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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Sunday, May 13, 2018

चन्द्रगुप्त II विक्रमादित्य शासन में हरिद्वार , बिजनौर , सहारनपुर -खंड -1

 Chandragupta Vikramaditya and Ancient  Gupta Era History of Haridwar,  Bijnor,   Saharanpur                       
                               हरिद्वार इतिहास ,  बिजनौर  इतिहास , सहारनपुर   इतिहास  -आदिकाल से सन 1947 तक-भाग -   208               

                                               इतिहास विद्यार्थी ::: भीष्म कुकरेती  
  

  रामगुप्त के बारे में विशाखदत्त कृत देवचन्द्रगुप्त नाटक व दुर्जनपुर (विदिशा , मध्य पदेश ) अभिलेख से कुछ विवरण मिलता है।  इसके अतिरिक्त वहीं रामगुप्त की मुद्राएं भी मिली है. रामगुप्त ने महराजधिराज विरुद धारण किया था 
  चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य (380 -415 CE ) 
 चन्द्रगुप्त रामगुप्त का लघु भ्राता था।  चन्द्रगुप्त ने विक्रमादित्य विरुद धारण किया था।  इलाहाबाद अभिलेख अनुसार चन्द्रगुप्त की एक पत्नी कुबेरनामा दक्षिण के किसी नाग नरेश की राजकुमारी थी।  इस रानी की पुत्री का विवाह प्रभावती का विवाह वाकाटक नरेश रुद्रसेन से हुआ था।  व नाटक अनुसार दूसरी पत्नी ध्रुवस्वामिनी थी जिसके कुमारगुप्त व गोविन्दगुप्त थे। 
        शक विजय यात्रा 
 यद्यपि  वासुदेव मृत्यु के पश्चात कुषाण वंश की समाप्ति हो चुकी थी किन्तु सौराष्ट्र गुजरात व मालव पर शक नरेशों का अधिपत्य तब भी था।  चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने इन  अधिपतियों का उत्पाटन किया व सौराष्ट्र व मालव को होने शासन में मिला लिया।  पश्चिम भारत जीतने के बाद चन्द्रगुप्त ने 'शकारि ' विरुद धारण किया 
     उज्जयनी राजधानी 
पश्चिम भारत पर सबल प्रभुत्व रखने हेतु चन्द्रगुप्त ने अपनी राजधानी उज्जयनी को बना लिया था। उज्जयनी का उल्लेख चन्द्रगुप्त अथवा कुमारगुप्त कालीन भाण 'पादतडितम ' में भी मिलता है।
        सप्त सिंधु विजय 
  दिल्ली के कुतुबमीनार निकट लौह स्तम्भ से ंदाज लगता है पश्चिम भारत अधिपत्य के बाद चन्द्रगुप्त ने सिंधु के सातों मुखों को पार कर वाह्विकों को परास्त किया। 
        दिल्ली का लौह स्तम्भ 
ऐसा अनुमान है कि दिल्ली का लौह स्तम्भ चन्द्रगुप्त ने बनवाया था और निर्माण कार्य हेतु गढ़वाल के शिल्पकारों ने किया था (वासुदेव उपाध्याय , गुप्त साम्राज्य का इतिहास प्रथम भाग पृष्ठ -85 )

  (चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य -शेष अगले भाग में ) 



Copyright@
 Bhishma Kukreti  Mumbai, India  2018 
   History of Haridwar, Bijnor, Saharanpur  to be continued Part  --

 हरिद्वार,  बिजनौर , सहारनपुर का आदिकाल से सन 1947 तक इतिहास  to be continued -भाग -



