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Sunday, May 13, 2018

गोविषाण /काशीपुर के मित्र वंशी शासक व बिजनौर का इतिहास

 Mitra Dynasty and istory of Haridwar, Bijnor,   Saharanpur 
        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  202                     
                                  हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   202               

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  
   सन 1901 व 1939 -40 में कनिंघम की खोजें अनुसार काशीपुर में उत्खलन किया गया और कई ऐतिहासिक सामग्री मिलने से गोविषाण व बिजनौर के प्राचीन इतिहास पर प्रकाश पड़ता है।  1978 -79  में हेमवती नंद गढ़वाल विश्वविद्यालय श्रीनगर द्वारा उत्खनन ने मयूरध्ज बिजनौर का उत्खनन किया व दूसरी शताब्दी पूर्व से कुषाण कालीन सामग्री मिलने से हरिद्वार से काशीपुर-बिजनौर  पट्टी की समृद्धि का पता चलता है।  
              गोविषाण दुर्ग 
गोविषाण दुर्ग उत्खनन में निम्न अंकित ईंटे मिलीं -
१- राyn मातृ मित्तस पुत्त 
२- तस्य रांवों श्री पृथ्वी विमत्तस .... 
 दोनों लेख अधूरे हैं जिससे सिद्ध होता है कि लेख कई ईंटों पर लिखा गया था।  दुर्ग ढह गया है तो संबंधित ईंटों को खोजना कथन ही था। 
 पूरे लेख में संभवतः अन्य नरेशों के भी नाम थे किन्तु तीन नरेशों की तो पुष्टि होती ही है -
मातृ मित्र 
मातृमित्र का पुत्र 
पृथविमित्र 
 उन दिनों मथुरा , कौशम्बी , पांचालों व पाटलिपुत्र नरेशों के अंत में मित्र लगाने की प्रथा थी। 
  इस अन्वेषण से स्पस्ट है कि गोविषाण पर किसी मित्र वंश का स्वतंत्र शासन था या सटे किसी  पांचाल नरेश मित्र का शासन था।  
        पुष्यमित्र शासन के पश्चात मध्य देश में नामन्त मित्र लगाने की प्रथा बनी रही। 
       कनिंघम ने मुद्राओं के आधार पर उत्तर पांचाल के बारह नरेशों का नाम उल्लेख किया (क्वाइंस ऑफ अन्सियन्ट इंडिया , पृष्ठ 81 -84 ) व नाम हैं -ध्रुव मित्र , सूर्य मित्र , फाल्गुनी मित्र, भानुमित्र , भद्रघोष , भूमिमित्र , जयमित्र , विश्वपाल , इंद्रमित्र व विष्णुमित्र।  इन नामों में मातृ मित्र व पृथ्वीमित्र नाम नहीं हैं।  उपरोक्त मुद्राओं की लिपि अशोककालीन ब्राह्मी है याने पहली सदी से पहले।  जबकि गोविषाण में ईंटों की लिपि तीसरी सदी के लगभग की है।  इतिहासकार सरकार ने मुद्राओं के आधार पर उपरोक्त 12 नरेशों के अतिरिक्त अन्य  बारह नरेशों के नाम दिए हैं किन्तु उनमे ये दो नाम नहीं हैं। 
             
