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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Monday, March 19, 2018

चंद शासन (1600 -1700 ) में उत्तराखंड पर्यटन

Uttarakhand Tourism from 1600-1700
(  में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
  -
उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -42
-
  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  42                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--147 )       उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 147   

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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  1600 से 1700 मध्य चंद शासकों लक्ष्मी चंद (1597-1621 ई  ), दिलीप चंद (1621 -1624 ई ), विजय चंद (1624 -25 ), त्रिमल्ल चंद (1625 -1638 ), बाज बहादुर चंद (1638 -1678 ), द्योत चंद (1678 -1698 ) ने कुमाऊं पर शासन किया।  
   यह काल भी युद्ध पर्यटन या राजनैयिक उठापटक पर्यटन के लिए जाना जाएगा। 
 पर्यटन विकास की दृष्टि से कुछ घटनाएं महत्वपूर्ण हैं। 
लक्ष्मी चंद ने गढ़वाल पर सात बार आक्रमण किया और पराजय मिली। 
लक्ष्मी चंद 1612 में जंहागीर के दरबार में उपस्थित हुआ और उसने जहांगीर को पहाड़ी टटटु ,गूंठ , अनेक शिकारी पक्षी कस्तूरी से भरी नाभ , कस्तूरी मृग की खालें , खड्ग उपहार दीं।  जहांगीरनामा  में लक्ष्मी चंद को पर्वतीय राजाओं में सबसे अधिक धनी माना गया है और कुमाऊं में सोने की खान है लिखा गया है। 1620  में भी कुमाऊं से जहांगीर को उपहार दिए गए थे। कुमाऊं के उपहार विशेष दर्जे के थे। जब जहांगीर ग्रीष्म ऋतू राजधानी खोज में हरिद्वार आया तो लक्ष्मी चंद जहांगीर से मिला।  उपहार भी दिए ही होंगे। स्थान विशेष उपहार स्थान छवि वृद्धि कारक होते हैं। 
  दिलीप चंद से पहले ही मंत्रियों व संतरियों के आपस में कलह शुरू हो गया था जो राज्य के अहित में अधिक सिद्ध हुआ। विजय चंद की हत्त्या की गयी।  
 त्रिमल चंद कुछ माह श्रीनगर में रहा। 
 बाज बहादुर चंद  ने लखनपुर मंदिर , बद्रीनाथ मंदिर सोमेश्वर मंदिर व पिननाथ मंदिर को भूमि प्रदान की थी। उसने अन्य मंदिरों में भी दान किया था। 
 बाज बहादुर चंद शाहजहाँ दरबार में उपहार लेकर उपस्थित हुआ था। बाज बहादुर व सिरमौर हिमाचल के राजा  मन्धाता को गढ़वाल जितने का फरमान मिला था। 
    उद्योत चंद ने कई मंदिरों का जीर्णोद्धार किया व निर्माण किया था।  कुछ विशेष भवन भी द्योत चंद ने निर्मित करवाए। द्योतचंद ने यज्ञ करवाए व कई मंदिरों को भूमि प्रदान की।  
उद्योत चंद ने काशीपुर , कोटा में आम बाग़ लगवाए।
           विदेशी विद्वानों को आश्रय याने जनसम्पर्क 
 बाज बहादुर के आश्रय में कई विद्वान् थे जिनमे महाराष्ट्रियन संस्कृत विद्वान् अनंत देव ने स्मृति कौस्तुभ की रचना की। 
  उद्योत चंद ने दक्षिणी विद्वान् भट्ट को भूमि व मकान देकर अल्मोड़ा में बसाया। 
 द्योतचंद के दरबार में दूर दूर से कवि व विद्वान् चर्चा हेतु आते थे। 
   मतिराम ने उद्योत चंद प्रशंसा कविता से राजा से पुरूस्कार प्राप्त किया था। मदन कवि भी उद्योत चंद के दरबार में था। 
 उपरोक्त तथ्य संकेत देते हैं कि विद्वान् कुमाऊं आते जाते रहते थे जो छवि वृद्धि करते थे।  भट्ट ब्राह्मण का अल्मोड़ा में बसवाना द्योतक है कि गैर कुमाउँनी ब्राह्मण किसी इन्हीं कारणों से कुमाऊं में बस रहे थे। 
    विदेशी विद्वानों द्वारा प्रशंसा सदा से ही स्थान छवि वृद्धि कारक होता है।
      वर्तमान संदर्भ में - विदेशी पत्रकारों व लेखकों का स्वागत 
   किसी भी पर्टयन स्थल को विदेशी पत्रकारों व लेखकों की स्थान प्रसिद्धि हेतु अति आवश्यकता होती है जो स्थान छवि वृद्धि करें।  स्थान प्रसिद्धि हेतु पर्यटन पत्रकारों की सकारात्मक पैरवी आवश्यक है। 



