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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Thursday, March 1, 2018

शुंग -कण्व काल में उत्तराखंड पर्यटन का पुनर्जीवित व पुष्ट होना

(उत्तराखंडी इंटरनेट लेखकों व पत्रकारों का विशेष उत्तरदायित्व ) 


(  शुंग काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
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उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -24
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   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  24                  
  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--12 
      
उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 129    

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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                   सम्राट अशोक की मृत्यु पश्चात उसके उत्तराधिकारियों मध्य राष्ट्र शासन हेतु लड़ाई व बाद में यवन आक्रमण व उनके  शासन (232 -184 B. C . ) से समस्त भारत में मौर्यों के सामंतों या अन्यों ने क्षेत्रीय राज संभाल लिए व समस्त भारत में राजनैतिक अस्थिरता छा गयी  . अशोक के उत्तराधिकारी सेना को बलशाली होने के स्थान पर बौद्ध या जैन धर्मों के महत्व समझाते रहते थे (जैन , जैन आगम साहित्य में भारतीय समाज पृ 523 -24 ) . 
  उत्तराखंड में भी राजनैतिक अस्थिरता रही और निर्माण -निर्यात -आयात पर आघात लगने से टूरिज्म पर बुरा प्रभाव पड़ा।  गिल्ड जैसे  संस्थानों के कमजोर होने से भी पश्चिम देशों  के साथ व्यापार निष्प्राण हो गया।  अस्थिरता से उत्तराखंड में शरणार्थी पर्यटन बढ़ गया। 
            शुंग काल (185 -73 B . C. ) मौर्य आमात्य पुष्य मित्र  (185 -149 B C. ) द्वारा मौर्य राजा वृहद्रथ की हत्या के बाद शुरू हुआ। पुष्य मित्र ने उत्तर भारत पर विजय प्राप्त कर साम्राज्य वृद्धि की। शुंग शासन का अंतिम शासक देवभूति था व उसके पश्चात पाटलिपुत्र पर कण्वों का शासन चला (73 -28 B C )। 
      शुंग शासन से यवन आक्रांताओं का आक्रमण रुका। 
                उत्तराखंड पर शुंग शासन की पुष्टि देहरादून में पायी गयी मृणमुद्रा से होती है जिस पर 'भद्र मित्रस्य द्रोणी घाटे ' से होती है।  (जयचंद्र , प्राचीन पंजाब व उसका पास पड़ोस पृ 6 ) .  
  -               
                सनातन वाद व संस्कृत का पुनर्रोथान 
   अशोक के समय संस्कृत साहित्य व सनातन पंथ को जो नुक्सान हुआ था व् शुंग काल में पुनर्र्जीवित हुआ।  पतंजलि या पाणनि  जो पुष्यमित्र के आमात्य भी थे और श्रुघ्न नगर के प्रेमी थे।  पाणनि ने इस काल के बारे में महाभाष्य रचा। महाभाष्य में उस काल की कई दशाओं का सजीव चित्रण मिलता है। पाणनि साहित्य से उत्तराखंड विशेषकर भाभर क्षेत्र की जानकारी भी मिलती है।  