      Ancient  History of Kankhal, Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Har ki Paidi Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Jwalapur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Telpura Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient  History of Sakrauda Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Bhagwanpur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient   History of Roorkee, Haridwar, Uttarakhand  ;  Ancient History of Jhabarera Haridwar, Uttarakhand  ;   Ancient History of Manglaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient  History of Laksar; Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient History of Sultanpur,  Haridwar, Uttarakhand ;     Ancient  History of Pathri Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Landhaur Haridwar, Uttarakhand ;   Ancient History of Bahdarabad, Uttarakhand ; Haridwar;      History of Narsan Haridwar, Uttarakhand ;    Ancient History of Bijnor;   seohara , Bijnor History Ancient  History of Nazibabad Bijnor ;    Ancient History of Saharanpur;   Ancient  History of Nakur , Saharanpur;    Ancient   History of Deoband, Saharanpur;     Ancient  History of Badhsharbaugh , Saharanpur;   Ancient Saharanpur History,     Ancient Bijnor History;
कनखल , हरिद्वार  इतिहास ; तेलपुरा , हरिद्वार  इतिहास ; सकरौदा ,  हरिद्वार  इतिहास ; भगवानपुर , हरिद्वार  इतिहास ;रुड़की ,हरिद्वार इतिहास ; झाब्रेरा हरिद्वार  इतिहास ; मंगलौर हरिद्वार  इतिहास ;लक्सर हरिद्वार  इतिहास ;सुल्तानपुर ,हरिद्वार  इतिहास ;पाथरी , हरिद्वार  इतिहास ; बहदराबाद , हरिद्वार  इतिहास ; लंढौर , हरिद्वार  इतिहास ;ससेवहारा  बिजनौर , बिजनौर इतिहास; नगीना ,  बिजनौर इतिहास; नजीबाबाद , नूरपुर , बिजनौर इतिहास;सहारनपुर इतिहास; देवबंद सहारनपुर इतिहास , बेहत सहारनपुर इतिहास , नकुर सहरानपुर इतिहास Haridwar Itihas, Bijnor Itihas, Saharanpur Itihas

उत्तराखंड से संस्कृत में फ़ूड रेसिपी

 Food Recipes in  Sanskrit from Uttarakhand 
 Uttarakhand Medical tourism in British Period 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म- 16 ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  72
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  72                 
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--  176    उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 176 

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )

  
  प्रत्येक पर्यटन में भोजन आकर्षण सर्वोपरि होता है।  हम स्थान के बारे में अधिक याद नहीं करते किन्तु स्थान में खाया भोजन व गंध -सुगंध को बहुत देर तक याद करते रहते हैं।  पर्यटन छवि वर्धन स्थान भोजन व भोजन विधि याने फ़ूड रेसिपी पुस्तक प्रकाशन अत्यावश्यकअवयव होता है।
?
     राजा सुदर्शन शाह के सभासद पंडित हरि दत्त नौटियाल (जन्म 1766 ?) ने संस्कृत में भोजनावलि: रचकर संस्कृत में फ़ूड रेसिपी साहित्य को अक्षुण रखा। 
        भोजनावलि: में १३२ पद्यावली हैं. इस शास्त्र में दो भाग हैं - प्रथम भाग -शाकान्त व उत्तर भाग में मांस वर्ग का विवेचन है।  
  प्रथम प्रकरण में - फल विवेचना है जिसमे खजूर्रर , नारिकेल , खुद्दरल , सिबिका , निवजा , राजादन , श्रीरसाल , नवनागरंग , कदली फल , सुकंटीक , इक्षुदंड , गौरीफल , श्रीपर्णिका , बीजपूरम , प्रभृति फलों का वर्णन है। 
    डा प्रेम दत्त चमोली अनुसार मिष्ठान प्रकरण में मिष्ठान निर्माण विधि व गुणों का वर्णन है जिसमे मोदक , दुग्धवटी , श्रृंगी।  मिष्टमण्डली का वर्णन है
,घीवर , मुकुंदवाटिका , अपूप , पूरिका , नवनीत , मांसयूष , राजमारस , माषवटी , मुकुंदवटिका , मिष्टोदन , गुलकंद , पर्पटपट , दधिवटक , कदलीफलशाक , वृताकशाक , मूलीयशाक , मेथीपलिंगशाक , शिवचरणकसुशाक , कोशातकीयशाक ,राजकोशातकीयशक , भिनीमालुकशाक , जयंतीकाशाक , मृणालशाक , निष्पाव शाक , पिंडालू आदि पदार्थों के निर्माण विधि व गुणों का आयुर्विज्ञान की दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं 
    मांसवर्ग में भी विभिन्न मांश भोजन निर्माण विधि , भक्षण व गुणों पर भरपूर प्रकाश डाला।  
      काव्य में सर्यूळ  ज्ञान -सूद विद्या भरपूर झलकता है।  ह्लगता है पंडित ह्री दत्त नौटियाल ग्यानी व अनुभवी पाक शास्त्री थे।  नौटियाल के  अनुप्रास अलंकार का उपयोग से पाठक को भोज्य रसानुभूति स्वयं हो जाती है।  हरिदत्त नौटियाल ने गढ़वाल में प्रचलित भोज्य पदार्थ झोळी , पळिंग आदि  की भी रेसिपी दी है -
 उच्चैरर्पितसर्पिषा तदुचित दर्व्यैश्च पूर्वचितां 
  पश्च्चाजीरसुगंधितां सुखिहिनां 'झोली ' त्वमङ्गीकुरुं। 
 पंडित हरि  दत्त नौटियाल द्वारा भोजनावलि: कृति रचने के कारण उन का नाम सदा उत्तराखंड पर्यटन इतिहास में अमर रहेगा 