Copyright @ Bhishma Kukreti   15/3 //2018 
ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  (कुमाऊं का इतिहास ) -part -10
-

  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  

चंद राज्य (1420 -1499 ) में पर्यटन -2

Tourism in Chand Kingdom, Kumaon -2
( चंद युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -40
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  40                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--145 )       उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 145   

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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 चंद राजाओं उद्यान चंद (1420 -22 , हरीशचंद (1422 -23 ), विक्रम  चंद (1423 -1434 ), कालि कल्याण  चंद (1434 -1468 ), भारती चंद (1444 -55  और 1468 -1499 ) का  काल युद्ध , आंतरिक विरोध , भाभर तराई में आक्रांताओं की लूटपाट व छीना झपटी व बाहर से सैनिकों व बाह्मणों के आगमन का काल है। 
    उद्यान /ध्यान चंद ने ज्ञान चंद के पाप प्रायश्चित हेतु एक साल के लिए कर माफ़ किये , बाला जी मंदिर का जीर्णोद्धार किया, ब्राह्मण कूर्म शर्मा व माहेश्वरी को भूमि प्रदान की व मंदिर पूजा हेतु एक गुजराती ब्राह्मण पुत्र सुखदेव को आमंत्रित किया जिससे गुजराती ब्राह्मण श्रीचन्द्र  रुष्ट हो चम्पावत से बारामंडल की ओर चला गया।  यह प्रकरण संकेत दे रहा है कि मैदानों से ब्राह्मण का आना व कुमाऊं सम्मान सहित बसना एक संस्कृति बन चुकी थी या बन रही थी। 
  सुलतान की सेना ने 1423 में कटेहर में प्रवेश किया साथ साथ  कटेहर से उपद्रवियों का पीछा करते भाभर -तराई में प्रवेश किया  वहां से से  कर उगाया और चला गया ,  पुनः 1424 में सुलतान की सेना ने भाभर में ही प्रवेश नहीं किया अपितु कुमाऊं की पहाड़ियों में भी प्रवेश किया।  
   ध्यान चंद ने कत्यूरी क्षेत्र भी जीता। 
     कलि कल्याण चंद  शासन अत्त्याचार के  उसके पुत्र भारती के विद्रोह के लिए अधिक जाना जाता है। डोटी शाशकों के मध्य अंतर्कलह से भी चंद राज्य का विस्तार हुआ। 
    मानस भूमि पर भूमि व्यवस्था की नींव राजा रत्न चंद ने रखी।  रत्न चंद ने जागेश्वर मंदिर हेतु भूमि प्रदान की।  रतन   चंद का  डोटी से फिर युद्ध हुआ। 
   भारती चंद के समय डोटी व् अन्य छोटे राजा फिर से स्वतंत्र हो गए  . भर्ती चंद ने फिर डोटी के क्षेत्र पर अधिकार किया व सीमा पर सैनिक टुकड़ियां रखी गयीं। 
   इसी समय नाथ गुरु सत्यनाथ का आगमन गढ़वाल हो चुका था व सत्यनाथ की प्रसिद्धि चम्पावत पंहुच गयी थी। 
       नाथ सम्प्रदायियों की प्रसिद्धि याने सिद्ध गुरुओं  का पर्यटन कुमाऊं में बढ़ गया था।  
       कटेहर पर सुलतान के भारी दबाब से कुमाऊं में शरणार्थी पर्यटन  क्रमशः जारी रहा और संकेत मिलता है कि शरणार्थी कुमाऊं में बसते गए। 
       गुजराती ब्राह्मण श्रीचन्द्र द्वारा चम्पावत छोड़ बारामंडल की ओर प्रस्थान इतिहास इंगित करता है कि बाह्य ब्राह्मण का अप्रत्यासित  घटना नहीं अपितु कर्मकांडी व विद्वान ब्राह्मणों को जनता बसाती रहती थी।  
        मंदिरों के रखरखाव  मंदिर बनाने की संस्कृति में ह्रास ही हुआ होगा।  कत्युरी मन्दिरों का शासन के ताम्रपत्र , शिलालेखों में उल्लेख से साफ़ संकेत मिलते हैं कि इन मन्दिरों का प्रबन्धन नही किया गया और धार्मिक पर्यटन में गिरावट ही रही .
      युद्ध का सीधा अर्थ है कि बाहर से भी सैनिकों को भर्ती किया जाता  रहा होगा।  
  


