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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Tuesday, June 30, 2015

बिन दारु बामण पूजा नि करदो

रचना - चन्द्र सिंह राही 

 भितर नीच अन्न की दाणी 
बुरो  बिसन ह्वेगे शराब को पाणी 
देवतौं की भूमि छौ यु उत्तराखंड 
शराब कर गए यख खंड मंड 
दारु पेकी  ह्वेगे उत्तराखंड 
आपस मा फ्वड़दन बरमंड 
 मनख्यात थैं या रागस  बणाणी
 बुरो  बिसन ह्वेगे शराब को पाणी
गंदी गंदी गाळी बकण लग्यां छीं 
रौल्यूं रौल्यूं उतौणा प्वडाँ छीं 
झुल्ला चिर्यां छीं बरमंड फुट्यां छीं 
कुकुर बी तौं देखि भुकण लग्यां छीं 
इंसानियत की कदर नि जाणी
बुरो  बिसन ह्वेगे शराब को पाणी 
बिन दारु बामण पूजा नि करदो 
दारु की झांज मा श्लोक च बुल्दो 
बिन घूँट जगरी से डौंरी नि बजदी 
बिन दारु क्वी बि पूजा नि हूंदी 
धर्म कर्म की जड़ उगटणी
बुरो  बिसन ह्वेगे शराब को पाणी
रीति रिवाज ह्वेगीं खराब 
मुर्दा फुकणकु बी चैंद शराब 
मनिख जोनी की कदर नि जाणी
बुरो  बिसन ह्वेगे शराब को पाणी 
पर्चण्ड बणगे बोतल राणी
बुरो  बिसन ह्वेगे शराब को पाणी 
(गीत गंगा से साभार ) 

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कैंतुरा पूजा वार्ता (उषेल )

इंटरनेट  प्रस्तुति - भीष्म कुकरेती 

(साभार , डा रणवीर सिंह चौहान , चौरास की धुंयाल। जिन्हे करोड़ चंद , कोटली , पावो ,घडदौड़स्यूं  पौड़ी गढ़वाल ने यह जागर /पूजा वार्ता /उखेल मंत्र प्रेषित किया )
झाली माली देवी -ब्वै का खाडू - वे ताल मुखी छुरी 
स्वर्ग ले खांचड़ी -पाताल निवासणी -
जै राजा न आम सौड़  का आम साधो धाम सौड़ का धाम 
तपोवन को धाम साधो -गंगोली घात को केएम काटो 
चौण्डलीया घाट को नकुवा मसाण साधो 
जा जा रे राजा सत का राजा -नीम का राजा -धर्म का राजा 
बड़ा राजा -छोटू छोटे के निरघोर कन्या कुँवारी का पाट 
गज पृथ्वी का पाट कास मा धोलो -कंसराया की पाट 
फैण में धोल्यो फैणराय को पाट -बगड़ मा धोल्यो बगड़राय को पाट 
राजा मर्मदेव को पाट - राजा बिरमदेव को पाट 
नीलीचौंरी उस्मान को पाट 
आसंतिराय को पाट -वासंती राय को पाट 
गोरा राय को पाट -सांवला का पाट 
राजा आत्मदेव का नातिण -पृथ्वीदेव का नातिण 
गंगा हापणी सूरज तापणी -सूरजबंशी राजा दुलाराजा धामदेव 
तेरो ऊंकारो बाबा -मार झण को राजा 
प्रथम चले रे बाबा सूर्यवंशी राजा 
बोल बोल खली का देवता कौन ?
असलदेव मसलदेव लूणा लाड़लो शाही भिंगबान 
बावरो मालूशाही -
प्रथम चले रे बाबा ऐ दाषणी को नाती वैदासणी को नाती 
चलदा वाणी -
सेखर कारीगर म भौत विछुवा साणी 
राजा सत जी को पुरखो मंगल हाथी -चौदंतो बाग़ 
सिंगणी की बिच्छी कल्यालो को लेखो 
प्रथम जल भूमि -जल माँ तुम्बीतुम्बी जलम्यो 
जल को जलम्यो सता -संत की जन्मी डाळि 
जलंधर देस म लगे रे बाबा बिरमोटिया मसाण 
घसेरी को घास तोड़ो -पनेरी को पाणी तोड़ी 
चल रे बेटे कादो वाच वार बैठ्यो 
तब ढेला आसंडी पवांर 
माथो नवाणो कैला खुर का खाणो 
दूध भात का खाणो -नित पान को खाणो 
बड़े राजा ओमराणा को पाट -धूमराणा को पाट 
गोकर्ण को पाट -
बाइस गज की झगुली -गजाभर का तणा 
बाइस खली का माल - बूढ़ा अमरदेव का पाट 
तब चल रे बाबा अन्तोकरगी संतोकारंगी -बाज कारंगी 
मुस्त कारंगी -धोगिया कारंगी -उबला साणी -माता नागणी को जाया 
पिता सेवाज को जाओ -सैनार को विछुवा साही 
जहां मैं बुलाऊँ तहाँ नि आई -जहां मै पठाउं नी तू आई 
तो राजा धामदेव को राव और ठाँव कु पूड़ा नी पाई 
बड़ी जिया का गावेण हकलाई 
राजा दुलाशाही की दुआई 

