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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Thursday, January 30, 2014

राहुल जी जनसम्पर्क से कुछ नि ह्वाइ त विज्ञापन जि क्या मुखड़ि लाल कारल ?

भीष्म कुकरेती        



               अचकाल लोकसभा चुनावुं  कारण सब पर विज्ञापन कु  काल भैरव लग्युं च।  क्वी राजनीतिज्ञ अपण मुख पर रंगुड़ लपोड़ीक कैमरा समिण आणा छन , क्वी नेता चूना पोतिक फोटो खैंचाणा छन।  क्वी मुख्यमंत्री  उत्तरप्रदेश का लोगुं तैं बताणु च बल उत्तरप्रदेश मा ताजमहल च , क्वी विज्ञापन मा बुलणु च बल मि युवा छौं।  जैमा जथगा सरकारी पैसा छन वो उथगा जोरुं से बताणु च हम कै से कम नि छंवां।  बाकी चंदा का पैसा से विज्ञापनाहुति  दीणा छन।  
  चुनाव मौसम आण से पैल एक मौसम आंद 'प्री इलेक्सन सीजन ' याने विज्ञापन मौसम।  अजकाल विज्ञापन बंगाल का काळु जादू ह्वे गेन अर सब राजनीतिज्ञ भूली गेन , बिसरी गेन कि  इण्डिया शाइनिंग  कन भद पिटी छे अर बिचारा लाल कृष्ण अडवाणी अबी तलक ' मिनिस्टर इन वेटिंग ' का वेटिंग रूम  मा वेट करणा छन।
                   खौंळेणे बात या च ज्वा राजनीतिक  छवि जनसम्पर्क से हासिल हूंदी वीं छवि पाणो बान पोलिटिकल पार्टी विज्ञापन का सहारा लीणा छन।  जनसम्पर्क छोड़िक विज्ञापन करण इन च जन फुल्टा भौरिक भात से पुटुक  नि भर्यायी  त फुल्टा चाटिक क्या होलु ?
इख तलक कि व्यापार मा बि विज्ञापन छवि बणाणो अंतिम हथियार माने जांद। 
           अजकाल राहुल गांधी तैं युवा नेता घोषित करणो विज्ञापन टीवी चैनेलों मा अर आउट डोअर मीडिया मा जोर शोरुं से चलणा छन।  जु विज्ञापन का विद्वान या अनुभवी छन वू बतै सकदन कि यी विज्ञापन सबूत च क्वी ब्रैंड (कांग्रेस ) अंतिम लड़ाइ का हथियार लेक मैदान मा ऐ गे।  राजनीति मा इन विज्ञापन तबि आंदन जब मौत समणि ह्वावो।  क्वी बि कुमारी   मायावती से नि सिखणु च कि वा प्रेस से बि दूर रौंद पण फिर बि वा अपण वोटरोंकी  राणी च।  मायावती विज्ञापन का सहारा से ऐंच  नि आयी।  केजरीवाल विज्ञापन से इथगा कम समय मा इथगा प्रभावशाली नि बौण बल्कि जनसम्पर्कीय विधि से प्रभावशाली बौण ।  
  राजनीतिक पार्टी वाळु तैं समजण चयेंद कि जख विज्ञापन पेन किलर जन थोड़ा देरा कुण कामयाब ह्वे सकद पण विज्ञापन पेन अव्वाइडर या पेन हीलर नी च। उख  जनसम्पर्क पेन अव्वाइडर अर पेन हीलर च। 
