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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Monday, January 28, 2013

बनि बनिक ब्यौs पौण (मेहमान)

गढ़वाली हास्य व्यंग्य
हौंसि हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा
                           बनि बनिक ब्यौs पौण (मेहमान)                    
                              चबोड्या: भीष्म कुकरेती
(s=-माने आधी अ )
आप कखि बि , कबि बि कै ब्यौम जावो आप तै तरां तरां का पौण सबि ब्यौम मिलि जाला। कुछ मेमानुं लक्छण इन छन।

आव भग्त्या या गेट कीपर पौण: इ पौण चाहे ब्योलाs तर्फांन ह्वावन या ब्योलिs तर्फांन ह्वावन यि तुम तै वेडिंग प्वाइंट या मांगल्य हौलौ गेटs समणि खड़ा मीलल।यि पौण इन लगद जन बुल्यां यूँ तैं हौर पौणु आव भगत करणों ठेका दिए गे हो। कुछ जनम जाति बाटो दिखन्देर हूंन्दन जो लोगुं तै बथाणा रौंदन बल भितर जाणों रस्ता क्वा च या ब्योला -ब्योलि रिसेप्सेन पर बैठि गेन कि ना।कुछ कुछ कुछ नि करदन बस गेटs न्याड़-ध्वार लंग्यड़ बरोबर खड़ रंदन। कुछ इना उना इन रिटणा रौंदन जन बुल्यां इ कैतैं खुज्याणा छन या कैकि जग्वाळ करणा छन।
जौंक पूठाs पर था नि होंद: इन पौण कखिम बि अधा मिनट तक ना त बैठ सक्दन ना इ खड़ा रै सकदन। रिसर्च पर अरबों रूप्या खर्च कौरिक दुनिया भरो गोंद बणाण वळि कंपनी फेल ह्वे गेन पण इन पौणु खुट या पूठ पर था (ठहराव या आधार) लीणो क्वी गोंद नि बणै सकिन।

रगरट्या पौण: बस यूं पौणु तै कुज्याण केको रगर्याट लग्युं रौंद धौ बस हर दें , हर बगत जल्दी बाजि इ करणा रौंदन। कति दें इ पौण रगर्याटमा ब्योला -ब्योलि तै भेंट दींद बिसरि जांदन या बगैर खयां द्वी चारों तै लमडैक-पतेड पत्याड़िक भैर अटकिक ऐ जांदन। अमूनन हरेक ब्यौमा रगर्याटम यी लोग खाणक जरूर खतदन या रगर्याटम दुसरs घरवऴयूं हाथ पकड़िक भैर गेट तक खैंचि बि लै जांदन।अर फिर जब वा जनानि बुल्दि बल "यां जब मै तै खैंचणो बगत छौ तब तुम गोरम जल्दि बाजिम गौड़ी या बखरितै खैंचण मिसे जांदा छा" तब यूं तै पता चलदो बल यूंन कुबगत पर रगर्याटम कै तै खैंचि द्याइ !

चिपकदा पौण: यि पौण जखम बैठि जाला अंत तलक उखमि बैठ्या मीलल।
जी दुखाण वळ पौण: कुछ पौण जथगा देर बि राला उथगा देर कैको मोरणो या दुख्यर होणो की इ छ्वीं लगांदन। यूं से हूणी-खाणी छ्वीं लगदि नि छन।

अग्ल्यारि लिन्देर पौण या पंगत तोडु पौण: इन पौण पंगतम पैथर नि रै सकदन अर जखम बि पंगत ह्वावो पंगत तोडि अग्वाड़ी जांदन अर क्वी हैंक पौण पंगत तोड़ी द्यावो त यी अगलर्या पौण वै तै अडांदन बल लैन तोड़न से इ इंडियाक छ्त्यानाश होणु च।

दुंळ खुजनेर (छिद्रोन्वेषी), निंदक या नुक्श बतांदेर: यूंक काम सब्युं तै ब्यौम क्या क्या कमि छन बथाणो हूंद याने यी जनम जाति दुंळ (छिद्र) खुजनेर हूंदन। दुंळ खुजनेरूं असली धरम निंदा करण इ होंद।
तुलना करदरा : यी हौर पौणु तै वर्तमानम नि रौण दींदन बस अलाणो शादिम त इन ह्वे छौ, फलणो शादिम तन ह्वे छौ कि बात करणा रौंदन। यूं तुला राशिक लोगुं तै लगद कि यी सुणण वाळु तै मजा दीणा छन जब कि यि हौरुं वर्तमानs मजा बिगाड़णा रौंदन।

