उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Thursday, March 23, 2017

राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन

राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों  स्त्रैण्य शहर भ्रमण  इच्छा 

                          राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 4  


                                           भीष्म कुकरेती 
                      गाँव सुंदर होते हैं । गाँव का हवा पानी साफ़ कहा जाता है । शहर  रहस्यमय  करता है । तकरीबन हरेक ग्रामवासी शहर देखने की इच्छा रखता ही है । एक स्त्री की भी इच्छा शहर घुमने की इच्छा होती ही है । राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी ग्रामीण समाज में भी शहर भ्रमण  की इच्छा अवश्य रहती है । लोक साहित्य रचयिता तो समाज को देखता रहता है । लोक गीत रचयिता की नजरें हर समय समाज की आकांक्षाओं , , इच्छाओं , दमित इच्छाओं , प्रेम , क्रोध , आदि पर हर समय आँखें लगाये होता है और लिक गीत रचयिता की नजरों से कोई भी इच्छा छुप नही सकती हैं ।
                                 राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में स्त्रियों की शहर भ्रमण इच्छाओं का सुन्दर वर्णन हुआ है ।

                              राजस्थानी   लोकगीतों में स्त्रैण्य  शहर भ्रमण इच्छा गीत 
           घर के काम काज से विवाहिता स्त्री के हाथों पर छाले पड़  गए हैं और वह अपने पति से शहर घुमने की इच्छा  व्यक्त करती है । निम्न गीत में नारी मानसिकता का पक्ष उभर कर आया है -

                  
म्हारे हाथड़िया रे बीच,
छाला पड़ गया म्हारे जी ।
मैं पालो कईयां काटूँगी ?
राखडी तो म्हारे बाप के सूंआई 
तो जुठणारी गाड़ी   आवे म्हारा मारू जी । मैं पालो कईयां काटूँगी ?
जयपुर भी दिखायियो मैंने दिल्ली भी दिखायियो,
म्हाने आगरे की सैर करायियो म्हारा महारु जी । मैं … 
लाडू नही भावे , मैंने बरफी नहीं भावे,
घेवरिया रे गेरी मन में आवे म्हारा मारू जी । मैं पालो कईयां काटूँगी ?
गाडी नही बैठूं मै तो मोटर नहीं बैठूं ,
मैंने फिटफिटया की सैर करायियो । मैं पालो कईयां काटूँगी ? 
(पाल = खेतों में खडी  फसल या पुआल ; मारू =पति )
इस प्रचलित  राजस्थानी लोक गीत में नायिका द्वारा पाल काटने से हाथों पर छाले पड़ गए हैं और वह अपने पति से जयपुर, दिल्ली , आगरा घुमने की इच्छा व्यक्त करती है साथ में घेवरिया खाने की इच्छा व्यक्त करती है । साथ में आग्रह करती है कि उसे मोटर या गाडी से भ्रमण नही करना है अपितु फिटफिटया से शहर घूमना है । इस राजस्थानी लोक गीत में स्त्री इच्छा का सामयिक वर्णन हुआ है ।


                         गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों  स्त्रैण्य शहर भ्रमण  इच्छा 
 गढवाली -कुमाऊंनी समाज में भी कृषि कार्य स्त्रियों के हाथ में ही होता है । मंगसिर और पूष महीने ही  स्त्रियों के लिए थोड़ा राहत के महीने होते हैं और इस किंचित विश्राम के समय में स्त्री अपने दिल्ली में रह रहे पति के साथ घूमना चाहती और अपना निर्णय सभी रिश्ते के सासुओं को इस प्रकार सुनाती है 
कब आलो ह्यूंद  मंगसिर मैना , 
हे ज्योरू ! हे ज्योरू घुमणा कु  मीन दिल्ली जाण ।
प्यायी सिगरेट फींकि चिल्ला, घुमणा कु जाण मीन  लाल किल्ला 
हे बड्या सासू , हे कक्या सासू ! घुमणा कु  मिन दिल्ली जाण ।
आलु प्याजो कु बणा इ साग आलु प्याजो कु बणाइ साग
घुमणा कु जाण मीन करोल बाग़ घुमणा कु जाण मीन करोल बाग़ ।
हे ज्योरू ! हे ज्योरू घुमणा कु  मीन दिल्ली जाण 
होटल की रुटि खाण , होटल की रुटि खाण।
हे ज्योरू घुमणा कु  मीन दिल्ली जाण ।

 इस गीत में भी मंगसिर  महीने में फुर्सत के दिनों चर्चा है   और दिल्ली शहर का चित्र उभारा गया है साथ में होटल में खाना खाने की बात बड़े आनन्द के साथ कही गयी है ।
वास्तव में दोनों भाषाओं के इन लोक गीतों में मानवीय मनोविज्ञान का परिपूर्ण चित्रं मिलता है । किसी भी उस ग्रामीण जिसने शहर नही देखा हो उस ग्रामीण के मन में शहर के प्रति मन में जो चित्र उभरते हैं उन चित्रों और मुख्य बिम्बों को इन लोक गीतों में उभारा गया है ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 20/8/2013 
सन्दर्भ - लीलावती बंसल , 2007 , लोक गीत :पंजाबी , मारवाड़ी और हिंदी के त्यौहारों पर गाये जाने वाले लोक प्रिय गीत 
गढवाली गीत संकलन - भीष्म कुकरेती 

( राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन; राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों  स्त्रैण्य शहर भ्रमण  इच्छा; राजस्थानी लोकगीतों में स्त्री सुलभ इच्छाएं ;गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में स्त्री सुलभ इच्छाएं ; राजस्थानी  लोकगीतों में दिल्ली भ्रमण इच्छा ; गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में दिल्ली भ्रमण इच्छा )




                  राजस्थानी गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतोंमें पूर्बज पूजा लोक गीत 

