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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Tuesday, December 25, 2012

साहित्यकार जग्गू नौडियालौ मिरत्यु पर कुछ सवाल


 भीष्म कुकरेती 
यु एक सद्यानो सच च बल जु जनमल तैन मोरण बि च। जब 10 अक्टोबर सन 1940म भीमली गौंम (पैडलस्युं,पौड़ी गढ़वाल , उत्तराखंड ) पंडित चैतराम नौडियालौ ड्यार जगदीश नौडियालन जनम ले छौ त भेमातान लेखी दे छौ बल 8 नवोम्बर 2012 कुणि श्याम पुर , रिशिकेषम जगदीश नौडियालो निर्वाण बि होलु .

इखम खौंऴयाणे बात नी च बल भग्यान जगदीश नौडियाल भरपूर परिवार ( घरवळी, द्वि नौन्याळ , बिवयिं नौनी अर नाति नतिण ) छोड़िक भगवानो ड़्यार चलि गेन . खौंऴयाणे बात या च बल हम बुलणों गढ़वाळि साहित्यौ सेवा करदारो तै पता इ नि चौल बल करुण रस से अंसदारी लाण वळो गितांग अर कवि चलि गेन . मेरि टेलीफोनम बात ऊं से सन 2011 बिटेन शुरु ह्वेन . मीन ऊंकी तीन किताबो समीक्षा कुछ बिगळी ब्यूंतम करि छौ त वों बार बार बुल्दा छा बल तुमन मै पछ्याण। अर आखिरें ओक्टोबरम उंको फोन बि ऐ छौ . ऊंन मेखुण 'उदगाथा ' किताब भेजि छौ अर यां पर बात ह्व़े . फिर परसि कनाडा बिटेन पाराशर गौड़ जी दगड बात हुणि छे अर मीन पूछ बल जग्गु दा दगड़ बात बि ह्वेन त वूंन बोलि बल ना भौत दिनों बिटेन नि ह्वे . थ्वडा देरम पाराशर जीक फोन आयि बल नौडियाल जीत 8 नवम्बरो यी दुन्या छोडि चलि गेन। मीन फिर चार पांच गढवाली साहित्यकारों फोन घुमाइ त पाइ बल कै तै कुछ नि पता !

अब इखमि सवाल खड़ा होंदन कि हम बात त साहित्य सेवा की जरूर करदां पण साहित्य जनमदारो बाराम उदासीन किलै रौंदवां . किलै हम दाना सयाणो साहित्यकारों तै बिसरि जांदा . इनि दिल्लीक साहित्यकारों तै पता इ नी च बल गढ़वळि महान कथाकार अर नाटककार काली प्रसाद घिल्डियाल बच्यां छन त कख छन? गढ़वळि साहित्यौ इतिहास लिखणम मजाक मसखरी करण वळु तै पता इ नी च बल जगदीश प्रसाद देवरानी क्वा च अर देवरानी जीन कथा लेखिन . आखिर या उदासीनता किलै ?

डा जग्गू नौडियालन वै बगत पर गढ़वळिम गीत अर कविता लेखिन जब गढ़वळि एक ट्रांस्फोर्मेसन की तलासम छे .लोकेश नवानीक बुलण च बल जब नौडियाल जी ज्वाल्पा देवी जिना मास्टर छ्या त लोग नौडियाल जीक लिख्यां -गयां गीत पुंगड़ो, डाँडो,रस्ता चलदा या गोरम गांदा छा .

डा जग्गू नौडियालन गढ़वळिम द्वि कविताखौळ (कविता संग्रह ) छपैन -गीतुं गाड (1963)अर समळौण (1979). डा पार्थ सारथि बुलण च बल कविताखौळ 'समळौण' एक सशक्त अर भावनाऊं से भोर्युं कवितागळ (कविता संग्रह ) च।समळौणम कवि न अभावो तै नया किस्मु भाव दॆन। 32 कवितौं संग्रह -समळौणऐ कवितौंम प्रपंच तै फुंड धोळिक पंच तै थरपे गे . समळौणक कवितौं मा प्रदर्शन की ना दर्शन की उपासना च .जु वीर रसै कविता छन वो विध्वंसात्मक ना बल्कणम निर्माणात्मक छन . डा डबरालो बुलण च बल जग्गू क कवितों माँ सर्वकल्याण भावना छन

डा जग्गू नौडियालो ब्वेक समळौण्या कविता कळकळो रसौ (करुण ) बढिया उदाहरण छन . ब्वेक मोरद दै अपण दुधि बच्चा वास्ता सौगंध मंगण वळि कविता वात्सल्य अर करुण रसौ संगम छ।
सन साठम ह्युं पोड़न पर रचींजग्गू नौडियालै कविता प्रतीक से बिम्ब दर्शाणो उदाहरण त छें इ च दगडम इतिहास दर्शांदी कविता बि च .

