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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

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Friday, December 2, 2011

कुमाऊँ की आलेखन परम्परा

कुमाऊँ का प्राचीन इतिहास अनेक कबीलों तथा विभिन्न संस्कृतियों को अपने आँचल में समेटे हुए है। कुमाऊँ में अल्पना तथा भिप्ति चित्रों का प्रत्यक्ष रुप व चलन चन्द शासन काल से होता है। 
 
कुमाऊँ में चन्द वंश की स्थापना का सूत्रपात चम्पावत में सोमचन्द से आरम्भ होता है। सोमचन्द तथा उसके दश वंशजों का शासन... ९७५ ई. से ११७८ ई. तक माना जाता है। इस काल की सबसे उल्लेखनीय घटना इन्द्र चन्द का चीनी राजकन्या से विवाह होना है। इस विवाह के कारण स्थानीय जनता ने विद्रोह कर दिया और उसे तथा उसके शासन काल में बाहर से आये हुए ब्राह्मण, क्षत्रिय (राजपूत) लोगों को कुमाऊँ से बाहर भगा दिया। यह लोग २०० से २५० वर्ष तक कुमाऊँ में नहीं आ सके। परन्तु १३६५ ई. में उन्होंने पुन: काली कुमाऊँ में अपना राज्य स्थापित किया।
 
सबसे ध्यान देने वाली बात यह है कि यहाँ के प्रशासक अथवा शासक राजपूत वर्ग - महरा, फड़त्याल, जिन्ना, जलाल, मनराल, रोतौला, रजबार आदि में यह कला समृद्ध नहीं है और न उनके सांस्कृतिक जीवन का अटूट अंग। ऐपण व भिप्ति चित्रकला परम्परा कुमाऊँ में मात्र साह (साह) व ब्राह्मणों में ही अपने सम्पूर्ण विकसित स्वरुप तथा जीवन के समस्त सांस्कृतिक कार्यकलापों की गहराई की हद तक जुड़ी हुई है। 
 
ब्राह्मणों में पंत व जोशी अपना मूल स्थान महाराष्ट्र व गुजरात मानते हैं। कहा जाता है कि सोम चन्द ८ वीं शताब्दी में गुजरात से ही आकर यहाँ बसा था। दूसरा मान्यता है कि सोम चन्द 'झूसी' इलाहाबाद का राजकुमार था और बैस राजवंश से सम्बन्धित था। तीसरी जनश्रुति कहती है कि सोम चन्द कन्नौज के शासक का भाई था, जो ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अन्तर्गत नये राज्य की कामना हेतु कुमाऊँ में आया था। उसका यहाँ आगमन उसकी बद्रीनाथ यात्रा के निमित्त हुआ था। तत्कालीन शासक ब्रह्मदेव ने अपनी कन्या का विवाह इससे किया और दहेज में चम्पावत के सुई क्षेत्र, दुर्ग तथा तराई की कुछ भूमि भी इसे प्रदान की। इस कथन का साक्ष्य कुमाऊँ क्षेत्र में घसने वाले 'साह' लोगों की इस मान्यता से होता है कि साह अपना पूर्व स्थान 'झूसी' इलाहाबाद को मानते हैं और आज भी साह लोग विशेष रुप से बढ़े-बूढ़े जब कभी प्रयाग व कुम्भ स्नान के लिए जाते हैं, तब झूसी में ही रहना सार्थक समझते हैं। दूसरी बात यह है कि कुमैया साह अपना पूर्ववर्ती स्थान चम्पावत को मानते हैं। इन सब बातों से यही विश्वास होता है कि 'साह' लोग चन्दों के साथ ही बाहर से आये।
 
ऐपणों व भिप्ति चित्रों, जिनको 'लिख थाप' या थापा कहते हैं, में अनेक प्रकार के प्रतीक व लाक्षणिक अन्तर दृष्टिगोचर होते हैं। साहों व ब्राह्मणों के ऐपणों में सबसे बड़ा अन्तर यह है कि ब्राह्मणों में चावल की पिष्ठि निर्मित घोल द्वारा धरातलीय अल्पना अनेक आलेखन प्रतीकों, कलात्मक डिजाइनों, बेलबूटों में प्रकट होती है। साहों में धरातलीय आलेखन ब्राह्मणों के समान ही होते हैं परन्तु इनमें भिप्ति चित्रों की रचना की ठोस परम्परा है। थापा श्रेणी में चित्रांकन दीवलों या कागज में होता है। यह शैली ब्राह्मणों में नहीं के बराबर है। जिन आलेखनों या चित्रों की रचना कागज में की जाती है। उन्हें प कहते हैं। इसी प्रकार नवरात्रि पूजन के दिनों में दशहरे का पट्टा केवल साह लोग बनाते हैं। विवाहोत्सव में विवाहित स्रियों के लिए विशेष प्रकार का कुसुमी पिछौड़ा (विशेष ओढ़नी) सारे कुमाऊँ में प्रचलित है परन्तु इनके निर्माण व रंगों की आभी साह व ब्राह्मणों में विशेष है। साहों के कुसुमी पिछौड़े विशिष्ट रंगों व प्रकाश के कारण तथा केन्देर स्थल के निर्माण के कारण सर्वश्रेष्ठ समझे जाते हैं और यही ब्राह्मणों के कुसुमी पिछौड़े के आलेखन व रंग आभा तथा साहों के कुसुमी पिछौड़े के रंगों के प्रयोग तथा केन्द्र के आलेखन का प्रबल लाक्षणिक अन्तर स्पष्ट करते हैं। ऐपणों में एक स्पष्ट अन्तर यह है कि ब्राह्मण गेरु मिट्टी से धरातल का आलेपन कर चावल के आटे के घोल से सीधे ऐपणों का आलेखन करते हैं परन्तु साहों के यहाँ चावल की पिष्टि के घोल में हल्दी डालकर उसे हल्का पीला अवश्य किया जाता हैं तभी ऐपणों का आलेखन होता है। ज्ञात हुआ कि उच्चकुलीन ब्राह्मणों में जो दीवानों की कोटि में आते हैं, वे भी 'बिस्वार' (चावल की पिष्ठि का घोल) में कच्ची अथवा सूखी हल्दी पीस कर डाल दी जाती है और पीली आभा युक्त ऐपण दिये जाते हैं। 
 