                     राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 3 


                                           भीष्म कुकरेती 

                   राजस्थानी लोकगीतों में पूर्बज पूजा लोक गीत 

           राजस्थानी लोक गीत मर्मग्य डा जगमल सिंह लिखते हैं कि लोक जीवन में मृत व्यक्तियों की पूजा की जाती है ।  झुंझार जी की पूजा भी इसी परंपरा में आती है ।  राजस्थानी लोक गीतों के दूसरे  विद्वान व्याख्याकार मोहन लाल व्यास शास्त्री ने भी राह्स्थान में  पूर्वजों की पूजा संम्बन्धी लोक  गीतों का संकलन किया और इन लोक गीतों की व्याख्या व्याख्या भी की ।
 पूर्वजों की आत्मा का पूजन लोक परम्परा में रत जगा किया जाता है और रात्रि जागरण में पूर्वजों अथवा पितरों की गीत गाये जाते हैं ।

राजस्थानी जन मानस  विश्वास होता है कि पूर्वज पुन्ह उसी घर में जन्म लेते हैं । निम्न लोक गीत जो की पितृ  पूजा में गाया जाता है उस लोक गीत में में पूर्वज द्वारा पुनर्जनम लेने की बात की गयी है 
धरम दवारे ओ रूड़ी पीपला जी 
जठे पूरवज करे विचार 
    xxx                 xx
जास्यां -जास्यां शंकर  पेट 
तो वांरी बहु लाड्यां की खुंखां हुलस्यां जी
यह गीत रात्रि जागरण में गाया जाता है  ।
गीत का मंतव्य है कि पीपल वृक्ष के नीचे खड़े पूर्वज विचार विमर्श  करते हैं कि वे शंकर जी की पत्नी के गर्भ में जाने की बात करते हैं और कहते हैं कि उनकी पत्नी की कोख में जन्म लेकर हुलसेंगे ।
 
     पूर्वजों की पूजा हेतु राजस्थान या पौराणिक वीर पुरुषों या वीरांगनाओं के गीत भी गाये जाते हैं । इन्हें झुंझार जी गीत भी कहा जाता है (J . Kamphrst , 2008 )। पाबू जी झुंझार लोक गीतों में चौदहवीं सदी  के वीर नायक पाबू जी लक्ष्मण के अवतार माने गए हैं याने कि पाबू जी लोक कथाओं में भी पुनर्जन्म का समावेश है ।
मेवाड़ में झुंझार देवता उसे कहा जाता है जिसने गाँव की रक्षा या गाँव के पशु रक्षा हेतु बलिदान दिया हो और मृत्यु को प्राप्त हुआ हो । जैसलमेर में झुंझार देव्ताअप्ने समय में समाज हेतु संघर्ष करता है और संघर्ष रत मृत्यु प्राप्त होता है । राजस्थान में झुंझार , भूमियो , भूमिपाल और क्षेत्रपाल या खेत्रपाल एक ही श्रेणी के देवता हैं याने ये सभी ग्राम रक्षक देवता है ।
पाबू जी  लोक गाथा की  निम्न पंक्तियाँ दर्शाती हैं कि वीर पुरषों की याद में पूर्वज पूजा सम्पन होती है जैसे गढ़वाल -कुमाऊँ में 'हंत्या घडेला -  जागर' में समाज या उत्तराखंड के वीर पुरुषो को याद कर र पूजा अनुष्ठान सम्पन होता है ।

जिमदा पाला विमनाई जगजीती जुद्ध जैवमाता जगजीति 
याने कि तुम दोनों (जिमदा और पाबू जी ) वीर हो , नायक हो और युद्ध जीतने में माहिर हो ! 
राजस्थान में भी पूर्वज पूजा का एक उदेश्य पूर्वजों की भटकती आत्माओं या अतृप्त आत्माओं को परम स्थान हेतु अनुष्ठान किये जाते हैं और वे अनुष्ठान लोक गीत शैली में होते हैं ।

                      गढ़वाली -कुमाऊनी लोक गीतों में पूर्वज पूजा 


गढ़वाल -कुमाऊँ में पुव्जों का पूजन एक विशेष धार्मिक , अनुष्ठान और आयोजन होता है जिसे हंत्या घड्यळ कहते हैं। हंत्या घड़ेला अनुष्ठान  पूर्वज की भटकती आत्मा की शान्ति या अतृप्त आत्मा को यथोचित संतोष हेतु होता है । घडेला में जो लोक गीत गाये जाते हैं उन्हें जागर कहते हैं । घडेला का अर्थ है देवता को नचाना । जागरी डमरू और थाली बजाने के साथ जागर (धार्मिक लोक गीत ) गाते हैं और एक या कई मनुषों के शरीर पर मृतक की आत्मा घुस आती है और वह (पश्वा ) नाचता है 
इन जागरों में जागर किसी ख़ास पौराणिक व्यक्ति जैसे अभिमन्यु मरण जैसी लोक गाथाओं के गायन , संगीत व नृत्य होते हैं होता है ।
मृत पूर्वजों की आत्मा शान्ति हेतु   लोक गीत रणभुत भी होते हैं जैसे कि राजस्थानी मे पाबू गीत पूजा होती है । रणभुत लोक गीतों  में क्षेत्रीय वीर पुरषों का गान होता है जैसे जीतू बगड्वाल जागर या रणरौत अथवा कैंतुरा जागर  आदि ।