Copyright @ Bhishma Kukreti   13/3 //2018   

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  (कुमाऊं का इतिहास ) -part -10
-

  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; 

प्रारम्भिक चंद वंशीय राज्य में हीन उत्तराखंड पर्यटन

Uttarakhand Tourism in Initial Chand Kingdom 
( चंद  राज्य में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -39
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  39                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--144 )       उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 144   

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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   थोरचंद /सोमचन्द से ज्ञान चंद (1420 ) तक चम्पावत का इतिहास मुख्यतः जनश्रुतियों व ब्रिटिश शासन को दिए गए वंशावली पर आधारित लिखा गया है।  ज्ञानचंद ( 1367 -1420 ) थोरचंद के चचा का वंशज माना जाता है। थोरचंद से लेकर ज्ञानचंद को गद्दी मिलने तक उथल पुथल व चंद राजाओं द्वारा राज्य विस्तार ही दीखता है।  राज्य प्रजा हित  गौण ही रहा है।
     
       माल (भाभर -तराई ) में शरणार्थियों व मुस्लिम आक्रांताओं की वसावत 
    पश्चिम भारत पर मुस्लिम राजाओं के शासन आने पश्चात कई हिन्दू आयुध व आश्रित बरेली ,, पीलीभीत बदायूं में बसे।  इस भूमि को पहले ही नहीं आज भी कटेहर कहा जाता है।  मुस्लिम सेना व कटेहरों के मध्य लड़ाईयां चलती रहती थीं।  जब भी कटेहर में मुस्लिम भारी पड़ते हिन्दू माल की और आ चल पड़ते थे। 
      दिल्ली सुलतान फिरोज तग़लक़ ने 1380 में कटेहर के नेता खड़क सिंह को मारने हेतु सेना भेजी तो खड़क सिंह कुमाऊं भाग कर आ गया।  सुलतान सेना ने कुमाऊं में विध्वंस मचाया और 24000 लोगों को बंदी बनाकर ले गए ।  ज्ञानचंद की व सुलतान की मित्रता जनश्रुति केवल कल्पना मात्र है। संभल के सूबेदार ने माल पर अधिकार किया.ज्ञान चंद की राज्याधिकारी  नालू कठायत ने माल पर फिर से अधिकार लिया।  किन्तु मुस्लिम सूबेदार लगातार माल पर आक्रमण करते ही गए।  
    सुलतान सेना ने फिर कटेहर सरदार हरी  सिंह को हराने हेतु सेना भेजी।  हरी सिंह कुमाऊं की पहाड़ियों में आ छुपा।  सुल्तान सेना ने फिर से कुमाऊं में विध्वंस मचाया।  ज्ञानचंद ने अपने विश्वसपात्र नालू कठायत की आँखे निकलवा दीं और एक गढ़पति कूंजीपाल की हत्या करवा दी ।  कूंजीपाल के पुत्र क्षेत्रपाल ने ज्ञानचंद की हत्त्या की।
 
             उत्तराखंड पर्यटन 
      चंद राजा अधिकतर अत्त्याचारी राजा ही हुए।  उनके राज में भी कत्यूरी राजा या ठकुराई ठाकुरों के प्रशसा लोक गीत अधिक प्रसिद्ध हैं। माल में शरणार्थी या मुस्लिम आक्रमण होते गए।  कुमाऊं के भीतर समृद्धि थी किन्तु उथल पुथल ही रही तो पारम्परिक पर्यटन विकसित नहीं हुआ अपितु ऐसा लगता है पूर्व से बद्रीनाथ जाने वाले पर्यटकों में कमी ही आयी। युद्ध पर्यटन अधिक हुआ।  
     थोरचंद से ज्ञान चंद तक कोई पर्यटनोमुखी वस्तु भी निर्मित नहीं हुईं या ऐसा कोई ठोस विचार ने भी जन्म नहीं लिया। ज्ञान चंद ने अवश्य बालेश्वर में मंदिर व मंडप निर्माण किया था। 
       युद्ध पर्यटन ने अवश्य ही चिकित्सा के कुछ नए आयाम खोले ही होंगे। 
      थोरचंद से ज्ञान चंद काल पर्यटन की दृष्टि से नकारात्मक काल ही माना जाएगा।  
      
