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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Monday, November 3, 2014

जरूर आप अध्यापक ही ह्वेल्या यदि

इना उना बिटेन ::: भीष्म कुकरेती 


यदि आप सुबेर सुबेर , श्याम दैं या कखिम बि अपण घरवळि समिण गप मारदा कि तुमकुण इथगा ज्यादा छ्वारों ब्वे -बुबाऊं रोज फोन आंदन। 
यदि तुमर रिस्तेदार आपकी जीमण मा शामिल नि हूंदन किलैकि वीं जीमण मां तुमर मित्र मास्टर ट्रांसफर , डीए , टीए की ही छ्वीं लगांदन। 
आप अपण बिल्डिंग मा या गाँ मा जुपुक जुपुक इन हिटदा /घुमदा जन बुल्यां तुम परीक्षा हाल मा छंवां अर परीक्षार्थी द्वारा नकल करण रुकणा छंवां। 
तुम ऊँ सब्युं से चिढ़दां जु चुइंगम खाणा रौंदन। 
यदि तुम अपण दिन भरौ दिनचर्या सुणाणो हुवाँ अर तुमर घरवळि अखबार पढ़ण मा व्यस्त हो। 
आप अपण चाबी , नेम प्लेट , कुर्सी , किताबुं  मा सलीका से अपण नाम लिखदाँ तो अवश्य ही आप अध्यापक छन। 
जब क्वी कोचिंग या ट्युसन की काट कारो तो आप वै तैं भद्र या अभद्र गाळी दीण शुरू कौर दींदा। 
यदि आप अपण घरवळि बणयीं  रुटि मा दोष ढूँडदा कि रुटि गोळ नी च तो आप कला अध्यापक ही ह्वेल्या। 
यदि आप ब्यौ -बरातिक जीमण की प्रतिक्रिया मा ब्वालो कि पूरी आयताकार , त्रिभुजाकार छन या छे तो आप अवश्य ही ज्यामिति  अध्यापक छन। 
आप तैं क्वी पूछो कि आजौ हाल क्या छन या आपक हाल क्या छन अर आपक जबाब हो कि आज सूरज तीन मिनट जल्दी आई , अदा सेंटीमीटर बरखा ह्वे तो आप भूगोल अध्यापक ही ह्वेल्या। 
यदि आपन अपण समाज मा सही जबाबुं  तैं बदतमीजी मा दियां टिप्पणी मानो तो। 
यदि आपक हथ खड़िया से भर्यां ह्वावन तो आप प्राइमरी अध्यापक छन अर यदि प्राइमरी अध्यापक ह्वेक बि चौक से हथ नि भर्यां ह्वावन तो आप गढ़वाल का कै स्कूलम मास्टर छंवां याने एक छात्र द्वी मास्टर !
आपक पैंट पर खड़िया  , धूळ लगीं हो तो आप प्राइमरी टीचर छन। 
आप नरेंद्र मोदीक भाषणो मादे व्याकरणीय गलती खुज्यांदा 
जब आप सोनिया गांधीक भाषण सुणदा अर बुल्दा जैन सीं तैं हिंदी सिखाई उ/वा  अवश्य मद्रासी होलु या ह्वेलि   

  Bhishma Kukreti  1  /11 /2014       
*लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं। 


                                                              CLEAN INDIA , स्वच्छ भारत !
                                                                                   
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ऑनलाइन टूर व्यापार में कीवर्ड ऑप्टिमाइजेसन का महत्व

ऑनलाइन टूर व्यापार में कीवर्ड ऑप्टिमाइजेसन का महत्व 

                            Importance of Keyword Optimization in Tourism Online Marketing 

        (Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series--97  

                                                      
उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 97   

                                               लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  विक्री प्रबंधनविशेषज्ञ ) 