          शंग शासन काल में महाभारत का संकलन व सम्पादन हुआ।  इसी काल -शुंग- कण्व काल में मनुस्मृति संकलन (200 B  स - 200 AD ) की शुरुवात हुयी।  कई पुराण इसी समय रचे व संपादित हुए।  शैव्य वैष्णव वाद की वास्तविक शुरुवात शुंग काल में हुयी व कई प्रतीक, जीव -जंतु व वृक्ष शैव्य -वैष्णव पंथ से जुड़े। कृष्ण का भगवान पद इसी काल की दें है और गीता का महाभारत व वैष्णवों के मध्य प्रवेश भी विकास इसी काल में हुआ।   (200 BC से शुरुवात ) . 
      भाष का साहित्य भी कण्व काल में रचा गया , अश्वघोष ने  भी इसी समय साहित्य रचा।  नाट्यशास्त्र भी इसी समय रचा गया। 
    शैव्य पंथ विकास , शैव्य पंथ पुराण , महाभारत के दक्षिण भाग व अन्य पुराणों के संकलन से उत्तराखंड एक महवत्वपूर्ण धार्मिक स्थल की धारणाओं को अत्यंत बल मिला और सारे जम्बूद्वीप में उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन हेतु रास्तों को पुष्ट करने में शुंग -कण्व काल का उत्तराखंड के लिए महत्वपूर्ण युग माना जाता है।  महाभारत रचना काल (मन ही मन में ) ने उत्तराखंड धार्मिक पर्यटन की आधारशिला रखी तो शुंग काल ने उत्तराखंड धार्मिक स्थल को विस्तार व संबल दिया। 
               बौद्ध साहित्य व जैन साहित्य को संस्कृत में लिखने की वास्तविक शुरुवात व विकास शुंग काल की देन  है और कई उत्कृष्ट साहित्य इस काल में रचे गए। ( उपरोक्त -वी डी  महाजन की पुस्तक ऐनसियंट इण्डिया , पृष्ठ -360 -372 आधारित ).      
                        व्यासाश्रम व उत्तराखंड की धार्मिक प्रतिष्ठा में वृद्धि 
       महाभारत क दक्षिण भारतीय पाठ व कतिपय पुराणों का सम्पादन उत्तराखंड के व्यासाश्रमों में हुआ।  जो इस बात का द्योतक है कि ऋषि -मुनि शान्ति पूर्वक लिखने/रचने हेतु उत्तराखंड पसंद करने लगे थे।  भोजपत्र सरलता से मिलने के कारण भी मुनि /साहित्य रचयिता व उनके शिष्य यहां आये होंगे।  और इससे उत्तराखंड को नए प्रकार के पर्यटन तो मिले ही उत्तराखंड को धार्मिक क्षेत्र बनने की प्रक्रिया को अधिक बल मिला। शुंग व आगे के काल में मैदानों में लिखे गए साहित्य में उत्तराखंड के धार्मिक ओहदा व प्रतिष्ठा बढ़ी ही और एक उत्कृष्ट व प्रतिष्ठित धार्मिक स्थल के रूप में उत्तराखंड को और भी बल मिला।  इस समय के साहित्य से उत्तराखंड में पर्यटन बढ़ा ही। 
      इसके अतिरिक्त ऋषि मुनियों व उनके शिष्यों के उत्तराखंड भ्रमण व अन्य धार्मिक पर्यटकों से  उत्तराखंड की सांस्कृतिक स्थिति में बदलाव भी आने शुरू हुए और बहुत से देवी देवता समाज में स्थान पाने लगे जिसने अलग से पर्यटन को प्रभावित भी किया ही होगा। 
                   