  

Copyright @ Bhishma Kukreti  12 /3 //2018   

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास (कुमाऊं का  इतिहास ) -part -10 
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   

कुमाऊं में चंद वंशीय शासन सूत्रपात याने आजीविका खोज पर्यटन

(  चंद शासन  कुमाऊं में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -38 
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  38                   
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--143 )       उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 14   

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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  कुमाऊं पर चंद शासन कब शुरू हुआ , कैसे शुरू हुआ , कहाँ शुरू हुआ यहां तक कि किसने शासन शुरू किया पर विद्वानों मध्य मतभेद हैं।  यहां तक कि पउपलब्ध विभिन्न चंद  वंशावलियों में भी अंतर है। अधिकतर थोरचंद याने सोम चंद को कुमाऊं में चंद शासन का शुरुवाती शासक मानते हैं । 
   थोरचंद उर्फ़ सोमचन्द कैसे कुमाऊं पंहुचा पर भी मतभेद हैं।  किन्तु यह सर्वमान्य है कि थोरचंद  /सोमचन्द कुमाऊं में सेना नौकरी करने झूंसी /कालिंजर / (?) से कुमाऊं आया या लाया गया।  सोमचन्द घरजवाईं था या बनाया गया पर अधिकांश विद्वान सहमत हैं। 
      एक जनश्रुति अनुसार थोरचंद /सोमचन्द अपने साथ कई व्यक्तियों के साथ मुमाऊं में आया था या आमत्रित किया गया। कोई आठवीं सदी में थोरचंद /सोमचन्द शासन प्रारम्भ का मत देते हैं किन्तु सन 1200 से पहले चंद वंशीय शासन शुरू हुआ इतिहास सम्मत प्रमाणित नहीं होते। 
          एक मत है कि सन  1223 के लगभग थोरचंद /सोमचन्द झूंसी से अपने कुछ सैनिक साथियों के साथ कुमाऊं आया और क्राचल्ल का सैनिक कर्मचारी बना।  उसके बाद चंद वंश की नींव पड़ी होगी।
                उत्तराखंड में आजीविका पर्यटन 
      लगभग सन 1000 के पश्चात भारत के मैदानी भागों में पश्चिम से मुस्लिम आक्रांता आक्रमण करने लग गए थे और उत्तर भारत में राजनैतिक अस्थिरता शुरू हो गयी थी।  उत्तराखंड शांत प्रदेश होने से कुछ लोगों हेतु शरण गाह व उत्तर भारत के कुछ लोगों हेतु उत्तराखंड एक शीर्षत आजीविका प्रदान करने वाला क्षेत्र था।  थोरचंद की दो तीन जनश्रुति से विदित होता है कि उत्तरप्रदेश से राजपूत सैनिक ही नहीं , ब्राह्मण व शिल्पी भी कुमाऊं आने , यहां के निवासी की पुत्री से शादी क्र यहीं बसने की चाह में कुमाऊं बसने लगे थे।  उत्तराखंड का यह पर्यटन ऐसा ही था जैसे 1915 के पश्चात उत्तराखंडी आजीविका की खोज में मुंबई प्रवास में जाने लगे थे। थोरचंद तो राजा या उच्च सैनिक अधिकारी बन गया।  किन्तु बहुत से सैनिक जो उत्तरप्रदेश के थे वे कुछ समय अंतराल पश्चात वापस अपने मूल स्थान जाते रहे होंगे और फिर आवश्यकता पड़ने पर उत्तराखंड आते रहे होंगे।   आजीविका खोज में जो भी पर्यटन होता है वही पर्यटन 1000 से उत्तराखंड में शुरू हो गया था। 
      नई युद्धनीति व सामाजिक रणनीति का प्रवेश 
थोरचंद के शासन प्रारम्भ ने उत्तराखंड को कई नई युद्धनीतियाँ दीं।  साथ साथ नए सामाजिक रणनीतियां भी प्रदान कीं।  