किसी भी ऑनलाइन व्यापार में कीवर्ड ऑप्टिमाइजेसन से  सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेसन की प्राप्ति होती है। 
 कीवर्ड ऑप्टिमाइजेसन का अर्थ होता है उन शब्दों की खोज करना जिन्हे ग्राहक मुख्य रूप से गूगल सर्च /सर्च इंजिन में  सर्च /खोज करते हैं ; उन शब्दों का विश्लेषण करना और अपने वेब साइट में प्रयोग करना जिससे की वांछित सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेसन प्राप्त हो सके याने सर्च में अपनी वेब साइट सबसे प्रथम पृष्ठ या दूसरे पृष्ठ में आ सके। 
 कीवर्ड ऑप्टिमाइजेसन कोई एक दिन का काम नही होता है अपितु ऑनलाइन व्यापार हेतु कर वक्त का कार्य है। हर समय ऑनलाइन व्यापारी को कीवर्ड के बारे में संवेदनशील होना आवश्यक है। 
कीवर्ड की जानकारी व्यपारियों ही नही जो भी ऑनलाइन में पोस्ट करता है जैसे लेखिका या लेखक आदि उसे भी कीवर्ड  जानकारी होनी चाहिए. 
कीवर्ड का हिंदी अनुवाद है शब्दों की चाभी याने वे चाभी सम्य शब्द जो  सर्च इंजिन या गूगल सर्च का ताला खोलते हैं. वास्तव में ये शब्द वे होते हैं जिन्हे ग्राहक अपनी सर्च /खोज करते समय गूगल सर्च /सर्च इंजिन में टाइप करते हैं. 
जैसे कि यदि किसी यूरोप वासी को भारतवर्ष में यात्रा करनी है तो अवश्य वह गूगल सर्च /याहू सर्च आदि में Tour in India टाइप करेगा . तो ये दो शब्द विदेशी टूरिस्टों के हिसाब से की वर्ड हैं। 
माना कि किसी भारतीय को सुहागरात मनाने किसी पहाड़ी स्थान पर जाना है तो वह Honeymoon hill station टाइप कर सकता है।  यदि अधिसंख्य ग्राहक Honeymoon hill stationटाइप करते हैं तो ये शब्द की वर्ड कहलाये जाएंगे।  स्थान , वर्ग व समय के हिसाब से प्रत्येक व्यापार या ब्लॉग के विशेष की वर्ड होंगे।   की वर्ड ग्राहक  सर्च के समय टाइप करते हैं और  तरह गूगल में इन की वर्ड के सहारे कई पेज खुल जाते हैं. प्रत्येक ऑनलाइन व्यापरी चाहता है कि उसका पेज प्रथम पेज पर खुले।  सर्च इंजिन के प्रथम पेज पर वेब साइट का आना ही सर्च इंजिन ऑप्टिमाजेसन है और इस प्रक्रिया में की वर्ड ऑप्टिमाइजेसन (वेब साइट के विषयों में ग्राहक द्वारा 'की वर्'ड का प्रयोग )  का बड़ा महत्व है।
                   SEO की वर्ड ऑप्टिमाइजेसन के लाभ 
१- सही व विशिष्ठ की वर्ड ऑप्टिमाइजेसन या ग्राहकों द्वारा प्रयोग किये गए शब्दों को वेब साइट में लाने से आपके ग्राहक आप तक पंहुचते हैं। 
उदाहरण- मेरे द्वारा शीर्षक में किये गए शब्द ग्राहक को मेरे लेख से जोड़ते हैं।  यदि कोई ग्राहक उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधनटाइप करेगा तो संभावना है कि मेरा यह लेख गूगल के प्रथम पेज में आ जाय। 
 २-की वर्ड की जानकारी से आप अपने वेब साइट के विषय  में बदलाव कर सकते हैं जिससे कि ग्राहक आप तक पंहुच सकें। 
३- की वर्ड की जानकारी से आप ग्राहकों के व्यवहार की मीमांसा कर पाते हैं। 

                     की वर्ड की खोज 
आपको अपने व्यापार में ग्राहकों द्वारा प्रयोग किये गए की वर्ड की खोज करनी आवश्यक है 
आपको अपने प्रतिद्व्न्दी द्वारा प्रयुक्त की वर्ड की जानकारी होनी आवश्यक है 
गूगल आदि सर्च इंजिन इस प्रकार की खोज करने में समर्थ हैं।
                   की वर्ड का प्रयोग 
निम्न जगहों पर की वर्ड का प्रयोग आवश्यक है 
शीर्षक 
विवरण 
हेडिंग , सब हेडिंग व विषय में 
मैटा टैग में 
फ़ाइल के नामों में 
फिल्म , चित्रों में 
 इन बॉन्ड -आउट बाउंड लिंकिंग पेजों में 
URL में 
           की वर्ड के गुण 
रचनात्मक 
आकर्षक 
विशिष्ठ 
लम्बे पूँछ वाले (विशेषकर शीर्षक )
पर्यायवाची शब्दों में 
                    की वर्ड घनत्व याने एक पेज में कितने की वर्ड आवश्यक हैं ? 

यद्यपि व्यापारियों के लिए की वर्ड घनत्व की जानकारी सलाहकारों से सही  तरह से मिल पायेगी फिर भी उन्हें कुछ ज्ञान आवश्यक है 
किसी भी लेख या फ़ाइल में की वर्ड की गहनता आवश्यक है याने की वर्ड का बार बार दुहराव होना ।  सभी शब्दों में से 2  से 8  प्रतिशत की वर्ड या पर्यायवाची शब्द आवश्यक होते हैं। 
अत्याधिक की वर्ड घातक भी होते हैं क्योंकि सर्च इंजिन इन्हे रोक देता है 
की वर्ड शीर्षक व प्रथम पंक्तियों  में अधिक हों तो लाभकारी होते हैं। 
पेड़ कलिक ब्यापार से अब की वर्ड  ऑप्टिमाइजेसन किया जाता है।  यही कारण है क़ि मेरे याने भीष्म कुकरेती के लेखों में Marketing of Travel, Tourism, Uttarakhand   का दुहराव है किन्तु मेरा लेख गूगल सर्च में प्रथम पेज पर इस की वर्ड प्रयोग से भी नही आता है क्योंकि travel व्यापारियों ने गूगल आदि से की वर्ड खरीद लिए हैं और कम से  चार पेज तक मेरे पेज नही खुलते हैं।   वैसे मेरा भी दोष है कि मुझे सही की वर्ड की जानकारी नही है।
एक उदाहरण की वर्ड समझने के लिए सरल है -
गढ़वाली पाठक गूगल में गढ़वाली कविता /Poetry टाइप नही करता या उसे कविता का लोभ नही है।  जब कि Folk Song टाइप करता है अतः गढ़वाली कवियों को अपने ब्लॉग में Garhwali Poetry and Folk Song को की वर्ड बनाकर प्रयोग करना चाहिए। 

दाळ इथगा ऐड़ाट -भुभ्याट किलै करणी च ?