      


Copyright @ Bhishma Kukreti  14/4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6 व डा प्रेम दत्त चमोली गढ़वाल की संस्कृत को दें पृष्ठ 128 
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   MedicalTourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

टिहरी गढ़वाल मोटर्स ओनर्स यूनियन कॉर्पोरेशन (TGMOC ) (टिहरी झील को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर्यटक स्थल हेतु आंदोलन ) )

 Theri  Garhwal Motor Owners Union 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म-4 ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  71
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  71                 
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--  175    उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 175

  लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
   यद्यपि ऋषिकेश से देवप्रयाग व पश्चात ऋषिकेश -नरेंद्र नगर बस सेवायें रियासत काल में प्रारम्भ हो चूका था किन्तु ब्रिटिश गढ़वाल या कुमाऊं की तर्ज पर कोई मोटर मालिकों की कोई संगठित संस्था न थी।  1953  में टिहरी गढ़वाल के मोटर मालिकों ने यूनियन की स्थापना टिहरी गढ़वाल मोटर्स ऑनर्स यूनियन प्राइवेट लिमिटेड नाम से की जो  1978 में पब्लिक में गयी।  TGMO के निदेशकों का चुनाव हर पांच साल में होता है। 
  TGMOC  बद्रीनाथ, केदारनाथ व गंगोत्री -यमुनोत्री रूट में बस परिवहन हेतु प्रसिद्ध है। 
 TGMOC की सेवायें सदूर  ग्रामीण क्षेत्र तक हैं और वास्तव में उत्तराखंड परिहवन की रीढ़ की हड्डी है TGMOC . TGMOC दैनिक परिवहन सेवाओं के अतिरिक्त पॅकेज टूर सेवा भी प्रदान करता है। चार धाम यात्रा इतिहास बगैर TGMOC के पूरा नहीं हो सकता है।   (TGMOC की वेब साइट )
              टिहरी झील को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पर्यटक स्थल छवि देना 

   उत्तराखंड पर्यटन को हिमाचल सदा से ही टक्कर  देता आया है।  टिहरी झील हिमाचल पर्यटन को टक्क्र  देने में सक्षम है उत्तराखंड में स्वतन्त्रता पश्चात आंदोलनों  का रुख पर्यटन गामी कम ही रहा है।  बुद्धिजवी अभी भी टिहरी झील बाँध का रोना लिए बैठे हैं।  आज आवश्यकता है कि समाज सरकार पर दबाब बनाये कि टिहरी झील अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पर्यटक स्थलों में शुमार हो जाय।  बहुत कम पहाड़ी क्षेत्र है जहां इस तरह की भौगोलिक स्थिति हो और साथ में गंगा भी हो।  अवसरों से लाभ न उठाना सही नहीं होता है।  भविष्य का अर्थ ही है जो है उसे ऊँचे  स्तर तक ले जाओ।  थिरि की विशेषता है कि दिल्ली या अन्य समृद्ध नगरों के भी पास ही है।  
  टिहरी  झील के निकट मेडिकल टूरिज्म की अपार संभावनाएं हैं स्पा , यह केंद्र, अपोलो या मैक्सवेल जैसे अन्य चिकित्सालयों का निर्माण , ग्रामीण टूरिज्म आदि की संभावनाएं है जिन्हे धरातल पर लाने  की आवश्यकता ह  




Copyright @ Bhishma Kukreti  /13 4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   MedicalTourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

राजा नरेंद्र शाह काल में टूरिज्म

Uttarakhand Tourism in Narendra Shah Ruling Period 
( बमें उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म-4 ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  68
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  68                 
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--172)       उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 172

राजा नरेंद्र शाह का शासन काल 1919 से 1946 तक रहा। . यह काल टिहरी में स्वंत्रता आंदोलन व राज अत्त्याचारों का काल रहा।  टूरिज्म या पर्यटन दृष्टि से निम्न घटनाएं प्रमुख रहीं -