बकी बातों ह्यूं
कवि : जग्गू नौडियाल
कवितौ रचना समौ :खैडा, गाँव २४ जनवरी १९६०

ये दिन याद राला ,
ह्यूं पड़ी अबा साला .
सात गती मौ का मैना ,
ह्यूं का पाड़ बंदे गेना ,
भवरेगैनी छाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
आंदा जांदा लोक बन्द ,
म्वरणो कू आया छंद
गोरु क्या जी खाला . ह्यूं पड़ी अबा साला
ह्यूं को पाणी तातु कैक
गौड़ी भैंसी वे पिलैक
लगै द्यावा ताल़ा . ह्यूं पड़ी अबा साला

हिन्दीम ऊंकी 6 किताब छपीं छन पण 'उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर : रवांइ क्षेत्र के लोक साहित्य का सांस्कृतिक अध्ययन ' मा रवांई क्षेत्रक लोक साहित्य की खोज च . ईं किताबो महत्व ऊनि च जन अबोध बन्धु बहुगुणा , डा गोविन्द चातक, डा मोहन बाबुलकर , डा शिवा नन्द नौटियाल अर डा भट्टो गढ़वाली लोक साहित्य पर खोज की च।
डा जग्गू नौडियाल क पांच छै किताब अणछप्यां छन , जां मादे एक कविता पोथी गढ़वळिम बि च
भगवान से उन्कि आत्मा तै शान्ति की प्रार्थना !

जा ! बलात्कार्युं जंगड़ सौड़ि जैन


भीष्म कुकरेती
आज एकान बीच दुफराम गुस्साम एक नौनि पर बलात्कार कार। बलात्कारी नौनी पर रुस्युं छौ
काण्ड लगि जैन तै मानसिकता पर जो सम्भोग तै गुस्सा उतारणों माध्यम मन्दन . अरे इथगा इ गुस्सा छौ त अपण मुंड ढून्गु पर मारदो ना !

एक भूतपूर्व जमींदारन समाजम अपण हैसियत , शक्यात , नियंत्रण दिखाणो, दहसत फैलाणों बान अपणी गौं की ब्वारी पर खुलेआम बलात्कार कार .

अरे मरजात ! हे कुजातिक ! हे न्यळतो (नपुंसक )! धौंस जमाणो त्वे तै जनानि दिखेन?.धौंस इ जमाण छे त कै पहलवान मरद पर दिखांदो त हम मानि लीन्दा तू छक्का नि छे मरद छे।

आज एक सैडिस्टन (जै तै दुसरो दुःख दिखणम रौंस आन्द ) एक नौनि पर बलात्कार कार
हे बहसी दरिंदा ! हे रागस ! इनि दुःख से मजा आंदो त अपण अंग प्रत्यंगुं तै ल्वाड़ोन थिंचांदी त तब पता चलदो त्वे बेशरम तै कि डा क्या हूंद . अर जु नियम होंदा कि बलात्कार्युं तै कुठारे जाल त ये सुंगर हिकमत होंदी तेरी ?
ब्याळि अपण दगड्यो बीचम मरदागनी दिखाणो बान उखम गैंग रेप ह्वे
एकान जनान्यु तै सबक सिखाणो बान रेप कार

हे डंडलि सजेन तुमारि , तडम लगि जैन तुमारि स्या मानसिकता . अर इनि, जु तुमर अंग -भंग करे जालो त फिर दिखाण लैक रैल्या तुम अपण स्या मरदानगी ?
एकान अफु तै महान मरद साबित करणों बान बलात्कार कार
अरे असुर ! फंड धुऴया! महान मरद इ बणनाइ त क्वी महान काम करदो मोरि गे छौ तु जु महानता सिद्ध करणों बान त्वे जनानी प्रताड़ना की सूझी ?

शराबौ नशाम एक बुड्यान बलात्कार करि .
ये निर्भागी , हे कोढ़ी ! शराबौ नशाम तीन गू किलै नि खायि ? ये पापि ! शराबौ नशाम तीन फांस किलै नि खायि ?
एक बलात्कारी तै पुछे गे बल तीन दलित नौनि पर बलात्कार किलै कौर ? त बुलण बिस्यायि बल यु त हमर अधिकार च .
या अमानवीय , अमानुषिक , सामाजिक मानसिकता कब बंद ह्वेलि ज्वा दलितों अर कमजोर वर्ग पर तरां तरां क अमानवीय अत्याचार करवांदी ?