चबोड़ इ चबोड़म खेल गिंदवा ::: भीष्म कुकरेती 


ब्याळि दाळ जोरूं से रुणि छे , ऐड़ाट -भुभ्याट करणी छे अर भयंकर सोग मा छे। 
मीन पूछ -ये दाळ क्या भंगुल जाम ? किलै इथगा जोरूं से रुणि छे ?
दाळ -ह्यां पैल यी ब्यापरिक अखबारुं भाषा से परेशान थौ अब सि तुम पहाड्यूंन बि दिक कर याल। 
मि -व्यापारिक अखबारु भाषा से तू परेशान ?
दाळ -हाँ ! जब मेरी बुवै हुणि हो त व्यापरिक खबर हूंदी बल उड़द अधिक बिकवाली से उछली असमान में ; जब मेरी निरै -गुड़ै समौ ह्वावो त समाचार छपद बल - ग्राहकों की उदासीनता से उड़द नरम पड़ी अर जब कुटै हुणि हो तो खबर आंद बल अधिक आवक से  उड़द लुढ़की। 
मि -ओहो ! यी व्यापार्युं अपणी आपसै   भाषा च।  त्वे तैं यूँ शब्दों तैं गंभीरता से नि लीण चयेंद।  देख शाही इमाम कु आमंत्रण तैं जन क्वी गंभीरता से नी लीणु च तनि तू यूँ मंडी का गुप्त शब्दों तैं गम्भीरतापूर्बक नि ले. 
दाळ -यां इन शब्द त्वैकुण प्रयोग ह्वावन तब दिखुल मि कि त्वै पर कन्न चिर्री पोड़द धौं ! 
मि -ह्यां ! रुण बंद कौर यी कारोबारी हिंदी भाषा च।  तू अंग्रेजी अखबार पढ़ा कर।
दाळ -अंग्रेजीम कम अन्याय हूंद जब मेरी फसल मंडी मा जांद तो अंग्रेजी अखबार छपदन कि उड़द इज ग्राउंडेड या उड़द इज नौट  शाइनिंग। 
मि -मीन ब्वालना तू कारोबारी भाषाक लंग-लफड़ा मा नि पोड।  इन बता कि बिचारा पहाड्यूं से किलै रुसयीं छे , क्रोधित छे , पहाड्यूं पैथर हथ ध्वेक किलै पड़ीं छे ?
दाळ -अरे  कारोबारी भाषा त सये बि जांदी  किंतु तुम  निकज्जों उत्तराखंडी पहाड्यूं करतूत त बिलकुल असह्य च। 
मि -ह्यां अब त प्रवासी अर निवासी पहाड़ी कुछ करदा इ नि छंवां तो जब  पहाड़ी ही परेशान नि छंवां त त्वै तैं क्यांक दुःख , क्यांक परेशानी , क्यांक अबजाळ (दुविधा ) ?
दाळ -अरे भारत तैं दाळ आयात करण पोड़द त मि तैं बुरु नि लगण ?
मि -इखमा बुरु लगणो बात क्या च जब हम दिवाळि मनाणो वास्ता द्यू -दिया, लक्ष्मी माटो मूर्ति आयत करिक बि नि शर्मांदा तो दाळ इम्पोर्ट करण मा क्यांक शरम , क्यांक लाज , क्यांकि बेज्जती ?
दाळ -तुम हिन्दुस्तान्यूं तैं शरम ल्याज नी च पर हम दाळु तैं त इन्सल्ट फील हूंद कि इण्डिया दाळ इम्पोर्ट करदो। 
मि -ह्यां पर इखमा उत्तराखंड का पहाड्यूं क्या दोष ?
दाळ -पता च ? उत्तराखण्ड  का पहाड़ों माँ कथगा धरती बांज पड़ीं च ?
मि -हाँ , तकरीबन तीन चौथाई खेती लैक पुंगड़ -पटळ बांज पड़ीं छन। 
दाळ -यदि पहाड़ी बांज पड़ीं धरती मा फसल उगावन तो ?
मि -भाषण दीण सौंग हूंद , बुलण सरल हूंद किंतु  करण कठण हूंद।  
दाळ -क्यांक कठण ?
मि -अरे गांऊं मा गूणी -बांदर , सुंगर छन तो फसल पात कनै करे जावो ?
दाळ -वै प्रवासी गढ़वाळी कैतै छै बेबकूफ बणानि ? 
मि -क्या मतबल ?
दाळ -निकज्जा झूठ भौत बुल्दन।  उड़द , गहथ , तोर, मसूर  तैं गूणी बांदर नि खांदन अर सुंगरुँ कामै चीज दाळ नि हूंद। 
मि -तो ?
दाळ -निकज्जा की सोच हुँचि हूंद।  तो क्या तुम पहाड़ी यदि पहाडुं मा दाळ की खेती करिल्या तो भारत तैं दाळ आयात करणै जरूरत बि नि होलि धौं !
मि -ह्यां पर दाळ उगाणो वास्ता आदिमुँ जरूरत नि पड़दी ?
दाळ -निकज्जों तैं बहाना चयेंद। जब तुम रोड , कूड़ बणानो वास्ता मजदूर आयात कौर सकदां तो पंजाब जन खेती वास्ता मजदूर इम्पोर्ट नि कर सकदां क्या ? 
मि -हाँ पर तीन चौथाई लोग तो प्रवासी छन इनमा खेती कनकै ह्वे सकदी ?
दाळ -निकज्जा हमेशा रचनाधर्मिता से भागद।  सहकारिता से खेती नि ह्वे सकदी क्या ?
मि -कनकै ?
दाळ -निकज्जों मा नकारत्मक सोच की भरमार हूंद।  प्रवासी अर पहाड़ वासी सहकारिता से मजदूर बुलावो अर दाळ कि खेती कारो। 
मि -पर ?
दाळ -नकज्जा  किंतु, परन्तु , इन नि ह्वे सकुद आदि का   गुलाम हूंदन।  सहकारिता से या  जमीन लीज पर द्यावो अर पहाड़ों मा दाळ उगाओ। 
मि -पर एक समस्या च।
दाळ -निकज्जो हमेशा समस्याओं बोझ उठैक चलणु रौंद अर समाधानो बड़ो दुसमन हूंद। 
मि -देखो ! हमर इख एक बड़ी दुखदायी समस्या च।  सूण त ले 
दाळ - निकज्जा कहींका बोल !
मि -यदि प्रवासी पहाड़ वास्युं तैं क्वी सलाह मशबरा द्यावन तो पहाड़वासी बुल्दन बल अच्छा ! अब हम तैं मुंबईं -दिल्ली वाळ ज्ञान द्याल ?
दाळ -तो तुम प्रवासी पहाड़वास्युं की सूणो। 
मि -यदि पहाड़वासी प्रवास्युं तैं राय द्यावन तो पता च प्रवासी क्या बुल्दन ?
दाळ -क्या ?
मि -प्रवासी बुल्दन बल अच्छा ! अब यूँ जयूँ -बित्युं आदिवास्युं बात सुणन हमन ?
दाळ -ठीक च।  यदि तुम प्रवासी -वासी  एक दुसर से सहकार नि करिल्या तो कुछ दिन बाद गढ़वाल गढ़वाल्युं नि रालो।  गढ़वाल कै हौरुं ह्वे जाल ! 