गपोड़ी पौण: यूंको काम बस बड़ी बड़ी गप मारणों हूंद
गढ़वाल प्रेमी पौण: यी चालीस पैंतालिस साल से मुंबई या दिल्ली जोग हि हुंयां छन पण मानसिक रूप से गढ़वाल से भैर नि ऐ सकदन अर रूणा रौंदन बल "गढ़वाल की संस्कृति खतम हूणि च , अब त ब्यौमा पाणि क्वी नि पींदो सबि दारू पींदन"।
भिंट्याण वळ पौण: बस यी पौण ज्वी बि मिल्दो वै पर भिंट्याण मिसे जांदन। कबि कबि आदतन अर गल्तिम अपणी घरवळि पर इ भिंटे जांदन अर पुछदन,' ये मेरि लाडि ! कथगा सालों से मिलणि छे तू ! बुड्या ठीक च?"
खौंळेण वळ पौण: यी पौण हेरक बात पर खौंऴयाणा रौंदन अर हरेक बात पर बुल्दन " न भै यां ! न्है यार ! क्या बुना छां? अच्छा ? हे मेरि ब्वे!"

खुचरट्या पौण: यूंक एकी काम होंद बस खुचर्याट करण।
सदाबहार पिछ्ल्वाड़िक पौण: इन लगदो कि यि लोग नौ ना दसों या ग्यारों मैनाम पैदा ह्वे होला या यूं तै यूंकी ब्वेन पिछल्वाडि बाड़ी खलै ह्वालो। यी पौण हमेशा ब्यौमा ड्वाला उठांद दै (विदाई ) इ आंदन।
उन हौर तरां पौण बि होंदन पण मि जरा एक शादि म जाणो छौं त उख बिटेन ऐक मि हौर तरां पौणु बाराम बथौल।

Copyright@ Bhishma Kukreti 29/01/2013 

Sunday, January 27, 2013

मुम्बैम रौणौ परमिट

गढ़वाली हास्य व्यंग्य
हौंसि हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा
                    मुम्बैम रौणौ परमिट
                            चबोड्या: भीष्म कुकरेती
(s=-माने आधी अ )
ब्याळि मीन अपण घरवळि कुणि बोलि बल आधार कार्ड बणानो जाण।
त घरवळिन बोलि," बुड्या ह्वे गेवां पण अबि तलक तुमर समज माँ कु काम अर्जंट च , कु काम महत्वपूर्ण च , कु काम जरूरी च पण महत्वपूर्ण नी च जन बात छंट्याण नि आयि।"
मीन पूछ ," अरे पण आधार कार्ड बणान जरूरी बी च अर अर्जेंट बि च।"
वींन बोलि," हां आधार कार्ड जरूरी जरूर च पण अर्जेंट कतै नी च।"
मीन बोलि," हां पण आधार कार्ड टैम पर बौणि जा त ...?"

घरवळिन रुसेक ब्वाल," तै बुड्याs खज्यात ऐ गे . मि कथगा सालुं से बुलणु छौं बल मुम्बैम रौणौ परमिट बणाओ पण मेरि कु सुणदु ?"

मीन बोलि," पण हमम राशन कार्ड च , हम सब्युंम अपण अपण वोटिंग कार्ड च त फिर ...?"
घरवळिन रुणफति ह्वेक ब्वाल,' पण हमम मुम्बैम रौणौ परमिट नी च . मि इथगा सालों बिटेन तुमर पैथर पड्युं रौं बल बाल ठाकरे ज्योर मांगन मुम्बैम रौणौ परमिट लया, परमिट लया पण मजाल च जु तुमन मेरि सुणि होलि धौं . अब त बिचारा ठाकरे ज्योर भग्यान बि ह्वे गेन।"
मीन बोलि," पण .."
वींन जोर से ब्वाल," अब आजि तुम राज ठाकरे जिठा जीमा जावो अर मुम्बैम रौणौ परमिट बणैs लैया।"
मीन बुलण चाइ पण वींन नि सुणि अर बुल्दि गे," सुणो ! जु राज ठाकरे जिठा जि पूछल कि तुम महाराष्ट्रियन छंवां कि ना त जबाबम अपण बवे अर बैणि सौं घौटिक बुलेन कि तुम शत प्रतिशत महाराष्ट्रियन छंवां। कखिम बि उत्तराखंड को नाम नि गाडिन !"
"पण मीम सन चौवहतरो राशन कार्ड च बल मि पक्को महाराष्ट्रियन छौं।" मीन तर्क दे
"नै नै ! राज ठाकरे जिठा जीक बुलण च बल इख बंगलादेस्यूंन घूस देकि अपण ददाओं राशन कार्ड बि बणायां छन। त तुम तै राज जिठा ज्योरू समणि सौंइ घटण पोड़ल कि तुम पक्का महाराष्ट्रियन छंवां।" घरवळिन समजाई
मीन बोले ," पण "

