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Thursday, March 23, 2017

चुनाव हारने पर हार -दर्द नाशक दवाएं

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चुनाव हारने पर हार -दर्द नाशक दवाइयां  
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  चबोड़ , चखन्यौ , ककड़ाट  भावानुवाद  :::   भीष्म कुकरेती    
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एक दैं भूतपूर्व चुनाव आयुक्तन वैकि अम्पायरिंग से दुखी राजनैतिक नेताओं से ब्वाल छौं बल , " मि त तुमर  आइना छौं। मि त वी दिखांदु जु तुम छंवां।  जु अपण मुख पर पिम्पल्स दिखणा छंवां  त मैं पर भगार (लांछन ) नि लगावो बल्कणम क्लियरसिल मल्लम खरीदो। "
पर चुनवा अधिकार्यूं तै पता नी चुनाव हरण कथगा दर्दनाक हूंद , कथगा पीड़ादायक हूंद , कथगा बेज्जती दायक हूंद।  अचकाल तो हारणो पर्यायवाची वास्ता एक नयो  शब्द हिंदी शब्दकोश तै मिल गए - राहुल गांधी. 
चुनाव आयुक्त तै गाळी दीण , चुनाव आयुक्त पर जोर शोर से भगार लगाण , चुनाव आयुक्त की निष्पक्षता पर प्रश्न चिन्ह लगाण भारत मा  चुनाव हारणो दुःख हरणो परम्परागत दवा दारु च।  जब बि भूतकाल मा भाजपा हरदि छै तो वा बि विशुद्ध भारतीय परम्परा निभाणम पैथर कत्तै नि राई अर अपण चुनाव हारणो ठीकरा चुनाव आयुक्त का मुंडम फोड़णम कत्तै नि शरमांदी छै। अबक दै बारी च मायावती , अखिलेश यादव, कजीरवाल  व हारक्षेत्र का सम्राट  राहुल गांधी की पलटन की। 2007म मायावती से हारणो बाद  मुलायम बाडान  चुनाव आयोग का सेक्युरिटी पर ही सवालिया निशान लगै दे छौ। बहिन  मायावती  इंजीनियरिंग मा हमेशा अग्वाड़ी रौंदी तो हार का दुःखभंजन का वास्ता वीन एक नै दवा ख्व्वाज - EVM का अस्तित्व पर सवालिया निशान।  भुला कजीरवालन बि बहिन मायावती की सकासौरी कार अर EVM की जगा कागज पर मुहर लगाणो पैरवी कर दे।  याने जब जब हारो तब तब चुनाव आयोग की ऐसी तैसी अर जब जीतो तब अपणी लाल करो।  तब जब कजीरवाल प्रचण्ड बहुमत से जीत  तो वैन अल्लाह तै शुक्रिया कार अर अब हार गे तो EVM की वजह से हार।  हाँ यदि टी सेशन आज हूंदा तो कागजी वोटिंग  पत्र की दलील पर ऊंन बुलण छौ - अच्छा तो तुम चाँदवां कि मि राजनीतिज्ञों तै डाका डालणो इजाजत दे द्यूँ क्या ? 
ध्रुवीकरण या पोलराइजेसन बि हारणो दुःख -दर्द , डॉ  भुलाणो एक मल्लम च।  जब भाजपा हरदी छै तो मुस्लिम वोटरों पोलराइजेसन भाजपा का वास्ता हार का गम कम करणो दवा छै अब राहुल गांधी ब्रिगेड का वास्ता भाजपा द्वारा पोलराइजेसन चुनावी   हार का कष्टकारी दर्द निवारक , दवा दारु च। 
जब 2012 मा बहिन मायावती हार तो वीन बोली बल सपान जनता तै ख्याली पुलाव से  बहकायी अर अब हार्यूं जुवारी अखिलेश बुलणा छन बल नरेंद्र मोदी का भकलौंणम जनता ऐ गे।  अखिलेश का अनुसार जनतान काम तै ना खोखला भासणो तैं महत्व दे।  उन दबी जुबान म पंजाब का भाजपायाइ -अकाली बि बुलणा छन बल पंजाब की जनता अरमिंदर सिंग की भकलौंण मा ऐ गे अर हमर कर्यां  काम तै बिसरी गे।  दूसरै भकलौंण बि चुनावी हार का दर्द मिटाणो एक मिट्ठी दवा च। 
विरोध्यु पर धनबल , बाहुबल अर दारुबल का अभियोग बि चुनावी हार भुलाणो एक रामबाण च। 
जितीं पार्टी द्वारा खुलेआम आचार संहिता  का उल्लंघन नामक भगार, लांछन , अक्यूजेसन  बि हार  दर्द निवारण की एक दवा च।  
तो आज हम दर्शक नेताओं से चुनावी हार का डीआरएस नाशक नई नई दवाओं का नाम सुणणा छंवाँ अर मजा लीणा छंवां।  