Copyright@  Bhishma Kukreti  31  /10 /2014       
*
लेख की   घटनाएँ ,  स्थान व नाम काल्पनिक हैं । लेख में  कथाएँ चरित्र , स्थान केवल व्यंग्य रचने  हेतु उपयोग किये गए हैं। 
                                                                                   
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गंगा सलाण में शिल्पकार डोला पालकी आन्दोलन

भीष्म कुकरेती    



       जब भी कोई बड़ा आन्दोलन छिड़ता है तो साथ में कई स्थानीय सामजिक आन्दोलन भी चलने लगते हैं।
जब भारत व उत्तराखंड में स्वतंत्रता आन्दोलन  रहा था तो उत्तराखंड में भी कई स्थानीय सामजिक आन्दोलन भी उभर कर आये।
छोटे वर्ग के ब्राह्मणों द्वारा सर्यूळ ब्राह्मणों से  कई तरह से प्रतियोगिता में आना और कहीं कहीं बहिस्कार भी । ब्राह्मणों की कई जातियों द्वारा पहली बार हल चलाना भी इसी युग में देखा गया। स्वतंत्रता के एकदम बाद कई जगह कास्तकारों /खैकरो द्वारा उस जमीन को हडपना जिस जमीन पर वे सदियों से खेती कर रहे थे किन्तु मालिकाना हक नही मिल रहा था आदि भी स्वतन्त्रता आन्दोलन की ही देन है।

                             शिल्पकार संबंधी आन्दोलन


 उत्तराखंड में आर्य समाज और  आजादी की लड़ाई में शिल्पकारों में एक चेतना जागरण हुआ कि उन्हें भी मानवीय अधिकार मिलने चाहिए। ब्रिटिश क़ानून और जागरण के कारण शिल्पकारों को विद्यालयों में शिक्षा सुलभ हुयी।
आर्य समाज जनित जनेऊ आन्दोलन तकरीबन हर गाँव में चला। धीरे धीरे सवर्णों  ने शिल्पकारों के जनेऊ पहनना स्वीकार किया।
 गढ़वाल कुमाओं में शिल्पकारों द्वारा एक आन्दोलन बहुत लम्बा चला वः आन्दोलन था 'डोला -पालकी आन्दोलन' . शिल्पकार मनीषी व विचारक विनोद शिल्पकार लिखते हैं कि डोला पालकी आन्दोलन उत्तराखंड के मूल निवासी आर्य शिल्पकार जाति  के लोगों के स्वाभिमान का प्रतीक व  उनके मानवीय अधिकार प्राप्ति का एक ऐतिहासिक आन्दोलन था।

                              डोला पाली आन्दोलन की शुरुवात 

    इतिहासकारों जैसे श्री विनोद शिल्पकार  आदि ने डोला पालकी आन्दोलन सन 1923 से 1947 तक माना जब कि उत्तर प्रदेश विधान सभा ने 'अयोग्यता निवारक अधिनियम ' बिल स्वीकृत किया किन्तु सन 1978 के करीब कुमाऊं का बलेछी काण्ड बताता है कि यह आन्दोलन कहीं अधिक सालों तक चला।  ढांगू पौड़ी गढ़वाल क्षेत्र में  सन 1952 -55 तक कई बार शिल्पकारों को डोला पालकी   से रोका गया। मऴळ (मल्ला ढांगू ) के जोगेश्वर प्रसाद कुकरेती आदियों को कैद भी किया गया था।