 नरेंद्र नगर की स्थापना 
 प्रताप शाह व कीर्ति शाह ने अपने नाम से नगर बसाये थे किन्तु वे मोटर मार्ग से भी जुड़ पाए।  नरेंद्र शाह ने ऋषिकेश से 10 मील की दुरी पर 5000 फ़ीट की ऊंचाई पर उड्याळी गाँव में नरेंद्र नगर बसाया जो आज भी उत्तराखंड पर्यटन में अपना योगदान देने में सक्षम है। नगर निर्माण कार्य 1921 में  सहस्त्र चंडी कर्मकांड से शुरू हुआ और दस सालों तक चलता रहा।  महल कार्य 1924 में सम्पन हुआ।  गृह प्रवेश उत्स्व भी धूमधाम से मनाया गया।  सेक्रेट्रिएट भवन 1942 में पूरा हुआ।  नरेंद्र नगर में डाकघर , दुकाने कर्मचारियों के लिए भवन आदि सभी का प्रबंध किया गया था और 30 लाख रूपये में नगर बसाया गया था। 

    हेली हॉस्पिटल 
१९२५ में नरेंद्र नगर में हेली हॉस्पिटल का निर्माण कार्य 1921 से शरू  हुआ। टिहरी से ऋषिकेश पैदल मार्ग का चौड़ीकरण भी किया गया। जनता से मुफ्त में 'प्रभु सेवा ' के नाम पर कार्य करवाया गया। 

चिकित्सालयों की स्थापना 
नरेंद्र शाह ने पुराने चिकित्सालयों में नए यंत्रों का प्रबंध किया व कुछ और चिकित्सालय भी खुलवाए।  कुछ डिस्पेंसरियां भी खोलीं गयीं। 

  वीर गबर  सिंह स्मारक 
 प्रथम विश्व युद्ध में शौर्य हेतु विक्टोरिया क्रॉस पदक प्राप्त गबर सिंह की स्मृति में 1924 में चम्बा में एक स्मारक का निर्माण हुआ। 

 नरेंद्र शाह द्वारा विदेश यात्राएं 
नरेंद्र शाह ने 11 बार विदेश यात्रायें  कीं। 

 ऋषिकेश कीर्ति नगर मोटर मार्ग 

1937 -38 में देवप्रयाग से कीर्ति नगर तक मोटर मार्ग निर्मित किया गया। 

  नरेंद्र नगर टिहरी मोटर मार्ग व टिहरी से उत्तरकाशी मोटर मार्ग योजनाएं 

 नरेंद्र शाह और मंत्री चक्रधर जुयाल मोटर मार्ग के पक्षधर थे।  1939 तक नरेंद्र नगर से टिहरी मार्ग पर चम्बा तक मोटर चलने लगीं थीं। 
  टिहरी से उत्तरकाशी मोटर मार्ग हेतु सर्वेक्षण कार्य भी किया गया।  कीर्ति नगर से टिहरी मोटर मार्ग की भी योजना बनाई गयी थी। 

     तीर्थ यात्रा  सुधार बिल 
1924 में तीर्थ यात्री आगमन  वृद्धि हेतु तीर्थ यात्री सुधार बिल पास हुआ।  इस विधान में पंडों , पुजारी हेतु हिंदी , संस्कृत शिक्षा अनिवार्य किये गए व यात्रियों की सुविधा हेतु  चट्टियों में नव प्रबंधन व निरीक्षण का प्रावधान किया गया व अन्य सुविधा हेतु कार्य प्रावधान किये गए। पंडों , पुजारियों को तीर्थ यात्री उन्मुखी बनाने का कार्य प्रशंसनीय ही माना जाएगा। 
 
     द्वितीय विश्व युद्ध में गढ़वालियों का शौर्य 
 प्रथम विश्व युद्ध की भांति द्वितीय विश्व युद्ध में भी गढ़वाल प्लैटून का शौर्य अविश्मरणीय रहा व गढ़वाल को एक नई छवि व प्रसिद्धि मिली।  दोनों गढ़वाल को सेना में भर्ती होने से समृद्धि के नए द्वार खुले जो आज तक चल ही रहा है।  गढ़वालियों द्वारा विदेश यात्राों या यहीं से कई  नई संस्कृति गढ़वाल को मिलीं जैसे गंगासलाण में गेंद व हिंगोड़ खेल व उत्तररखण्ड को मुशकबाज वाद्य यंत्र।  सेना कर्मियों द्वारा उत्तरखंड के मैदानी हिस्से में बसने का हौसला भी सेना ंवृत कर्मियों द्वारा गढ़वालियों को मिला।  भूतपूर्व सैनिकों ने पर्यटन उद्यम में भी निवेश किया जैसे दुकानें खोलना या भवन निर्माण करना।   सैनिकों द्वारा गढ़वाल में आधुनिक संस्कृति या सभ्यता भी आयात हुयी।  कोटद्वार , काशीपुर जसपुर , देहरादून में नई बसाहत  का श्रेय तो भूतपूर्व सैनिकों  को ही जाता है।  गाँवों में शराब प्रचलन भी सैनिकों द्वारा ही बढ़ा।  