  मातृ  मित्र 
गोविषाण दुर्ग में मित्र वंश का संस्थापक की सूचना नहीं मिलती है। मातृ मित्र की कोई मुद्रा भी नहीं मिली ना ही किसी अभिलेख में नाम।  हो सकता है अन्य ईंटों में कोई नाम रहे हों। 
 पृथ्वीमित्र 
 ईंटों पर लेख से पता नहीं लगता कि कौन पूर्ववर्ती था और कौन पर्ववर्ती शासक
   लेख लिपि काल 
 इष्टका लेखों की भाषा से  लगता है कि ये शासक वासुदेव कुषाण के बाद के शासक थे। 
  काल 250 -290 ई  माना जा सकता है। 
  मातृमित्र व पृथ्वीमित्र के इष्टा लेख की भाषा संस्कृत से उसी प्रकार प्रभावित है जैसे छत्रेश्वर मुद्राओं के लेख। 
    अतः माना जा सकता है कि पश्चमी भाबर व बेहट में छत्रेश्वर वंशीयों का शासन था तो बिजनौर , काशीपुर भाबर पर मित्र वंशियों का शासन था।  
    स्थापत्य 
 गोविषाण के मित्र वंशियों के दुर्ग अवशेष अभी भी हैं। ये अवशेस तीन कालों की सूचना देते हैं।  संभवतया यहां एक दुर्ग व कई मंदिर रहे होंगे। दुर्ग के पास 600 'x 600 ' का द्रोण सागर तालाब भी मित्र वंश काल का ही है। 
    उज्जैन गाँव काशीपुर तहसील जनश्रुति अनुसार द्रोण सागर निर्माण व उज्जैन दुर्ग पांडवों ने गुरु द्रोण हेतु बनाये थे। 
     दुर्ग व तालाब खुदाई मित्र वंशी शासकों ने किया। 
 मित्र वंशी शासन के चार सदी बाद  चीनी यात्री हुएन सांग ने गोविषाण की समृद्धि का वर्णन किया है।  उसने गोविषाण का घेरा ढाई मील बताया है। 
 कनिंघम ने मित्र वंशी ुर्ग का उल्लेख किया है।  दुर्ग 1500 फ़ीट चौड़ा व 3000 फ़ीट लम्बा था।  दुर्ग का निर्माण 15 x 10 x 2 1/2 इंच की ईंटों से हुया था।  दुर्ग निकट खेतों से 25 -30 फ़ीट ऊपर टीले में स्थित था.  दो पुराने फाटकों के अवशेष प्राप्त हुए जिनसे आज उगे जंगल में प्रवेश होता है।  कनिंघम ने पूर्व को छोड़ तीन दिशाओं में खाइयों का वर्णन किया है।  डबराल अनुसार अब खाईयां भर गयी हैं। 




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 Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018 
   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



      Ancient History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;   seohara , Bijnor History Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
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छागलदेश और हरिद्वार , सहारनपुर इतिहास

Ancient Haridwar, Saharanpur and Bijnor History in 250-460 
        Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  203                      
   हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -    203               