   रवाईं में हंत्या  जागर -भाग 

मामी तेरी छुटी पड़ी चाखोल्युं की टोल।
तेरो होलो केसों मामी इजा को पराण।
तेरो होलो केसों मामी इजा को पराण।
त्वेको आयो पड़ी मामी काल सी ओ बाण।
काल सी छिपदो मामी रीट दो सी ओ बाण।
सोची होलो मामी तै हरस देखऊं।
यख मं बैठी रो तेरो बांको माणिस।
के कालन डालि मामी जोड़ी मां बिछाऊँ।
भैर  भीतर मामी देखी ज तू अ क्वैक।
देखी भाळी जाई मामी आपड़ो बागीचा।
इस लोक गीत में एक औरत की अकाल मृत्यु  हुयी है और उस  मृतक आत्मा की शांति हेतु घड़ेला रखा जाता है । जागरी मृतक के बारे में हृदय विदारक  गाथा इस प्रकार सुनाता है -
हे प्रिय (मामी -प्रिय सूचक शब्द ) ! पक्षियों का झुण्ड अब तेरे से छूट  गया है । हे प्रिय ! तेरा माँ का ममत्व युक्त प्राण कैसा होगा  । तेरे लिए वह काल बाण कैसे आया  । यह काल छिपकर और घूम घूम कर कैसे आया होगा  । यह काल तुझे ढूंढता रहा  । तूने सोचा होगा मै अपने परिवार में सबका हर्ष देखूंगी  । यहाँ तेरा सुन्दर पति बैठा है  । किस काल ने तेरी जोड़ी में बिछोह डाला  । हे प्रिय ! तू बाहर भीतर सुदर तरह से सब जगह देख जा और भाव से अपने बगीचे (परिवार ) को देख जा  ।
इस तरह हम पाते हैं कि राजस्थानी , गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में पूर्वजों की पूजा के कई प्रकार के गीत हैं। कुछ गीत पौराणिक हैं , कुछ गीत लोक इतिहास पर आधारित है,कुछ गीत स्थानीय वीरों-नायक -नायिकाओं जो  देव तुल्य हो गये हैं या लोक देव बन गए हैं पर आधारित है और कुछ गीत अत्यंत स्थानीय  होते हैं। अतृप्त परियों आदि के गीत भी पूर्वज गीतों में आ जाते हैं ।

Copyright@ Bhishma  Kukreti 19/8/2013 

सन्दर्भ 
 
डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली 
डा शिवा नन्द नौटियाल , 1981 ,गढवाली लोकनृत्य -गीत , हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग 
मोहन लाल व्यास 'शास्त्री '  (सम्पादन ) राजस्थानी लोक गीत 
डा जगदीश नौडियाल उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर


                         राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में नारी पीड़ा 

                  राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 2


                              
                      भीष्म कुकरेती

  भारत  में तकरीबन सभी समाज में स्त्रियों को विशेष भौतिक और मानसिक कष्ट सहने पड़ते हैं । मानव जनित सामजिक कष्ट कहीं अधिक दुखदाई होते हैं ।  
 लोक गीत या लोक साहित्य रचयिता की आँखें सभी कुछ देखता है और उन घटनाओं को अनुभव करता है फिर वः यथार्थ चित्रित कर डालता है और अपने अनुभवों को लोक गीतों या लोक कथनों में ढाल देता है ।  
  राजस्थानी और 
            राजस्थानी और  गढ़वाली-कुमाउंनी लोक गीतों में बहुओं की विभिन्न पीडाएं ह्रदय विदारक ढंग से चित्रित गया है ।



                                               राजस्थानी  लोक गीत में बहू भेदभाव पीड़ा 
और सहेलिया माँ झूलण जाय, खेलण जाय । 
म्हने मण रो माँ पीसणो । 
पीसत -पीसत दुख्याँ मां मोर  ।  
पीवत दुखिया माँ पैरवा  । । 
औरों ने दिया माँ बुल्का च्यार 
म्हने बटल्यो मां एकलो 
औरों ने मां घप्सां घप्सां खांड 
म्हने घप्सों मां लूण रो  
औरों माँ  पली  पली घी 
मने मोरियों मां तेल रो 
औरों ने मां बाटकिया बाटकिया खीर , 
म्हने बाटकी मां राब की
(गीत संकलन - श्रीमती रानी लक्ष्मी कुमारी 'चूड़ावत ' राजस्थानी लोक गीत )

उपरोक्त राजस्थानी लोक गीत में एक लडकी अपनी माँ से अपने ससुराल में उस के साथ किये गये भेदभाव, दुराव छुपाव और अन्य कष्टों की कहानी बताती है कि 
हे मां ! अन्य सहेलियां तो झूलने जाती हैं , खेलने जाती हैं किन्तु मुझे मन भर अनाज पीसने और मन भर आता रोटी पकाने दिया जाता है । अनाज पीसते पीसते मेरा मोर (पृष्ठ भाग ) दर्द करने लगा है । रोटी पकाते पकाते मेरी अंगुलियाँ दर्द करने लगी हैं ।  हे मां ! ससुराल में औरों को चार चार फुल्के दिए जाते हैं जबकि मुझे छोटा फुल्का दिया जाता है । दूसरों को भर भर कर शक्कर  दिया जाता है तो मुझे केवल नमक । औरों को कटोरी भर कर घी दिया जाता है तो मुझे बूंद भर तेल । औरों को कटोरे भर भर कर खीर दी जाती है और मुझे केवल कटोरी में दलिया दिया जाता है ।
     
                          गढवाली -कुमाउंनी लोक गीतों में  बहू पीड़ा 

            गढ़वाली और कुमाउंनी लोक गीतों में भी नारी खाशकर बहू पीड़ा को दर्शाने वाले दर्जनों गीत हैं और कई क्षेत्रीय गीतों का संकलन अभी बाकी है । 
निम्न गढ़वाली लोक गीत में नारी पीड़ा के कई  पक्ष दर्शाए गए हैं ।
 केकु बाबाजीन मिडिल पढायो 
केकु बाबाजीन मिडिल पढायो
केकु बाबाजीन राठ  बिवायो 
बाबाजीन देनी सैंडल बूट 
भागन बोली झंगोरा कूट ।
बाबाजीन दे छई मखमली साड़ी 
सासू नी देंदी पेट भर बाड़ी ।
जौं बैण्योंन साड़ी रौल्यों क पाणी 
वा बैणि ह्वे गए राजों क राणी ।
जौं बैण्योंन काटे रौल्यों को घास 
वा भूली गै राजों का पास ।
मै छंऊ बाबा राजों का लेख 
तब मी पाए सौंजड्या बैख ।
दगड्या भग्यानो की जोड़ी सौंज्यड़ी
मेरी किस्मत मा बुड्या कोढ़ी ।
बांठा पुंगड़ा लड़बड़ी तोर 
नी जैन बुड्या संगरादी पोर ।
बाबाजीन दे छई सोना की कांघी 
सासू ना राखी छै मैना राखी ।
(गीत संकलन : डा कुसुम नौटियाल , गढ़वाली नारी : एक लोकगीतात्मक पहचान)