वींन मि तै बुलण नि दे," तुम तै नी पता अमेरिका म रौणो वीसा मिलण सरल च अर राज जिठा जी बिटेन मुम्बैम रौणौ परमिट पाण भारि कठण च।जु राज जिठा जी पूछ्ल बल तुम तै मराठी आन्दि च कि ना त मराठी माँ ना अंग्रेजीम सौं घटिन बल तुम तैं इ ना तुमर संतान तै बि मराठी पढ़ण अर लिखण आंद च।"
मीन पूछ," पण मराठी म किलै नि बचऴयाण?"

घरवळिन खुलासा कार," तुमर हिंदी मा इ गढ़वाळी भौण आन्दि त राज जिठा जीक समणि मराठीम बचळेऴया त वूं तै शक नि ह्वे जावो कि तुम बिहारी छौंवां।"
मीन अपण तर्क दे," पण राज जी उतराखंड्यूँ से नि चिर्याड़न्दन। मि बोलि सकदो कि मि उत्तराखंडी छौं अर अब महाराष्ट्रियन छौं।"

घरवळिन गुस्सा ह्वेक ब्वाल," तुम सरीखा लाटा -काला-स्वमा लीन उतराखंड्यूँ तै गलतफहमी च बल राज ठाकरे ज्योर सरीखा लोग जाणदा छन कि उत्तराखंड बि क्वी जगा च। अरे जब सूबा को मुख्यमंत्री तैइ नी च पता कि उत्तराखंड क्या च त हौरुं तै क्या पता कि उत्तराखंड बि क्वी परदेस च। बस राज ज्योरु समणी तुम केवल अंग्रेजीमा ही मराठी माणस की ही छ्वीं लगैन।"
मीन बोलि," अरे पण .."
बगैर मेरि बात सुण्या वींन हिदैत दे," अर सुणो ! राज जिठा जि हुस्यार मनिख छन वु तुम तै पूछि सकदन कि रिटायरमेंटो बाद कख सेटल हूण त भूलिक बि अपण इच्छा नि बथैन कि देहरादून। बोलि देन कि तुम तै आमचि मुंबई से बडो प्रेम च अर बुढ़ापाम इखि मुम्बैमा इ रैल्या।"

मीन आखरि बार कोशिस कार," अरे भई जब आधार कार्ड मील जालो त अफिक ही मि मुंबईक नागरिक ह्वे जौलु।"
वींको तर्क छौ," नै नै ! राशन कार्ड, पासपोर्ट, आधार कार्ड त खालि साबित करदन कि तुम भारतीय छौंवां पण राज ज्योरू मुम्बैमा रौणौ परमिट से तुम खुले आम मुंबईमा घूमि सकदवां। आज भारतम भारतीय हूण जरूरी नी च बल्कणम स्थानीयता को पुजारी,स्थानीयता को गुलाम हूण जादा जरूरी च।",
मि घंघतोळ मा छौं बल पैल मुम्बैमा रौणौ परमिट बणौ कि भारतीय हूणों प्रमाणपत्र आधार कार्ड बणौ ?