               रिवाज था कि शिल्पकार शादी में वर -वधू को डोला -पालकी में नही ले जा सकते थे।
 जबआर्य समाज, स्वतन्त्रता आन्दोलन व  इसाई धर्म परिवर्तन आन्दोलन से 
शिल्पकारों में अपने मानवीय अधिकारों को लेकर चेतना स्फुरण हुआ तो वरु वधू को डोला पालकी में ले जाने का आन्दोलन भी सामने  आया। चूँकि उस समय लेखक ब्राह्मण या राजपूत जाति के ही अधिक थे तो डोला पालकी का क्रमगत नही मिलता।
 श्री  विनोद शिल्पकार ने कुछ घटनाओं का संकलन किया है। डा शिव प्रसाद डबराल ने भी उत्तराखंड का इतिहास (ब्रिटिश काल ) में शिल्पकार आन्दोलन का जिक्र किया है किन्तु विनोद शिल्पकार इसे अपूर्ण व  गलत सूचनाओं के आधार वाले घटनाएँ बताकर खारिज करते दीखते हैं।
          सन 1923 में दुगड्डा के पास बोरगांव से कांडी (पट्टी बिचलोट) में डोला पालकी आन्दोलन हुआ।  सन   1924 में कोरिखाल से बिन्दलगांव की डोला पालकी शिल्पकार बरात पर हमला हुआ. बरात चार दिनों में वापस आई, श्री जयनन्द भारतीय व पंडित अर्जुन देव इस बरात में  शामिल थे
                                                ग्राम गोदी , लंगूर में डोला पालकी कांड 

             2 फरवरी 1929 को श्री पंचम सिंह की पालकी वाली वारात गोदी से बिसोखी जा रही थी। डाडामंडी के पास सवर्णों ने बारात पर हमला क्र दिया। तीन दिन तक बाराती नदी  किनारे बैठे रहे। पटवारी कानूनगो की मदद से बरात बिसोती पंहुची। वापसी पर सवर्णों ने बारात पर हमला किया और डोला पालकी को भेळ में फेंक दिया या कहें तो लूट लिया। 19 दिनों तक बरातियों ने धरना दिया। तब जाकर 21 फरवरी को सरकारी संरक्षण में बरात वापस गोदी पंहुची।

                                      लंगूरी -मैन्दोली क्षेत्र में डोला पालकी आन्दोलन   

                   सन 1933 में लंगूरी मैंदोली क्षेत्र में शिल्पकारों की डोला पालकी बरात पर हमला हुआ और केस निचली अदालत में पंहुचा। निचली अदालत ने सवर्णों के पक्ष में निर्णय सुनाया। किन्तु 
21 फरवरी  1936 को अलाहावाद उच्च न्यायालय ने शिल्पकारों के पक्ष में निर्णय दिया। यह दिन डोला पालकी आन्दोलन का एक सुवर्ण दिन माना जाता है।

                                          
                                          दुगड्डा में शिल्पकार सम्मेलन 


    शिल्पकार जातीय उधार अभियान के तहत डोला पालकी आन्दोलन चला रहे थे तो स्वर्ण इस नये रिवाज के विरुद्ध में शिल्पकारों के डोला पालकी बरात में विघ्न डाल रहे थे। तब शिल्पकारों ने एक विशाल जन सभा का दुगड्डा में किया। आयोजकों ने सरकार को अल्टीमेटम दिया कि यदि डोला पालकी में सवर्णों द्वारा विघ्न को रोका नही गया तो शिल्पकार सत्याग्रह करेंगे।
                    यहीं 24फरवरी 1929 को पांच हजार शिल्पकारों ने इसाई धर्म अपनाने का निर्णय लिया। लेकिन आर्य समाजी नेताओं के समझाने से यह निर्णय समाप्त किया गया। किन्तु यह भी सत्य है कि दुगड्डा के नजदीक बोरगाँव और बिंदलगाँव के कुछ हरिजन इसाई बन ही गये।
                                           तिमल्याणी उदयपुर (यमकेश्वर) डोला पालकी काण्ड 

                 जून 
1939 में तिमल्याणी में शिल्पकारों की डोला पालकी वाली बरात पर सवर्णों ने हमला किया और डोला पर आग लगा दी गयी। पटवारी और कानूनगो की भी कुछ नही चली। तब श्री जया  नन्द भारतीय ने उत्तर प्रदेश के प्रधान मंत्री श्री गोविन्द  पन्त को  भेजा गया। फिर बरात सरकारी संरक्षण में निकाली गयी।
           किन्तु रिवाज टूटने के भय से सवर्णों ने सरकारी नियमों को नही माना और सभी जगह शिल्पकारो के डोला पालकी का विरोध होता  रहा। सन   1940 में ओडगांव (एकेश्वर) की घटना इतिहास में  है जब शिल्पकार शिरोमणि श्री गंगा राम आर्य के नेतृत्व में गैंगी लडकी की बरात जा रही थी तो डोला पर आग लगा दी गयी।