आज , बीस साल बाद, बलात्कारो केसम एक बलात्कारी तै ठोस गवाह नि मिलण पर निर्दोष साबित कार
ये राजनैतिक अर कार्यपालिका का ठेकेदारों कब तुम पवित्र संविधान की रक्षा बान समय पर न्याय दिलाणो इंतजाम करिल्या ?
दिल्लीम गैंग रेप को उपरान्त राजनीति गरमाई
हे बेशरम राजनीतिज्ञों ! कबि त शरम कारो . कबि त स्वाचो कि तुमारि क्या क्या जुमेवारी च , नियमो मा समयानुसार बदलो त सै ! तुम पर अबि बि जनता भरवस करणि च अर जैदिन तुमर कुकर्मो , अरनिष्क्रियता से दुखि ह्वेक कखि जनतान थमाळि उठाइ दे त !

Copyright@ Bhishma Kukreti 26/12/2012     

उत्तराखंड में पुष्प उत्पादन उद्द्योग संभावनाएँ


Floriculture in Uttarakhand

                                                                                     डा बलबीर सिंह रावत
 
 
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मन को हर्षित कर देने वाला शब्द फूल , पुष्प ,रंगौ, सुगंधियों से भरपूर . जिसको दो उसको हर्षित कर के अपने हित में मिला लो। भगवान् को चढाओ, बर माला बनाओ, जन्म दिन में, सालगृह में,स्वागत समारोहों में, मेल मुलाकातों में, भोजनालयों, होटलों की मेजों में, घर के गमलों में,श्र्धांज्लियों में,हर जगह फूल ही फूल। कहने का तात्पर्य यह है कि हर मौके के लिए तरह तरह के फूलों की मांग है, और जैसे जैसे, लोगों की आमदनी और रूचि बढ़ती रहेगी, वैसे वैसे फूलों के मांग हर मौसम में बढ़ती रहेगी . यही बढ़ती मांग है जो पुष्प उत्पादन के व्यवसाय को प्रोत्साहित करने के लिए पर्याप्त है।
 
         वैश्विक स्तर पर फूल उद्योग 10 प्रतिसत प्रतिवर्ष  बढ़ रहा है याने कि फूल उद्योग दिनों दिन फल फूल रहा है . एक आकलन के हिसाब से सन 2015 में फूल उद्योग  9 लाख करोड़  का हो जाएगा। .जर्मनी ,अमेरिका, ब्रिटेन , फ़्रांस ,हौलैंड और स्विट्जर लैंड दुनिया के अस्सी प्रतिशत फूल आयात कर्ता देश हैं . ग्लोबल मार्केटिंग के कारण आज तेल अवीव ,दुबई और कुनमिग (cheen)फूलों के नये विक्री वितरण केंद्र बन गये हैं .

  जहां तक भारत का प्रश्न है यह उद्योग हर साल तीस प्रतिशत के हिसाब से बढ़ रहा है . सन 2015 में भारत का फूल निर्यात 8000 करोड़ रूपये का हो जाएगा . गुलाब का फूल सबसे अधिक निर्यात होता है अभी भारत में कर्नाटक भारत का 75 प्रतिशत पुष्प निर्यातक प्रदेश है . इसके बाद क्रमश: महाराष्ट्र , तमिलनाडु, बिहार ,पश्चिम बंगाल ,उत्तरप्रदेश ,हरियाणा,पंजाब , जम्मू-कश्मीर ,आन्ध्र प्रदेश और मध्य प्रदेश  का नम्बर आता है .

    पुष्प उद्योग में जहाँ तक उत्तराखंड का प्रश्न  है अभी इसमें प्रगति नही हुयी है . डा निशंक ने अपने मुख्यमंत्रित्व काल में 2000 रूपये प्रति वर्ष का टार्गेट रखा था .

एक सर्वेक्षण के अनुसार उत्तराखंड में 300 प्रकार के निर्यातगामी फूल उगाये जा सकते है .इसके  उत्तराखंड में और  भारत में भी अंतर्देशीय उपभोक्ता हैं . भारत में 10000 करोड़ के फूल बिकते हैं याने की आतंरिक खपत भी फूल उद्योग वृद्धि को प्रेरित करता है  
               इस तरह हम पाते हैं कि उत्तराखंड में पुष्प उद्योग की अपार संभावनाएं हैं और प्रतेक उत्तराखंडी को इन संभावनाओं से लाभ लेना ही चाहिए .  
 