                                 आर्थिक स्थिति 
   शुंग काल में पश्चिमी देशों से व्यापर भी खूब चला तो उत्तराखंड से भी निर्यात होता रहा होगा याने व्यापारिक पर्यटन भी इस काल में अपनी जगह दुबारा स्थापित हुआ। 
           उत्तराखंड में कुणिंद नरेशों का शासन 
  उत्तराखंड में श्रुघ्न पर 232 BC से 60 BC, व(इसके अतिरिक्त अल्मोड़ा में अलग कुणिंद शासन 60  BC से 20  AD  ) तक कुणिंद शासन रहा और इस शासन काल में उपरोक्त सभी गतिविधिया रहीं।
            शरणार्थी पर्यटन 
     मैदानी भागों में उथल पुथल होने से बहुत से लोग पर्वतों की ओर पलायन भी करने लगे और शरणार्थी पर्यटन को संबल मिलने लगा। ये शरणार्थी भी समाज में बदलाव लाये ही होंगे।   
 
       निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि शुंग -कण्व  काल उत्तराखंड पर्यटन का एक महत्वपूर्ण काल है जिसमे शैव्य धर्म , धार्मिक साहित्य आदि  से  उत्तराखंड पर्यटन  को नई ऊंचाइयां मिलीं और  पर्यटन स्थल प्रसिद्धि से भविष्य पथ और भी साफ़ हुआ।  
         इंटरनेट लेखकों , साहित्यकारों व पत्रकारों की नई भूमिका 
          उत्तराखंड राज्य बनने के पश्चात भी उत्तराखंड पर्यटन वः ऊंचाई नहीं पा सका जिसका उत्तराखंड हकदार है।  अशोक काल के बाद की स्थितियां व शुंग -कण्व काल धाद  देता है कि उत्तराखंडी पत्रकारों , लेखकों , साहित्यकारों का उत्तरदाईत्व बनता है कि इंटरनेट के जरिये नए पर्यटन प्रोडक्टों के बारे में इंटरनेट के जरिये साड़ी दुनिया को अवगत कराएं।  इंटरनेट पर पर्यटन वृद्धिकारक साहित्य पोस्टिकरण से यह सम्भव है।  
    भारत में किसी भी स्थल प्रसिद्धि हेतु मुख्य चौषठ कलाओं को आधार माना गया है (शुक्रनीति, काम शास्त्र आदि )  . अतः लेखकों /पत्रकारों को उत्तराखंड की इन कलाओं को इंटरनेट माध्यम से प्रसिद्धि दिलाना आवश्यक है।  
           
                
Copyright @ Bhishma Kukreti  25 /2 //2018   

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3, pages 136-150
-

  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia; 

उत्तराखंड में बनफ्सा मसाला , औषधि उपयोग इतिहास

 History, Origin, Introduction,  Uses  of  Banfsa , Himalayan  white violet   as   Spices ,  in Uttarakhand 
उत्तराखंड  परिपेक्ष में वन वनस्पति  मसाले , औषधि  व अन्य   उपयोग और   इतिहास -  6                                             
  History, Origin, Introduction Uses  of    Wild Plant  Spices ,  Uttarakhand - 6                       
  उत्तराखंड में कृषि, मसाला ,  खान -पान -भोजन का इतिहास --  95
History of Agriculture , spices ,  Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -95
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 आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व संस्कृति शास्त्री ) 
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वनस्पति शास्त्रीय नाम - Viola serpens, Viola canescens 
सामन्य अंग्रेजी नाम - Banfsa , Himalayan  white violet 
संस्कृत नाम -बनप्सा 
हिंदी नाम - बनफ्सा 
नेपाली नाम -घट्टेघांस 
हिमाचल -गुगलु फूल , बनफ्सा , बनाक्षा 
उत्तराखंडी नाम - बनफ्सा , 
बनफ्सा भूमि पर फैलने वाला बहुवर्षीय पौधा है जिसके बैंगनी , सफेद व नीले फूल होते है।  पाकिस्तान से उत्तर पूर्व के हिमालय में 1600 -2000 मीटर   ऊंचाई में पैदा होता है। 
जन्मस्थल संबंधी सूचना - Viola की दो एक जातियों का जन्म हिमालय है 
संदर्भ पुस्तकों में वर्णन -   संहिताओं में बनफ्सा का नाम नहीं है किन्तु आदर्श निघण्टु व सिद्ध भेषज मणिमाला में बनफ्सा व इसके उपयोग का वर्णन मिलता है।  सिद्ध भेषज मणिमाला में तो कथा भी मिलती है। भावप्रकाश निघंटु  में बनफ्सा को परसिष्ट  भाग में जोड़ा गया है।
       औषधि उपयोग
इसे गरम तासीर का पौधा माना जाता है।  कफ , शर्दी , जुकाम , बुखार , मलेरिया बुखार , बदहजमी निर्मूल हेतु  काम आता है।
                चाय मसाला
   फूल के सुक्सा को गढ़वाल में जाड़ों के दिनों में कम मात्रा में चाय में डाला जाता था- विशेषकर जब तापमान गिर जाता था या बर्फ पड़ी हो। लोककथ्य   है कि बनफ्सा को चाय में पीने से बर्फ में भी पसीना आ जाता है। काफी ठंडियों के दिनों में कभी उड़द की दाल में भी बनफ्सा के बहुत कम मात्रा में सूखे फूल डाल दिए जाते थे।
  वैज्ञानिकों का मत है अति दोहन से कई प्रजातियां खतरे में पड़ गयी हैं।  
 