Copyright@ Bhishma Kukreti 28/01/2013

Lal Batti ki Syani’: Satire on Aspiration for Political Position


Critical review of Garhwali satirical prose- 132
Critical Review of Garhwali Satire written by Prakash Mani Dhashmana -10
 ‘Lal Batti ki Syani’ (Rant Raibar 7/1/2013) by Prakash Mani Dhashmana 
                       Review by Bhishma Kukreti
 [Notes on Satire on Aspiration for Political Position; Garhwali Satire on Aspiration for Political Position; Uttarakhandi Satire on Aspiration for Political Position; Mid Himalayan Satire on Aspiration for Political Position; Himalayan Satire on Aspiration for Political Position; North Indian regional language Satire on Aspiration for Political Position; Indian local language Satire on Aspiration for Political Position; Indian subcontinent regional language Satire on Aspiration for Political Position; South Asian local  language Satire on Aspiration for Political Position; Asian area language Satire on Aspiration for Political Position; Oriental regional language Satire on Aspiration for Political Position]
                 Prakash Mani Dhashmana writes a regular Garhwali satirical column for a Garhwali weekly ‘Rant Raibar by the name ‘Chakdait Uvach’’. When a ruling party member of legislative assembly   (MLA) does not get the minister ship or other position in government agency the MLA feels desperation. Prakash satirizes such desperation of a politician for not getting powerful position in government agency.
   Prakash Dhashmana is editor and journalist too and there is effect on his reporting and editorial job on his satire. There is less humor in the satire but more description on feeling of the politician.  
Copyright@ Bhishma Kukreti 27/11/2012
Critical review of Garhwali satirical prose to be …133
Critical Review of Garhwali Satire written by Prakash Mani Dhashmana to be…11
Comments  on Satire on Aspiration for Political Position; Garhwali Satire on Aspiration for Political Position; Uttarakhandi Satire on Aspiration for Political Position; Mid Himalayan Satire on Aspiration for Political Position; Himalayan Satire on Aspiration for Political Position; North Indian regional language Satire on Aspiration for Political Position; Indian local language Satire on Aspiration for Political Position; Indian subcontinent regional language Satire on Aspiration for Political Position; South Asian local  language Satire on Aspiration for Political Position; Asian area language Satire on Aspiration for Political Position; Oriental regional language Satire on Aspiration for Political Position to be continued…

बुफे लंच-डिन्नर सस्तो किलै हूंद ?

गढ़वाली हास्य व्यंग्य
हौंसि हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा
                            बुफे लंच-डिन्नर सस्तो किलै हूंद ?
                                             चबोड्या: भीष्म कुकरेती
(s=-माने आधी अ )
अजकाल बुफे डिन्नर या बुफे लंचौ याने बुफे पार्टीs प्रचलन बढ़ी गे . जख जावो तख सडकोंम तुम तै -बुफे पार्टी कैसे दी जाय या - बुफे पार्टीम खाणों तरीका जन किताब मीलि जाला। आप तै सिखये जांद बल जैदिन बुफे पार्टी ह्वावो वां से एक या द्वी दिन पैलो बरत धरण जरूरी होंद . याने अजकालो हिसाब से बुफे पार्टीम जाण ह्वावो त नीनु पुटुक जाण ही सभ्य पुरुसुं काम च।
जु तुमन पार्टी दीण त बुफे पार्टी दीणम फैदा च . बुफे पार्टीs खर्चो सस्तो आंद . होटल वाळ तीन सौ टका को डिस्काउंट दीणों तयार रौंदन .
ब्याळि , रिवाजो हिसाब से , द्वी दिनों नीनु पेट लेकि मि एक बुफे पार्टीम होटल ग्योँ। उख पार्टीम मीन अंक्वाई (अन्थाजण) बल उख बड़ा बड़ा लोग छ्या किलैकि सबि अंग्रेजीम बचऴयाणा छया अर सबि एक हैंक तै हीण समजणा छ्या।पैलो जमानम जु संस्कृतम बचऴयांदो छौ अर सब्युं तैं छ्वटो समजदो छौ वी बड़ो आदिम हूंद छौ अब जु अङ्ग्रॆजिम बचऴयांदो अर सब्युं तैं छ्वटो समजदो वो ही बड़ो आदिम हूंद .

मि प्लेट लेक सलादों एरियाम ग्योँ त उख सबि बीस किस्मो सलाद मिक्स सलाद छया एक बि सलाद इकुऴया नि छौ । सलादो तौळ बनि बनि नामै प्लेट छे जन कि 'मिक्स्ड ग्रीन एंड ग्रीन बेल्जियन सलाद'; 'चीज, वेजिटेबल एंड पास्ता मिक्स्ड स्पेनिश सलाद';'चिकन मिक्स्ड विद पल्स पोर्तगीज सलाद'; 'मंगोलियन स्रिम्प प्राउन एंड लोबस्टर सलाद '; 'टेन वेज मिक्स्ड विद जमाइकन सौस कैरिबियन सलाद' आदि आदि। मीन एक सलाद गाड अर मेरि खानदानी सरयूळया जात जगी गे . मै लग ये सलादम अलग अलग दिनम कटीं भुजी या दाळ च . मीन गढ़वाळी बैरा तै पूछ ," भैजि ! इन लगणु च चिकन मिक्स्ड विद पल्स तीन चार दिन बासी च ."
बैरान जबाब दे ," हाँ ! भुला ताज होटलों पर्स्याक वेडिंग पार्टीम बच्युं चिकन सलाद मांगक चिकन च अर ओबेराय होटलौ नितर्स्यो तिरैं पार्टी मांगन बच्युं दाळ सलाद च। हमन द्वि मिलै देन "