            पुष्प उत्पादन , कृषी के अन्य उत्पादनों से भिन्न है। भिन्न इसलिए है कि इसके उत्पादों को अन्तिम उपभोक्ता तक उसी सुन्दर रुप में पहुचाना पड़ता है, जिसमे रूचि और मौके के अनुसार आकर्षण हो, यानि, पुष्पों में रंग पूरे, ताजगी पूरी और आकर्षण पूरा सुरक्षित रहना चाहिए जो उसका प्रमुख नैसर्गिक गुण है। इन्ही विशेष कारणों से पुष्प उत्पादन व्यवसाय की एक अपने में अलग ही विशेष विशेषग्यता है।

सब से पाहिले यह जानना जरूरी है की आपके इलाके में कौनसे पुष्प सब से अच्छे उगाये जा सकते हैं। यह सलाह आपको प्रदेश के बागवानी और फ़्लोरिकल्चर विभाग से मिलेगी। कृषि विश्व विद्य्यालय से भी जानकारी तथा पर्शिक्षण मिल सकता है। किसी सफल पुष्प कृषक के फार्म में जा कर देख पूछ कर व्यवसाय की जानकारी मिलती है। इन सब प्रार्थमिक सूचनाओं के आधार पर आप अपना बिचार व्यवहार में ला सकते है।पुष्प उत्पादन में दो शाखाये हैं, फूल जैसे के तैसे बेचने का और सुगन्धित फूलों से इत्र बनाने का . दोनों साथ साथ भी चल सकते हैं।

इस व्यवसाय को शुरू करने के लिए पर्याप्त पूंजी , समुचित तकनीकी ज्ञान, दक्ष श्रम शक्ति और नियमित स्थाई बाजार का होना आवश्यक है । खेत की मिट्टी की जांच करा लीजिये, जैविक खाद और उर्वरकों का प्रबंध कर लीजिये, सिचाई की नियमित व्यवस्था जरूरी है। बीज/पौध का प्रबंध,समय पर बुआई, रोपाई , नियमित सिंचाई (सब से उत्तम है ड्रिप तरीका ), गुडाई, पौध संरक्षण के लिए जो रसायन चाहियें, सुनिश्चित कर लीजिये की वे नियम कायदों के अनुरूप हों, बाजार के फुटकर विक्रेताओं की सलाह पर न चलिए, वे अपने मुनाफे को ध्यान में रखते हैं, आपके और ग्राहकों के हित को नहीं। तो सरकारी या विश्वविद्यालयों के विज्ञान केन्द्रों से ही सलाह लीजिये और केवल मान्यता प्राप्त उत्पादक संस्था के ही रसायन उपयोग में लाईये। कुछ महंगे अवश्य होंगे परन्तु आपकी विस्वशनीयता बनी रहेगी, जो इस धंदे के लिए परम आवश्यक है। खेत खुले और पोली हाउस तरह के हो सकते हैं।ये भी ध्यान रहे कि फूलों के पौधों को धूप की पूरी रोशनी मिलती रहे। खाद, उर्वरक, कीट और फफूंद नाशक द्रव्यों का समयानुसार छिडकाव, समुचित (न कम न अधिक) सिंचाई, निर्धारित समय पर निर्धारित मात्रा में होती रहे। फूल जितने कोमल होते हैं उनकी देख रेख भी उतनी ही कोमलता से करनी होती है। यह व्यवसाय अधिक निवेश और ध्यान माँगता है, और अधिक लाभ तो देता ही है , अधिक संतुष्टि भी देता है। {रबीन्द्र नाथ टेगोर ने अपनी एक कविता में कहा भी है कि (भावार्थ) जब निराशा घेर ले तो पुष्प उगाओ , खिलते पुष्पको देखने से जो आनंद मिलता है उससे निराशा भाग जाती है ।}

जब फूल खिलने लगते हैं  तो उन्हें उसी समय , ऐसी लम्बाई और आकार में , काट कर पौधों से अलग करना चाहिए जिस आकार और स्तिथि में वे बाजार के फूल बिक्रेता की दूकान पर पहुंच जाय। यह
ध्यान में रखना होता है कि कटा भाग अब भी ज़िंदा है और वोह बढ़ भी रहा है, मरा नहीं है। अंतिम ग्राहक के पास पहुचने तक उसे उस रूप में होना चाहिए जिसमे उसे ग्राहक चाहता है। फूलों का यह कुछ समय तक जीवित और बढ़ते रहने का गुण अलग प्रजाति का अलग अलग होता है . इसी कारण पुष्प उत्पादन में दक्षता पूरी होनी चाहिए कि किस फूल को कब काटना है, और किस बाजार के लिए काटना है। नजदीक के,, दूर के, विदेश के। कैसे साधन से भेजना है ? यह सारी विशेषताए मायने रखती हैं, आपकी विश्वसनीयता और मुनाफे के लिए।

पौधों से अलग करने पर फूलों को इस प्रकार पैक करना होता है की उनके किसी भी भाग को कोई खरोंच तक न आय। इसलिये पाकिंग और लदान, ढुलान के लिए विशेष प्रकार के कागज़ , कपडे, बक्शे, कंटेनर, जो भी आवश्यकता होती है, उसे पूरी करना चाहिए क्योंकि इन जरूरतों के साथ छोटी से छोटी भी लापरवाही भी महंगी पड़ती है। पूरा का पूरा माल वापस तो आएगा ही, आगे का धंदा भी हाथ से जा सकता है।

