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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Wednesday, February 24, 2010

भरोसा कू अकाळ

जख मा देखि छै आस कि छाया
वी पाणि अब कौज्याळ ह्‍वेगे
जौं जंगळूं कब्बि गर्जदा छा शेर
ऊंकू रज्जा अब स्याळ ह्‍वेगे
घड़ि पल भर नि बिसरै सकदा छा जौं हम
ऊं याद अयां कत्ति साल ह्‍वेगे
सैन्वार माणिं जु डांडी-कांठी लांघि छै हमुन्
वी अब आंख्यों कू उकाळ ह्‍वेगे
ढोल का तणकुला पकड़ी
नचदा छा जख द्‍यो-द्‍यब्ता मण्ड्याण मा
वख अब बयाळ ह्‍वेगे
जौं तैं मणदु छौ अपणुं, घैंटदु छौ जौं कि कसम
वी अब ब्योंत बिचार मा दलाल ह्‍वेगे
त अफ्वी सोचा समझा
जतगा सकदां
किलै कि
अब,
दुसरा का भरोसा कू त
अकाळ ह्‍वेगे

copyright@धनेश कोठारी

"चौपालों पर चुप्पी"

बैठते थे बुजुर्ग जहाँ पर,
मिलकर हुक्का गुड़गुड़ाते,
बातें करते, सुनते सुनाते,
भाई चारे की बात बताते.

न्याय का मसला जब आता,
पंच परमेश्वर न्याय दिलाते,
चहल पहल हर वक्त रहती,
हर पल हँसते खिलखिलाते.

क्या बताएं, वक्त बदला,
बूढ़े हो गए अपने गाँव,
"चौपालों पर चुप्पी" छाई,
पड़ती है वृक्ष की छावं.

निहारी थी कवि "ज़िग्यांसु" ने,
अपने गाँव में चौपाल,
लगाते थे मंडाण वहां पर,
देवी देवताओं का हर साल.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, २१.२.२०१० ७.४५ सायं)

सुनो नहीं, देखो

दूरदर्शन के आने से पहले,
सुनते थे सभी लोग,
रेडियो से खबर और गाने,
लोकप्रियता पाई इतनी,
झुमरीतल्लैया के लोग,
फरमाइश करते थे पत्र लिखकर,
सुनते थे गाने मनमाने.

रेडियो नजीबाबाद से,
जब प्रसारित होने लगे,
लोकप्रिय उत्तराखंडी गाने,
पहाड़ की वादियों में गूंजने लगे,
मनभावन कुमाउनी, गढ़वाली गाने.

पहाड़ छूटा रेडियो भी,
दिल्ली में दूरदर्शन अपनाया,
कहता है "सुनो नहीं, देखो"
कवि "ज़िग्यांसु" को,
चारों पहर यही बताया.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित, २१.२.२०१० ११.४५ रात्रि)

"सुख अर दुख"

सुख की कामना सब्बि करदन,
दुःख की क्वी नि करदु,
भोग्दु छ मन्खि सुख सदानि,
दुःख देखि पल पल डरदु.

दुःख ऊकाळ छ ,
सुख सैंद्यार छ,
द्वी छन मन्खि का खातिर,
दुःख जब मन्खि का दूर ह्वै जान्दन,
बल भूली जान्दु फिर.

सुख कू स्वाद सदानि भलु लग्दु,
मन्खि बद्रीविशाल जी तैं भूली जान्दु,
मायाजाळ मा अल्झि अल्झि ,
परमपिता कू ध्यान नि लगान्दु.

"सुख अर दुख" मन्खि का खातिर,
अतीत सी छन दगड़ा,
तेल, तवा कू साथ त देखा,
तब बणदा छन लगड़ा.

दुःख की घड़ी मा बल मन्खि,
भगवान जी कू नौं लेन्दा,
सुख की घड़ी मा मतलबी मन्खि,
चैन की नींद छन सेन्दा.

रचनाकर: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित २४.२.२०१०)
जन्मभूमि: बागी-नौसा, चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.
कर्मभूमि: "दर्द भरी दिल्ली"

द्वी छ्वटी कविता

(1)
नयु राज्य
अयु बांठ |
हौरुकी दसा जखा तखी
गलादरून का ठाठ |

(2)
जनी पौंछि वो मथि
निकलिगैन वेका सिंग |
खाली हथ देखि
भौर्याकी आन्द |
बंद मुठी देखि
दुबकी जांद |

copyright@विजय कुमार 'मधुर'

Tuesday, February 23, 2010

सुख

सुख
तब बि छाया
जब हम नि छाया

पर तब सुख
इतगा छांटा
इतगा ख्वींडा नि छाया
जतगा आज

तब सुख सुख्यर्या छाया
वो/ हैंसदाख्यलदा
आन्दा छाया
अर मनखंयू कि मनख्यात देखी
वखि बासा रै जांदा छाया
वूतैं दड़सांसो अर
हिकमत दे जांदा छाया

सुख तब बि राला
जब हम नि रौंला
भौद ओरि बि छांटा अर
ओर बि ख्वींडा ह्वे जाला
तब लोग कनके
यों सुखु तैं भ्वागला
कनके भ्वागला

copyright@मदन मोहन दुकलाण

दुःख

दुःख तब बि छाया
जब हम नि छाया
पर तब दुःख
इतगा घैणा अर पैना नि छाया
जतगा आज।

दुःख
तब बि आन्दा छाया
सतान्दा छाया / रुंवांदा छाया
आदिम तैं अजमान्दा छाया
अर देखी
आदिमे सक्या वेका तापा
दुःख दुख्यर्या ह्वेकि
लौटि जांदा छाया
आजे तरों
बासा नि रैंदा छाया।

दुःख तब बि राला
जब हम नि रौंला
भौद वो
हौर बि घैणा
और बि पैना ह्वाला
तब लोग
दुःखु तैं कनकै साला
कनकै साला

copyright@मदन मोहन दुकलाण