इस लोक गीत में दिखाया गया है कि एक आठवीं पास (जिस युग में  लडकियाँ स्कूल भी नही जाती थीं )लडकी की शादी उसके पिताजी ने लोभ में एक बुद्धे के साथ कर दी । फिर वह लडकी कह  रही है कि पिताजी ने भेंट में सैंडल दी हैं किन्तु उसके भाग्य में झंगोरा कूटना  लिखा है । द्यपि उसने आठ पास किया है किन्तु उसकी शादी अविकसित देस में हुआ है । उसके पिता  जी ने मखमली साडी दी किन्तु उसकी सास उसे पेट भर बाड़ी भी नही देती है ।
पिताजी ने भेंट में सैंडल दी हैं किन्तु उसके भाग्य में झंगोरा कुटना लिखा है । जो  बहिन दूर नदी से  पानी लाती थी उसे राजा दुल्हा मिला । जो बहिन घास लाती थी वह राजमहल में वास करती है । मेरे हाथ में राजयोग लिखा था तो मुझे बुड्ढा पति मिला । मेरी सहेलियों को जवान पति मिले तो मुझे कोढ़ी जैसा पति । मई चाहती हूँ यह बुड्ढा मर ही जाय । पिताजी ने मुझे सोने की कंघी दी किन्तु मेरी सास ने मुझे छह माह तक नंगा ही रखा 
 इस तरह हम पाते हैं की राजस्थानी व गढवाली  भाषाओं के लोक गीतों में स्त्री पीड़ा या नारी के साथ दुराव -भेदभाव एक समान दर्शाए गए हैं । ऐआ लगता है कि नारी पीड़ा सभी जगह एक जैसी ही है ।
दोनों लोक गीतों में करुण रस उभर कर आया है । दोनों ही भाषाओं के लोक गीत स्त्री विमर्श पर ह्रदय विदारक चित्र उभारने में सफल हैं ।राजस्थानी और गढ़वाली के लोक गीत नारी व्यथा चित्रित करने में यथार्थ को सामने लाते हैं और ये लोक गीत अपने युग का आयना सिद्ध होते हैं ।


Copyright@ Bhishma  Kukreti 16 /8/2013 

सन्दर्भ 
डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली 
डा शिवा नन्द नौटियाल , 1981 ,गढवाली लोकनृत्य -गीत , हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग
डा नन्द किशोर हटवाल , 2009 उत्तराखंड हिमालय के चांचड़ी  गीत एवं नृत्य ,विनसर पब क. देहरादून
(राजस्थानी लोक गीतों में स्त्री पहचान ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्री पहचान ; राजस्थानी लोक गीतों में  बहू पीड़ा ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में बहू पीड़ा ;राजस्थानी लोक गीतों में करुण रस ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में करुण रस   ;राजस्थानी लोक गीतों में स्त्री दुःख ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्री दुःख ; राजस्थानी लोक गीतों में नारी पीड़ा ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी पीड़ा ; राजस्थानी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ दुराव ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ दुराव ; राजस्थानी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ भेदभाव ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में स्त्रियों के साथ भेदभाव ;राजस्थानी लोक गीतों में नारी वेदना ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी बेदना ;राजस्थानी लोक गीतों में नारी कष्ट ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी कष्ट ;राजस्थानी लोक गीतों में नारी विषयक हृदय विदारक चित्र ; गढ़वाली -कुमाऊंनी लोक गीतों में नारी विषयक ह्रदय विदारक चित्र - राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन श्रृखला भाग 3 में जारी … )




                 राजस्थानी और गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों में  अंग्रेजी शासन के विरुद्ध आवाज 

               राजस्थानी, गढ़वाली-कुमाउंनी  लोकगीतों का तुलनात्मक अध्ययन:भाग- 1

                                       भीष्म कुकरेती 

लोक गीत लोकोन्मुखी होते हैं . लोक रचनाकार जो देखता उसे फोटोकॉपी जैसे चित्रित कर  देता है I हाँ रचना करते वक्त लोक धर्मी रचनाकार भौगोलिक , आर्थिक सामजिक व अपनी कल्पना और शब्द सामर्थ्य के हिसाब से रचना कर डालता है I 
अंग्रेजी शासन में भारत पर कई तरह के अत्याचार व अनाचार हुए I ब्रिटिश  अत्याचारों का प्रभाव भारत के सभी वर्गों पर कुछ हिसाब से तकरीबन एक सा ही रहा है I 
यही कारण है कि राजस्थानी और गढ़वाली लोक गीतों में अधिक साम्यता है I 
निम्न राजस्थानी गीत में अंग्रेजी राज्य की अव्यवस्था और जनविरोधी कार्य की निंदा की गयी है


         देश में अंग्रेज राज आयो
           
   देश में अंग्रेज राज आयो , काईं काईं लायो रे I 
  फूट नांकी भायाँ में , बेगार लायो रे 
काली टोपी रे , हाँ हाँ काली टोपी रे 
देश में घुत्यारो आयोरे भूरिया मुंडालो 
अबु न अजमेर बच में डोडी हडकाँ नांकी रे 
घोड़ी रोवे घास ने टावर रोवे दाणा ने 
महलां ठुकराण्या रोवे , जामण जाया ने 
इस राजस्थानी लोक गीत  में ब्रिटिश राज की बहाली की भर्त्सना की गयी है   की महगाई आदि व चीजों की कमी का रोना रोया गया है I घोड़े को घास नही दाणा नही मिलने की बात उठाई गयी है


ब्रिटिश राज में मंहगाई की मार 
निम्न गढवाली गीत भी ब्रिटिश राज में रचा गया है और जनता की बदहाली को सामने रखता है 

 

सूणा सूणा भाई बन्दों भारत को गीत जी 
कना कना हाल ह्वेन कन ऐन अंग्रेजी रीत जी 
हजार हजार का भैंसा ह्वेन दूध नी माणी जी 
हौर चीज फंड फूका अंग्रेजी चा जरुर पीणा जी 
डेरा मूं खंदेर आयूँ च खांद 
सौदा  खाणकू रूप्या  नी कन आयो अकरी जी
इस गढ़वाली लोक गीत में गीत में भैस के दाम बढ़ गये हैं किन्तु दूध कम होता जा रहा है . और नई नई व्यसन घर कर गये हैं कि जिन्दगी जीना दूभर हो गया है