                                            कस्याळी (उदयपुर पट्टी ) डोला पालकी काण्ड 

   जिस जनरेसन का मई हूँ उस युग वालों को कस्याळी कांड की याद अवश्य होगी। मैंने भी बचपन में कस्याळी कांड के बारे में सुना  था। कस्याळी उ . प्र के  .भुत पूर्व मंत्री स्व श्री जगमोहन सिंह नेगी  का पैत्रिक गाँव है।
            जून  1945 के दिन कस्याळी से जिठवा  शिल्पकार युवक की बरात ग्वाड़ी  गाँव जानी थी। हरिद्वार से आर्यसमाजी नेता पंडित वेद  व्रत शर्मा, स्वामी ओम  प्रकाशानंद व  ब्रह्मचारी बालकराम जी भी बरात में थे। दुल्हे को  डोला में जाना था किन्तु आस पास के  गाँवों से सैकड़ों स्वर्ण डोला रोकने के लिए इकट्ठा हो गये थे। इस पर दोनों समुदायों के बीच  हुयी कि गाँव में वर पालकी में नही बैठेगा।
 ग्वाड़ी गाँव में बरात तो पंहुच गयी। वहां भी सैकड़ों की संख्या में आस पास गे गाँवों से स्वर्ण आ गए थे। स्थिति अत्यंत तनावपूर्ण हो गयी थी। स्वर्ण डोला पालकी ही नही। वर पक्ष को वधू झबरी को  नही ले जाने की हठ  बना रखे थे।
फिर यह निश्चय हुआ कि यदि वर पक्ष का हरेक बाराती  पचास पचास रुपया दंड भरेगा तो   वधू गाँव से जा सकेगी। आर्यसमाजी नेताओं ने बात   नही मानी।
 जब झबरी व जिठ्वा की बरात डोला -पालकी में चली तो कुछ नही हुआ। गाँव के बीच में  सैकड़ों स्वर्ण आ गये और गाँव के शिल्पकार डॉ कर भाग खड़े हुए किन्तु आर्य समाजी नेताओं ने डोला पालकी को कंधे पर उठा लिया।  फिर रास्ते में सवर्णों द्वारा डोला पालकी को छीना  गया। बारात समूह   छिन्न भिन्न हो गया। हरिद्वार से आये नेताओं को भी चोट आई और इन्हें रात में किसी खेत में काटना पड़ा। लमखेत के श्री हीरा लाल टमटा ने इन नेताओं को शरण दी। वास्तव में रुक   गयी। 30 जून 1946 को पटवारी और कानूनगो के संरक्षण में बरात विदाई हुयी। यह संघर्ष एक साल तलक चला। इसीलिए इतिहास में कस्याळी काण्ड एक प्रमुख घटना मानी जाती है। 

                         गढ़वाल के शिल्पकारों के अधिकारों को रास्ट्रीय स्तर पर ले जाना 


      फिर इन नेताओं व अन्य शिल्पकार नेताओं ने अपना आन्दोलन  कर र दिया, तीनो नेता दुगड्डा पंहुचे। यंहा से इन नेताओं ने डोला पालकी अधिकार की सभी बातें कौंग्रेस के रास्ट्रीय स्तर के नेताओं, हिन्दू महासभा के नेताओं व  तक पत्र लिखकर बात पंहुचायी।
इसी समय जवाहर लाल नेहरु कोटद्वार चुनावी सभा में पंहुचे थे। वहां नेहरु जी ने इनकी बात सुनी  और अपना भाषण भे डोला पालकी से शुरू किया और सवर्णों से नेहरु जी ने प्रार्थना की कि वे शिल्पकारों के मानवीय अधिकार ना छीने।
नेहरु जी ने गढ़वाल चुनावी  भ्रमण में हर सभा में डोला पालकी की बात की। इस चुनावी भ्रमण में श्री बलदेव सिंह आर्य नेहरु जी के साथ ही रहे थे।
इस दौरान समाचार माध्यमों में डोला पालकी प्रकरण संबंधी  कई लेख प्रकाशित  हुए और शिल्पकार अधिकारों को समाज के सामने  रखा गया
गांधी जी ने भी डोला -पालकी पर लेख लिखा व श्री पन्त को एक आदेसयुक्त  पत्र भी लिखा।
सन 1947  में डोला पालकी  का विधेयक ' अछूत योग्यता निवारक बिल' के साथ पास किया गया। श्री बालकराम आर्य , प. वेद व्रत के अनुसार पन्त जी ने उन्हें धोखा  दिया कि डोला पालकी बिल अलग से क्यों नही पास किया
  
 बिल पास होने के बाद भी शिल्पकारों द्वारा डोला पालकी प्रयोग का विरोध होता रहा किन्तु धीरे धीरे शिल्पकारों को उनके अधिकारों को सामजिक  मान्यता मिली। 

सन्दर्भ -विनोद शिल्पकार , 2009, उत्तराखंड का उपेक्षित समाज और उसका साहित्य )


Copyright@ Bhishma Kukreti 10/7/2013 आयोजन

Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kingdoms in Himachal

Foreign Policy of Garhwal Kings in Pal /Shah Period -3
Administration, Social and Cultural Characteristics History of Garhwal in Shah Dynasty -32 

History of Garhwal including Haridwar (1223- 1804 AD) –part -221     
   History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -469 
                        By: Bhishma Kukreti (A History Research Student)
               The relationship of Garhwal Kings had been cold and hot with Himachal Kingdoms adjacent to Uttarkashi and Dehradun regions.
          According to folklores, Garhwal army destroyed the forts of Kamru (Rampur) and Chini of Himachal in fifteenth century. The Kamru Thakur (chieftain) Kehr Singh established Rampur.
       There was cordial relationship of Garhwal Kings with Bushahr King from Ajaypal till Balbhadra Shah. The Garhwal Kings and many Himachal Kings had marriage relationship too.
           According to Bahuguna Vanshavali, Garhwal King Manshah won Utkal (Jubbal) and Kameth (Kanthyl) of Himachal. The folklore and historical witnesses support the Bahuguna Vanshavali.  Garhwal King Manshah won the territories of Thong/Thyong, Madhan and Ghund of Himachal. These territories were ruled by  Thakurs.
 Dr. Dabral suggested that Manshah also  have won Ravai Pargana of Himachaal region.
    Madho Singh Bhandari the Garhwal Chief of Army of Mahpati Shah reached to Shringkatha of Vaspa valley. Perhaps his army reached to Vaspa via Chitkal, Sanga, Kalpa, Chini and Pangi. Madho Singh died there in Vaspa. With difficulty, Garhwal army returned to Garhwal.
   Prithvipati Shah also tried to extend his rule till Sutlej but was not successful due to strong resistance from togetherness of Himachal Kings. Garhwal rule was till Hatokoti of Himachal. As per order of Auranzeb, Madani Shah won Butolgarh of Kyunthalgarh of Aurangzeb.
 There was border dispute with Sirmaur king of Fateshah. However, after oppressive methods of Guru Govind Singh  , Garhwal King Fate Shah helped Sirmaur King.  From that time Garhwal Kings started appointing Himachal soldiers.
 By appointing Himachal soldiers, Garhwal Kings and Kumaon Kings started ignoring Rajput and Khas soldiers.  A couple of regional commanders of west Garhwal declared them free from Garhwal Kingdom and took help of Himachal Kingdoms.
     Just before Gorkha attack, Himmat Singh the King of Bushehr captured Ravaigarh from Garhwal.


Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com31/10/2014
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -470
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
History of Garhwal from 1223-1804 to be continued in next chapter ….
History of Characteristics of Garhwal Kings Shah dynasty, to be continued

XX                     
Notes on South Asian Modern Period  History of Garhwal;  South Asian Modern Period   History of Pauri Garhwal; South Asian  Modern Period  History of Chamoli Garhwal;  South Asian Modern Period   History of Rudraprayag Garhwal;  South Asian Modern  History of Tehri Garhwal; South Asian Modern  History of Uttarkashi Garhwal;  South Asian Modern Period   History of Dehradun, Garhwal;  Modern  History of Haridwar ; South Asian Modern Period   History of Manglaur, Haridwar;  South Asian Modern Period   History of Rurkee Haridwar ;  South Asian Modern Period   History of Bahadarpur Haridwar ; South Asian Modern Period History of Haridwar district, South Asian History of Bijnor old Garhwal
XX
Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kingdoms in Himachal; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kingdoms in Kamru , Himachal in relation Uttarkashi Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Bushahr Kingdom in Bushehar , Himachal in relation Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Thyog Kingdom in Himachal in relation  Dehradun Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kingdom in Madhan, Himachal in relation  Haridwar Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kingdom in Ghund Himachal in relation  Bijnor, old Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Vaspa Kingdom in Himachal in relation  Pauri Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Butaulgarh Fort, Himachal  in relation  Pauri Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kingdom in Himachal in relation  Chamoli Garhwal History; Foreign Policy of Garhwal Kings for Relationship with Kangda Kingdom in Himachal in relation  Rudraprayag Garhwal History;

Thursday, October 30, 2014

टूर ऑपरेटरों को सर्च इंन्जिन ऑप्टिमाइजेसन का ज्ञान आवश्यक है

Knowledge of  Search Engine Optimization is Essential for Tour Operators 

                (Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series--96  

                                                      
उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन -भाग 96   

                                               लेखक : भीष्म कुकरेती  (विपणन  विक्री प्रबंधनविशेषज्ञ ) 

टूर ऑपरेटर छोटा हो , मध्यम हो या बड़ा हो उन्हें  इंटरनेट मार्केटिंग का आधार लेना होता ही है।  इंटरनेट मार्केटिंग में सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेसन  आधारिक ज्ञान आवश्यक है।  
                            सर्च इंजिन

  सर्च इंजिन एक सॉफ्ट वेयर है जो   रोल्ड वाइड वेब या संसार के सभी इंटरनेट जालों (world wide web ) से सूचना खोजता है। गूगल , याहू आदि सर्च इंजिन है और खोजी  अन्य सर्च इंजिन में 
कोई शब्द भरता है तो सर्च इंजिन सभी संबंधित सूचनाओं का ढेर लगा देता।  जैसे आप गूगल सर्च में भीष्म कुकरेती टाइप करोगे तो आपको वे सभी पेज सामने आ जायेंगे जिनमे भीष्म कुकरेती आया है। 
  आजकल इस्लामिक देशों ने फैथफुल सर्च इंजिन भी ईजाद कर लिया है  अवांछित विषयों की खोज रोक देता है जैसे यूएई में प्रोनो फिल्म  खोजा जा सकता है। 
    निम्न सर्च इंजिन दुनिया में मुख्य हैं -
सर्च इंजिन ----------मार्किट शेयर %
गूगल ----------------६८. ६९ 
बैयडू ----------------१७.१७ 
याहू ------------------६. ७४ 
बिंग -------------------६. २२ 
                          सर्च इंजिन की कार्यशैली 
सर्च इंजिन की कार्यशैली में
वेब क्रॉलिंग 
इंडेक्सिंग 
सर्चिंग की क्रमगत तकनीक काम आती हैं
वेब कॉलिंग को मकड़ा या स्पाइडर भी कहते हैं। यह world wide web से खोज करता है। 
फिर इंडेक्सिंग  इंगितिकरण होता है याने क्रॉलर के बाद कौन सा पेज कैसे लगेगा तकनीक काम आती है।
और फिर सर्चिंग या खोज शुरू होता है। 
जब आप कोई शब्द (की वर्ड ) गूगल में टाइप करते हैं तो क्रॉलिंग से इंडेक्सिंग होती है फिर खोज। 
कौन सा पेज गूगल सर्च इंजिन में पहले आता है वह की वर्ड्स (Key Word ) सिद्धांत अनुसार आता है। 
  सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेसन का अर्थ होता है की आपके वेब साइट का प्रथम दूसरे पेज में आना। जब यदि कोई ग्राहक टूर के बारे में टाइप करता है तो टूर व्यापारी का उद्येस्य होता है की  वेब साइट गूगल/याहू आदि सर्चइंजिन  के प्रथम पेज में आये. 
सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेसन के कुछ मूलभूत नियम -
१- विषय राजा है - विशिष्ठ व वे विषय जिन्हे आपके पाठक /ग्राहक अधिक चाहते हैं , उन विषयों का होना आवश्यक है 
२- 'की वर्ड ऑप्टिमाइजेसन' का ध्यान अति आवश्यक है 
३- हर पेज में मैटा डाटा होना चाहिए 
४- आपके हर पेज का शीर्षक होना चाहिए और पेज के बारे में जानकारी होनी चाहिए 
 ५-आपकी वेब साइट का लिंक सही व काम का होना चाहिए 
६- सोसल साइट साइट से जुड़िये 
७- बैक लिंक का ध्यान रखिये 
८- फोकस याने अपने ग्राहकों की रूचि तक सीमित रहिये जिससे आपके विषयों को सर्च इंजिन क्राउलर  शीघ्र खोज सके 
९- फोटो आदि सर्च इंजिन ऑप्टिमाइजेसन के नियमों के तहत डालिये 
१०- पेड़ या पेड क्लिक जोड़िये 
११- UCL Domain पर रहिये रहिये 
१२- सर्च इंजिन सलाहकार की सहायता लीजिये 
१३- हमेशा अपने वेब साइट  विश्लेषण करते रहिये 