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पातञ्जलि योग संहिता सूत्र 7 से 16 तक

गढ़वाली अनुवाद - भीष्म कुकरेती 
[ आजकल योग की बहुत चर्चा है जो आवश्यक भी थी।  किन्तु आम लोग योग को केवल आसन तक सीमित समझते हैं।  जबकि योग एक जीवन शैली है।  पातञ्जली ने योग संहिता में योग का सारा निचोड़ दिया है याने सूत्र दिए हैं।  इन सूत्रों का नौवाड करते मुझे अति प्रसन्नता है। ] 
                      प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि  -७  
प्रमाण तीन तरां से मिल्दो -
प्रत्यक्ष 
अनुमान 
अर 
ज्ञानी द्वारा
                    विपर्यो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम् -८ 
विपर्य याने विरोधी धारणा मिथ्या ज्ञान च जू असलियत मा वै पदार्थ मा प्रतिष्ठित नि हूंद।  जन कि मन की बात तै आत्मा की आवाज समजण। रस्सी तै सांप समजण।
               शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः -९ 
शब्दों से उत्पन ज्ञान (कल्पना या कैक भकलौण से उत्पन ज्ञान  ) का पैथर चलणो स्वभाव विपर्य च।
                अभावप्रत्ययालंबना वृतिनिद्रा -१० 
जागृत या नींद मा जु छ नी च वै तैं प्रतीत करण /मनण निद्रा च (अवचेतन मन ) जन कि सुपिन तै सच मनण .
                अनुभूतविषयासम्प्रमोषः स्मृतिः -११ 
फिर से याद आण /याद करण स्मृति च।
                 अभ्यासवैराग्याभ्यां  तन्निरोधः -१२ 
 अभ्यास और वैराग्य ( तटस्थ भाव ) से वृतियों (अस्थिरता ) कु निरोध हूंद।
                तत्र स्थितौ यत्नोअभ्यासः -१३ 
चित्त (मन , वृद्धि , अहम ) तै स्थिर करणो नाम अभ्यास च।
                  स तू दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमि: - १४ 
श्रद्धा , ऊर्जा , भक्तिपूर्वक निरंतर दीर्घकाल तक अनुष्ठान करण   से दृढ अवस्था वळ ह्वे जांद।

                 दृष्टानुश्राविकाविषयवितृषणस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम् -१५ 

दृष्ट व आनुश्रविक (दिख्युं , अनुभव कृत ) विषयों मा जब तृष्णा नि रौंदी (तटस्थ भाव )तो वु वशीकर वैराग्य याने ऊपरी वैराग्य च।
             ततपरं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम् -१६ 
   विवेक द्वारा गुणों से तृष्णा रहित हूण  पर -वैराग्य च। 

बकै भोळ 

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हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर इतिहास संदर्भ में कुणिंद नरेश वृद्धपाल व धनभूति

Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanabhuti II & Ancient  History of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur

                     हरिद्वार  ,  बिजनौर   , सहारनपुर   इतिहास  संदर्भ में कुणिंद नरेश वृद्धपाल व धनभूति


                         Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,  History Saharanpur History  Part  -130                       
                                                हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -130                      