मीन बोलि," अर नाम दे द्यायि - 'चिकन मिक्स्ड विद पल्स पोर्तगीज सलाद'"
"खाणों नामकरण मार्केटिंग डिपार्टमेंट वाळ करदन ." बैरा क जबाब छौ .
मि नौनवेज टेबल जिना ग्योँ त उख दुन्या भरौ नौन वेज से मेज भोरिं छे जन कि मोमिजी जापानीज चिकन'; 'अरेबियन लैम्ब विद ऑस्ट्रेलियन सौस' ; 'बेल्जियन डक लेग एंड मलेसियन डक रिब्स विद रसियन रेसिपी' आदि आदि
मीन 'इन्चिलाडा मेक्सिकन चिकन' चाख त फिर से मेरो भितरौ खानदानी सरयूळ जागृत ह्वे गे। मीन गढ़वाली बैरा तै पूछ ," भुला ये मैक्सिकन चिकनम तीन चार किस्मौ चिकन लगणा छन "

गढ़वाली बैरान बथाई बल हाँ द्वी तीन बड़ा बड़ा होटलों से ब्याळि-पर्स्यौ चिकन आलो त तीन चार किस्मौ चिकनs स्वाद आलो ही .
मि तै होटलों परचेज मैनेजर बडोला जी मीलि गेन। बडोला जी हमर अड्गैंका छन त वूंन बथै बल हम बड़ा बड़ा होट्लूं से बच्युं खाणा खरीददवां अर फिर मिक्स कौरिक नै नै रिसिपी बणौन्दा अर नया नया नाम देकि आप लोगुं तै परोसदवां
मीन पूछ," पण बडोला जी! यो त ऐथिकल बिजिनेस नी च। दुसर होटलों बच्युं खाणक नया नाम से बिचण क्वी बढ़िया बात त नी च ?"
बडोला जीक जबाब छौ," एक बात बथाओ तुम सरीका कम आमदनी का लोगुं तैं इथगा जादा खाणक सौ रुपया प्लेट मिलणों च त यां से खुशगंवार एथिकल बिजनेस क्या ह्वे सकुद ?"
खैर जो बी ह्वाओ मै तै बनि बनिक खाणों मील मि इखमा इ खुश छौ .

Copyright@ Bhishma Kukreti 27/01/2013

Katwari System: Satire on bribery with laughable humor


Critical review of Garhwali satirical prose- 131
Critical Garhwali review of Satire by Great Garhwali Satirist Harish Juyal -5
‘Katwari System’ (Satire collection ‘Khubsat’, 2012) Garhwali Satire Prose by Great Garhwali satirist Harish Juyal (A review)
                            Review by Bhishma Kukreti
[Notes on Satire on bribery with laughable humor; Garhwali Satire on bribery with laughable humor; Uttarakhandi Satire on bribery with laughable humor; Mid Himalayan language Satire on bribery with laughable humor; North Indian regional language Satire on bribery with laughable humor; Indian regional language Satire on bribery with laughable humor; Indian subcontinent regional  language Satire on bribery with laughable humor; South Asian regional language Satire on bribery with laughable humor; Asian regional language Satire on bribery with laughable humor; Oriental regional language Satire on bribery with laughable humor]
                     Bribery means an act of offering gift or money that alters/changes or adjusts the behavior of beneficiary. The paying-off is to get the job done through government officials or other persons by offering those gifts or money.
             Harish Juyal takes the readers in the satirical article ‘Katwari System’ to past about offering bribe through Ghee pot (Katwari). Humorously, Juyal states that these days, the procedure of ‘Katwari System’has changed and will change in future too as ‘Udan Tastari’.
  Humorously Juyal discusses glove money, cross palm, greasing palm, greasing wheels, oiling the angels etc.
कट्वरि  सिस्टम कि बात करे जा त यि पूर्णत: 'अपारदर्शी नीति ' का अंतर्गत आंद . जैकारण से येखुण पर्दा प्रथा अलाउड छ , इलैकि कट्वरि अन्ध्यर मा लिए जांद अरअन्ध्यर मा दिये जांद . कट्वरि तै उज्यळ से भौत परहेज च
Juyal is on top creating satire with laughable phrases.
Copyright@ Bhishma Kukreti 25/01/2013
   Critical review of Garhwali satirical prose to be … 132
Critical Review of Satirical articles by Harish Juyal to be continued…6
Notes on Satire on bribery with laughable humor; Garhwali Satire on bribery with laughable humor; Uttarakhandi Satire on bribery with laughable humor; Mid Himalayan language Satire on bribery with laughable humor; North Indian regional language Satire on bribery with laughable humor; Indian regional language Satire on bribery with laughable humor; Indian subcontinent regional  language Satire on bribery with laughable humor; South Asian regional language Satire on bribery with laughable humor; Asian regional language Satire on bribery with laughable humor; Oriental regional language Satire on bribery with laughable humor to be continued…