      आजीविका पर्यटन या पलायन से नई  समस्या  व  चुनौती 
 आजीविका हेतु , सुरक्षा हेतु या अन्य कारणों से गैर उत्तराखंडियों द्वारा उत्तराखंड में पहले पर्यटन करना , आजीविका खोज व फिर उत्तराखंड में बसने की घटनाओं ने पूर्व सामजिक विन्यास को ही चकनाचूर कर डाला जिसका वर्णन आगे भी होता रहेगा।  जो समस्या 1875 के बाद मूल मुंबई व निकटवर्ती क्षेत्र वासियों ने दूसरे क्षेत्रवासियों का मुंबई में बसने से झेला या झेल रहे हैं वही  समस्या कुमाऊं में चंद या गढ़वाल में पंवार वंशीय शासन के बाद मूल उत्तराखंडियों ने झेला (यद्यपि तब के मूल वासी भी कभी प्रवासी बनकर ही उत्तराखंड आये थे )।   
     

Copyright @ Bhishma Kukreti  11  /3 //2018   

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -10 
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;    

वैद्यनाथ कत्यूरी काल में उत्तराखंड पर्टयन कारकों का अविस्मरणीय विकास

Uttarakhand Tourism Product Development in Vaidyanath Katyuri Period 
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(  वैजनाथ कत्यूरी काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -37
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )     -  37                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--142 )       उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 142   

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन व बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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  इतिहासकारों का मानना है कि जोशीमठ (कार्तिकेयपुर ) के उत्तरी छोर में तिब्बती आक्रांताओं के बार बार आक्रमण , लूट व जोशीमठ में भयंकर हिमस्खलन के कारण कत्यूरी राजा नरसिंह देव को राजधानी बदलनी पड़ी।  नर  सिंह देव ने राजधानी करवीपुर में स्थापित की जो डोटी व गढ़वाल क्षेत्र दोनों के मध्य था व जुड़ने हेतु मार्ग थे। शिलालेखों व अन्य प्रमाण अनुसार  बीच में अशोक चल्ल परिवार का भी शासन रहा।   कत्यूरियों की कई शाखाओं ने अलग अलग क्षेत्रों पर राज किया।  पर्यटन इतिहास की दृष्टि से इस अध्याय में कत्यूऋ राजाओं के कार्यों हेतु सन   1000 -1400  की विवेचना किया जाएगा । 
 इस काल में पर्यटन दृष्टि से निम्न कार्य महत्वपूर्ण हैं 
     कटारमल मंदिर -कटारमल मंदिर याने बूटधारी सूर्य मंदिर की स्थापना 1080 -1090 मध्य हुयी जहां विष्णु , शिव , गणेश की भी मूर्तियां हैं . मंदिर भव्य था। वास्तुकला , धातुकला , काष्टकला का सुंदर नमूना। 
      द्वारहाट की कालिका मंदिर मूर्ति - 1143 में गुलण नामक व्यक्ति ने कालिका मंदिर निर्माण किया। 
        राजा सुधार देव कत्यूरी ने द्वारहाट में सन 1316 में मंदिर निर्माण करवाया। 
         राजा मानदेव कत्यूरी ने 1337 में द्वारहाट में मंदिर बनाया। 
          राजा सोमदेव कत्यूरी ने द्वारहाट में 1348 व 1354 में मंदिर निर्मित कराये। 
          राजा निरमपाल कत्यूरी ने 1348 में स्यूनरा में मंदिर निर्माण करवाया। 
      दोरा पट्टी में गूजर देवल ,रतन देवल , कचेरी , मृत्युंजय , बद्रीनाथ , कुटुमबुड़ी , बण देवल , मनियान आदि मंदिर बारहवीं -चौदवीं सदी के माने जाते हैं।  यहां कई प्राचीन नौले इसी काल के माने गए हैं।  
        