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  


                                    कुणिंद नरेश वाधपाल या वृद्धपाल 

         कुणिंद नरेश वाधपाल या वृद्धपाल संभवतया बृद्ध माता पिताओं का भक्त था।  उसने कुमारवस्था में ही भारहूत में अपना दान अंकित करवा लिया था।  इससे प्रतीत होता है किकुणिंद नरेश वाधपाल या वृद्धपाल के पिता धनभूति का राजयकाल लम्बा था।  भारहूत में पूर्वी तोरण का निर्माण धनभूति ने करवाया था और स्तूप की वेष्ठिनी पर कुमार वृद्धपाल का नाम अंकित है तो साफ़ हो जाता है कि तोरण व वेष्ठिनी का निर्माण काल एक ही है।
                                       कुणिंद नरेश धनभूति द्वितीय 
कुणिंद नरेश धनभूति द्वितीय  का दानलेख भारहूत में नही मिलता अपितु दानलेख मथुरा में मिला है। धनभूति ने अपने धन का उपयोग शायद निकटवर्ती धार्मिक कार्यकलापों में किया होगा। धनभूति उत्तराधिकारी बलभूति की मुद्राएं मथुरा में भी मिली हैं। 
  धनभूति के शिलालेखों की लिपि इतिहास हेतु महत्वपूर्ण है। धनभूति के लेखों में अक्षरों पर मात्रायें लगी हैं। और शिरोपंक्तियां भी हैं।  ये गुण  अशोककालीन लिपियों में नही मिलते हैं। कुणिंद नरेश अमोधभूति , औदुंबर नरेश घरघोष व अन्य नरेश वर्म्मिक के मुद्राओं में भी ये गुण मिलते हैं।  इसलिए इतिहासकार मानते हैं कि अमोधभूति का शासन काल धनभूति द्वितीय से पचास साल पीछे से अधिक  नही हो सकता है। 




Copyright@
 Bhishma Kukreti  Mumbai, India 28/6/2015 
   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



      Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;  Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II & Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &AncientHistory of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ; Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &  Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ; Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &  Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &Ancient  History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;  Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ; Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &  Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;    Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II & AncientHistory of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;  Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &   Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ; Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &   Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;  Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II & Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;    Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II & History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ; Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &   Ancient History of Bijnor;   Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;   Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II & Ancient History of Saharanpur;   Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &Ancient  History of Nakur , Saharanpur;  Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &  Ancient   History of Deoband, Saharanpur;Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II &   Ancient Saharanpur History,    Kuninda Kings -Vridhpal and Dhanbhuti II & Ancient Bijnor History;
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काकिन मै सिवा लगाइ , ब्वारी तै मीन सिवा लगाइ अर स्याळि नि पछ्याण