 फिर विज्ञापनो मा विषय या हेडलाइन तैं जनसम्पर्कीय विषय बणये जांद। 
  अचकाल एक विज्ञापन च नरेंद्र मोदी कु जु सरदार पटेल की मूर्ति का वास्ता खेती का लोखरौ  औजार की मांग करणु च।  कॉंग्रेस का नेताओं तैं पता नि चौल कि यी विज्ञपान जनसम्पर्कीय विषय खड़ो करद।  यु सरदार पटेल की मूर्ति कु विज्ञापन एक बहस शुरू करद जब कि राहुल गांधी कु विज्ञापन बहस बंद करदु। जनसम्पर्कीय  विज्ञापन से ब्रैंड का विषय मा लोग बात करदन अर विज्ञापनी विषय का विज्ञापन से लोग ब्रैंड का विषय मा बात करण बंद करी दीन्दन।  
          जु विज्ञापन ब्रैंड का प्रति समाचार पैदा कारो तो वो विज्ञापन प्रभावशाली हूंद।  राहुल गांधी कु विज्ञपान वास्तव मा समाचार ही नी  च। इनी मुलायम कु शहजादा अखिलेश कु विज्ञापन च जु समाचार ही नि बणनु च तो इन विज्ञापन क्याक कामौक ?
विज्ञापन वास्तव मा विश्वास लैक नि होंदन या  विश्वास खतम करदन जब कि जनसम्पर्क या जनसम्पर्कीय आधारित विज्ञापन विश्वास या प्रतिष्ठा बढ़ान्द।
विज्ञापन कै बि ब्रैंड कु निर्वाह वाहन या रखरखाव (मेंटेन ) कु एक जरिया च. जनसम्पर्कीय विज्ञापन या जनसम्पर्क कु काम विश्वास अर प्रतिष्ठा बड़ांद तो राजनेतिक विज्ञापनो मा इन तत्व ह्वावन जो विश्वास का तरफ ढळक्यां ह्वावन।
 विज्ञापन हवा कु चलण च जब कि जनसम्पर्क सूर्य च। 
विज्ञापन शब्दुं खेल मने जांद जब कि जनसम्पर्क एक दृश्य पैदा करद। 
विज्ञापन रिखड़ा छन तो जनसम्पर्क एक खाका हूंद।
 विज्ञापन सब जगा पौंछद पण जनसम्पर्क काम का ही ग्राहकूं तक पौंछद अर जु बिंडी अटकदू वू खन्नु फटकदू।  विज्ञापन ध्यानविहीन हूंद  त ध्यानविहीन प्रभाव डाळदु जब कि जनसम्पर्क पट्ट उखि असर डाळदु  जख जरूरत च। 
विज्ञापन बरखा च अर जनसम्पर्क कूल च। 
विज्ञापन स्वमुखी या स्वचिंता मुखी हूंद जब कि जनसम्पर्क परमुखी या परचिंता मुखी हूंद।
विज्ञापन मर्युं याने उदासीन हूंद अर जनसम्पर्क जीवंत हूंद। 
विज्ञापन मैंगू हूंद अर जनसम्पर्क सस्तु हूंद। 
विज्ञापन नकल हूंद अर जनसम्पर्क मौलिक हूंद। 
विज्ञापन अविश्वास पैदा करद जब कि जनसम्पर्क विश्वास पैदा करद।  
विज्ञापन मजका हूंद अर जनसम्पर्क गम्भीर हूंद। 
विज्ञापन मरम्मत कु काम करद जब कि जनसम्पर्क छवि निर्माण करद । 
विज्ञापन तैं  चौड़ बिसर जांदन जब कि जनसम्पर्क यादगार हूंद। 
 