Copyright @ Bhishma Kukreti  10 /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   MedicalTourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;

टिहरी रियासत में पर्यटन तंत्र भाग -1

 Laws for Tourism Development in Tehri Riyasat  
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -66
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  66                 
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--170      उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 170

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
  टिहरी रियासत  काल 1816 -1948 तक को अधिकतर जन शोषण काल माना जाता है किन्तु टिहरी रियासत काल में सुचारु उत्तराखंड पर्यटन हेतु कई पग भी उठाये गए थे।
                मोटर मार्ग 
1937 -38 में ऋषिकेश से देवप्रयाग मोटर मार्ग निर्मित हुआ पीछे इस मार्ग का  कीर्तिनगर तक विस्तार विटार किया गया 
   1921 में ऋषिकेश से नरेंद्र नगर मोटर मार्ग का कार्य प्रारम्भ हुआ पीछे मोटर मार्ग टिहरी तक पंहुचाया गया। 
     मानवेन्द्र शाह काल में टिहरी से धरासू तक मोटर मार्ग निर्मित हुआ। 
            1940 में टिहरी रियासत में निम्न मुख्य मार्ग थे -
ऋषिकेश नरेंद्र नगर मोटर मार्ग-53 मील 
ऋषिकेश देवप्रयाग -कीर्तिनगर मोटर मार्ग -63 मील 
 टिहरी मसूरी अश्व मार्ग -40 मील 
 अन्य कच्ची सड़कें 844 मील 
             राज्य बंगले 
टिहरी रियासत के राजकीय बंगले - कौड़िया , धनोल्टी , पौ , डांगचौरा , धरासू , नाकुरी  बड़ाहाट , भटवाड़ी , हरसिल , जांगला , देवलसारी , मगरा , बड़कोट ,पुरोला , बडियार , फाकोट , नागणी , चमुवा , टिहरी , प्रताप नगर , नरेंद्र नगर और कीर्ति नगर में थे। 
              जनता द्वारा मार्ग निर्माण 
  अधिकतर मार्ग निर्माण जनता द्वारा ही किये जाते थे।  
         टिहरी में नाट्य गृह 
 टिहरी में एक नाट्य गृह भी निर्मित  किया गया जहां नाटक व सांस्कृतिक प्रोग्रैम होते थे। पांच सखा के गढ़वाली नाटक पाखो का मंचन इसी नाट्यगृह में हुआ था। 
      देव प्रयाग में पाठशालाएं 
 भवानी शाह काल में 1860 में हिंदी व संस्कृत पाठशालाएं खोली  गयीं जो आतंरिक पर्यटन हेतु लाभकारी था।
   गंगाजल विक्रय 
 भवानी शाह ने गंगोत्री के गंगा जल विक्रय हेतु ठेके की प्रथा प्रारम्भ क। 
   भवानी शाह ने कतिपय मंदिरों का जीर्णोद्धार किया व एक दो नए मंदिर भी निर्मित किये व राजप्रासाद भी निर्मित किये।
      प्रताप शाह काल 1871 -1886 
 प्रताप शाह ो भवन निर्माण का शौक था। टिहरी में मोटर चलने लायक सड़कें बनवायीं। 
        टिहरी में चिकित्सालय 
प्रताप शाह ने टिहरी में चिकित्सालय बनवाया जहां राजवैद्य रवि दत्त व यूरोपियन पद्धति के डा हरिराम भारतीय चिकित्स्क थे।
     प्रताप नगर की स्थापना 
  प्रताप शाह ने टिहरी से 9 मील की दूरी पर 7 हजार फ़ीट की ऊंचाई पर 1877 में प्रताप नगर बसाया। जहां कई उद्यान व भवन निर्मित हुए।  टिहरी से प्रताप नगर तक मार्ग चौड़ा किया गया।
  टिहरी रियासत में शिकार पर्यटन 
  भवानी शाह व सुदर्शन शाह अंग्रेज भक्त थे और इस भक्ति प्रदर्शन हेतु कई अंग्रेजों जैसे विल्सन हंटर को शिकार खेलने की इजाजत दे दी थी।  इस दौरान सैकड़ों वन्य जंतु मारे गए।  1935 में वन्य जीवन धिनियम से शिकार खेलने पर प्रतिबंध तो नहीं लगा किन्तु कुछ वन सुरक्षित क्षेत्र घोषित किये गए।  