मुंबई बटें जसपुर तक नागराजा पूजा जात्रा -10 

                             अविस्मरणीय धार्मिक -सांस्कृतिक यात्रा वृतांत  -10                 
                                  
      
                             जत्र्वै - भीष्म कुकरेती 

          जब भौत दिनुं मा ड्यार जाण हो अर गांमा दुन्या भर का प्रवासी ऐ जावन तो सबसे बड़ी परेसानी हूंद पछ्याँणणो।  हालांकि अबि 21 तारीख इ छे अर सामूहिक नागराजा पूजा पचीस बिटेन शुरू हूण छे पर में सरीखा लोग आण लग गे छ जौन अपण पूजा सँजैत पूजा से पैल करण छे अर फिर घड्यळ आदि पुजै बि करण छे। 
 घीड़ी जसपुर अर ग्वील की हद की जगा च पैल इख चार मवासा छया अब बस एक फूफू ही इक रौंदि।  घीड़ी से इ पता चल गे छौ कि जसपुर की आवादी मा अचानक (द्वी चार दिनोकुण इ सै ) इजाफा हूण वाळ च।  पैल मुख्य गाँव से घीड़ी का बीच केवल सन्नी /छनि /गौशाला अर खेत छ अब तो गाँव सीधा घीड़ी तक बढ़ गे याने लोगुंन पंगत मा मकान बणाइ आलिन।  हालांकि घीड़ी म हमर एक पाणी छयो तो मुख्य गाँव से क्वी फॉर नी च तो घीड़ी से म्यार कूड़ तक की यात्रा मा क्वी विशेस बात नि हूण चयेणी छे पर लिख्वार छौं तो विशेस बात खुज्याण इ तो लिख्वारौ धरम हूंद। 
   अब जब गांव आवो तो सिवा सौंळी लाजमी बात च।  जौं तै पछ्याणो तो ऊंक दगड़ सिवा सौंळी सरल च।  अर पुरातन काल की टेक्नीक ही आज बि सब जगा चलदी - खूब छे , परिवार मा सब सुख्यर छन।  बच्चों ब्यौ ह्वे गे , नाती नतणा क्या क्या छन , सबि भाई दगड़ी रौंदन आदि आदि सब बात सिवा सौंळी का मीख्य अंग छन।  इक तक तो ठीक छौ। 
पर घीड़ी से कूड़ तक आंद आंद तीन घटना यादगार घटना बण गेन अर यूँ घटनौं की पुनरावृति जब तक ड्यारम क्या ऋषिकेश एक ब्यौ तक हूणि इ रैनी। 
 रस्ता मा में से दिख्याणम  कमउमरी जनानीन में तै सिवा लगै दे अर मीन बि बोलि दे - सौभ्यग्वती रावो , फूलो फलो   …। (अब सात पुत्रों की मा कु आशीर्वाद गाळी च तो यु आशीर्वाद अब बंद ह्वे गे )
फिर मीन पूछ - बाबा मीन नि पछ्याण ! तुमर पति या हजबेंड का नाम   .... ?
        मे से कमउमरी जनानी कु जबाब छौ - रतनमणि जी। 
   अब म्यार गस खाणो क्षण छयो ।  रतन मणि त म्यार  चचा छौ अर समिण चाची छे , ना चाचीन पछ्याण ना मीन चाची पछ्याण। रतन चचा जी मेसे दस बारा साल बड़ा छन। 
मीन अब ब्वाल -चाची तीन मि तै नरक लिजाणो पूरी तागत लगै इ द्यायि हाँ।  मि भीषम छौं। 
अब चचिक खौंळयाणो बारी छे - इ कन काण्ड लगिन।  पछ्याणी नी मीन। मीन   त त्यार नंगमुंड देखिक समज कि क्वी कक्या ससुर जी होला तबी तो सिवा लगाइ . चल क्वी बात नी च अब तू मीतै सिवा लगै ली। 
खैर कुछ अगनै ग्यों तो एक जनानी जु बुडड़ी सि दिखेणी छे तो मीन बरबर ह्वैक सिवा लगै दे। वीं जनानिन बि आशीर्वाद दे दे। 
अब वीं जनानीं पूछ - मीन त्वै तै नि पछ्याण !
मीन उत्तर दे - मि भीषम छौं। 
म्यार इन बुलण छौ कि वीं जनानिन अपण जीब दांतु तौळ काटद तड़ाक से ब्वाल - ये मेरी ब्वे क्या पाप ह्वे गे।  तुम तो म्यार कक्याससुर छंवां , बामण छंवां अर तुमन मि तै सिवा लगै दे। 
अब मेरी यादगार सही जगा पर आई।  चप्पे मीन तो प्रेम सिंह की ब्वारी तै सिवा लगै दे ! प्रेम म्यार भतिज लगद।  असल मा युवावस्था मा प्रेम स्वर्गवासी ह्वे तो ब्वारी पर बुढ़ापा कुछ जल्दी ही आण शुरू ह्वे गे या शरीर इ इनि ह्वालो। 
  मुख्य गां मा आंद भौत सा लोगुं से रामरूमि ह्वे। 
गोविन्द चचा जीक कूड़ो समिण औंवां।   गोविन्द चचाजीक सरा परिवार कट्ठा हुयुं छौ।  चचाजी अर चचि तै मि पछ्याणदो छौ तो रमा रुमी मा क्वी दिक्क्त नि ह्वे।  लघु भ्राताओं की पतन्युंन दूर से ही सिवा बरज अर मीन बि दूर से ही आशीर्वाद दे। 
फिर कैन ब्वाल बल -सि मंगला नन्द की ब्वारी छन।  मंगलानन्द भुला ह्वे तो मंगलानन्द की ब्वारी रिस्ता मा ब्वारी ह्वे अर यु लाजमी छौ कि वो दूर से ही सिवा बरजां। 
पर मंगलानन्द की वाइफ  ऐन अर म्यार खूट छू गेन।  यु कुछ अटपटो छौ कि भाइकी ब्वारी जेठ तै छुणी छे। 
मि कुछ गंगणै ग्यों। 
तब मंगलानन्द की ब्वारीन इ जबाब दे - मि त तुम्हारी स्याळि छौं। 
मि -स्याळि इ इ ?
मंगलानन्द की वाइफ - हाँ जया जीजा जी म्यार जीजा जि छन। 
फिर गोविन्द चचाजीन बताइ कि मंगलानन्द की वाइफ  झैड़ गौं की छन अर म्यार भुला जया की ब्वारिक खास चचेरी बैणि च।
मीन ब्वाल -औ तो चलो अच्छो ह्वाइ मीन स्याळि तै सिवा नि लगाइ ! 
 