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Notes on History of Culinary, Gastronomy, Spices  in Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy , Spices in Pithoragarh Uttarakhand; History ofCulinary,Gastronomy,  Spices in Doti Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Dwarhat, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy,  Spices in Pithoragarh Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Champawat Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Nainital Uttarakhand;History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Almora, Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Bageshwar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Udham Singh Nagar Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Chamoli Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy, Spices  in Rudraprayag, Garhwal Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy in Pauri Garhwal, Uttarakhand; History ofCulinary,Gastronomy in Dehradun Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices   in Tehri Garhwal  Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy,  Spices in Uttarakhand Uttarakhand; History of Culinary,Gastronomy ,  Spices in Haridwar Uttarakhand; 

 ( उत्तराखंड में कृषि,  मसाला ,  व भोजन का इतिहास ; पिथोरागढ़ , कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;चम्पावत कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; बागेश्वर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; नैनीताल कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;उधम सिंह नगर कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;अल्मोड़ा कुमाऊं  उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; हरिद्वार , उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;पौड़ी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ;चमोली गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; रुद्रप्रयाग गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; देहरादून गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; टिहरी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; उत्तरकाशी गढ़वाल   उत्तराखंड में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; हिमालय  में कृषि व भोजन का इतिहास ;     उत्तर भारत में कृषि ,  मसाला व भोजन का इतिहास ; उत्तराखंड , दक्षिण एसिया में कृषि व भोजन का इतिहास लेखमाला श्रृंखला )

सिक्कों के आगमन से पर्यटन में नई संस्कृति व देवप्रयाग के तीर्थ यात्री

(  यवन , कुणिंद , शक  व कुशाण  काल में उत्तराखंड मेडिकल टूरिज्म ) 
 Uttarakhand Medical Tourism in Bactrian  Greece to Kushan Periods  -

उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म विकास विपणन (पर्यटन इतिहास )  -26-

   Medical Tourism Development in Uttarakhand  (Medical Tourism History  )     -  26                  
  (Tourism and Hospitality Marketing Management in  Garhwal, Kumaon and Haridwar series--131  

      
उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य 
विपणन प्रबंधन -भाग 131    

    लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  विक्री प्रबंधन विशेषज्ञ ) 
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     शुंग काल से मुद्रा प्रचलन बढ़ गया था।  वास्तव में छोटे -बड़े शासक मुद्रा निर्माण अपनी सिक्की व दिखाने हेतु करते थे कि उनका नाम बढ़ता जाय व साथ में सिक्के विनियम के माध्यम भी थे।  उत्तराखंड के श्रुघ्न व अल्मोड़ा के कुणिंद राजाओं ( 232 BC -20 AD ) के सिक्के भाभरी  क्षेत्र व पहाड़ों में मिलने , शक -पहलवियों  (200 BCE -400 ADE ) के सिक्के व मैदानी उत्तराखंड पर अधिकार  , कुशाण राजा का अधिकार (घृषमैन, ईरान  ) सिद्ध करते हैं कि उत्तराखंड में सिक्कों का निर्यात -आयात व्यापार में प्रचलन शुरू हो गया था।  इस काल में पहाड़ी उत्तराखंड इतिहास पर सामग्री उपलब्ध नहीं है तो इतिहासकारों को  मैदानी भाग में उपलब्ध सामग्री से ही काम चलाना होता है। 
      घृषमैन के अनुसार कुशाण वंशी विम ने दक्षिण उत्तराखंड पर अधिकार कर लिया था।  कनिंघम के अनुसार उसने हरिद्वार में एक सुदृढ़ किला बनाया था जिसके अवशेष 1867 तक शेष थे।  भाभर क्षेत्र में कुशाण कालीन सिक्के मिलने से भी सिद्ध होता है कि दक्षिण उत्तराखंड पर तो कुशाणों  का अधिकार था। (पुरी , इण्डिया अंडर कुशाणाज़ ).  कनिष्क सबसे अधिक प्रसिद्ध कुशाण शासक सिद्ध हुआ।   कुशाणों के शासन  (30 -375 AD ) से पता चलता है कि कुषाणों का उद्देश्य राज करने का रहा व लूट कर अपनी पैतृक मातृभूमि का भंडार भरना नहीं रहा था।  इसलिए निर्यात व आयात व्यापार में पूर्वकाल  से कमी नहीं आयी।  
    कुछ भागों पर कुणिंद  अथवा सबंधियों का राज भी रहा। 