दोनों भाषाओं की गीत यथार्थ का पोर वृतांत बताने प्यूरी तरह समर्थ हैं . 
दोनों भाषाओं के लोक गीत जन चेतना के लोक गीत हैं 
दोनों भाषाओं के ये लोक गीत जो देखा गया , जो अनुभव किया गया उसे साफ़ साफ़ दर्शाने में समर्थ हैं I 
दोनों लोक गीत दर्शाते हैं कि लोक रचनाकार को स्पस्ट कहने में कोई हिचकिचाहट बिलकुल भी नही है I 
राजस्थानी और उत्त्रख्न्दी लोक गीत के रचनाकार निडर हैं और उन्हें बादशाहत का  कोई भय नही है किन्तु जन मानस की चिंता सता रही है और लोक रचनाकार अन्याय व अत्याचार को मौन स्वीकार नही करता है बल्कि वः किसी भी तरह मुखर हो उठता है I

Copyright@ Bhishma  Kukreti 14/8/2013 

सन्दर्भ 
 
डा जगमल सिंह , 1987 ,राजस्थानी लोक गीतों के विविध रूप , विनसर प्रकाशन , दिल्ली 
डा शिवा नन्द नौटियाल , 1981 ,गढवाली लोकनृत्य -गीत , हिंदी साहित्य सम्मेलन , प्रयाग 

द्वारीखाल -गंगासलाण का एक करुण रस का लोक गीत

भीष्म कुकरेती
-
- यह लोक गीत एक सत्य कथा पर आधारित लोक गीत है. जिसे आज 8 मार्च 2017 को मैंने अपनी माँ जी श्रीमती दमयंती डबराल कुकरेती से सुना -
कथा है कि श्यामा पधानी (?) की सात सौतन थीं और उसका पति उसे बहुत प्रेम करता था। इस डाह में श्यामा की सौतनों ने श्यामा को खीर में जहर देकर मार दिया। निम्न गीत में मृत श्यामा को देखकर गीत कहा गया है -
-
सीणी द्यावो रे ब्वे बाबु की लाडी , सीणी द्यावो रे ब्वे बाबु की लाडी ,
लोकुकी ब्वार्यून नळ कूट्याल, सीणी द्यावो रे ब्वे बाबु की लाडी ,
लोकुकि ब्वारी ऑटो पीसी आल
सीणी द्यावो रे ब्वे बाबु की लाडी ,
द्वारी खाल की श्यामा पधानी सीणी द्यावो रे ब्वे बाबु की लाडी ,
त्यार पट्टिक पटवारी पट्टी जयूँ च
सात सौतुन ब्वे खीर पकाई
तसी बि निंद नि खुलि तेरी
सीणी द्यावो रे ब्वे बाबु की लाडी

2017 का विधानसभा चुनाव का जोक्स , हॉंसोड्या छौंका

Best  Harmless Garhwali Literature Humor , Jokes  ;  Garhwali Literature Comedy Skits  , Jokes  ; Garhwali Literature  Satire , Jokes ;  Garhwali Wit Literature  , Jokes  ;  Garhwali Sarcasm Literature , Jokes  ;  Garhwali Skits Literature  , Jokes  ;  Garhwali Vyangya   , Jokes   ;  Garhwali Hasya , Jokes   ; गढ़वाली हास्य , व्यंग्य,  गढ़वाली जोक्स

2017 का विधानसभा चुनाव का जोक्स , हॉंसोड्या छौंका 
-
  चबोड़ , चखन्यौ , चचराट अनुवाद  :::   भीष्म कुकरेती    
-
भाजपा की जोरदार , शानदार जीत से उपज्यां कुछ जोक्स इंटरनेट माँ इना ऊना फुळयां छन -
-
अखिलेशन राहुल गांधी दगड़ गठबंधन कौरिक हुस्यारी दिखाई।  अब अखिलेश हार का वास्ता  राहुल गाँधी पर भगार लगै सकुद अर लोग सत्य बि मानि ल्याला  (सर जडेजा )
-
कांग्रेस की आत्मनिरिक्षण बैठक माँ -
राहुल गाँधी पंजाब की जीत का जुम्मेबार छन किन्तु उत्तर प्रदेश माँ हार का कारण कांग्रेसी कार्यकर्ता जुम्मेवार छन , सब कार्यकर्ताओं तै टा जिंदगी  कांग्रेस से भैर करे जावो (भीष्म कुकरेती )
-
एक खबर अनुसार -पंजाब का कांग्रेसी नेताअरमिंदरन राहुल गांधी तै फूलों गुच्छा भेजी बल धन्यवाद जो आप चुनावी कैमपेयन मा पंजाब नि ऐन। (लोआ कुट्टीमा )
-
राहुल गांधी की सक्यात का बारा  मा अब कै तैं संशय ,कन्फ्यूजन ,  घँघतोळ नि रै गे बल राहुल गांधी भाजपा तै जितै सकदन।  पता नि सोनिया जी पर क्या बितणी ह्वेल धौं। (केतन भाटे )
-
केजरीवालन फिर से अपणी हार  का जुम्मेदार प्रधान मंत्री तै ठहराई , मोदी जीन जुम्मेवारी स्वीकार कार 
-


 -
 -
Copyright@ चोरिक माल च जी  , Mumbai India ,  13 /3 / 2017 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।

 Best of Garhwali Humor Literature in Garhwali Language , Jokes  ; Best of Himalayan Satire in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Uttarakhand Wit in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  North Indian Spoof in Garhwali Language Literature ; Best of  Regional Language Lampoon in Garhwali Language  Literature , Jokes  ; Best of  Ridicule in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Mockery in Garhwali Language Literature  , Jokes    ; Best of  Send-up in Garhwali Language Literature  ; Best of  Disdain in Garhwali Language Literature  , Jokes  ; Best of  Hilarity in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Cheerfulness in Garhwali Language  Literature   ;  Best of Garhwali Humor in Garhwali Language Literature  from Pauri Garhwal , Jokes  ; Best of Himalayan Satire Literature in Garhwali Language from Rudraprayag Garhwal  ; Best of Uttarakhand Wit in Garhwali Language from Chamoli Garhwal  ; Best of North Indian Spoof in Garhwali Language from Tehri Garhwal  ; Best of Regional Language Lampoon in Garhwali Language from Uttarkashi Garhwal  ; Best of Ridicule in Garhwali Language from Bhabhar Garhwal   ;  Best of Mockery  in Garhwali Language from Lansdowne Garhwal  ; Best of Hilarity in Garhwali Language from Kotdwara Garhwal   ; Best of Cheerfulness in Garhwali Language from Haridwar    ;
Garhwali Vyangya, Jokes  ; Garhwali Hasya , Jokes ;  Garhwali skits , Jokes  ; Garhwali short Skits, Jokes , Garhwali Comedy Skits , Jokes , Humorous Skits in Garhwali , Jokes, Wit Garhwali Skits , Jokes  