जनसंपर्क तैं विज्ञापन  जरूरत नि होंदी जब कि विज्ञापन तैं जनसम्पर्क की जरूरत हूंद।  
विज्ञपान उयाद नौनु च जब कि जनसम्पर्क कमाऊ नौनु च 
जनसम्पर्क समाचार पैदा करद विज्ञापन समाचार खतम करद 

Copyright@ Bhishma Kukreti  29 /1/2014 



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक  से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  द्वारा  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वालेद्वारा   पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले द्वारा   भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले द्वारा   धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले द्वारा  वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  द्वारा  पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक द्वारा  विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक द्वारा  पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक द्वारा  सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखकद्वारा  सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक द्वारा  राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, राजनीति में परिवार वाद -वंशवाद   पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ग्रामीण सिंचाई   विषयक  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, विज्ञान की अवहेलना संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य  ; ढोंगी धर्म निरपरेक्ष राजनेताओं पर आक्षेप , व्यंग्य , अन्धविश्वास  पर चोट करते गढ़वाली हास्य व्यंग्य    श्रृंखला जारी  ]  

Monday, January 27, 2014

Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speech in Garhwali Drama

गढ़वाली  लोक नृत्य-गीतों  , लोक नाटकों  में पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार  

Review of Characteristics of Garhwali Folk Drama, Folk Theater/Rituals and Traditional Plays part -87 

                                    Bhishma Kukreti (लोक साहित्य शोधार्थी)


                When a word is repeated at the identical time, it is Punarukti Prakash Alankar. As in following folk song  word is repeated at identical time and place.
गढ़वाली  लोक नृत्य-गीतों लोक नाटकों में पुनरुक्तिप्रकाशअलंकार का उदाहरण

माटो पड़े कमकम ढुंगा पड्या दम दम
पाड़ मा मोटर चले थ-रा-रा पम पम


Copyright@ Bhishma Kukreti 26 /1/2014

Characteristics of Garhwali Folk Drama, Community Dramas; Folk Theater/Rituals and Traditional to be continued in next chapter

                 References
1-Bharat Natyashastra
2-Steve Tillis, 1999, Rethinking Folk Drama
3-Roger Abrahams, 1972, Folk Dramas in Folklore and Folk life 
4-Tekla Domotor , Folk drama as defined in Folklore and Theatrical Research
5-Kathyrn Hansen, 1991, Grounds for Play: The Nautanki Theater of North India
6-Devi Lal Samar, Lokdharmi Pradarshankari Kalayen 
7-Dr Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas part 1-12
8-Dr Shiva Nand Nautiyal, Garhwal ke Loknritya geet
9-Jeremy Montagu, 2007, Origins and Development of Musical Instruments
10-Gayle Kassing, 2007, History of Dance: An Interactive Arts Approach
11- Bhishma Kukreti, 2013, Garhwali Lok Natkon ke Mukhya Tatva va Charitra, Shailvani, Kotdwara
12- Bhishma Kukreti, 2007, Garhwali lok Swangun ma rasa ar Bhav , Chithipatri

Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches     in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Chamoli Garhwal, North India, South Asia; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches   in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Rudraprayag Garhwal, North India, South Asia; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches   in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Pauri Garhwal, North India, South Asia; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches   in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Tehri Garhwal, North India, South Asia; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Uttarkashi Garhwal, North India, South Asia; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Dehradun Garhwal, North India, South Asia; Punaruktiprakash Alankar or Epistrophe Figure of Speeches  in Garhwali Folk Drama, Folk Rituals, Community Theaters and Traditional Plays from Haridwar Garhwal, North India, South Asia;
गढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार,  टिहरी गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ;उत्तरकाशी गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकारहरिद्वार गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ;देहरादून गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ;पौड़ी गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ;चमोली गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में  पुनरुक्तिप्रकाश अलंकाररुद्रप्रयाग गढ़वाल केगढवाली लोक नाटकों में   पुनरुक्तिप्रकाश अलंकार ;

गणतंत्र दिवस पर उत्तराखंड ki जड़ी बूटी की झांकी पर्यटन सहयोगी है !