                 कुशाण युग में पर्यटनोगामी व्यापारिक केंद्र 
      श्रुघ्न , कालसी , बेहट , वीरभद्र , कनखल , ब्रह्मपुर व गोविषाण बड़ी मंडियां थीं व इन  मंडियोन का मथुरा व पाटलिपुत्र मार्ग से सुगमता से जुड़ने के कारण उत्तराखंड में निर्यात -आयात सुगम था। इसके अतिरिक्त  अन्य व्यापारिक केंद्र भी थे (डबराल (उखण्ड का इतिहास -3 , पृ 231 -234 व मुखर्जी , हिस्ट्री ऑफ इंडियन शिपिंग )

                  निर्यातित वस्तुएं 
      तिब्बत व उत्तराखंड से शीतकाल में व्यापारी माल लेकर भाभर की उपरोक्त मंडियों में पंहुचते थे और निर्यात की वस्तुएं बेचते थे व उत्तराखंड व तिब्बत की आवश्यकताओं की वस्तुओं खरीदते थे। 
    निम्न वस्तुओं का निर्यात होता था -
     तिब्बत का सुहागा , स्वर्णचूर्ण व विभिन्न रत्न व उप रत्न की सबसे अधिक मांग थी जो ब्रिटिश काल तक बनी रही। 
     तिब्बत से आयातित लैपिसलजूली , मरगज , स्फटिक , अफीक , संग अजूबा , संगीशत्व , संगसुलैमानी व उत्तराखंड की जिप्सम , सेलखड़ी , अलावस्टर।  स्वर्णमक्षिका , अनेक प्रकार के रंगीन पत्थर। 
              ऊनी व खाल वस्त्र निर्यात 
 उत्तराखंड के व्यापारी तिब्बत व उत्तराखंड के बहुमूल्य समूर खाल , ऊनी वस्त्र , उन से बनी कई वस्तुएं भाभर प्रदेश ले जाते थे व बेचते थे।  रोम व यूनान में इन वस्तुओं को खरीदने हेतु धनिकों में होड़ लगी रहती थी व उत्तराखंड एक ब्रैंड था। भारत में भी इन वस्तुओं की भारी खपत थी (मोतीचंद्र , भारतीय वेशभूषा ) .  
      साधुओं के आसन , तंत्र -मंत्र प्रयोजन , घर व रथ  भागों को ढकने हेतु बाघ , हिरण   की खालें निरीटात होतीं थीं (डबराल , उखण्ड के भोटान्तिक पृ 29   )
              बनैले पशु अंग व मेडिकल टूरिज्म 
       सजावट ही नहीं अपितु रंग रोगन , औषधि हेतु कई उत्तराखंडी पशुओं के अंगों की मांग अन्यत्र व पश्चिम देशों में बराबर रही है।  तिब्बत व पहाड़ों से बनैले पशुओं की खाल , अंग भष्म , अंग सुक्सा जैसे हड्डियों का चूरा , सींग व सींग चूरा आदि का निर्यात भी खूब था
        भोटिया कुत्तों की मांग
  भोटिया कुत्तों की मांग बाह्य देशों के व भारत के धनिकों में खूब थी।  भोटिया कुत्तों का मालिक होना सम्मान सूचक माध्यम था।  उत्तराखंड से इन कुत्तों का भी निर्यात होता था। 
                उपरोक्त निर्यात साफ़ बतलाता है कि उस समय उत्तराखंडियों को बनैले व घरेलू पशुओं के प्रजनन से लेकर उनके स्वास्थ्य व अंग प्रयोग का पूरा ज्ञान था और वे इस ज्ञान  को व्यापारियों द्वारा सदूर अन्य क्षेत्रों में पँहुचाते थे।  प्रोडक्ट नॉलेज , प्रोडक्ट निर्माण ज्ञान के बगैर निर्यात नहीं होता है।
    