चुनाव हारण पर भगार , दोषारोपण , बहानेबाजी का गुर

Best  Harmless Garhwali Literature Humor , Jokes  ;  Garhwali Literature Comedy Skits  , Jokes  ; Garhwali Literature  Satire , Jokes ;  Garhwali Wit Literature  , Jokes  ;  Garhwali Sarcasm Literature , Jokes  ;  Garhwali SkitJokes   ;  Garhwali Hasya , Jokes   ; गढ़वाली हास्य , व्यंग्य,  गढ़वाली जोक्स

चुनाव हारण पर भगार , दोषारोपण , बहानेबाजी का गुर 

-
  चबोड़ , चखन्यौ , चचराट :::   भीष्म कुकरेती    
-

यदि आप चुनाव हार गेवां तो तौळs कै  बि कारण से छुटकारा पाए जै सक्यांद -
१- जनता की समझ मा हमर बात नि ऐ कि हमन  कथगा कार उन्कुण 
२-विरोधी पार्टीन हमसे ज्यादा , बिंडी , भौत बिंडी झूठा आश्वासन देन 
३- हमर ईख शब्दकोश नि छौ  तो हम नया नया आश्वाशन नि दे  सक्यां 
४- विरोध्यूंन झूठी अफवाह फैलाई कि हमन गुंडों तै टिकेट देन 
५- हमन दिल्ली मा इथगा काम कार अर विज्ञापन  गोआ अर पंजाब मा बि देन पर ईं  अनपढ़ जनतान  हमर झूठ विज्ञापनों पर विश्वास ही नि कार 
६-जितण वळी पार्टिन  धन अर बाहुबल को प्रयोग हम से अधिक कार 
७- उंका ज्यादा मंत्री चुनावी कैम्पैन मा छा 
८- प्रधान मंत्रीन गैर पारम्परिक ढंग से रैली करिन 
९- जातिवाद का खेल चल 
१० - हमर विरोधी EVM मशीन की सहायता से चुनाव जीत 
-
 -
Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,  13 मार्च 2017 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।

 Best of Garhwali Humor Literature in Garhwali Language , Jokes  ; Best of Himalayan Satire in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Uttarakhand Wit in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  North Indian Spoof in Garhwali Language Literature ; Best of  Regional Language Lampoon in Garhwali Language  Literature , Jokes  ; Best of  Ridicule in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Mockery in Garhwali Language Literature  , Jokes    ; Best of  Send-up in Garhwali Language Literature  ; Best of  Disdain in Garhwali Language Literature  , Jokes  ; Best of  Hilarity in Garhwali Language Literature , Jokes  ; Best of  Cheerfulness in Garhwali Language  Literature   ;  Best of Garhwali Humor in Garhwali Language Literature  from Pauri Garhwal , Jokes  ; Best of Himalayan Satire Literature in Garhwali Language from Rudraprayag Garhwal  ; Best of Uttarakhand Wit in Garhwali Language from Chamoli Garhwal  ; Best of North Indian Spoof in Garhwali Language from Tehri Garhwal  ; Best of Regional Language Lampoon in Garhwali Language from Uttarkashi Garhwal  ; Best of Ridicule in Garhwali Language from Bhabhar Garhwal   ;  Best of Mockery  in Garhwali Language from Lansdowne Garhwal  ; Best of Hilarity in Garhwali Language from Kotdwara Garhwal   ; Best of Cheerfulness in Garhwali Language from Haridwar    ;
Garhwali Vyangya, Jokes  ; Garhwali Hasya , Jokes ;  Garhwali skits , Jokes  ; Garhwali short Skits, Jokes , Garhwali Comedy Skits , Jokes , Humorous Skits in Garhwali , Jokes, Wit Garhwali Skits , Jokes  

सभी को फूलदेई की शुभकामनायें।

फूल देई-छम्मा देई, दैंणि द्वार- भर भकार,
यौ देळी  कैं बार-बार नमस्कार।
      एक लोक गीत         
           फूलदेई -फूलदेई -फूल                 संग्रान्द   
           सुफल करी नयो साल तुमको श्रीभगवान
            रंगीला सजीला फूल फूल ऐगी , डाल़ा बोटाल़ा  हर्या ह्व़ेगीं
              पौन पन्छ , दौड़ी गेन, डाल्युं फूल हंसदा ऐन ,
                तुमारा भण्डार भर्यान, अन्न  धन बरकत ह्वेन 
               औंद राउ ऋतू मॉस , होंद राउ सबकू संगरांद 
               बच्यां रौला तुम हम त फिर होली फूल संगरांद 
               फूलदेई -फूलदेई -फूल                 संग्रान्द   
फूल संगरांद का यह दिन आज उत्तराखंड में कन्याओं द्वारा प्रसन्नता के साथ मान्या जाता है कन्याएं बैसाखी तक रोज सुबह सुबह देहरी में फूल डालती हैं 
-
 आभार स्व श्री शिवा नन्द नौटियाल (लोकगीत )
        एवम श्री कैलाश पांडे 

सतपाल महाराज जी ! नै कज्याणि बिगरौ मा पुराणि कज्याण नि बिसरि जैन हाँ !