कटे फूलों के अलावा फूलों के बीज, कलमें, गांठें,तने, जिस से भी ने पौधा बनता है ओह, उगे पौध, खिलते फूलों के पौधे भी आसानी से बिकते हैं। ऐसे व्यापार के लिए प्रशिक्षित श्रम शक्ति अधिक चाहिए , केवल खानदानी माली होने से ही काम नहीं चलता ,अनुभव महत्व पूर्ण है। इसलिए माली लगाने से पाहिले उसकी पृष्ठ भूमि जाचना हितकारी होता है।
आर्थिक दृष्टि से उचित आकर के क्षेत्र में ही फूलों की खेती करनी चाहिए। येआ आकर इस पर निर्भर करेगा की बाजार में आपके कौन कौन से फूलों की कितनी मांग है, और उसी खेत्र में कितने और उत्पादक हैं। इसलिए पूरा समय लीजिये, सारी छन बीब कर के संतुष्ट होनर पर ही शुरू कीजिये। प्रारम्भिक झटके होते हैं, उनसे पार पाने के रास्ते समय पर आप निकाल सकें, इसके लिए सचेत रहिये। यह व्यवसाय पर्याप्त लाभ और प्रसन्नता देने वाला है।

--डॉ। बलबीर सिंह रावत.. BK OO6/25.12. ,                                  
dr.bsrawat28@gmail.com
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अबौ जड्डू अर तबौ जड्डू

गढ़वाली हास्य व्यंग्य
हौंसि हौंस मा, चबोड़ इ चबोड़ मा
                                    अबौ जड्डू अर तबौ जड्डू
                                   चबोड्या : भीष्म कुकरेती

                           तबारि थर्मामीटर हूंदा होला पण तबारि सरकारम गढ़वाळो कुण इथगा बजट नि छौ बल हम तै पता चौल जावो बल गढ़वालम औसतन कथगा तापमान च त जलवायु इतियासौ खुजनेर बि नि बतै सकणा छन बल तबौ तापमान अर आजौ तापमानम क्या अंतर छौ . मेरि ददि बुल्दि छे बल ये सालौ जड्डू इनि च जन जै साल फलण मोरि छौ या अलणौ ब्यौ ह्वे छौ या वैकि -तैकि जनानी मैत भागि छे . जलवायु इतियासौ खुजनेर अबि गढ़वाळम कथगा ठंड पड़दि छे बान हमर लोक साहित्य पर जादा आधारित छन .
                      हमर टैम याने जब हम छ्वटा छया (अब गीतेश नेगी जन कवि बुल्दन मि दानो हवे ग्यों ) पर बि सुबर सुबर आजौ तरां सिलड़ रस्तोंम खारो कांच जन जम्युं रौंद छौ अर तब हम आज्ञाकारी श्रवण हूंदा था त सुबर सुबर पाणि लाणो जाण पड़द छौ पण तबार्यौ कांच जन खारो बड़ो दयावान , दयालु , करुण हूंद छौ . वो खारो इथगा दयालु हूंद छौ बल हम तै पता इ नि चल्दो छौ बल ठंड बि क्वी चीज हूंद . हम सुबेर सुबेर कर्च कर्च खारोम हिटदा छा पण मजाल च खारो हमर कुछ बिगाड़ी द्याओ धौं .वै खारो तै बि पता छौ बल हम वीर पुत्र पुत्री छंवां अर नंगा खुटुन जाण हमारि शान छे त वै जमानो खारु बि हम लोगुं नुक्सान नि करदो छौ। अचकालौ खारु ! हे मेरि ब्वे बडो निगरू , करुड , निर्दयि ह्वे गे . उन त अचकाल बच्चा लोग श्रवण कुमार बणनम शर्मान्दा छन पण कबि कबि कबार कै बच्चा पर श्रवण कुमारो भूत लगि गे अर वु सुबेर सुबेर पाणिम ग्यायि अर कांच जन खारोम हिटो त खारु रूसे जांदू . कांच जन खारु चप्पल वाळ तै रडै दींदु , रबर शु वळो रबर शू भिजै दींदु या चमडा जुतुं भितर बि छीरि जांदो .इनमा श्रवण कुमारो भूत लगण पर बि बचा लोग सुबेर सुबेर पाणिम नि जांदन बल कु रावु ये निर्दयी , निगरू खारो दगड़ भारत लीणु. हमर टैम पर जड्डूम सुबेर सुबेरो ठंडी , कुरकुरी हवा बि बड़ी मयेळि हूंदी छे , करुणामयी हूंदि छे। हम जंग्याम सुबेर सुबेर पाणिम जांद छा पण मजाल च कुरकुरी बर्फीली हवा हमर कुछ बिगाड़ी द्यायो धौं ! हमर टैमौ कुरकुरी हवा जाणदी छे बल हमम एकी सुलार च जैन सरा साल चलण अर हम वै सुलार पैरिक रोज स्कूल बि जांदा त हमर टैमौ कुरकुरी हवा जाणदी छे सुलार खारोम भीजि जांदो अर कखि बल जु हम सुलार पैरिक सुबेर सुबेर पाणि लौला त सुलारन भीजि ग्याई त हम स्कूल जाण लैक नि रै जौलां . इनमा सुबेरक कुरकुरी हवा हम पर दया दिखांदी छे अर हमारो कुछ नि बिगाड़दि छे .अबै सुबेरक हवा ग्लोबल माइंडेड ह्वे ग्याइ अर जु तुम गरम कपड़ा नि पैरिल्या त या नई जमानै ठंडी हवा तुम पर निमोनिया जन रोग सरै दॆन्दि , फैले दींदी . हवा को रुख बदले ग्याइ त अचकाल नौन्याळ गरम कोट, पैंट , स्वेटर , टाइ पैरिक पाणि लाणो जांदन . पचीस सालम जड्डू हवाम इथगा बदलाव ऐ ग्याइ .
 