आपन कु कु हौरि दवाओं नाम सूण ?  

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Copyright@ Bhishma Kukreti , Mumbai India ,  /19 3 / 2017 
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल हौंस , हौंसारथ , खिकताट , व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं।

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श्री कुलानन्द भारतीय जी की मृत्यु और गढ़वाली साहित्यकारों द्वारा अपनों की ही अवहेलना

भीष्म कुकरेती 
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               गढ़वाली भाषा के विकास के मध्य युगीन कवि स्व श्री कुलानन्द भारतीय जी का देहावसान 9 जनवरी दिल्ली में हुआ किन्तु मुझे भी कल  ही पता चला की वरिष्ठतम कवि अब इस दुनिया में नही रहे।  उनके मुंडित -कुटुंब की नातिन श्रीमती शोभा कोटनाला ने मुझे यह दुखद समाचार कल मेल से दिया।  
  वास्तव में सन 2009 -10 में मैंने गढ़वाली कवियों के बारे में लिखना शुरू किया तो मैंने इधर उधर से पता लगाया और मुझे उनके बारे में सूचना मिली कि श्री कुलानन्द भारतीय जी अब भग्यान हो गए हैं।  मैंने इंटरनेट में अंग्रेजी लेख में उनके Late  Kulanand  Bhartiya लिख दिया।  श्रीमती शोभा कोटनाला का मेल आया कि श्री भारतीय जी ज़िंदा हैं।  श्रीमती कोटनाला ने ही बताया कि जन्म से वे भारद्वाज थे किन्तु कभी भी उन्होंने जाती नही लिखी। 
और अब इतनी देर बाद हमे पता चला कि सिंह युग के स्तम्भ नही रहे और दुःख यह है कि किसी भी गढ़वाली साहित्यकार को नही पता कि भारतीय जी हमारे मध्य नही रहे।  स्व जग्गू नौडियाल की मृत्यु का समाचार भी किसी गढ़वाली साहित्यकार ने नही दिया था अपितु उनकी मृत्यु के बाद मैंने उनसे contact किया तो सूचना उनके परिवार से मिली। प्रश्न यह उठता है हम नई पीढ़ी के साहित्यकार अपने पुरानी पीढ़ी की अनदेखी क्यों करते हैं 
श्री  कुलानन्द जी को उनके खण्डकाव्य 'डौळया' के लिए गढ़वाली काव्य में जाना जाता है।     
------------------------------22 फरवरी 2017 -------------

Kulanand Bhartiya: A politician and Asian Garhwali Poet of Story oriented long Poetry  

Critical and Chronological History of Modern Garhwali (Asian) Poetry – 40

                    Literature Historian:  Bhishma Kukreti
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           Kulanand Bhardwaj Bhartiya is a multitalented personality. Most of the Garhwalis know late Kulanand Bhartiya as famous Garhwali social worker and politician of Delhi. Kulanand Bhartiya was representing Shaktinagar region of Delhi as politician.
            However, Kulanand Bhartiya has been publishing his poems in regional periodicals. Critics praise his famous storied long poem  (Khand Kavya ) ‘Daulya’ for his story narration and subject of discussion on the so called benefits of migration and to search employment in Garhwal only. 
Kulanand Bhartiya was born in a Himalayan village Jamni, Malla Salt of Kumaon border of Garhwal on 24th May 1926. 
              Kulanad is famous in Garhwali literature for his Khandkavya (storied long poem) ‘Daulya’. The poems are in lyric form and are very pleasure some. The story surrounds two illiterate friends of a Garhwali village who come to Delhi in search of job. One of two takes job in different hotels. Another fellow gets job as butler with a learned professor. This fellow with professor study in night schools and become manger with a private firm after gaining higher education through night schools. Time comes, when the illiterate fellow wants to marry his daughter with the son of his friend but the educated fellow goes to village for marrying his son that there would be link with Garhwal.
           Small epic ‘Daulya’ is effective so many variables between the life of cities and villages, the changing psychology of villagers towards working in the village, the desire of village youth for work in cities and their escaping psychology for easy works available in villages. The poet depicted successfully the life and confusion, confrontation, frustration of villagers and city workers simultaneously in ‘Daulya’.
According Bahuguna (1981) , Kualanand Bhartiya uses imagery tool in depicting geography of Garhwal and simple Salani dialects in his poetry.