चबोड़्या -चखन्यौर्या -भीष्म कुकरेती 
-
     
(s =आधी अ  = अ , क , का , की ,  आदि )
-
                 अचकाल क्या बरसों से रिवाज च बल नै नै कज्याणि बिगरौ मा मरद पैलाक कज्याण बिसरि जांद।  पौड़ी क्षेत्रौ सांसद सतपाल महाराज जी का बि इनि हाल दिखेणा छन।  पुराणा जमाना मा हरम संस्कृति मा पुराणि राणि तैं नबाब  साबौ दर्शन कर्याँ दसियों साल ह्वे जांद छा अर नबाब साब हर साल नै नै खवानीस दुल्हन तैं हरम जोग करदु छौ।  तथाकथित रेल पुरुष की फोटो दिखुद अर मि तैं यि नबाबजादा याद ऐ जांदन जु पुराणि घरवळिक हिफाजत त करदा नि छा अर नै नै कज्याण्युं कुण नै महल , नै बौड़ी बणान्दा छा । पुराणि कज्याण कुठड़ि पुटुक सड़णि ह्वावो , दम तोड़णि ह्वावो अर बुड्या   नै कज्याण लाणो विचार सरा गां वाळ तैं बताणु कि मीन नै बिगरैलि बांद लाणाइ।  सतपाल महाराज की याद करदु अर मि तैं इतिहास का उ दिन याद ऐ जांदन जब पैल रणिवास मा दस दस कज्याण सालों से राजा प्रतीक्षा करणा रौंदि छे कि राजा आवो त राजकुमार -राजकुमारी पैदा ह्वावन पण राजा च कि अपण नपुंसकता  छुपाणो बान , अपणि इम्पोटेंसी लुकाणो वास्ता हर साल दस नई दुल्हन लांदो छौ। सौ राण्युं नपुंसक पति महाराज  दुनिया मा बुलणु रौंद छौ मि  परजा तैं राजकुमार दीणो बान दूर देस से नई राणि लाणु छौं।  सतपाल महाराज की फोटो देखिक मि तै वै कजे याद ऐ जांद जु छौंद भूख -तीस से बेहाल बच्चों देख भाळ करणम असमर्थ ह्वावो पण चौथु ब्यौ त्यारी मा व्यस्त रावो।
-
  सतपाल जी यदि महाराज नि हूंद छा त सचमुच मा म्यार मुखान कुजाण क्या क्या गाळी -लाब -काब ऐ जाण छौ धौं। 
सतपाल महाराज जी तताकथित रेल पुरुष नि हूंद छा त मीन सतपाल जीक बांठै धरण छे कि असभ्य से असभ्य गाळी बि शरमा मारन मूक लुकै दींदि !
सतपाल महाराज जीन गढवाळम आश्रम नि खोल्यां हूंदा त मीन सतपाल महाराज जी  तैं इन इन गंदी से गंदी उपमा दीण छे कि केजरीवाल की आप पार्टी मि तैं उत्तराखंड ना सै पण गढ़वाल का पार्टी अध्यक्ष अवश्य बणै  दींदी। 
-
सतपाल माहाराज जी एक दैं हम लोगुं तैं भरमाणो वास्ता ही सै लोकसभा मा स्थानीय भाषाओं तैं संविधान की आठवीं सूची मा रखणो प्रस्ताव नि लांदा छा त मीन सतपाल जी तैं  खूनी  खजर , खूनी मंजर  , खूनी खंद्वार जन बेहयाई पदवी  देक भाजपा सम्राट से गुजरात रत्न की पदवी त  लेइ  लीण छे।   

  नै नै ! जरा ठहरो ! सतपाल महाराज जी अपण श्रीमती अमृता रावत जी छोड़ि दुसर पत्नी नि लाणा छन।  बात कुछ हौर च। 
-
 अबि कुछ दिन पैल सतपाल महाराज उप राष्ट्रपति दगड़ लैटिन अमेरिका मा पेरू देस गेन अर सतपाल जीक दिल किनुआ पर ऐ गे।  अर दगड़म उत्तराखंड की उद्यान -बगवान मंत्र्यांणी श्रीमती अमृता रावत को दिल बि पेरू   का किनुआ पर ऐ गे । 
मनुष्य पर दुसरौ कज्याण बिगरैलि  अर दुसरौ कजे कामगति लगणो रोग पुराणो च।  सतपाल महाराज जी अर श्रीमती अमृता रावत तै किनुआ मा उत्तराखंड विकास का वास्ता एक रामबाण   दिखे गे।
किनुआ एक गुलेटिनहीन , उच्च प्रोटीनयुक्त अनाज (स्यूडोसीरल )  च जो कम नमी बलुआ धरती मा बि खूब पैदा ह्वे सकद। 
अब जब सतपाल महाराज जी अर श्रीमती अमृता रावत का दिल किनुआ पर ऐ गे तो इन बुल्याणु च बल पंत नगर कृषि विश्वविद्यालय का वैज्ञानिक पेरू जाला अर निकट भविष्य मा किनुआ की खेती उत्तराखंड मा बि होलि। सतपाल जीक दलील च बल कम कीमत पर उत्तराखंड्युं तैं एक सम्पूर्ण अनाज मिल  जालो।  सतपाल महाराज पेरू का कई रंगीन मुंगर्युं से भि प्रभावित छन अर सतपाल महाराज यूँ मुंगर्युं तैं उत्तराखंड मा लाण चाणा छन।
सतपाल महारज जी ! क्या उत्तराखंड की समस्या नयो  अनाज नि उपजाणौ  च ? 
क्या उत्तराखंड कृषि की समस्या या च कि उत्तराखंड मा रंगीन मुंगरी नि हूँदन ?
क्वादो -झंगोरा की ही खेती पहाड़ मा दुबर शुरू करवावो तो उत्तराखंड तैं किनुआ की जरूरत ही नी  च।  चलो माना नई कज्याण किनुआ पुराणि कज्याण झंगोरा -क्वादो से जादा उपजाऊ च पण  सासत्व सवाल को जबाब कु द्यालो कि पहाड़ों मा खेती करण वाळ कखन आला ? सतपाल महारज जी ! किनुआ की खेती का वास्ता बि त उत्तराखंड -पहाड़ों मा किसाणु जरोरत होलि कि ना ?
सतपाल साब ! किनुआ की कृषि वास्ता बि त गूणी -बांदर -सुंगर से रक्षा बंदोबस्त की जरूरत होलि कि ना ? 
सतपाल साहब ! पहाड़ों की समस्या क्या क्या फसलो खेती करे जावो कतई नी  च बल्कणम असली समस्या त खाली गाँव छन।   आपका संसदीय क्षेत्र का तो नया रिकॉर्ड च कि पौड़ी जिला मा जनसंख्या मा भारी कमी आणि च। 
-
सतपाल जी ! पैल इन बतावो कि किनुआ उगाण  असली समस्या को निदान च   क्या ?
पहाड़ों मा अनाज उगाण कदापि बि समस्या निदान नी  च बलकणम समस्या निदान तो बागवानी ही च। 
उत्तराखंड की समस्या किनाउहीन खेती नी च  बलकणम प्रवास्युं द्वारा कृषि मा भागीदारी नि निभाण च।  जब तलक पुंगडूं  असली मालिक प्रवासी कृषि मा भागीदारी नि निभाला तब तलक किनुआ की बात करण फोकटिया सुपिन दिखण च अर शायद प्रवासी बागवानी मा ही भागीदारी निभै सकदन। 
तो सतपाल महाराज जी पैल प्रावास्युं भागीदारी बारा मा समाधान की स्वाचो फिर किनुवा का बारा मा स्वाचो। 
अनाज की खेती मा प्रवास्युं (  खेतों असली मालिक छन ) भागीदारी ह्वैइ नि सकदी तो फिर किनुआ कु उपजालु ? 
अर किनुआ /किनुवा कि खेती इन बि नी  च कि तिल जन ब्वावो अर फिर काटणो ही जावो।  आज यदि इनि जि  फसल उगाण सरल हूंद त पहाड़ी गांवों मा तिल की खेती तैं किले आप बढ़ावा नि दीणा छंवां ?
म्यार सांसद जी ! ऊत्तराखण्ड का पहाड़ों समस्या या नी च कि उख दुनिया का सबसे स्वास्थ्य वर्धक अनाज की खेती नि होंदि ।  पहाड़ों समस्या केवल एकी च कि प्रवासी खेती मा भागीदारी नि निभाणा छन अर प्रवास्यूं भागीदारी बगैर तुम अमृत बी लावो तो खेतिs दशा नि सुधर सकदी ! मेरी दरख्वास्त च बल किनुआ तैं प्रवास्युं भागीदारी से ज्वाड़ो तबि किनुआ का बारा मा ब्वालो 