जड़ी बूटियां उत्तराखंड पर्यटन को प्राचीन  संबल देती आ रही हैं !
                      Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Uttarakhand 
                  (Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series--40)
                                          उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 40   
                                                           लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  विक्री प्रबंधनविशेषज्ञ )
         सन २०१४ के गणतंत्र दिवस के दिन दिल्ली में झांकी में उत्तराखंड में जड़ी बूटियां संबंधी चल झांकी भी दिखाई जायेगी। उत्तराखंड पर्यटन ब्रैंडिंग हेतु  झांकी महत्वपूर्ण है। 
जड़ी बूटियों द्वारा उत्तराखंड की छवि महाभारत काल से पहले से ही बनती आयी है।  
महाभारत , पुराणो व अन्य प्राचीन साहित्य में उत्तराखंड इलाके में ऋषियों , राजाओं का पर्यटन व कई वनस्पतियों का जिक्र मिलता है जो बताता है कि उत्तराखंड की जड़ी बूटियों ने उत्तराखंड की छवि वर्धन में कारगार योगदान दिया था।  प्लेस ब्रैंडिंग में मेड इन (निर्माण स्थान ), मेड बाइ ( किसने निर्माण किया ) का बड़ा महत्वपूर्ण स्थान होता है।  महाभारत में तो उत्तराखंड की बहुत सी वनसप्तियों का वर्णन इस प्रकार हुआ है जो इंगित करता है कि अन्वेषक उत्तराखण्ड आते रहे हैं। 
कालिदास के साहित्य में भी वनस्पतियों द्वारा उत्तराखंड छवि वर्धन हुआ है। 
 ऐसा माना जाता है कि चरक व सुश्रुवा व  शिष्यों ने उत्तराखंड में विचरण किया था और उत्तराखंड की जड़ी बूटियों का अध्ययन भी किया था जो इस बात का द्योत्तक है कि जड़ी बूटियों ने उत्तराखंड को विशेष छवि प्रदान की थी। 
अशोक व गुप्त काल में उत्तराखंड की वनस्पति व खनिज का निर्यात रोम तक होता था।  जो  बतलाता है कि जड़ी बूटियों का उत्तराखंड पर्यटन में एक विशेष स्थान था और है।  निर्यात पर्यटन सहायक माध्यम होता है। 
 
                             जड़ी बूटियों व वनस्पतियों से उत्तराखंड छवि वर्धन याने प्लेस ब्रैंडिंग 

जड़ी बूटियां या किसी भी अन्य वस्तु से स्थान छवि वर्धन से पर्यटन -निर्यात को लाभ होता ही है।
पहचान - जड़ी बूटियां (वनस्पतियां ) उत्तराखंड को  विशेष पहचान दिलाने में सहायक होते हैं। मेड इन या अवेलेबल (निर्मित  या सुलभता ) विशेष पहचान हेतु  आवश्यक माध्यम है।  हमेशा से ही वस्तु स्थल पहचान देने का एक औजार  सिद्ध हुआ है। 
स्थान की पहचान - स्थान की पहचान  अर्थ है कि ग्राहक विशेष स्थान को किस तरह देखता है या समझता है। 
वस्तु  का पहचान से क्या  संबंध  है - याने जड़ी बूटी या वनस्पतियों से उत्तराखंड की पहचान से क्या संबंध  है।  क्या यह जुड़ाव वास्तव में सशक्त छवि प्रदान कर  सकता है ? जड़ी बूटी स्वास्थ्य से संबंधित हैं. इसीलिए  जड़ी बूटी  उत्तराखंड छवि हेतु एक सकारात्मक माध्यम है और यह माध्यम धार्मिक माध्यम के साथ अवश्य ही  खाता है। 
वस्तु का  जीवन व इतिहास से संबंध - वास्तु का मानव जीवन के साथ संबंध भी छवि संवर्धन को प्रभावित करता है। हिमालय में मानव हितैसी जड़ी -बूटियां मिलती हैं जैसी छवि प्राचीन काल से ही है अत: जड़ी बूटी को माध्यम बनाकर छवि वर्धन उत्तराखंड के लिए हितकारी है। 
  शिवा नंद आश्रम , गुरुकुल कांगड़ी , पंतजलि आश्रम , अमृतधारा द्वारा निर्मित वस्तुएं उत्तराखंड के पर्यटन वृद्धि में  सहायक कारक व माध्यम हैं।
                  वनस्पति जनित औषधि विज्ञान व व्यापार को प्रश्रय 
  
उत्तराखंड के समाज को वनस्पति जनित औषधि विज्ञान व व्यापार को सभी तरह से परिश्रय देना चाहिए।  उत्तराखंड में ऐसे निर्णय लिए जायं कि सभी लोग उत्तराखंड को आयुर्वैदिक समझने लगे।  यह मान  चाहिए कि उत्तराखंड को आयुर्वैदिक धरती बनाने से  पर्यटन व निर्यात में वृद्धि होगी । 
  