काळी  को रैबार 

रचना --कुलानन्द भारतीय (1926 , जामणी सल्ट दुशांत) 

काळी  द्याखनौऴया राम मालुम ह्वेई।  दिल्ली जाम 
दौड़ी दौड़ी वख काळी आई घास काटणु छोड़ आई 
आवाज वींल नौऴया थैं देइ द्यूरा !   ऊँथैं जाणदा ह्वैला। 
दिल्ली  ऊँथैं जरूर पैला म्यारु रैबार भेजी दियां 
भली  समझैक बोली दियां खामू पीमू रमू यख 
द्वी साल ह्वैगे तुम नि आया ब्याऊ कैरीक क्या मिल पाया।  
दिन रात मीत कटदू घास ब्वै बाब तुमरा नि गडदा बाच 
दड़िमा की डाळी फूली ग्याई आमूं की डाळी पर बौर आई 
सरसों खेती फूली ग्याई पर मेरी दुनिया बांजी रै ग्याई। 
द्यूरा ! ऊंमा बोली दियां ये साल घौर जरूर अयाँ 
चिट्ठी पत्री भेजदी रयां खयाँ पियाँ भलीक रयाँ 
कातिग तुम घर अयाँ मंगसिर मिथैं दिल्ली लिजैंयाँ   


साभार --शैलवाणी अंग्वाळ )
Copyright @ Bhishma Kukreti Mumbai, 2016

Monday, February 13, 2017

शूद्रक का विदूषक याने हिंदी फिल्मों का महमूद , ओम प्रकाश शर्मा का कैप्टन हमीद

Satire and its Characteristics, Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire,  व्यंग्य परिभाषा, व्यंग्य  गुण /चरित्र
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  शूद्रक का विदूषक याने हिंदी फिल्मों  का महमूद , ओम प्रकाश शर्मा का  कैप्टन हमीद 
                      (संस्कृत नाटकुं मा हास्य व्यंग्य )  
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    (व्यंग्य - कला , विज्ञानौ , दर्शन का  मिऴवाक  : (   भाग - 24   ) 

                         भीष्म कुकरेती 
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 शूद्रक नामी गिरामी प्राचीन भारतीय नाटकोंकारों  मादे एक प्रमुख  नाटककार माने जान्दन। शूद्रक एक राजा व नाट्यलेखक छ्या (सुकुमार भट्टाचार्यजी  , विश्वनाथ बनर्जी ) । यद्यपि शुकध्रक की जीवनी बाराम भ्रान्ति ही च।  
शूद्रक का रच्यां मृच्छकटिकम , वासवदत्ता  अदि तीन नाटक माने जान्दन। 
 शूद्रकन बि अपण नाटकुं  मा कालिदासौ तरां हास्य अर व्यंग्य उत्पति करणो बान विदूषक को सहारा ले।  कालिदास का या अन्य प्राचीन संस्कृत  नाटकुं विदूषक जख मन्द बुद्धि , लालची , खाउ हून्दन तो शूद्रक का मृच्छिकटिकम का विदूषक राजा का सहचर , अनुशासनयुक्त , अफु पर काबु  करण वळ अर चतुर च।  हाँ वाक्पटुता अर अलंकार प्रयोग दुइ प्रकार का विदुषकुं चारित्रिक गुण छन।  शूद्रक की या विदूषक चरित्र की परिपाटी  हिंदी फिल्मुं  मा सन 1970 तक राइ तो  ओम  प्रकाश शर्मा  सरीखा हिंदी जासूसी उपन्यासकारों न बि अपणै। 
   