(ये चेप्टर मा नाम म्यार बदल्यां छन तो जसपुर वाळ यांक ध्यान रखिन, अन्यथा  घटना सही छन ) 

* भोळ पढ़ो -म्यार ब्राह्मणवादी संस्कार कन सटाक से अग्नै ऐन  अविस्मरणीय धार्मिक -सांस्कृतिक   नागराजा पूजा जात्रा वृतांत का बाकी  भाग 11   में पढ़िए

Copyright @ Bhishma Kukreti 28/6/15
bckukreti@gmail.com
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पातञ्जलि योग संहिता -1

गढ़वाली अनुवाद - भीष्म कुकरेती 
[ आजकल योग की बहुत चर्चा है जो आवश्यक भी थी।  किन्तु आम लोग योग को केवल आसन तक सीमित समझते हैं।  जबकि योग एक जीवन शैली है।  पातञ्जली ने योग संहिता में योग का सारा निचोड़ दिया है याने सूत्र दिए हैं।  इन सूत्रों का नौवाड करते मुझे अति प्रसन्नता है। ] 
         अथ योगानुशासनम् -१ 
गढ़वाली - अब योग की पवाण -
        योगश्चित्तवृत्तनिरोधः -२ 
योग चित्त की वृतियां (अस्थिरता ) रुकणो नाम च।
            तदा द्रष्टुः स्वरुपावस्थानम् -३ 
तब दृष्टि की स्वरूप मा अवस्थिति हूंदी याने जब चित्त वृतिहीन हूंद तब आत्म दर्शन हूंद।
               वृत्तिसारूप्यमितरत्र - ४ 
वृति की समानरूपता भिन्न अवस्था मा हूंद
  वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टा -५ 
 वृति /अस्थिरता पांच तरां की हूंदी अर कष्ठदायक दाई हूंदन  
प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृत्यः -६ 
 प्रमाण , विपर्यय/ विरोधी बात  , अवचेतन मन /स्वप्न , स्मृति से चित्त (मन , वृद्धि , अहम ) मा अस्थिरता आंदि

उत्तराखंड में केसर- खेती से मोटी कमाई की सम्भांवनाएं

Potentiality for  Saffron Farming in Garhwal, Kumaon;  
                                        उत्तराखंड में केसर- खेती से मोटी  कमाई की सम्भांवनाएं

                                                   डॉ. बलबीर सिंह रावत  (देहरादून)  
                                                                                     
केसर , लाल सोना, १ ग्राम का खरीद मूल्य लगभग ३०० रुपये, १ किलो २,००,००० रुपये में, अमीरों का शौक केसर जो अपने विशिष्ठ रंग और स्वाद के लिए अपने में ही उदाहरण है , सदियों से दुनिया के ठन्डे इलाकों में उगाया जा रहा है।  पूरे विश्व की मांग का ९५ % अकेला ईरान उगाता है और बाकी का ५ % भारत, स्पेन  मोरोक्को, इटली और अजरबेजान से आता है. अब चीन और कनाडा भी केसर उगाने लगे हैं। अमेरिका केसर का सब से बड़ा ग्राहक है। अकेला ऑस्ट्रेलिया साल में ३,००० किलो केसर खपाता है। 