उत्तराखंड के समाज को औषधीय वनस्पति उत्पादन , वनस्पति उत्पादन , वनस्पति का औषधीकरण , वनस्पति एवं औषधियों का विपणन आदि की योजनाओं को साकार करना चाहिए। 
  

Copyright @ Bhishma Kukreti 25  /1/2014 

Contact ID bckukreti@gmail.com

Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...
उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों मेंकोटद्वार गढ़वाल 



Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Uttarakhand;Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Bageshwar Kumaon, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Champawat Kumaon, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Almora Kumaon, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Nainital Kumaon, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Haridwar Garhwal, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Dehradun Garhwal, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Uttarkashi Garhwal, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Tehri Garhwal, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Chamoli Garhwal, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand; Medicinal and Herbal Plants as Source of Tourism Development in Pauri Garhwal, Uttarakhand;

Origin of Modern Garhwali and Kumaoni Languages

History of Garhwal (1223- 1804 AD) –part -8

 History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -253

                       ByBhishma Kukreti (A History Student)

             In twelfth or end of eleventh century, Challa ruling class from Nepal destroyed Katyuri of Baijnah Kingdom. For administrating from Nepal, Challa divided Garhwal-Kumaon into regions or (Mandals) and offered ruling power to Mandlik or regional chieftains.  In later stage, these regional chieftains became rulers of tens of Kingdoms. However, that division did not minimize the cultural unity of today’s Garhwal and Kumaon. There is exclusivity in the region between Tones-Yamuna to Kali Ganga that separates Uttarakhand region from Nepal, Himachal Pradesh, Kashmir and Afghanistan of Himalaya. The geographical aspects of Uttarakhand is exclusive than North East Himalayan region of India. In north of Uttarakhand is Tibet (China) and even Uttarakhand had exclusivity against Himalayan Tibet in many respects.
               Before, Katyuri took ruling in Uttarkhand, Nand, Maurya, Maukhari, Gupta, Harsha and Paurav kings had ruling in Uttarakhand but its cultural and geographical exclusivity remained intact. Katyuri ruled on Uttarakhand for two hundred years from Joshimath and two hundred years from Baijnath. They enhanced the cultural unity and that unity still exists in Uttarkhand.
 Various social and the cultural beliefs, structures started from Katyuri rules in Uttarakhand.
    Badrinath, Kedarnath, Tapovan, Simli, Adi Badri , Dev Prayag, Jageshwar, Bageshwar pilgrim places got specific places in religious tourism map of  India in Katyuri period. Shankaracharya reestablished the religious power of Badrinath and Kedarnath. Medhakar types of saints came to Dev Prayag in this period.
       Uttarakhand attracted saints, religious priests, religious leaders, temple architectures from all parts of India. Uttarkhand became the land of Gods and Goddesses (Dev Bhumi).

                           Origin of Garhwali and Kumaoni Languages

                 Katyuri period is also credited for developing two exclusive languages in the region. Khas language is the mother of Garhwali and Kumaoni languages. Garhwali and Kumaoni languages were derived by culturing distorted Khas language. There are similarities in both the languages in terms of form, postures but slowly both languages developed exclusivity too. The exclusivity in between Garhwali and Kumaoni languages also inspired for having two exclusive Garhwali and s Kumaoni societies in the region. However, cultural and religious words could intact the cultural unity very intact.


Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com24/1/2014
                                      References

1-Dr. Shiv Prasad Dabral, 1971, Uttarakhand ka Itihas Bhag-4, Veer Gatha Press, Dogadda, Pauri Garhwal, India 
2-Harikrishna Raturi, Garhwal ka Itihas
3-Dr. Patiram, Garhwal Ancient and Modern
4-Rahul Sankrityayan, Garhwal
5- Oakley and Gairola, Himalayan Folklore
6- Bhakt Darshan, Garhwal ki Divangit Vibhutiyan
7-Foster, Early Travels in India William Finch
8-Upadhyaya, Shri Shankaracharya
9-Shering, Western Tibet and British
10-H.G. Walton, Gazetteer of British Garhwal
11-B.P.Kamboj, Early Wall Paintings of Garhwal
12-H.g Walton, Gazetteer of Dehradun
13- Vimal Chandra, Prachin Bharat ka Itihas
14-Meera Seth, Wall Paintings of Western Himalayas 
15-Furar, Monumental Antiquities
16-Haudiwala, Studies in Indo-Muslim History