                       तबारि जब हम जड्डूम सुबेर सुबेर पाणि लाणो जांदा छा त पाणि लांदा लांदा हम पर अग्नि प्रेम को बयाळ चौढ़ी जांद छौ अर हम घौर ऐका अपण हाथ चुल जोग करि दीन्दा छा . खुट बि अग्नि प्रेम का खातिर चुल पुटुक जाणों आतुर्दि रौंद छा पण हमर खुट सांस्कृतिक नियमों पालन करणों खातिर चुल पुटुक नि जांदा छा बस चुल्लो भैर बिटेन अग्नि दिबता पुजाई करदा छा . वै बगत खुट बि समाज अर संस्कृति नियमो पालन करणम घमंड महसूस करदा छा। अचकाल त खुट बि मनिख जन ह्वे गेन ब्वे बुबों तै बि लते दींदन।

हमर जमानोम जड्डूम गुड़ऐ बड़ी इज्जत हूंदी छे अर हम जड्डूम गुडै चा पींदा छा या गुडै कुटकी दगड़ चा पींदा छा . अब त लौबीइंगौ जमानो च . जख जावो तख लौबीइंग . शक्कर लौबी हरेक राज्यम इथगा ताकतवर ह्वे ग्याइ बल गुड़ लौबी इ खतम ह्वे ग्याइ अर अब त गुड़ - गिन्दोड़ा इतियासो पन्नो मा इ मिल्दन . गुड़ -गिन्दोड़ा बणानो बड़ी बड़ी चासणी -लखड़ो कैंचा पुरात्व विभागों म्युजियमम दिखणो मिल्दन .
 
                              गां मा ह्यूं पोडि गे त त्यौहार जन माहौल ह्वे जांदो छौ . हरेक ब्वे बुखण (खाजा ) भुजदी छे जन कि भट्ट, मर्सू , भंगुल , मुन्गरि -जुंडळु खील आदि .अर बैक लोग अंगेठी चारो तरफ बैठिक तमाखू पींदा पींदा इतिहास विमर्श करदा छा याने लोक कथाओं आदान प्रदान करदा छया या अन्ताक्षरी खिल्दा छा . अब भट्ट, मर्सू , भंगुल , मुन्गरि -जुंडळु हूंदा नी छन त पैकेटोम भर्याँ नमकीन पर जोर रौंद अर अचकाल बैठकुंम तमाखु जगा दारु -शराबन ले आल, अन्ताक्षरी जगा जुवाक ताश बिराजमान ह्वे गेन .इतिहास विमर्श या लोक साहित्य चर्चा जरूर हूंद च पण कै ग्राम परधानन कथगा गोलमाल कार या जवाहर रोजगार योजनाम कै कैक नकली बैक खाता खोल्यां छन जन आधुनिक लोक साहित्य पर चर्चा होंदी।

                                  जलवायु या हवा परिवर्तन से अब हवाम कुछ हौरि हवा च। अब रूम हीटरो आण से लोग बाग़ जड्डू मजा नी लींदन . पैल हम जड्डूम रात्यु खंतड्यु से प्रेमिका से जादा प्रेम करदा छा . अब त रूम हीटरो आण से खंतड्यु महत्व इ बिसरि गेवां .अब हम हवा- बदलणो(एयर -कंडीसनर) यंत्र लै गेवां त हम तै पता इ नि चलद कि हवा कनै बगणी च . अब द्याखो ना हमर प्रधान मंत्री तै अमेरिकाम वित्तीय स्तिथि बाराम पूरो पता रौंद पण प्रधानमंत्री तै इथगा सालोम पता इ नि लग कि लोगम स्त्री प्रातीडन से कथगा आक्रोश च .