 मृच्छकटिकम कु पंचों  अंक मा वसन्तसेना द्वारा ब्राह्मण  चारुदत्त तै भोजन दीणम उदासीनता का प्रति मैत्रेय नामौ विदूषक कसैली , कांटेदार , कड़क टिप्पणी  उपमा अलंकार या कहावतों से करद -
--------------"बगैर जलड़ो कमल , ठगी  नि करण वळु बणिया , सुनार जु चोरी नि कारो ,  बगैर  घ्याळ -घपरोळ  की ग्रामसभा की बैठक  , अर लोभहीन गणिका मुश्किल से ही ईं मिल्दन। " -----
पंचों अंक मा विदूषक चारुदत्त तै हास्य व्यंग्य रूप मा सलाह दीन्दो -
--------"गणिका जुत्त पुटुक अटक्यूं गारो च जैतै भैर निकाळण  बि मुश्किल ही हूंद "  -----
मृच्छकटिकम नाटक का खलनायक च शकारा अर वैक  दोस्त च विट जैक नौकर च चेत। यी चरित्र अलग अलग बोली -भाषा वळ छन अर  प्राकृत याने स्थानीय भाषा प्रयोग करदन ।  (तिलकऋषि ) 
शूद्रकन प्राकृत अर संस्कृत का प्रयोग हास्य -व्यंग्य उत्तपन करणो बड़ो बढ़िया प्रयोग कौर।  मृच्छकटिकम मा कल्पना, उपमा  अर मुहावरों मिळवाक्  से तीखा व्यंग्य करे गे। 

शूद्रक की शैली अनुसार ही हिंदी मा महमूद , जॉनी वाकर जन हास्य कलाकारुं से काम लिए गे तो जासूसी उपन्यासकार ओम प्रकाश शर्मा का कैप्टन हामिद बरबस शूद्रक रचित मृच्छकटिकम  का मैत्रेय चरित्र की याद  दिलांद। 



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8 / 2/2017 Copyright @ Bhishma Kukreti 

Discussion on Satire; definition of Satire; Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire,Verbal Aggression Satire; Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire, Words, forms Irony, Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire,Types Satire;  Games of Satire; Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire,Theories of Satire; Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire,Classical Satire; Censoring Satire; Sanskrit Drama by  Shudraka's Vidushak &  Satire,Aim of Satire; Satire and Culture , Rituals
 व्यंग्य परिभाषा , व्यंग्य के गुण /चरित्र ; (संस्कृत नाटकों में  हास्य व्यंग्य )  व्यंग्य क्यों।; (संस्कृत नाटकों में  हास्य व्यंग्य )व्यंग्य  प्रकार ; (संस्कृत नाटकों में  हास्य व्यंग्य ) व्यंग्य में बिडंबना , व्यंग्य में क्रोध , व्यंग्य  में ऊर्जा ,  व्यंग्य के सिद्धांत , व्यंग्य  हास्य, व्यंग्य कला ; व्यंग्य विचार , (संस्कृत नाटकों में  हास्य व्यंग्य )व्यंग्य विधा या शैली ,(संस्कृत नाटकों में  हास्य व्यंग्य ) व्यंग्य क्या कला है ? (संस्कृत नाटकों में  हास्य व्यंग्य )   

कालिदास साहित्य मा हास्य -व्यंग्य

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                कालिदास साहित्य मा हास्य -व्यंग्य 
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    (व्यंग्य - कला , विज्ञानौ , दर्शन का  मिऴवाक  : (   भाग - 23    ) 