  चट्टी तंत्र 
  गुप्तकाशी या मंदाकिनी घाटी से गंगोत्री -जमनोत्री यात्रा मार्ग व ऋषिकेश -यमनोत्री यात्रा मार्ग पर तीन चार मील पर चट्टियां थीं। केदार सिंह फोनिया ने अपनी  उत्तराखंड पर्यटन पुस्तक में इन चट्टियों का विस्तार से वर्णन किया है 

Copyright @ Bhishma Kukreti 8 /4 //2018

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6 
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   MedicalTourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; 

ब्रिटिश काल में परिवहन योजनाएं और वर्तमान में वोट और विभाग अहम प्रेरित परिहवन योजनाएं

Transportation improvement in British Period in Uttarakhand 

Temple Management in British  Era 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -60
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  - 60                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--166      उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 166 

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ )
   गढ़वाल कुमाऊं में बार बार अन्नकाल पड़ते थे।  ऐसे समय में निर्यातित अनाज को सदूर गाँवों में पंहुचना टेढ़ी खीर थी। पहाड़ों में बैलगाड़ी जाना आज भी संभव नहीं है।  तो घोड़ों व खच्चरों से लदान संभव था या है। किन्तु गढ़वाल राजाओं व क्रूर गोरखाओं ने कर लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी किन्तु सड़कें नहीं बनवायीं।  ब्रिटिश शासन ने आंतरिक परिवहन को सुदृढ़ करने हेतु कुछ कदम उठाये। 
 1948 में कुमाऊं में अल्मोड़ा में 180 मील , नैनीताल में 80 मील लम्बी सड़कें निर्माण का काम हाथ में लिया गया। सर्वपर्थम कोटद्वार -फतेहपुर सड़क पर ध्यान दिया गया।  लैंसडाउन छा वनी बनने से भी दक्षिण गढ़वाल में परिहवन सुलभ हुआ।
    In Garhwal, there was no plan for road construction till 1828.
       Trail started road construction from Haridwar to Badrinath in 1827-1828. Trail did not take help from any engineer for planning. Trail himself used to supervise the works. it is said that Trail used to cut or dig stone when there was steep stone hurdle. He used to go for marking on steep hill with the help of roped basket. Trail used to sit in roped  basket and helpers used to take rope and he used to jump here and there for marking. Trail travelled from Badrinath to Kedarnath for road survey.
    Trail also discovered a road from Kumaon to Mansarovar. Church officials criticized Trail for that he was promoting idol worshipping.
   By 1834, Haridwar –Badrinath road was completed. Animals and men could cross each other on that road. By 1835, government constructed roads from Rudraprayag to Kedarnath, Ukhimath to Chamoli, Chandpur to Kumaon via Lobha. Kumaon was connected to Ruhelkhand. So Ruhelkhand was connected to Badrinath via Kumaon. The length of such roads was 300 miles and cost was Rs. 25000.Sadavrat tax was used on road construction.
    The successors of Trail kept road construction works alive. Workers completed road construction from Joshimath to Neeti in 1840. There was road from Shrinagar to Almora and Shrinagar to Kotdwara to Nazibabad by 1841.
 कोटद्वारा , हल्द्वानी , ऋषिकेश व देहरादून, हरिद्वार  को रेल से जोड़ने का जो कार्य ब्रिटिश शासन ने किया था उसमे भारत सरकार ने एक इंच भी वृद्धि नहीं क।  रेल मार्ग ने तो पर्यटन उद्यम त्र में क्रान्ति ला दी थी 
ऋषिकेश -देवप्रयाग मोटर मार्ग ने भी उत्तराखंड पर्यटन की काया पलट ही कर दी।  प्राचीन काल से चलने वाला ऋषिकेश -बद्रीनाथ मार्ग तो बंद ही हो गया। 
    गढ़वाल में 1948 में डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की मुख्य सड़कें इस प्रकार थीं -
तपोवन घाट -नारायण बगड़ -लोहाबा -बुंगीधार -44 मील 
बुवाखाल -कैन्यूर -44 मील 
रामणी बाण -देवाल -ग्वालदम -38 मील 
दनगल -पोखड़ा -बैजरों --२६ मील 
नंद प्रयाग -बाट मार्ग -12 मील 
 दोगड्डा -द्वारीखाल -पौखाल -डाडामंडी पैदल मार्ग भी ब्रिटिश देन है. व्यासचट्टी , महादेव चट्टी जैसे घाटों को अच्छी सड़कों (घोडा सड़क ) गाँवों से जोड़ने का प्रशंसनीय कार्य भी ब्रिटिश काल में शुरू हुए। 
इन सड़कों के निर्माण ने आंतरिक पर्यटन व वाह्य पर्यटन विकास की आधार शिला रखी। इन सड़कों पर ऐसे पल बने हैं जो अभी भी सही सलामत हैं। 
    गंगा व सहयोगी नदियों पर पल भी ब्रिटिश काल में बने जिन पुलों ने पर्यटन को नई दशा व दिशा दीं।  श्रीनगर गुमखाल मोटर मार्ग भी ब्रिटिश काल देन है। 
 ऋषिकेश कोटद्वार मार्ग भी ब्रिटिश काल में निर्मित हुआ। 
     वन सड़कें - ब्रिटिश काल में वनों के अंदर आवागमन हेतु कई सड़कें बनीं।  अब तो सार्वजनिक विभाग व वन विभग्ग की खींचातानी में चलते मार्ग भी अवरुद्ध किये जा रहे हैं हरिद्वार -कोटद्वार मोटर मार्ग का इतिहास यही कहानी बयान करता है। 
   ब्रिटिश अधिकारियों पर बहुत से अभियोग लगते हैं किन्तु यह अभियोग नहीं लगता कि उन्होंने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ हेतु सड़क योजनाएं बनायीं।  आज तो हर सड़क की योजना वोट निश्चित करने हेतु बन रही हैं।  वोट बैंक सामने आ गया है और पर्यटन नेपथ्य में चला गया है।  सड़क व पुलों का शुभारम्भ भी नेताओं की फोटोजनी हेतु होते हैं समाजहित नेपथ्य में चला जाता है।  