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  
            जयदास व उसके बंशजों का हरिद्वार -सहारनपुर इतिहास में स्थान 
          देहरादून जिले में चकरौता से 25 मील  पूर्व में यमुना व मोरदगाज संगम पर एक प्राचीन मंदिर में खंडित शिलालेख मिला है।  रोहिलाओं के विध्वंसकारी कार्यों से कई मूर्तियां व शिलालेख खण्डित  हो गयीं हैं।  प्रशस्ति की पहली , दूसरी , तीसरी , पांचवीं व छटी पंक्ति सुरक्षित हैं चौथी पंक्ति आधी खंडित हो गयी है 
  इसे छागलदेश प्रशस्ति शिलालेख 11 " x 13 " शिला पर अंकित हिन् जिसे चांगलदेश प्रशस्ति नाम दिया गया है यह शिलालेख लोकेश्वर मंदिर जो 12 -13 वीं सदी का बताया जाता है में मिलीं जहां पुरातत्व बिभाग को यहां  5 वीं 6 ठी सदी के छत वाले मंदि र के अवशेस भी मिले हैं जिसकी जानकारी अभी उपलब्ध नहीं हो सकी है। 
     यह प्रशस्ति छागलदेश या छगलकेतु नामक किसी राजा ने अंकित करवाई हैं। प्रशस्ति का आरंभ 'सिद्धम ' से है -
  सिद्धम। नस्वा , नगेन्द्रतनयां परिहासक (त्रीम )
   (घृत्वा सदा ) पशुपते रतिचारुरूपम (पहली पंक्ति )
  असीत पुरा नरपतिज्जैयदास नामा नामा 
तस्या आत्मज नृपति   .... 
 तस्याद  गुहेश च क्षितिपो वभूव। । 
  तस्माद अभूत अचलेत्यवनीपतीश।  ।  
    ..... .... छागलेशदास। 
रुद्रेशदास इति तत तनयस च जज्ञे। 
तनमांच रूद्रनृपतेश  ........ केतु। ।  
देव्यां अजेश्वर नृपात गुणवान गुणायाम। 
 ... हतभुज्यां अधिपान्जयंता: (दूसरि पंक्ति ) ( यू पी  हिस्टोरिकल सोसाइटी , जुलाई , 1944 , पृष्ठ 83 से 90 ) 
    निम्न नरेशों का वर्णन प्रशस्ति में मिलता है 
नरेश ---------------- उपाधि 
१- जयदास -------------- नरपति 
२- ... ? (तस्य आत्मज  -----नृपति 
३- गुहेश ------------------- क्षिपति 
४- अचल -------------------- अवनीपतीश 
५- ?    ------------------------?
६- छागलेशदास -------------?
७- रुद्रेशदास ------------- नृपतेश 
८-  अजेश्वर , छागलदेश , छागलकेतु --- नृप
  राज्य शासित क्षेत्र 
 यद्यपि पूरी सूचना अभाव में कहना कठिन है किन्तु विश्लेषण से पता लगता है कि कुषाण काल में राजाओं की उपाधि महाराजा , राजतिराज का प्रचलन बढ़ गया था।  अतः  जयदास वंशी नरेश बृहद भूभाग नृप नहीं थे।  हो सकता है इस वंश का शासन जौनसार बाबर , बेहट सहारनपुर निकटवर्ती भाग व पूर्वी हिमाचल तक रहा हो।  उत्तर पश्चिम हरिद्वार भी जयदास वंशजों के आधीन हो भी तर्कपूर्ण है। उत्तरकाशी व बड़ाहाट  संभवतया जयदास वंशजों के ही अधीन था क्योंकि किसी अन्य राजा के वहां पंहुचने का  अर्थ
   होता कि छागलेश वंशी शासक न होते।   
             छागलेश /छागल केतु 
 अंतिम नरेश छागलेश या अजेश्वर था जिसकी पत्नी नाम गुणवती था। छागलेश के पुत्र की तुलना इंद्र पुत्र जयंत से की गयी है।  अगला भाग खंडित हो चूका है अतः छागलेश पुत्र का नाम पता नहीं चलता है। 
       जयदास वंशज राज्य काल 
   छत्रेश्वर , रावण , भानु काल 290 -350  ई  तक मान सकते हैं।   एक पीढ़ी के शासन के हिसाब से जयदास वंशी राज्य काल 110 -112 रहा होगा इस हिसाब से डबराल का मत है कि जयदास से छागलदास काल 350 से 460 ई तक होना चाहिए। 
            शिक्षा 
    लालखामण्डल में इस काल मेके कई शिलालेख या इष्टालेख संस्कृत में मिले हैं जिससे अनुमान लगता है कि 3 ऋ सदी से 6 सदी तक उचित शिक्षा प्रबंध था। 
      धार्मिक मान्यताएं 
  प्रशस्ति से अनुमान लगता है कि क्षेत्र में शैव्य सम्प्रदाय का प्रभुत्व था।  पशुपति , सिद्धम , नागरंदर शब्द इसी ओर इशारा कर रहे हैं।
    
       स्थापत्य 
 जय दास वंशज काल में मूर्ति निर्माण प्रगति पथ पर था।  मंदिर  वाले होते थे। मंदिरों में द्वारपाल निर्मित होते थे जो मानवाकार आकृति के होते थे। डा वासुदेव शरण अग्रवाल अनुसार लाखामंडल की मूर्तियां पांचवीं -छथि सदी की हैं।  द्वारपाल की आकृति से ओज , शौर्य टपकता है और कला का सुंदर नमूने प्रस्तुत करते हैं।  उन पर लगी पोलिश भी अति उत्तम किस्म की हैं।  शिव मंदिर जयदास वंशजों ने निर्मित किया या पहले किसी अन्य शाशकों ने के बारे में निश्चित नहीं है किन्तु निर्माण उच्चकोटि के हैं इसमें संदेह नहीं है। 
     यमुना -मोरद संगम प्राचीन काल से ही धार्मिक श्ठल थे।  लाखामंडल में केदार शिला का शिव रूप में  पूजा होती है।  लाखामंडल में कई प्रागैतिहासिक खंदिर मूर्तियां व खंडहर पड़े हैं।  


(आर्किलॉजी सर्वे  इण्डिया देहरादून जॉन की वेब साइट से  कुछ वर्णन लय गया है ) 
  