गैरसैणs नाम वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ठीक नगर नी च

गढ़वाली हास्य व्यंग्य
हौंसि हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा
                              गैरसैणs नाम वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ठीक नगर नी च
                                            चबोड्या: भीष्म कुकरेती
(s=-माने आधा अ )
अचकाल कथगा लोगुं मांग च बल गैरसैणो नाम बल वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली नगर धौरि द्यावो। नाम बदलणो भारी विरोधी छौं।
अब द्याखो ना ! दूर दराज बिटेन क्वी विधवा अपण पेन्सन पट्टाs कागज़ सुधारणो राजधानी आलि अर इख जब नेता अर औफिसर क्वी बि वीं दुख्यारि काम नि कारल अर उल्टां तंग ही कारल त वीं रंडोळन (विधवान) इन गाळी दीण ," बज्जर पोड़ी जैन ईं चन्द्र सिंह नगरी पर जख दुख्यारो तै बुरि तरां से तंग करे जांदो ." त ए मेरो दगड्यो तुम चांदो बल वीर चन्द्र सिंह तै फोकटम गाळि पोड़न ? इनि हजारों लोग अपण काम कराणों उत्तराखंडऐ राजधानी आला अर जब ऊंको काम नि होलु त विचारों न निरस्याण च अर गाळी वीर चन्द्र सिंह नगरी तै दीण . क्या तुम सहमत छंवां कि चन्द्र सिंह जी गाळि खावन ?

जब पत्रकार रन्त रैबार -खबर-सार द्याला कि उत्तरखंड की राजधानीम नेता अर अधिकारी निवास नि करदन बल्कणम उत्तरखंड की राजधानीम छगटा (ठग), डकैत रौंदन त छगटों, ठगों, अर डकैतों संबंध बगैर बातो वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली दगड़ जुड़ी जालो। जिकुडि पर कथगा बड़ो चीरा लगल, कथगा बुरु लगल जब अखबारम लिख्युं रालो ," चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी नेताओं अर अधिकार्युं नगरी नी च बल्कणम छगटों याने ठगों नगरी च, चन्द्र सिंह नगरी चोर उच्चकों की नगरी च ". क्या वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली चाला कि बगैर बातो वीर चन्द्र सिंह को नाम छगटों या ठगों दगड़ जुड़ल ?

अचकाल जब देहरादूनम सड़कोम जाम लगदो त हरेकक मुख बिटेन गाळि आंदन ," साला ! देहरादून की सड़के चलने लायक नही है ..". अर इनि जब बुले जालो ,' साली चन्द्र सिंह नगरी की सडकें चलने लायक नही .." तब क्या रूणों ज्यूं नि बुल्याल बल बिचारा चन्द्र सिंह गढवाली दुसरो पाप को डंड भोगणा छन!

राजधानीक अपणों बिगरौ हूंद बल इख जमीनै कीमत स्वर्गलोक से बिंडी ह्वे जांद अर खार खैक इनमा लोग इन बोल्दन ," आग लगिन ईं राजधानी पर "फिर जब गैरसैण या वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरम बि जमीनों कीमत विष्णुलोक से जादा इ बढ़लि त लोगुंन रोषम -गुस्साम इन बुलण ," काण्ड लगिन! बुरळ पोड़िन, कीड़ पोड़िन यीं चंद्र सिंह नगरी पर जख खुट धरणो जगा बि नी बचीं।" क्या इन बुरा सम्बोधन भग्यान चंद्र सिंह गढवाली को वास्ता ठीक रालो ?