(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
History of Garhwal from 1223-1804 to be continued in next chapter          
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -254  
Xx
History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal; History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Pauri Garhwal district); History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Tehri Garhwal District); History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Uttarkashi Garhwal District); History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Chamoli Garhwal District); History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Rudraprayag Garhwal District); History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Haridwar Garhwal District); History aspects of Naming Kedarkhand and Garhwal (Including-Dehradun Garhwal District);

दुसरौ मुन्नि बदनाम नि कारो , तुमर घौरम बि मुन्नि बैठीं च

 चुनगेर ,चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती        


(s =आधी अ  = अ , क , का , की ,  आदि )
               अचकाल राजनीतिज्ञों मा टीवी समिण दुसरौ मुन्नि (नीयत या राजनैतिक , सरकारी कार्य ) तैं बदनाम करणो रोग बिंडी लग गे।  अपण पूठक  गुवक थड़का त दिखद नि छन दुसरो मुख पर लग्युं सुक्युं माटु  पर बड़ो हो हल्ला करणा रौंदन। 
           अब द्याखो ना ! राजनीति तैं बदलणो बान हाई स्टैण्डर्ड की बात करण वाळ आम आदमी पार्टी बि ऊनि करतब करण बिस्याणि च जन सबि राजनैतिक पार्टी करदा छा। ठीक च दिल्ली का न्याय मंत्री सोमनाथ भारतीन क्वी इथगा बड़ो सामजिक गुनाह नि कार पण संवैधानिक गुनाह तो उंसे ह्वैइ गे कि ना ? तो हाइ स्टैंडर्ड का हिसाब से आम आदमी  पार्टी तैं कुछ तो करण ही पोडल कि ना ? दूसरौ मुन्नी तैं बदनाम त आप पार्टी बि करणि च अर अपण घौरम बैठी अपण मुन्नी तैं नि दिखणा छंन।  
        एक बेवकूफी करण वाळ पार्टी च भाजापा ज्वा आम आदमी  पार्टी की मुन्नी ( राजनैतिक कार्य ) तैं बदनाम करणो बान धरना आदि करणी च।  अब मेरी समज मा आइ कि दिल्ली वाळुन भाजापा पर झाडु किलै लगाइ।  दिल्ली की भाजापा लोगुं नबज पछ्याणनम नाकाब पार्टी च। एबगत आम आदमी पार्टी की आग जळणी  च अर तुम धरना देकि वीं आग मा धरना रूपी घी ना पेट्रोल डळणा छंवां ? मि त मुंबई मा बैठिक बि बताइ सकदु कि यद्यपि सोमनाथ भारती  संवैधानिक हिसाब से दोषी ह्वे सकदन किन्तु जनता की नजरों मा सोमनाथ भारती  रॉबिनहुड छन.   अर इन मा भाजापा वाळ सोमनाथ भारती का विरोध करणा छन तो अपणो ही नुकसान करणा छन।  कबि कबि विरोध नि करण भौत बड़ो विरोध हूंद।  आम आदमी पार्टी तो चांदी च कि भाजपा विरोध कार अर आम आदमी पार्टी की घर बैठ पब्लिसिटी ह्वावो।  
            अर भाजपा की राज्य सरकारों  , नगर निगमों , पंचायतों मा सैकड़ों सोमनाथ बैठ्या छन फिर इन माँ सोमनाथ का विरोध कौरिक क्या मीलल ? अपण घौरम बदनाम मुन्नी बैठीं च अर दूसरौ मुन्नी तैं बदनाम करण कखक न्याय निसाब  च भै ?
          कॉंग्रेस तो बिदूषक जन नाटक करणी च।  खुद मुन्नियों जन्मदात्री ह्वैक दुसरौं मुन्नियों तैं बदनाम करण केवल एक विदूषक ही कौर सकुद। 
                दूसरौ मुन्नी तैं बदनाम करण पर याद आयि कि जब 1977 मा जनता दल की सरकार आयि तो कुछ नेता इंदिरा गांधी की बात ही नि करदा छा।  किन्तु कुछ चरण सिंग जन नेता इंदिरा गांधी पैथर लत्था लेक पड़ी गेन अर यूँ नेताओंन इंदिरा गांधी तैं जेल मा बंद करी दे।  रातों रात इंदिरा गांधी का इमेरजेंसी पाप धुली  गेन अर इंदिरा गांधी को पुनर्जन्म ह्वे गे।  वा वैदिन से दुबर रानी बौण गे।  कबि कबि कैक अत्याधिक विरोध बि नुकसानदेय हूंद।  असल मा इंदिरा गांधी क बात नि करण ही मा जनता दल को फायदा छौ किन्तु जब राजनीतिज्ञ जनता की नबज पछ्याणनम गलती करदन तो इंदिरा गांधी जन विरोधी तैं ऑक्सीजन दीन्दन। ये मामला मा इंदिरा गांधी होसियार छे।  दुबर सरकार मा आणो बाद इंदिरा गांधीन जनता सरकार की बात ही नि कार अर यांसे जनता दल इरेलिवेंट साबित ह्वै गे।  
     आज नरेंद्र मोदी की प्रसिद्धि, जन झुकाव, लोकप्रियता  का पैथर भाजापा कु हाथ एक रति भर बि नी  च।  सन 2002 से लेक आज सुबेर तलक क्वी दिन इन नि गे होलु जैदिन कै राष्ट्रीय नेतान नरेंद्र मोदी की काट नि कौर होलि।  अर राष्ट्रीय स्तर पर रोज नरेंद्र मोदी की आलोचनान  नरेंद्र मोदी तैं अंतराष्ट्रीय नेता बणै दे।  दुसरै मुन्नी तैं बदनाम करणो चक्कर मा दुसरै मुन्नी पॉपुलर बि ह्वे जांद , यु दिखणाइ तो नरेंद्र मोदीक पॉपुलरिटी ग्राफ देखि ल्यावो। 
 इनी आम आदमी पार्टीक पॉपुलरिटी बि , लोकप्रियता बि च।  भाजापा अर कॉंग्रेस द्वारा आप पार्टी की अनावश्यक आलोचना से आम आदमी पार्टी तैं भौत फैदा ह्वे। 
राजनीति मा दूसरौ मुन्नी तैं बदनाम करण जरुरी च पण इथगा बि बदनाम नि करण चयांद कि दूसरौ मुन्नी बदनाम हूणो जगा लोकप्रिय ही ह्वे जावो।  नरेंद्र मोदी अर आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता मा विरोधियों द्वारा आलोचना कु हाथ जादा च।  
तो ध्यान दीण चयेंद  कि दुसरै मुन्नी तैं बदनाम करणो चक्कर मा  कखि  लोग तुमर मुन्नी तैं ही नि भूल जावन हाँ ! 