          मौर्य काल के बाद    उत्तराखंड में मेडिकल टूरिज्म के स्तम्भ 
   हिमालयी जड़ी बूटियों के मांग भारत व अन्य देशों में काल से ही रही है।
     वैद्य व किरातों की भागीदारी 

     अत्रिदेव ' आयुर्वेद के इतिहास' (पृ -79 ) में लिखते हैं कि चरक आदि वैद्य हिमालय निवासी किरातों की सहायता लेकर हिमालय की ऊँची श्रेणियों में उपलब्ध जड़ी बूटियों को पहचानते थे व उन्हें प्राप्त करते थे।  इसी तरह अन्य जड़ी भी स्थानीय लोग पहचनते थे व उन्हें उपयोग करने तक साधते भी थे। 
              मौर्य काल से कुषाण काल तक जड़ी बुशन का व्यापार 
   यूनान व रोम में जटामासी , कुषण बच , मोथा , गुग्गल , कस्तूरी आदि की भारी मांग थी जो उत्तराखंड से भी पूरी होती थी (मुखर्जी , हिस्ट्री ऑफ इण्डिया पृष्ठ 67 )
     अत्रिदेव  आयुर्वेद के इतिहास (133 )  में लिखते हैं कि गंधमादन के मीठाविष , कालकूट विष , हलाहाल , वत्सनाभ , मेष श्रृंगी , संख्या अदि विषों की भारी मांग थी और सोने से भी अधिक मंहगे थे।
             मेडिकल टूरिज्म व औषधि निर्माण की प्रक्रिया
      उत्तराखंड से उपरोक्त औषधियां व जड़ी बूटियों के निर्यात साक्ष्य बताते हैं कि उत्तराखंड निवासियों के मध्य जड़ी बूटी पहचानने , उन पौधों का संरक्षण , उन्हें तरीके से उखाड़ने , आवश्यकता पड़ने पर उन जड़ी बूटियों  शोधन उनका  औषधि अवयव परिवर्तन विधि , सुक्सा बनाने की विधि , उनका ग्राहक तक सुरक्षित पंहुचाने का पूरा ज्ञान था।  मेडिकल टूरिज्म के हर अंग व भागिदार अपना कार्य बखूबी करता था।  जब व्यापार होता है तो निर्माता व ट्रेडर्स को वास्तु ज्ञान /प्रोडक्ट नॉलेज व वस्तु उपभोग सभी ज्ञान होने आवश्यक होते हैं।  उपरोक्त साहित्य सिद्ध करते हैं कि उत्तराखंड वासी मेडिकल टूरिज्म सिद्धांत को पूरा अनुसरण करते थे।  
   चूँकि उत्तराखंड से औषधि निर्यात होता था तो अवश्य ही वैद्यों व ट्रेडर्सों का उत्तराखंड भ्रमण आवश्यक रहा ही होगा ।  
          