                         भीष्म कुकरेती 
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महाकवि कालिदास संस्कृत का नाटक शिरमौर छन। ऊंको महाकव्य , गीतों में प्रतीकों से सटीक बिम्ब बणदन, कालिदासन शास्त्रीय शैली अपणाइ।  कालिदास का नाटकुं माँ चरित्र अपण पद अर जाती का हिसाबन व्यवहार करदन तो  कालिदास का नाटकुं माँ     
हास्य -व्यंग्य करणो काम विदूषक  /भांड करदन।  किन्तु विदूषक  का हास्य बि परिष्कृत हास्य व्यंग्य च। बलदेव प्रसाद उपाध्याय (संस्कृत साहित्य का इतिहास , 1965 , शारदा मन्दिर प्रकाशन ) लिखदन बल  कालिदास का कवितौं माँ हास्य व्यंग्य पर्याप्त मात्रा माँ च और उंका नाटकुं मा वीम का सिर बि दर्शकों तैं हंसाण मं कामयाब च , हास्य च तो व्यंग्य बि ऐई जांद।   गोविंदराम शर्मा (संस्कृत साहित्य की प्रमुख प्रवर्तियाँ, 1969  ) लिखदन की कालिदास का हास्य प्रयोजन बि श्रृंगार कारस का अनुकूल च।. 
                      जे  . तिलकऋषिन अपण एक लेख ' THE IMAGES OF WIT AND HUOUR IN KALIDAS'S AND SUDRKA'S DRAMAS ' मा  कालिदास अर शूद्रक का नाटकों माँ व्यंग्य की पूरी छानबीन अर व्याख्या कार। कालिदास कृत अभिज्ञान शाकुंतलम का रूपान्तरकार विराजन बि कालिदास कृत ये नाटकम हास्य व्यंग्य का कथगा इ उदाहरण देन। 
अनन्तराम मिश्र 'अनन्त ' अपण ग्रन्थ 'कालिदास  साहित्य और रीति काव्य परम्परा (लोकवाणी संस्थान , 2007 , पृष्ठ 297 ) मा लिखदन बल 'हास्य -व्यंग्य क्षेत्र में रीतिकवि कालिदास से अधिक सफल हैं। यद्यपि कालिदास ने नाटकों में विदूषक के माध्यम से हास्य रस उद्भावना के  विभिन्न प्रयास किये हैं तथापि उनमे हास् भाव रीतिकाव्य के जैसे स्फुट और विशद नही हैं ' ।
सुषमा कुलश्रेष्ठ (कालिदास साहित्य एवं संगीत कला, 1988  ) मा बथान्दन बल कालिदास साहित्य मा हास्य भरपूर च (भरत कु नाट्य शास्त्र माँ    हास्य माँ ही व्यंग्य समाहित च ) .  
कालिदास का विदूषक अंक  मा हास्य व्यंग्य पैदा करणो बाण कालिदासन अलंकार , उपमाओं को बढ़िया प्रयोग कर्यूं च। विदूषक की भाषा में अपभ्रंश व प्राकृत शब्दावली प्रयोग हुयुं च। 

विक्रमोर्वशीय का तिसरो अंक मा विदूषक का भोजन की कल्पना व्यंग्य को बहुत सुंदर उदाहरण च जब भोजन व चिन्नी  -मीठा प्रेमी प्रिय  विदूषक ' चिन्नी ' की याद  माँ चन्द्रमा की  तुलना  चिन्नी -पिंड से करद (ही ही भो खांडमोदासस्सिरियो उदीदो रा। ... )   । 
'मालविकागणिमित्र' मा बि विदूषक का हाव भाव व वार्तालाप हास्य -व्यंग्य पैदा करद ( तिलकऋषि) 
शकुंतलम (दुसर अंक ) मा बि विदूषक का भाव भंगिमा , वार्ता से हास्य व्यंग्य पैदा हूंद। विदूषक का वार्तालाप शब्द अर मच्छीमार का शब्द सामयिक प्रशासन अर समाज पर व्यंग्य  पैदा करदन।  
कालिदास का सभी नाटकों में हास्य व्यंग्य उतपति का वास्ता विदूषक ही मुख्य चरित्र च। कालिदास का नाटकुं मा मुख्यतया   उपमा अलंकार का प्रयोग हास्य -व्यंग्य उत्पन करद।   


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7 / 2/2017 Copyright @ Bhishma Kukreti 

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पँचतन्त्र मा हास्य व्यंग्य

Satire and its Characteristics, Panchtantra, व्यंग्य परिभाषा, व्यंग्य  गुण /चरित्र
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पँचतन्त्र मा हास्य व्यंग्य 
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    (व्यंग्य - कला , विज्ञानौ , दर्शन का  मिऴवाक  : (   भाग -  22  ) 

