
तितरू बासणु गौं का न्योड़ु,
द्योरू होयुं अंध्याघोर.

मनखी बैठ्याँ भितर फुंड,
बरखा लगिं झकझोर,
फूल्टी भरी ऊस्यौण लग्याँ,
मुंगरी, गौथ अर तोर.

हरीं भरीं दिखेण लगिं,
कोदा झंगोरा की सार,
डांडी कांठ्यौं मा छयुं छ,
संगति हर्युं रंग हपार.

रसमसु होयुं छ द्योरू,
बगदा बथौं कू फुम्फ्याट,
कखि दूर सुणेण लग्युं,
गाड गद्न्यौं कू सुंस्याट.

विरह वेदना मन मा लगिं,
पति जौंका परदेश,
देवतौं छन मनौण लगिं,
कब बौड़ि आला गढ़देश.

छोरा छन कौंताळ मचौणा,
ऐगि "बसगाळ्या बरखा",
दादा दादी बोन्न लग्याँ,
हे बेटों भितर सरका.

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(१.८.२०१०)
दिल्ली प्रवास से.....