Copyright@ Bhishma Kukreti  22/11/2013 

कांग्रेस में संगठनात्मक बदलाव हो रहा है

मजाक मसखरी , खरी खोटी - भीष्म कुकरेती 
-
मेरे कांग्रेसी दोस्त  ने कहा - थैंक्स गॉड ऐट लिस्ट राहुल बाबा अंडरस्टूड  आफ्टर सो मेनी डिफीट्स 
मैं -क्या समझे राहुल जी कि मोदी सूट बूट वाला नही बल्कि शत्रुमर्दन वाला है ?
दोस्त -नही नही मोदी कांग्रेस की समस्या नही है 
मैं -तो ?
दोस्त -राहुल जी के हिसाब से संगठन  समस्या है 
मैं -अच्छा तो संगठन परिवर्तन हो रहा है 
दोस्त -हाँ 
मैं -क्या परिवर्तन होने वाला है ?
दोस्त - श्री मोतीलाल बोरा अब कोषाध्यक्षन नही होंगे   .. 
मैं -हैं ऐसे सेवक को कोषाध्यक्ष पड़ से रिटायर ?
दोस्त - जी अब उन्हें वरिष्ठ कोषाध्यक्ष बनाया जाएगा। 
मैं -बहुत सुंदर। 
दोस्त - श्री दिग्विजय सिंग जी को महासचिव के पड़ से बर्खास्त किया जाएगा 
मैं - हैं ? क्या अब दिग्गी बाबू राहुल जी की नजरों से गिर गए हैं।  इतने गिरे हुए भी नही हैं। 
दोस्त -उन्हें मानद  उपाध्यक्ष पद  दिया जा रहा है और उनके लिए एक नया  पद बनाया जा रहा है - 'बहुसंख्यक चिढाओ कोष्ठ ' . अब दिग्गी बाबू पुर्णकालिन रूप से 'बहुसंख्यक चिढाओ कोष्ठ ' के सर्वेसर्वा होंगे। 
मैं -वाह परिवर्तन तो भला है। 
दोस्त -और अशोक चौहान को महाराष्ट्र अध्यक्ष पद से हटाकर नही पश्चिम भारत का अध्यक्ष बनाया जाएगा।  यह एक बड़ा परिवर्तन है कि अब भारत में चार क्षेत्र के नए और  अध्यक्ष होंगे।  

मैं -ग्रेट थिंकिंग !
दोस्त -हाँ और कपिल सिब्बल को ' उन्हें पटावो कोष्ठ ' का अध्यक्ष बनाने जा रहे हैं हम 
मैं -' उन्हें पटावो कोष्ठ ' 
दोस्त -हाँ जब भी विरोधी दलों जैसे सपा , बसपा , ममता , करुणानिधि अदि को भ्र्ष्टाचार या गुळादँगी के आरोप से छुड़ाने हेतु वकील की जरूरत होगी  कपिल सिब्बल विरोधियों के मुफ्त वकील होंगे 
मैं -व्हाट ए इंन्वेटिव आइडिया। 
दोस्त -जी हाँ।  लालू जी को कांग्रेस का पुर्णकालीन सलाहकार बनाया जाएगा 
मैं -अच्छा 
दोस्त - कुछ प्रचार सचिव को संगठन सचिव व संगठन सचिव को संगठन से हटाकर प्रचार सचिव बना दिए जायेंगे। 
मैं - अदला बदली 
दोस्त -हाँ 
मैं -मधुसूदन मिस्त्री सरीखे विशेष सलाहकार क्या करेंगे ?
दोस्त -उन्हें प्रमोट कर नरेंद्र मोदी के लिए नए नए गाली खोजने का  काम दे दिया जाएगा 
मैं -मस्त विचार 
दोस्त -बस ऐसा कुछ करने के रयूमर्स चल रहे हैं कांग्रेस में 
मैं - लौंग लिव राहुल , लौंग लिव कांग्रेस , लॉन्ग लिव नरेंद्र मोदी