       त्रिभुवन पाल देव ने बागेश्वर मंदिर व्यवस्था हेतु भूमि प्रदान की थी। 
       इंद्रपाल देव की पत्नी दमयंती ने चौघाड़ापाटा में एक बाग़ लगवाया था। 
    लक्ष्मण पाल देव ने 998 में बैद्यनाथ मंदिर में लक्ष्मी नारायण की मूर्ति स्थापित की। 
        इसी तरह कटीरी काल में जागेश्वर , आदि बदरी , सोमेश्वर , केदारनाथ , नालचट्टी आदि स्थानों में मंदिरों की स्थापना हुयी
           मूर्ति कलाकारों को शरण 
    मध्य भारत में राजनैतिक अस्थिरता के चलते कलाकार उत्तराखंड मँहुचने लगे और उन्हें उत्तराखंड शासकों ने सम्मान दिया।  इन मूर्ति कलाकारों ने उत्तराखंड मूर्ति कला को प्रसिद्धि दिलाई। 
        प्रतिहार मूर्ति कला का पूर्ण विकास 
   इसी काल में प्रतिहार मूर्ति कला का पूर्ण विकास उत्तराखंड में ही हुआ।
       मूर्ति निर्यात 
 इस काल में उत्तराखंड मूर्ति कला प्रसिद्ध थीं और मैदान के धनी वर्ग  , राजा उत्तराखंड निर्मित मूर्तियों को मंदिरों में स्थापित करने में गर्व अनुभव करते थे। यशोवर्मन चंदेल ने गर्व से घोषणा की थी कि मैंने हिमालय समान महोच्च मंदिर में मूर्ति कैलास (केदारखंड निकट मूर्ति निर्माण शाला ) में निर्मित है।
     
    कत्यूरी काल में निर्मित मूर्तियां तिब्बत , कांगड़ा , कन्नौज , मध्यदेश , बुंदेलखंड , सौराष्ट्र , महाराष्ट्र व सदूर दक्षिण तक पंहुचती थीं। वैष्णव धर्म के आचार्य माधवानंद अपने साथ मूर्तियां ले गए थे। 
            नारद कृत संगीत मकरंद व नृत्य , संगीत प्रसार 
   इस काल में मंदिरों में व्यवसायिक तौर पर नृत्य व संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत किये जाते थे।  कत्यूरी काल में नृत्य -संगीत में आसातीत विकास हुआ।  केदारखंड अध्याय 66 -77 से लगता है कि रुद्रप्रयाग नृत्य -संगीत प्रशिक्षण केंद्र था। अनुमान है कि नारद का ग्रंथ संगीत मकरंद की रचना रुद्रप्रयाग में हुयी थी। दो भागों में बनता नृत्य व संगीत संगीत मकरंद में रोग निवारण हेतु संगीत की आवश्यकता पर बल दिया गया है (संगीताध्याय) -
     आयुधर्मयशोवृद्धि: धन धान्य फलम लभेत।
      रागाभिवृद्धि:सन्तानं पूर्णभगा: प्रगीयते।।     
 सालर जंग म्यूजियम जॉर्नल जिल्द 27 -28 पृष्ठ 7 में उल्लेख किया गया है कि नारद कृत संगीत मकरंद का प्रकाशन गढ़वाल में मिली हैदराबाद म्यूजियम में रखी गयी एकमात्र पांडुलिपि के आधार पर गायकवाड़ ओरियंटल सीरीज ने 1900 से पहले प्रकाशित किया।  संगीत मकरंद के अतिरिक्त किसी पुस्तक में वीणा वादन के इतने प्रकार नहीं हैं  जितने मकरंद में हैं। 
  रुद्रप्रायग में नारद शिला लोककथाओं /जनश्रुतियों के होने से भी प्रमाणित होता है कि नारद ने संगीत मकरंद की रचना रुद्रप्रयाग में की।
      संस्कृत पठन पाठन याने चिकित्सा शास्त्र का महत्व
    यद्यपि कत्यूरी काल का संस्कृत साहित्य लुप्त हो गया है किन्तु क्राचल्लदेव के ताम्रशासन से विदित होता है कि ज्योतिष , तंत्र मंत्र , कृत्यानुष्ठान, शकुन शास्त्र , आरोग्य शास्त्र , न्याय के पंडित राज्य में निवास करते थे। 
    संस्कृत पठन पाठन में आरोग्य शास्त्र अवश्य ही समाहित होता है। 
         माधवाचार्य का आगमन 
    वैष्णव धर्म के माधव सम्प्रदाय के प्रवर्त्तक माधवाचार्य (1118 -1197 ) लगभग 1153 में बद्रीनाथ पंहुचे थे।  माधवाचार्य अपने साथ भेंट मिली शालिग्राम निर्मित तीन देव मूर्तियां ले गए जिनका उन्होंने सुब्रमणियम , उदीपि , मध्यतल मंदिरों में स्थापना की।  इसके साथ माधवाचार्य बद्रिकाश्रम से दिग्विजयी राम व व्यास की मूर्ति बी ले गए थे भंडारकर , वैष्णविज्म , शैविज्म  ..   पृष्ठ 58  व रामदास गौड़ , हिंदुत्व पृष्ठ 633 -634 )। 
  माधवाचार्य ही नहीं अपितु अन्य आचार्यों ने भी उत्तराखंड में पर्यटन किया।  
        धार्मिक पर्यटन विकास 
 इस काल में मंदिर बनने व मूर्ति कला प्रसिद्धि से कई नए प्रकार के पर्यटक भी आने लगे थे।  मूर्ति निर्यात से उत्तराखंड की छवि को एक न्य आयाम भी मिला।  
       