** आगे पढ़िए - की वर्ड्स की हैसियत 


Copyright @ Bhishma Kukreti  30 /10//2014  

Contact ID bckukreti@gmail.com
Tourism and Hospitality Marketing Management for Garhwal, Kumaon and Hardwar series to be continued ...

उत्तराखंड में पर्यटन  आतिथ्य विपणन प्रबंधन श्रृंखला जारी 

                                   
 References

1 -
भीष्म कुकरेती, 2006  -2007  , उत्तरांचल में  पर्यटन विपणन परिकल्पना शैलवाणी (150  अंकोंमें ) कोटद्वार गढ़वाल

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Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom

Foreign Policy of Garhwal Kings in Pal /Shah Period -2
Administration, Social and Cultural Characteristics History of Garhwal in Shah Dynasty -31 

History of Garhwal including Haridwar (1223- 1804 AD) –part -220     
   History of Uttarakhand (Garhwal, Kumaon and Haridwar) -468 
                        By: Bhishma Kukreti (A History Research Student)

            Initially till thirteen century, in Tibet, the political situation was same as of Garhwal. There were tens of Chieftains (Garhpati) who were ruling tinny area. Daba Gadhi was behind Janskar Hills adjacent North  to Garhwal.
   Till Garhwal Kingdom was not established by Pal Kings and there were Garhpati in Garhwal, the chieftains and looters from Tibet used to attack on Bhotantik regions (Neeti to Mana) of Garhwal. Those looters and chieftains used to loot grains, animals and women from Garhwal. There is no authentic records of Tibet capturing, ruling north regions of Garhwal but still today, China had opposite perception about bordering line.
                In Manshah time, Jeetu Bagdwal was regional commander /officer of Neeti valley and people worship Jeetu Bagdwal as Bhad Gramdevta (village deity).
     The letter of Father Andrede states that the Sarswati valley or Mana valley was under the rule of Shyamshah(1624)
  The geographical situation of bordering region of Daba (Tibet) and Garhwal (India) is such that neither Garhwal could capture Daba permanently nor it was possible for Daba Kings to rule over Mana –Neeti valley.
       Though, army of Shyamshah captured Daba but could not stay there in winter season. Garhwal chief of army Madho Singh Bhandari erected terraces for marking the bordering line between Daba and Garhwal. Fateshah also attacked on Daba.
             There were wars between Garhwal and Daba (Tibet, China). However, the export and import business was continuous between Daba and Garhwal till 1962.

Copyright@ Bhishma Kukreti Mumbai, India, bckukreti@gmail.com30/10/2014
History of Garhwal – Kumaon-Haridwar (Uttarakhand, India) to be continued… Part -469
(The History of Garhwal, Kumaon, Haridwar write up is aimed for general readers)
History of Garhwal from 1223-1804 to be continued in next chapter ….
History of Characteristics of Garhwal Kings Shah dynasty, to be continued

                     
Notes on South Asian Modern Period  History of Garhwal;  South Asian Modern Period   History of Pauri Garhwal; South Asian  Modern Period  History of Chamoli Garhwal;  South Asian Modern Period   History of Rudraprayag Garhwal;  South Asian Modern  History of Tehri Garhwal; South Asian Modern  History of Uttarkashi Garhwal;  South Asian Modern Period   History of Dehradun, Garhwal;  Modern  History of Haridwar ; South Asian Modern Period   History of Manglaur, Haridwar;  South Asian Modern Period   History of Rurkee Haridwar ;  South Asian Modern Period   History of Bahadarpur Haridwar ; South Asian Modern Period History of Haridwar district, South Asian History of Bijnor old Garhwal
XX Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Rudraprayag Garhwal History; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Chamoli Garhwal History; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Pauri Garhwal History; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Bijnor , old Garhwal History; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Haridwar Garhwal History; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Dehradun Garhwal History; Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Uttarkashi Garhwal History;  Foreign Policy with Daba, Tibet (China) of Garhwal Kingdom in context Tehri Garhwal History;