Copyright @ Bhishma Kukreti  4 /4 //2018 

1 -भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -6
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  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   MedicalTourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia

Monday, April 2, 2018

ब्रिटिश काल में तीर्थ यात्रियों की सुविधाओं में सुधार और वर्तमान में श्रीनगर कोटद्वार मार्ग को राष्ट्रीय स्तर का पयटन मार्ग बनाने की आवश्यकता

Improvement in Tourist Facilities in British Uttarakhand 
( ब्रिटिश युग में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म-4 ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -59
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  Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Tourism History  )  -  59                  
(Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--165      उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 16 5

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  बिक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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गढ़वाली  राजाओं व गोरखा शासन में मंदिरों को कर मुक्त मुवाफ़ी गाँव दिए गए थे।  गूंठ भूमि राजस्व से मंदिरों में पूजा व कर्मचारियों का वेतन प्रबंध होता था। इसके अतिरिक्त सदाव्रत गाँव भी थे जिनकी आय से श्रीनगर , जोशीमठ में यात्रियों हेतु मुफ्त भोजन व्यवस्था भी होती थी। 1816 में गढ़वाल के सहायक कमिश्नर ने सलाह दी थी कि गूंठ  या मंदिर गाँवों की आय का कुछ भाग यात्रियों की सुविधाओं हेतु प्रयोग होना चाहिए। 
  केदारनाथ के रावल द्वारा अमानत में खयानत से अधिकारियों ने रावलों या पुजारियों से सदाव्रत गाँवों से आय व उपयोग का अधिकार छीनकर स्वंतंत्र कमेटी 'लोकल एजेंसी 'बना दी।  सदाव्रत गाँवों की आय से हरिद्वार -बद्रीनाथ यात्रा मार्ग चौड़ा किया गया।  सदाव्रत गाँवों के राजस्व से यात्रिओं को मुफ्त भोजन व्यवस्था , यात्री चिकित्सा,  मरोम्मत कार्य में तेजी लायी गयी। मार्ग मरमत कार्य अब नियमित व सुचारु रूप से होने लगा था. 
  ट्रेल के उत्तराधिकारियों द्वारा सदाव्रत पट्टियों  की आय से निम्न मार्ग निर्मित हुए या उनका पुनर्निर्माण हुआ 
जोशीमठ -नीती 
अल्मोड़ा से लाभा -गढ़वाल 
श्रीनगर से नजीबाबाद मार्ग 
   1927 -28 में ट्रेल ने गाँव वालों से बेगार लेकर (मुफ्त मजदूरी ) हरिद्वार -बद्रीनाथ मार्ग निर्माण कार्य करवाया।  वह स्वयं भी मार्ग निर्माण निरीक्षण करता था।  1855 तक निम्न यात्रा मार्ग भी निर्मित हो चुके थे -
रुद्रप्रयाग से -केदारनाथ 
उखीमठ से चमोली 
कर्णप्रयाग से चांदपुर
 बेकेटभूव्यवस्था में गूंठ व सदाव्रत भूमि की विधिवत व्यवस्था की गयी थी।  डा डबराल ने लिखा है कि मंदिरों के साथ अन्याय भी हुआ।  कुछ मंदिरों की भूमि भी छीन ली गयी थी। 
     सदाव्रत गाँवों से बेकेट भूव्यवस्था में  वार्षिक राजस्व 100013 रुपयाथा।  सदाव्रत व गूंठ गाँव की संख्या 535 थी व 1863 में इन गाँवों का क्षेत्रफल 8074 बीसी नाली थ