कै बि राजधानी एक जरूरी लक्छण होंद बल उख पाणि भारि कमि होंद अर तिसा लोग हरदम इन गाळि दीन्दन ," बिजोग पोड़ि जैन यीं राजधानी पर, नरक समै जैन या राजधानी।". इनमा गैरसैणम बि पाणि टापि टापि जरूर ह्वेलि अर तिसा लोगुन गाळि दीणि च बल ,"बिजोग पोड़ि जैन यीं चंद्र सिंह नगरी पर, नरक समै जैन या चंद्र सिंह नगरी !". अब तुमि बथाओ क्या इन गाळि , बुरि बात को संबंध वीर चंद्र सिंह गढवाली दगड़ भलो रालो ?

जैं राजधानिम गंदगी, सड्याण , चिराण, सिलापैण, भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार , व्यभिचार आदि नि ह्वावो वा भारतीय प्रदेशों राजधानी नि ह्वे सकदी त इनमा जब लोग खबर पौढ़ल बल "वीर चंद्र सिंह नगरी गू-मूत, कचरा-गंदगी, भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार , व्यभिचार की नगरी" त क्या क्या वीर चन्द्र सिंह जी क आत्मा दुखि नि होलि
राजधान्युंम बिजली संकट अति होंद अर जब बिजली जाँदि त गाळि राजधानी ही खादि अर बुले जांद निरपट लगि जैन यीं राजधानी पर . ऊर्जा प्रदेसम बि बिजली कटौति होण इ च त जब उत्ताराखंडै राजधानिम बिजली जालि त हरेक कूड़ बिटेन इन पितीं (दुखी ) आवाज आलि ," सुंताळ पोडि जैन यीं चंद्र सिंह नगरी पर , आग लगी जैन यीं चंद्र सिंह नगरी पर .". इनमा हम सबी भक्तों तै हार्दिक दुःख नि होलु कि विचारा चन्द्र सिंह गढ़वाली बगैर बातों गाळि खाणा छन !

इनि हर पल , हरेक सेकंडम निरास , प्रताड़ित , रुंदा -पित्यांदा , दुखि , रोगिलों लोग बुलणा राला ," चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी को छत्यानास ह्वे जैन ! जा ! चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी डूबि जैन ! जा चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी नरक समै जैन ...." त हम सौब वीर चंद्र सिंह गढ़वाली प्रेम्युं तै बुरु नि लगल ?
त म्यार दिखण से गैरसैणो नाम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली नि होण चयेंद .

Copyright@ Bhishma Kukreti 26/01/2013

गैरसैणs नाम वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ठीक नगर नी च

गढ़वाली हास्य व्यंग्य
हौंसि हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा
                              गैरसैणs नाम वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली ठीक नगर नी च
                                            चबोड्या: भीष्म कुकरेती
(s=-माने आधा अ )
अचकाल कथगा लोगुं मांग च बल गैरसैणो नाम बल वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली नगर धौरि द्यावो। नाम बदलणो भारी विरोधी छौं।
अब द्याखो ना ! दूर दराज बिटेन क्वी विधवा अपण पेन्सन पट्टाs कागज़ सुधारणो राजधानी आलि अर इख जब नेता अर औफिसर क्वी बि वीं दुख्यारि काम नि कारल अर उल्टां तंग ही कारल त वीं रंडोळन (विधवान) इन गाळी दीण ," बज्जर पोड़ी जैन ईं चन्द्र सिंह नगरी पर जख दुख्यारो तै बुरि तरां से तंग करे जांदो ." त ए मेरो दगड्यो तुम चांदो बल वीर चन्द्र सिंह तै फोकटम गाळि पोड़न ? इनि हजारों लोग अपण काम कराणों उत्तराखंडऐ राजधानी आला अर जब ऊंको काम नि होलु त विचारों न निरस्याण च अर गाळी वीर चन्द्र सिंह नगरी तै दीण . क्या तुम सहमत छंवां कि चन्द्र सिंह जी गाळि खावन ?