Copyright@ Bhishma Kukreti 25/12/2012

Chala Daud Dikhla: Satire Satirizing Run for competition


Critical review of Garhwali satirical- humors prose by Asian satirist - 123

Garhwali language Satirical, sardonic, ridiculing, mocking, spoofing, lampoon, and humorous Prose by regional Asian satirist Bhishma Kukreti -61
Chala Daud Dikhla ‘ (Garh Aina, 10/4/1989), A Garhwali humorous and satiricalmocking, spoofing, lampoon, and humorous article written by regional Asian satirist Bhishma Kukreti 
                       Review By: Bhishma Kukreti

[Notes on satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Garhwali satire by Asian satirist satirizing Run for competition; Uttarakhandi satire by Asian satirist satirizing Run for competition; Mid Himalayan satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Himalayan satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; North Indian satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Indian  satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Indian subcontinent satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; South Asian satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Asian satire Satirizing Run for competition; Oriental satire by Asian satirist Satirizing Run for competition]
           In English literature, the following types of satire are discussed:
                                  Tones of Satire
1-Horatian satire: The Horatian satire means witty, tolerant, wise and self effacing
2-Juvenalian Satire: the Juvenalian Satire consists of angry, resentful, caustic, and personal
3-Mennipean
                                   Satiric strategies or Device  
1-Humor: Exaggeration, understatement, incongruity, deflation, linguistic games, surprise, twisting the end etc
2-Irony (irony, verbal Irony, Dramatic Irony, Socratic irony, situational irony)
3-Inective (harsh, Abusive)
4-Mock Encomium
5-Grotesque
6-Comic juxtaposition
7-Mock epic
8-Paradoy
9-Inflation
10-Diminution
11-Sarcasm
12-Malaporpism
13-Pun
14-Hyperbole
15-Absurdity
16-Euphemism
17-Traversity
18-Berlesque
19- Knaves and fools
                   The Asian satirist Bhishma Kukreti wrote maximum numbers of Satire in Garhwali language literature and he used most of the above satirical devices in Garhwali language.
  In this present article Chala Daud Dikhla (1989), the Asian satirist wrote about the present race for competition in every life.  The Asian Satirist Kukreti talks that everywhere human being is running to get his goal.  Apart from aiming for noble target, the culprits are aiming for harmful object too.
  The satire is not harsh but the tone is simple and humorous.
 विपक्ष्युं माँ प्रधान मंत्री बणनो दौड़ दिखाण बि क्वी खेल  ?
अर गढ़वाळि तै गढ़वाळि बणानो बान प्रकाशक , लेखकसम्पादक ज्वा दौड़ लगाणा छनअर पठनेरूं या हालात  अबि तलक दौड़न  राइ दूर यी उठणा बि नि छन .
अर गढ़वाळम '" - " की राखडी पढ़ाण वाळुम ज्वा छौम्पा दौड़ लगीं  ?


Copyright@ Bhishma Kukreti 24/12/2012
Critical review of Garhwali satirical sardonic, ridiculing, mocking, spoofing, lampoon, an humors prose by Asian satirist to be continued… 124
Garhwali language Satire mocking, ridiculing, spoofing, lampoon and humorous and humorous Prose by regional Asian Satirist Bhishma Kukreti to be continued…62
Commentary  on satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Garhwali satire by Asian satirist satirizing Run for competition; Uttarakhandi satire by Asian satirist satirizing Run for competition; Mid Himalayan satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Himalayan satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; North Indian satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Indian  satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Indian subcontinent satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; South Asian satire by Asian satirist Satirizing Run for competition; Asian satire Satirizing Run for competition; Oriental satire by Asian satirist Satirizing Run for competition to be continued…

Sunday, December 23, 2012

डा शिव प्रसाद डबराल: प्रसिद्ध इतिहासकार


उत्तराखंडौ नामी गिरामि मनिख
                   डा शिव प्रसाद डबराल : प्रसिद्ध इतिहासकार 
                                  भीष्म कुकरेती