                  भारत पर बाह्य आक्रमण से शरणार्थियों का आगमन 
 
      इसी काल में मुहमद गौरी आदि के आक्रमण शुरू हुए और उत्तराखंड में भारत के सभी स्थानों से पलायित प्रवाशी बसने लगे जिनमे विद्वान् , युद्ध कला निपुण , कलाकार , चिकित्स्क आदि भी थे।   प्रवासियों ने आगे उत्तराखंड के पूर्व समाज को ही परिवर्तित कर दिया।   

          यात्राएं
 उत्तराखंड यात्राओं के दो मुख्य मार्ग थे पूर्व में बैजनाथ , अल्मोड़ा के तरफ से जोशीमठ पथ व पश्चिम में चंडीघाट कनखल से आज के पौड़ी गढ़वाल में गंगा तट पर बद्रिकाश्रम पथ।   मानसरोवर की भी यात्रा महत्वपूर्ण धार्मिक यात्रा मानी जाती थी। 

डा शिव प्रसाद डबराल कृत कुमाऊं का इतिहास 1000 -1790 पृष्ठ 1 से 53 आधारित 
Copyright @ Bhishma Kukreti   10/3 //2018   

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी …

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना , शैलवाणी (150  अंकों में ) , कोटद्वार , गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास (  कुमाऊं का इतिहास 1000 -1790 )
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  

उत्तराखंड में जख्या का मसाला , औषधि उपयोग इतिहास

 History, Origin, Introduction,  Uses  of Asian Spider, Cleome Jakhya    as   Spices ,  in Uttarakhand 
उत्तराखंड  परिपेक्ष में वन वनस्पति  मसाले , औषधि  व अन्य   उपयोग और   इतिहास - 15                                              
  History, Origin, Introduction Uses  of    Wild Plant  Spices ,  Uttarakhand - 15                      
 उत्तराखंड में कृषि, मसाला ,  खान -पान -भोजन का इतिहास --  104 
History of Agriculture , spices ,  Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -104
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 आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व संस्कृति शास्त्री ) 
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वनस्पति शास्त्रीय नाम - Cleome viscosa
सामन्य अंग्रेजी नाम - Asian Spider Flower , Wild mustard 
संस्कृत नाम -अजगन्धा 
हिंदी नाम - बगड़ा 
नेपाली नाम -हुर्रे , हुर्रे , बन तोरी 
उत्तराखंडी नाम -जख्या 
एक मीटर ऊँचा , पीले फूल व लम्बी फली वाला जख्या बंजर खेतों में बरसात उगता है। 
जन्मस्थल संबंधी सूचना - संभवतया जख्या का जन्म एशिया में हुआ है। 
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन -अजगन्धा जिसकी पहचान Cleome gyanendra आदि  में होती है का उल्लेख कैवय देव   निघण्टु , धन्वंतरि निघण्टु ,राज निघण्टु , में हुआ है। 
   औषधीय उपयोग 
जख्या पत्तियों  से घाव , अल्सर की दवाइयां   बनाई जाती हैं। बुखार , सरदर्द , कान की बीमारियों की औषधि हेतु उपयोग होता है   

  जख्या का मसाला उपयोग 
  उत्तराखंड का कोई ऐसा घर न होगा जो जख्या का छौंका न लगाता  हो।  जख्या केवल छौंके के लिए ही प्रयोग होता है।  उत्तराखंड के प्रवासी भी उत्तराखंड से अपने साथ जख्या ले जाते हैं। 

Copyright@Bhishma Kukreti Mumbai 2018

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