Copyright@ Bhishma Kukreti  25  /1/2014 



[गढ़वाली हास्य -व्यंग्य, सौज सौज मा मजाक  से, हौंस,चबोड़,चखन्यौ, सौज सौज मा गंभीर चर्चा ,छ्वीं;- जसपुर निवासी  द्वारा  जाती असहिष्णुता सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ढांगू वालेद्वारा   पृथक वादी  मानसिकता सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;गंगासलाण  वाले द्वारा   भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; लैंसडाउन तहसील वाले द्वारा   धर्म सम्बन्धी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;पौड़ी गढ़वाल वाले द्वारा  वर्ग संघर्ष सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; उत्तराखंडी  द्वारा  पर्यावरण संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;मध्य हिमालयी लेखक द्वारा  विकास संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य;उत्तरभारतीय लेखक द्वारा  पलायन सम्बंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; मुंबई प्रवासी लेखक द्वारा  सांस्कृतिक विषयों पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; महाराष्ट्रीय प्रवासी लेखकद्वारा  सरकारी प्रशासन संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य; भारतीय लेखक द्वारा  राजनीति विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; सांस्कृतिक मुल्य ह्रास पर व्यंग्य , गरीबी समस्या पर व्यंग्य, आम आदमी की परेशानी विषय के व्यंग्य, जातीय  भेदभाव विषयक गढ़वाली हास्य व्यंग्य; एशियाई लेखक द्वारा सामाजिक  बिडम्बनाओं, पर्यावरण विषयों   पर  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, राजनीति में परिवार वाद -वंशवाद   पर गढ़वाली हास्य व्यंग्य; ग्रामीण सिंचाई   विषयक  गढ़वाली हास्य व्यंग्य, विज्ञान की अवहेलना संबंधी गढ़वाली हास्य व्यंग्य  ; ढोंगी धर्म निरपरेक्ष राजनेताओं पर आक्षेप , व्यंग्य , अन्धविश्वास  पर चोट करते गढ़वाली हास्य व्यंग्य    श्रृंखला जारी  