        देवप्रयाग के तीर्थ यात्री 
 
         देव प्रयाग में रघुनाथ मंदिर के सामने शिलालेख है जो डा छाबड़ा  (एपिग्राफिया इंडिका vol 33 पृ 133 व 135 )  के अनुसार ये शिलालेख 2 से 5 वीं सदी तक हैं व इनमे यात्रियों के नाम खुदे हैं व डा पार्थ सारथि  डबराल इन्हे यात्रियों के नाम नहीं अपितु वंशावली  (पल्ल्व वंश ) की मान्यता देते हैं  ( देव प्रयाग के ब्राह्मी नाम लेख , गढ़वाल की जीवित विभूतियाँ पृ 236  से 240 ) .  
     शिलालेख व इन नामों की व्याख्या और  व अन्य विश्लेषणों से पता चलता है कि चंडीघाट से देव प्रयाग तक धार्मिक यात्रा बहुप्रचलित हो गयी थी तथापि  साहसी यात्री  माणा व मानसरोवर की यात्रा भी करते थे।   
              और जहां यात्रा वहां अपने आप यात्रा मार्ग पर चिकित्सा  सुविधाएं भी सुलभ होने  लगती हैं जो आंतरिक   मेडिकल  टूरिज्म को संवारने में उपयोगी सिद्ध होता है।   


Copyright @ Bhishma Kukreti   27/2 //2018   

Tourism and Hospitality Marketing Management  History for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकों में ) कोटद्वार गढ़वाल
2 - भीष्म कुकरेती , 2013 उत्तराखंड में पर्यटन व आतिथ्य विपणन प्रबंधन , इंटरनेट श्रृंखला जारी 
3 - शिव प्रसाद डबराल , उत्तराखंड का इतिहास -part -3 कुणिंद , शक , कुशाण काल का इतिहास खंड 
-

  
  Medical Tourism History  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History of Pauri Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Chamoli Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Rudraprayag Garhwal, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical   Tourism History Tehri Garhwal , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Uttarkashi,  Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Dehradun,  Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Haridwar , Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History  Nainital Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;  Medical Tourism History Almora, Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History Champawat Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   Medical Tourism History  Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand, India , South Asia;   

उत्तराखंड में सेमल कलियों का मसाला , औषधि उपयोग इतिहास

 History, Origin, Introduction,  Uses  of Dried Kapok, Semal, Dried Red Silk Cotton   Buds   as   Spices ,  in Uttarakhand 
उत्तराखंड  परिपेक्ष में वन वनस्पति  मसाले , औषधि  व अन्य   उपयोग और   इतिहास -  7                                             
  History, Origin, Introduction Uses  of    Wild Plant  Spices ,  Uttarakhand -  7                     
  उत्तराखंड में कृषि, मसाला ,  खान -पान -भोजन का इतिहास --  96
History of Agriculture , spices ,  Culinary , Gastronomy, Food, Recipes  in Uttarakhand -96
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 आलेख -भीष्म कुकरेती (वनस्पति व संस्कृति शास्त्री ) 
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वनस्पति शास्त्रीय नाम -Bombax ceiba 
सामन्य अंग्रेजी नाम - Red Silk Cotton, Kapok 
संस्कृत नाम -शाल्मली 
हिंदी नाम - सेमल  
उत्तराखंडी नाम - सेमल , सिमुळ 
(सब्जी खंड में सूचना दे दी गयीं हैं )
       उत्तराखंड का प्राचीन मसाला
  जब सेमल की सब्जी आम बात थी और मैदानों से सब्जी व मसाले मिलना सोने- गोल्ड खरीदना जैसा था तब सेमल की बंद कलियों को सुखाकर रख दिया जाता था।  फिर जब कभी दाल या फाणु  आदि  को विशेष स्वाद देना हो तो कलियों के सुक्सा को तेल में छौंककर स्वाद बढ़ाया जाता था  .   
   इस लेखक ने अपनी दादी  श्रीमती क्वाँरा देवी (पिता जी की ताई जी ) से सुना था जिन्होंने कभी अपनी सास द्वारा  सुखाया सेमल सुक्सा मसाला प्रयोग किया था।  



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