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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



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कर्तृपुर के खशधिपति, हरिद्वार , सहारनपुर व बिजनोर इतिहास

Khashadhipati of Kartripur and History of haridwar, Saharanpur and Bijjnor     

Ancient  History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  204                     
                             हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -  204               

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  
    समुद्रगुप्त ने प्रयागप्रशस्ति में अपने शासन के सीमान्त राज्यों का उल्लेख इस प्रकार किया है -
  समतट डबाक , कामरूप , नेपाल कर्तृपुरादि प्रत्यंतनृपतिभि: सर्वकरदानाज्ञारणप्रणामगमनपरितोयित प्रचंडशासनस्य। 
   इस प्रशस्ति अभिलेख में कामरूप के पश्चिम में नेपाल है और फिर कर्तृरादि नाम आया है।  इसका अर्थ है कि नेपाल के पश्चिम में कर्तृपुर था।  
        डबराल ने उत्तराखंड का इतिहास खंड -3 में पृष्ठ 282 से 294 तक कर्तृपुर की विवेचना की और निर्णय दिया कि कर्तृपुर गढ़वाल में था जो बाद में शायद कत्यूरी वंश की राजधानी बना। 
    विभिन्न स्रोत्रों की विवेचना उपरान्त डबराल ने लिखा कि इस खशाधिपति ने समुद्रगुप्त की आधीनता स्वीकार की और उत्तराखंड गुप्त साम्राज्य की आधीन आ गया था।  कुमार गुप्त के मंदसौर अभिलेख में गुप्त साम्राज्य के अधीन सुमेरु व कैलास  जो कि प्राचीन काल में उत्तराखंड के ही भाग थे।  
   यद्यपि अभी तक पता नहीं लगा कि गुप्त काल में खशधिपति उपायन देकर  गुप्त राजाओं ने युद्ध में पराजित था। कुमारगुप्त की मुद्राएं हमीरपुर , सहारनपुर , मथुरा में मिलने से (ऐल्लन व राधाकुमुंद मुकर्जी , गुप्ता ऐम्पायर पृष्ठ 74 )  भी अनुमान लगता है कि बि जनौर , हरिद्वार व सहारनपुर क्षेत्र गुप्त साम्राज्य के अधीन आ गए थे। 
     खशधिपति का  पद  गवर्नर जैसा पद था या कुछ और पर भी कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है।  पर यह लगभग तय ही है कि सहारनपुर , बिजनौर और हरिद्वार न्यूनधिक रूप से गुप्त साम्राज्य के अंतर्गत आ गए थे।   गोविषाण के मित्र  अथवा लाखामंडल के जयदास शासकों के वंशजों का क्या हुआ पर कोई साहित्य उपलब्ध नहीं है। 
 डबराल ने गुप्त काल से पहले प्राचीन उत्तराखंड दक्षिण के शासकों का काल का निम्न भाँति  अनुमानित विवरण दिया -
कुषाण -वासुदेव प्रथम व परवर्ती शासक - 206 से 250 ई 
कुणिंद नरेश -छागलेश्वर , भानु , रावण --243 -290 ई 
गोविषाण मित्रवंशी नरेश - 250 -290 
अश्वमेध यज्ञकर्ता  नरेश शीलवर्मन आदि --290 -350 ई 
 कर्तृपति खशधिपति -350 -380 ई 
गुप्त सम्राट 270 -381 ई 





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   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



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उत्तरकाशी के प्राचीन मंदिर

 Old Temples of Uttarkashi 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- ) 
  -
उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  76
-
  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -    76               
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series-- 180      उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग -180

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
    उत्तरकाशी के निम्न प्राचीन मंदिर प्रसिद्ध हैं -
यमुनोत्री 
गंगोत्री 
पोखू महाराज -नैटवाड 
समेश्वर मंदिर कोटगांव व अन्य यामुन शैली के मंदिर 
लव कुश मंदिर - कोटगांव 
समेश्वर देव मंदिर जखोळ 
कमलेश्वर -रामसेराइ 
कपिल मुनि आश्रम -मुंदियाट गाँव 
देवढुंगा -पुरोला 
कॉलिंग नाग मंदिर - सरबडियाड़ 
लुद्रेश्वर - देवराड़ा  डांडा 
शिव गुफा -बड़कोट 
भद्रकाली -पौंटी 
रघुनाथ मंदिर -पुजैली 
यमदग्नि ठान -थान 
सोमेश्वर -खरसाली