इधर उत्तराखंड में भी केसर की खेती को प्रोत्साहित किया जा रहा है।  केसर उगाने के लिए जलवाय शीतल, नम और धूपदार होनी चाहिए , जैसे ३२ और ४० डिग्री उत्तरी अक्षांश में होती है।  मिट्टी महीन दोमट और क्षारीय ( पीएच ६ से ८) उपयुक्त मानी जाती है इसको बोने के जमीन को मिट्टी पलट हल से ८-९ इंच ( २० -२२ सेंटीमीटर ) गहरा जोता जाता है,जुताई के समय कम्पोस्ट या गोबर की खूब तैयार खाद भी मिलाई जाती है। 
चूंकि केसर के पौधे बीज नहीं बनाते तो इसकी  गँठियाँ ( बल्ब ) खेत में लगानी होती है।  ये गांठिया केसर के खेतों में लगी फसल से चार साल बाद ली जाती हैं तो इनकी उपलब्धि इतनी आम नहीं है। या तो बड़े किसानों से  बड़ी मात्रा खरीदनी होती है,  या दाम अधिक होने से, छोटी मात्रा में खरीद कर अपने हो खेतों में उगा कर धीरे धीरे क्षेत्र बढ़ाना होता है।  

बुवाई के लिए जून से सितमबर तक का समय ठीक रहता है। इसकी क्यारी जमीन से ७-८ इंच ऊंची होनी चाहिए ताकि पानी का ठहराव न हो। गँठियों को ८ सेंटीमीटर गहराई पर, एक से दूसरे को १० सेंटीमीटर दूर और कतारों  के बीच १०-१५ सेंटीमीटर का अंतर रखना होता है।  अगर नत्रजन का फर्टिलाइजर डालना हो तो लगाई के साथ साथ डालना चाहिए। अगर मिट्टी  में प्रयाप्त नमी है तो पानी देने की जरूरत नहीं होती।   अक्टूबर में फूल आते हैं जो पूरे महीने चलते हैं।  इस बीच अगर जमीन में खुश्की आ गयी हो तो सिंचाई, हफ्ते में एक बार, करनी चाहिए . नए लगाये पौधों में एक पौधे पर एक ही फूल आता है, दो साल बाद  प्रति पौधे दो दो फूल आते हैं। एक फूल पर stigma के  तीन filament,( धागे ) लगते हैं।  छोटे किसान इसे पौधे से ही हाथ से तोड़ते हैं , बड़े किसान फूल चुन कर लाते है और एक जगह पर इन फिलमेंटों को तोड़ते है। १५० फूलों से 

१ ग्राम सूखी केसर मिलती है, एक एकड़ जमीन से, अच्छी पैदावार हो तो, ५०० ग्राम बिक्री योग्य केसर का उत्पादन होता है। केसर की खेती के लिये मानव श्रम की अधिक आवश्यकता होती है क्यों कि  खेत जोतने के अलावा प्रायः हर काम हाथों से ही करना होता है।     

कैसर की गंठियो को जंगली चूहे खोद कर चाव से खा जाते हैं, इन गंठियों में फंगस भी लगने का खतरा होता है। पौधों के उगने पर इनकी पत्तियों और फूलों को खरगोश  चर जाते हैं।   इन बीमारियों और जानवरों से बचाव के उपाय करना परम आवश्यक होता है। 

चूंकि केसर उत्पादन उत्तखण्ड में नया व्यवसाय है तो शुरू करने से पाहिले इसके हर पहलू पर पूरा  विचार करके, लागत, प्राप्ति का हिसाब तीन प्रकार से करके, १. जब सब कुछ साधारण तरीके से हो रहा हो, २. जब हर काम में आसानी से सफलता मिल सकती हो और ३. जब कुछ भी सही नहीं हो।   और तब इनके औसत को ध्यान  कर धंदा शुरू करने का निर्णय लेना चाहिए.  अधिक जान कारी और सहायता के लिए निम्न  पते से सम्पर्क करके पण प्लान को मूर्तरूप देना चाहिए                  
Department of Horticulture & FOOD Processing, Circuit House, Dehradun (Uttarakhand) INDIA   Horticulture Mission for North East & Himalayan States, Uttarakhand   E-mail: missionhortiuk@gmail.com   Ph: 0135-2754961 For further details contact: Dr. I.A. Khan, Joint Director   E-mail:imtiaz05@rediffmail.com
अध्यापक श्री जगमोहन सिंह बिष्ट केसर की केटी विकास में संलग्न है उन्हें - 9410328161 पर संपर्क किया जा सकता है