   स्ट्रेचों की रिपोर्ट सलाह मानते हुए ब्रिटिश शासन ने सदाव्रती पट्टियों के सदाव्रत भूमि राजस्व  का उपयोग तीर्थयात्री मार्ग निर्माण , पुनर्णिर्माण  , तीर्थ यात्रियों हेतु औषधालय निर्माण , औषधि वितरण , पर होने लगा।  इन तीर्थ यात्री सुविधाओं से भारत के अन्य भागों में अपने आप उत्तराखंड छवि वृद्धि हुयी और तीर्थ यात्रियों की संख्या में वृद्धि होने लगी। 
         गाँवों में श्रमदान से मार्ग निर्माण में तेजी 
       तीर्थ यात्रा मार्गों में सुधार से प्रेरित हो गढ़वाल के अन्य क्षेत्रों में श्रमदान से ग्रामवासी मार्ग निर्माण करने लगे। ग्रामवासी अपने गाँव को लघु मार्गों द्वारा मुख्य यात्रा मार्ग से स्वयं जोड़ने लगे। 


    पौड़ी गढ़वाल पर्यटन में पिछड़ा जनपद है 
  पौड़ी गढ़वाल में स्वर्गाश्रम , लक्ष्मण झूला व श्रीनगर को छोड़ दें तो पौड़ी में धार्मिक पर्यटन नगण्य हैं।  यदि उत्तराखंड पर्यटन वृशि करनी है तो पिथौरागढ़ व पौड़ी जनपदों को को राष्ट्रीय स्तर का पर्यटन जनपद विकसित करने ही होंगे।  इसके लिए श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग को प्रसिद्धि आवश्यक है। 
      श्रीनगर -कोटद्वार रुट हेतु प्रवासियों का योगदान ही विकल्प है 
 यदि श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग को राट्रीय स्तर का पर्यटन मार्ग बनाना है तो श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग के गाँवों को विशिष्ठ पर्यटक क्षेत्र निर्मित करना होगा जिसमे प्रवासियों की भूमिका के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है।  प्रवासी निम्न स्तर पर अपना योगदान दे सकते हैं 
१- वैचारिक स्तर पर अपने गाँव में विशिष्ठ पर्यटन आकर्षी प्रोडक्ट निर्माण 
२- ग्रामवासियों को तैयार करना - आजकल एक बीमारी फैली है कि हर भारतीय शासन से सब कुछ चाहता है किन्तु अपने योगदान के बारे मबौग सार देता है। प्रवासी यह जड़ता तोड़ सकते हैं 
3 -पर्यटन प्रोडक्ट निर्माण में निवेश कर प्रवासी अपनी भूमिका निर्धारित कर सके हैं। प्रवासी श्रीनगर -कोटद्वार मार्ग पर रिजॉर्ट , म्यूजियम , बाल क्रीड़ा केंद्र , हनी मून हाऊसेज , हॉस्पिटल आदि खोल सकते हैं। 

Copyright @ Bhishma Kukreti  3/4 //2018 
ourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास  part -4
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