                         भीष्म कुकरेती 
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पण्डित विष्णु शर्माs  रच्यूं कथा खौळ (संग्रह ) पँचतन्त्र आज भी उपयोगी च , लाभकारी च अर प्रासंगिक च।  कथा चूँकि शिक्षा दीणो रचे गै थै त इखमा निखालिश व्यंग्य की गुञ्जैस कमी च। 
फिर बि पँचतन्त्र मा व्यंग्यक झलक झळकां मिलदी च।  दंभ , मिथ्याभिमान, लोलुपता , नारी दगड़ विश्वासघात आदि जन व्याख्यानों में कम ही सै व्यंग्य तो छैं इ च (सत्यपाल चुग , 1968 , प्रेमचन्दत्तरो उपन्यासों की शिल्पविधि ).  
Leonard Feinberg न अपण ग्रन्थ  'Asian Laughter  (पेज 426 ) मा पँचतन्त्र का कथाओं मा हास्य व्यंग्य ढूंढ।Leonard Feinberg का हिसाब से संसार तै जानवरों आँख से दिखण अपण आप मा व्यंग्य च अर जानवरों चरित्र से मनिखों मनोविज्ञान व्याख्या करण बि एक तरां को व्यंग्य ही च। 
पँचतन्त्र माँ सूक्ष्म हास्य या व्यंग्य च अर वो  झळकां ही च (Meena Khorana , 1991 , The Indian subcontinent in literature for children and Young)  
Mathew Johan Hodgart अपणी किताब  Die Satire ( पृष्ठ 127  मा )लिखदन कि पँचतन्त्र या अन्य पुरणी कथाओं मा कथा उद्देश्य अपणा आप मा व्यंग्य च अर  फिर जानवरों द्वारा कथा तै जीवन्त बणये जाण बि त व्यंग्य को एक रूप च।   
सम्मेलन पत्रिका  19 77 माँ बि इनि बोले गे बल पँचतन्त्र मा अपरोक्ष रूप से व्यंग्य मिल्दो जखमा एक पात्र अर्जुन तरां संशय से भर्यूं रौंद अर दुसर चर्तित्र कृष्ण तरां उपदेश दीन्दो वास्तव मा यु सुकराती आइरोनी च। 

पँचतन्त्र मा चरित्रों नाम गुण बि बथान्दन अर यो भि व्यंग्य को एक भाग च।  यही शील गढ़वाली नाटक का शिरमौर भवानी दत्त थपलियालनन अपण द्वी नाटकों मा बि अपणाइ।  नाम से हास्य व्यंग्य पैदा करण एक व्यंग्य  शैली च  

@भीष्म कुकरेती

Sunday, January 29, 2017

Forest Administration by Ramsay

Exploitation of Forest Resources-4

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                            British Administration in Garhwal   -105
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History of British Rule/Administration over Kumaun and Garhwal (1815-1947) -122
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            History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -959
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                              By: Bhishma Kukreti (History Student)

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                One of various steps for reforming forest administration by Kumaon commissioner Captain Henry Ramsay was forest protection.
 Atkinson called Ramsay as first conservator of Uttarakhand.
  Ramsay stopped offering old system of offering forest on contract and started new system.  Henry Ramsey stopped farming inside forests. Ramsey offered land to those were farming in hill forests in Bhabhar or Haridwar to Baramdev region. That was first appreciable step in protection for forests.
 By 1867, Ramsey displaced Goth (a temporary camp for animals) from forest of Haldwani to   Sharda River. Ramsey desired for displacing all ‘Goth’ from Garhwal forests.
   Ramsey started branding / indentifying by the officials the trees to be cut by contractors. The government officials used to hammer on trees to be cut.  By displacing Goth from forests was also for decreasing forest fire in summer season. By that there were difficulties for Goth masters but was fine for forest protection. Ramsey started cultivating new tress too. There was increase in forest revenue and there was net saving for Rs 15 lakhs in 1867-68 after all expenses (Atkinson page 853).