प्रसिद्ध वेस्ट इन्डियन इतिहासकार मारकस गार्वे क बुलण छौ बल मि ठोस भाषाम वो इ बुल्दु जां से मेरी कौम अपण इतियास जाणि जावो अर अफु तै पूरी तरां से समझी सौक अर इनि डा शिव प्रसाद डबराल न कौर डा शिव प्रसाद डबराल 'चारण ' न बी यो ही काम कार . डा डबरालन उत्ताराखंड्यु तै बथाई बल तुम क्या छ्या , क्या छंवां अर क्या ह्वे सकदां . डा शिव प्रसाद डबरालक महत्व उत्तराखंडम इनि च जन प्रसिद्ध इतिहास खोजी अर लिखवार मारकस गार्वे , बेन जोकानन ,डा इवान सर्तिदिमा सुजौन हेनरिक क्लार्क ,फ्रांतज़ फ़ेनोन ,हेनरी सेल्वेस्टर ,विलियम्स ,विलियम इडवार्ड ,बुर्गार्ड डुबोईस,जौर्ज पादमोरे ,क्वामे नकुर्मा ,एरिक विलियम्स ,चेख अन्ता डियोप ,ओल सोइंका ,चांसलर विलियम्स, रिचर्ड पंखुरस ,रुनोको राशिदी क च . यूं सबि इतियासकारुन अपण समाजौक इतियास सरा दुन्या तै बथाई .

. डा डबरालौ जनम गौळीम (डबरालस्यूं , गंगा सलाण , पौड़ी गढ़वाल ) 12 नवम्बर 1912म ह्वे छौ। शिव प्रसाद जीक बुबाजी मास्टर छ्या अर पढ़न लिखणो ढब बचपन बिटेन लगी गे छौ . आगरा यूनिवर्सिटी से भुगोलम एम् ए अर पी एच डी कार। डी ए वी इंटर कॉलेज म अध्यापक रैन अर फिर इखी प्रिंसिपल पद से रिटायर ह्वेन .

डा डबरालन 18 किताब उत्तराखंड का इतिहास पर लिखेन , 9 ऐतिहासिक नाटक , चारणऔ नाम से द्वि पोथी , कथगा इ गढ़वाली लोक साहित्य जन ढोल सागर , सुरजी नाग अर आधुनिक साहित्य जन पांखु नाटक कु सम्पादन कार अर यूं किताबु तै अपण प्रिंटिंग प्रेसम छपाई .

डा डबराल शुरूम घुम्मकड़ छ्या अर यां से ऊंन कथगा इ वो ऐतिहासिक तथ्य खुजेन जो आज हरची सकदा छा। डा शिव प्रसाद औ उत्तराखंड का इतिहास (18 भाग ) आज उत्तराखंड की धरोहर छन . जु कै तै बि उत्ताराखंडौ इतिहासम काम करण त डा डबरालक किताब बंच्यां बगैर यु काम नि ह्वे सकुद .
डा डबराल तै भौत सि सन्स्थौन सम्मान दे .

डा शिव प्रसाद डबराल 24 नवम्बर 1999 म इं दुनिया से गेन पण वो अमर छन

Mantri ka nau Kakai Chitthi: Satire Criticizing city life and politicians


Critical review of Garhwali satire, spoof, skit, lampoon Prose -122
Critical Review of Garhwali satire written by great Indian satirist Puran Pant Pathik -15
Review of ‘Mantri ka nau Kakai Chitthi ‘A Garhwali satire written by great regional Indian satirist Puran Pant Pathik (2004)
                                  Review by:  Bhishma Kukreti
[Notes on Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Garhwali Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Uttarakhandi Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Mid Himalayan Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Himalayan Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; North Indian Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Indian Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Asian Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; oriental Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician]

     In Garhwali poetry, Great Indian Satirist Puran Pant Pathik is called master of criticizing sharply the wrong happenings. The great Indian satirist Puran Pant also is expert in satirizing specially politicians in Garhwali satirical prose articles.
The satirical article Mantri ka nau Kakai Chitthi satirizes on two aspects-on politicians and wrong happenings in the capital of Uttarakhand. In this article, great Indian satirist Puran Pant tells about his visit to Dehradun in search of a minister for village developmental work. The satirist takes readers to many parts of Dehradun the capital of Uttarakhand and shows the ridicule happenings in the city.
 The purpose of satire is to show the unpresidential deeds happening in capital and the minister ignoring village developmental works as promised by him at the time of election. The phrases are in Garhwali and are humorous too.
Copyright@ Bhishma Kukreti 23/12/2012
Critical review of Garhwali satire, spoof, travesty, burlesque, mockery, caricature, skit, Parody, Ridicules, making fun of, lampoon Prose to be …123
Critical review of Garhwali satire, spoof, travesty, burlesque, mockery, caricature, skit, Parody, Ridicules, making fun of, lampoon Prose  by great Indian satirist Puran Pant Pathik to be continued…-16
Commentary  on Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Garhwali Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Uttarakhandi Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Mid Himalayan Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Himalayan Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; North Indian Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Indian Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; Asian Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician; oriental Satire by great Indian satirist Criticizing city life and politician to be continued…