जब पत्रकार रन्त रैबार -खबर-सार द्याला कि उत्तरखंड की राजधानीम नेता अर अधिकारी निवास नि करदन बल्कणम उत्तरखंड की राजधानीम छगटा (ठग), डकैत रौंदन त छगटों, ठगों, अर डकैतों संबंध बगैर बातो वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली दगड़ जुड़ी जालो। जिकुडि पर कथगा बड़ो चीरा लगल, कथगा बुरु लगल जब अखबारम लिख्युं रालो ," चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी नेताओं अर अधिकार्युं नगरी नी च बल्कणम छगटों याने ठगों नगरी च, चन्द्र सिंह नगरी चोर उच्चकों की नगरी च ". क्या वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली चाला कि बगैर बातो वीर चन्द्र सिंह को नाम छगटों या ठगों दगड़ जुड़ल ?

अचकाल जब देहरादूनम सड़कोम जाम लगदो त हरेकक मुख बिटेन गाळि आंदन ," साला ! देहरादून की सड़के चलने लायक नही है ..". अर इनि जब बुले जालो ,' साली चन्द्र सिंह नगरी की सडकें चलने लायक नही .." तब क्या रूणों ज्यूं नि बुल्याल बल बिचारा चन्द्र सिंह गढवाली दुसरो पाप को डंड भोगणा छन!

राजधानीक अपणों बिगरौ हूंद बल इख जमीनै कीमत स्वर्गलोक से बिंडी ह्वे जांद अर खार खैक इनमा लोग इन बोल्दन ," आग लगिन ईं राजधानी पर "फिर जब गैरसैण या वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरम बि जमीनों कीमत विष्णुलोक से जादा इ बढ़लि त लोगुंन रोषम -गुस्साम इन बुलण ," काण्ड लगिन! बुरळ पोड़िन, कीड़ पोड़िन यीं चंद्र सिंह नगरी पर जख खुट धरणो जगा बि नी बचीं।" क्या इन बुरा सम्बोधन भग्यान चंद्र सिंह गढवाली को वास्ता ठीक रालो ?

कै बि राजधानी एक जरूरी लक्छण होंद बल उख पाणि भारि कमि होंद अर तिसा लोग हरदम इन गाळि दीन्दन ," बिजोग पोड़ि जैन यीं राजधानी पर, नरक समै जैन या राजधानी।". इनमा गैरसैणम बि पाणि टापि टापि जरूर ह्वेलि अर तिसा लोगुन गाळि दीणि च बल ,"बिजोग पोड़ि जैन यीं चंद्र सिंह नगरी पर, नरक समै जैन या चंद्र सिंह नगरी !". अब तुमि बथाओ क्या इन गाळि , बुरि बात को संबंध वीर चंद्र सिंह गढवाली दगड़ भलो रालो ?

जैं राजधानिम गंदगी, सड्याण , चिराण, सिलापैण, भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार , व्यभिचार आदि नि ह्वावो वा भारतीय प्रदेशों राजधानी नि ह्वे सकदी त इनमा जब लोग खबर पौढ़ल बल "वीर चंद्र सिंह नगरी गू-मूत, कचरा-गंदगी, भ्रष्टाचार , अनाचार , अत्याचार , व्यभिचार की नगरी" त क्या क्या वीर चन्द्र सिंह जी क आत्मा दुखि नि होलि
राजधान्युंम बिजली संकट अति होंद अर जब बिजली जाँदि त गाळि राजधानी ही खादि अर बुले जांद निरपट लगि जैन यीं राजधानी पर . ऊर्जा प्रदेसम बि बिजली कटौति होण इ च त जब उत्ताराखंडै राजधानिम बिजली जालि त हरेक कूड़ बिटेन इन पितीं (दुखी ) आवाज आलि ," सुंताळ पोडि जैन यीं चंद्र सिंह नगरी पर , आग लगी जैन यीं चंद्र सिंह नगरी पर .". इनमा हम सबी भक्तों तै हार्दिक दुःख नि होलु कि विचारा चन्द्र सिंह गढ़वाली बगैर बातों गाळि खाणा छन !

इनि हर पल , हरेक सेकंडम निरास , प्रताड़ित , रुंदा -पित्यांदा , दुखि , रोगिलों लोग बुलणा राला ," चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी को छत्यानास ह्वे जैन ! जा ! चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी डूबि जैन ! जा चन्द्र सिंह गढ़वाली नगरी नरक समै जैन ...." त हम सौब वीर चंद्र सिंह गढ़वाली प्रेम्युं तै बुरु नि लगल ?
त म्यार दिखण से गैरसैणो नाम वीर चंद्र सिंह गढ़वाली नि होण चयेंद .

Copyright@ Bhishma Kukreti 26/01/2013