Antyanupras or Consonance Alliteration Figure of Speech in Garhwali Folk Drama

गढ़वाली  लोक नृत्य-गीतों  , लोक नाटकों  में अंत्यानुप्रासअलंकार  

Review of Characteristics of Garhwali Folk Drama, Folk Theater/Rituals and Traditional Plays part -86 

                                    Bhishma Kukreti (लोक साहित्य शोधार्थी)
                 When in nay poetry the consonant at the end of poetry line is repeated it is called Consonance Alliteration Figure of Speech. Following is an example of Consonance Alliteration Figure of Speech in Garhwali Drama

गढ़वाली  लोक नृत्य-गीतों लोक नाटकों में अंत्यानुप्रास अलंकार काउदाहरण
 लाल बणी होलि ब्वै काफळ की डाळी
लोग खांदा होला ब्वै लूण राळि राळी
xxx  
तू होली बीरा ऊँची निसि डांड्यु माँ  , घस्यार्युं भेष माँ
खुद मा तेरी सड़क्यूं माँ मि रूणु छौं परदेस माँ
(Song by: Jeet Singh Negi)

Copyright@ Bhishma Kukreti 24 /1/2014

Review of Characteristics of Garhwali Folk Drama, Community Dramas; Folk Theater/Rituals and Traditional to be continued in next chapter.

                 References
1-Bharat Natyashastra
2-Steve Tillis, 1999, Rethinking Folk Drama
3-Roger Abrahams, 1972, Folk Dramas in Folklore and Folk life 
4-Tekla Domotor , Folk drama as defined in Folklore and Theatrical Research
5-Kathyrn Hansen, 1991, Grounds for Play: The Nautanki Theater of North India
6-Devi Lal Samar, Lokdharmi Pradarshankari Kalayen 
7-Dr Shiv Prasad Dabral, Uttarakhand ka Itihas part 1-12
8-Dr Shiva Nand Nautiyal, Garhwal ke Loknritya geet
9-Jeremy Montagu, 2007, Origins and Development of Musical Instruments
10-Gayle Kassing, 2007, History of Dance: An Interactive Arts Approach
11- Bhishma Kukreti, 2013, Garhwali Lok Natkon ke Mukhya Tatva va Charitra, Shailvani, Kotdwara
12- Bhishma Kukreti, 2007, Garhwali lok Swangun ma rasa ar Bhav , Chithipatri
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गढवाली लोक नाटकों में  अंत्यानुप्रास अलंकार,  टिहरी गढ़वाल के गढवालीलोक नाटकों में  अंत्यानुप्रास अलंकार ;उत्तरकाशी गढ़वाल के गढवाली लोकनाटकों में  अंत्यानुप्रास अलंकारहरिद्वार गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकोंमें  अंत्यानुप्रास अलंकार ;देहरादून गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में अंत्यानुप्रास अलंकार ;पौड़ी गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में अंत्यानुप्रास अलंकार ;चमोली गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में अंत्यानुप्रास अलंकाररुद्रप्रयाग गढ़वाल के गढवाली लोक नाटकों में   अंत्यानुप्रास अलंकार ;