-
(संदर्भ, व आभार डा हेमा उनियाल, केदारखंड पृष्ठ 279 316 

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1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
-
 
  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   MedicalTourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

समुद्रगुप्त शासन में हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर

Ancient  Samudra Gupta Gupta Era History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part                      
Ancient   History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Par -206

                               हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग - 206                 

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  
   चन्द्रगुप्त प्रथम ने अपने  जीवनकाल में ही समुद्रगुप्त  (340 -380  ) को योग्यता बल पर राज्य सौंप दिया था। समुद्रगुप्त को मघद व पूर्वी उत्तर प्रदेश का भूभाग मिला था।  समुद्रगुप्त ने मध्य देश जीतकर फिर कामरूप , नेपाल , कर्तृपुर जीता व  अपना साम्राज्य यमुना पूर्व तट तक विस्तार किया।  यमुना पश्चिम में कई गणराज्य थे। कई गणराज्यों पर अधिपत्य जमकर समुद्रगुप्त ने दक्षिण की ओर विश्तार किया।  समुद्रगुप्त कलिंग तक पंहुच गया था। 
 मध्य देश जीतना व यमुना पूर्व तट तक पंहुचने का अर्थ है कि बिजनौर , हरिद्वार व सहारनपुर समुद्रगुप्त के आधीन आ गए थे।  
                      समुद्रगुप्त का व्यक्तित्व 
  समुद्रगुप्त महत्वाकांक्षी व्यक्तित्व का स्वामी था जिसके शरीर पर पर युद्ध में दसियों घाव लगे थे। याने समुद्रगुप्त लीडिंग फ्रॉम  फ्रंट में विश्वास करता था. युद्ध अभिलाषी होने के बाद भी सामाजिक हितों का रक्षक था। समुद्रगुप्त संगीत प्रेमी था व कवियों का आदर करता था।  उसके एक मुद्रा में उसे वीणा बजाते दिखाया गया है।  उसकी प्रसस्ति पत्र का कवि महादंडनायक हरिषेण था। 
     दिग्विजय के पश्चात उसने अश्वमेध यज्ञ सम्पन किया जिसमे विजिट राजाओं ने भाग लिया।  अश्वमेध यज्ञ अवसर पर समुद्रगुप्त ने स्वर्ण मुद्राएं प्रचारित की थीं जिनके अग्र भाग में 'राजाधिराज पृथ्वीम वित्वा दिविजयत्याहृत ' व पश्च भाग में 'अश्वमेध पराक्रम: अंकित है। 
           समुद्रगुप्त के प्रशस्ति पत्र व मुद्राओं से पता चलता है कि वः सुखी परिवार का स्वामी था व उसके योग्य पुत्र व योग्य पौत्र थे व सुयोग्य पुतर्वधहुएँ थी। 
        




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 Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018 
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 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



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रामगुप्त और हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर का इतिहास

Gupta Era History of Haridwar , bijnor, Saharanpr 
        Ancient   History of Haridwar, History Bijnor,   Saharanpur History  Part  -  207                     
                               हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -                  

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  


        
  समुद्रगुप्त के बाद उसके जेष्ठ पुत्र शर्मगुप्त या राम गुप्त को सिंहसन मिला।  रममगुप्त ने साम्राज्य वृद्धि हेतु प्रत्यंत प्रदेशों को मिलाने हेतु योजना बनाई। एक नाटक देवी चन्द्रगुप्त अनुसार रामगुप्त ने कर्तृपुर पर आक्रमण किया किन्तु किसी घात पर संकट में फंस गया।  कर्तृपुर नरेश को अपनी पत्नी देकर रामगुप्त को संधि करनी पड़ी।  रामगुप्त के भाई चन्द्रगुप्त ने खशाधिपति को खड्ग से मारा।  नाटक अनुसार चन्द्रगुप्त द्वितीय ने रामगुप्त की हत्त्या की व सिंहासन पर बैठा।


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