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Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com 27/1/2017
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -960
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*** History of British Rule/Administration over British Garhwal (Pauri, Rudraprayag, and Chamoli1815-1947) to be continued in next chapter
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(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
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References  
 1-Shiv Prasad Dabral ‘Charan’, Uttarakhand ka Itihas, Part -7 Garhwal par British -Shasan, part -1, page- 287-312
 2- Atkinson, Himalayan Districts, Vol.-1 page 840-915

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History of British Rule, Administration , Policies, Revenue system,  over Garhwal, Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule , Administration , Policies Revenue system  over Pauri Garhwal, Udham Singh Nagar Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Chamoli Garhwal, Nainital Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Rudraprayag Garhwal, Almora Kumaon, Uttarakhand; History of British Rule, Administration, Policies ,Revenue system  over Dehradun , Champawat Kumaon, Uttarakhand ; History of British Rule, Administration, Policies, ,Revenue system  over Bageshwar  Kumaon, Uttarakhand ;
History of British Rule, Administration, Policies, Revenue system over Haridwar, Pithoragarh Kumaon, Uttarakhand;

छुमा बौ एक प्रतीकात्मक नाम है

- भीष्म कुकरेती
आज मेरे पुराने मित्र व पाठक उद्योगपति श्री दयानंद द्विवेदी जी ने छुमा बौ गीत की फरमायश की मै कोशिस करूंगा कि छुमा बौ से संबंधित सभी गीत इंटरनेट पर प्रस्तुत करूँ।
प्रसिद्ध इतिहासकार डा. शिव प्रसाद नैथाणी ने 'उत्तराखंड लोक संस्कृति और साहित्य ' लेख में छुमा बौ पर अपनी राय दी
उत्तराखंड के लोक गीतों कि नायिकाओं के नाम बहुत कुछ उनकी सामयिकता तत्कालीन युग का परिचय भी दे देते हैं
कत्य्री गाथा में वह उदा है, जोत्रमाला है, मोती माला है , इजुला, बिजुला और राणी जिया है .
उधर उत्तर मध्य काल में उसके नाम हैं सुरु कुमैण, मोतिया, जसी , मलारी और राजुला, किन्तु राजुला से पहले सुरजी हुए थी
रमकणि, छमकणि, बीरू कसी वूंग, कहती मीठी साली होली दाख दाड़िम जसी ....
और इधर पिछली सदी में पहले दौंथा थी, पुरुष 'मेरी दौंथा कथैं गे ' कहकर ढूंढते थे
इस बीच मधुलि भी तो आ गयी थी
'खेली जाली होली , मदौली मदुली सबि बुल्दन कन मदुली होली'
दौंथा के बाद तो छुमा प्रसिद्ध हुयी किन्तु वा तो छुमा बौ के नाम से प्रसिद्ध हो गयी , छुमा बौ कद में कुछ छोटी है , नारंगी सी दाणीसी, गोल मटोल सी, और रंग नारंगी जैसा है, छुमा बौ को पहाड़ी टोपी और मगजी बहुत प्रभावित करती है . भाभी है तो प्रगल्भ भी है इशारा भी करती है
छोटी छोटी छुमा बौ टु नारंगी सी दाणी
रूप कि आन्छरी छुमा, जन ऐना चमलांद
गुड़ खायो माख्योंन , सरा संसार गिच्चन खांदो
तू खांदी आंख्योंन
पीतल कि छनी, पीतल कि छनी मुलमुल हंसदी छुमा
दै खतेणि जन
रोटी क कतर, रोटी क कतर, नथुली को कस लगे
तेरी गल्वाड़ी पर
झंगोरा कि बाल, झंगोरा कि बाल छुमा परसिद ह्व़े गे
सरा गढ़वाल सरा गढ़वाल
छुमा ने प्रसिद्ध तो होंना ही था जिस नथुली के कस कि बात गितांग कर रहा है उस नथुली को हल्का सा हिलाकर छुमा ने अपने प्यार कि स्वीकृति भी दे दी थी पर बुद्धू बहुत देर बाद समझ पाया
टोपी कि मगजी टोपी कि मगजी
नथुली न सान करे तिन णि समझी
सुनने में आया कि बाद में छुमा बौ लछमा के नाम से प्रसिद्ध हुयी
आजकल तो छुमा बौ हिंदी फिल्मो से निकल कर गढ़वाल में बसने लगी है और छुमा बौ का गुलबन्द गुम हो ग्या है नथुली हर्च गयी है और छुमा बौ मोबाइल में समाने को आतुर है