साहों के यहाँ ऐपणों के अन्तर्गत एक और विशेष शैली है, जिसे 'वर' कहा जाता है। क्योंकि इसमें बूँदों तथा उनकी सँख्या द्वारा समान रुप से वरों व डिज़ाईनों का निर्माण किया जाता है। हर डिजाइन व अभिप्राय के लिए बूंदों की अलग-अलग संख्या निर्धारित है। प्रत्येक आलेखन विशेष ज्योमितीय अलंकरण, बूंदों की संख्या, विशेष रंग द्वारी निर्धारित व नामांकित है। पट्टे पर वर बूंद मुख्यत: उपासना या पारिवारिक पूजा गृह में ही सुशोभित रहते हैं। पर बूंदों का चित्रांकन पूजा गृह के अतिरिक्त भी दृष्टिगोचर होता है। यदि उनके निर्माण का कारण जाना जाय तो शत प्रतिशत यह तथ्य उजागर होता है कि अमुक समय में विवाह या यज्ञोपवीत संस्कार उस स्थान पर हुआ था, इसलिए वहाँ वरों का निर्माण हुआ था। थापा पट्टा शैली, ज्यूति मातृका इत्यादि शैलियाँ चम्पावत या संलग्न क्षेत्र में मात्र कुछ ब्राह्मण अथवा साह परिवारों के अतिरिक्त कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होतीं। अन्य इनका ज्ञान नहीं रखते। इन शैलियों की विगत १०० वर्षों से सुरक्षित अनेक रचनाएँ आज भी अल्मोड़ा, रानीखेत में हैं। इनका आलेखन आज भी उसी उत्साह व मान्यताओं के आधार पर होता है जो विगत शताब्दियों से था। प्रयुक्त संकेतों, कोणों, बिन्दुओं, चित्रकृतियों व विभिन्न अनुष्ठानों के लिए विभिन्न संख्या को बिन्दुओं द्वारा निर्मित यंत्र चौकियों के देखने से स्पष्ट होता है कि कुमाऊँ की इस कला में वज्र यानी, शैव व शाक्त तांत्रिक अवुष्ठानों व मान्यताओं का प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ा है।
 
रेखाचित्रों वाले पट्टों व ज्यूतियों में 'जैनशैली' जो अपनी प्रारम्भिक अवस्था में गुजरात में 'अपभ्रंश' शैली के रुप में विकसित व प्रतिष्ठित हुई थी, स्पष्ट रुप से दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त राजस्थानी शैली, जो कि अपभ्रंश शैली का ही विकसित रुप थी व विशेष रुप से 'मालवा शैली', जो राजस्थानी शैली की ही एक धारा है, से भी विकसित होकर उभरी। इसका उदाहरण ज्यूति मात्रिका पट्टा, शेष शय्या (शेषनाग की शय्या पर विराजमान विष्णु व लक्ष्मी), महालक्ष्मी पट्टा, डोर दुबज्योड़ पट्टा, कृष्ण जन्माष्टमी पट्टा व नवदुर्गा पट्टा (नवरात्रि पूजन के समय) में दृष्टिगोचर होता है।
 
कुमाऊँ की ज्यूति मातृका पट्टों, थापों तथा वर बूदों में श्वेताम्बर जैन अपभ्रंश शैली का भी स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है। श्वेताम्बर जैन पोथियों की श्रृंखला में बड़ौदा के निकट एक जैन पुस्तकागार में ११६१ ई. की एक ही पुस्तक में औधनियुक्ति आदि सात ग्रंथ मिले, जिनमें १६ विद्या देवियों, सरस्वती, लक्ष्मी, अम्बिका, चक्र देवी तथआ यक्षों के २१ चित्र बने हैं। इन ग्रंथ चित्रों में चौकोर स्थान बनाकर एक चौखट सी बनाई गई हैं और इनके मध्य में आकृतियाँ बिठाई गई हैं। ठीक इसी प्रकार का चित्र नियोजन कुमाऊँ के समस्त ज्यूति पट्टो, थापों व बखूदों में किया जाता है। कुमाऊँ में ज्यूति पट्टों में महालक्ष्मी, महासरस्वती व महाकाली ३ देवियाँ बनाई जाती है साथ में १६ षोडश मातृकाएं तथा गणेश, चन्द्र व सूर्य निर्मित किये जाते हैं। अपभ्रंश शैली में रंग व उनकी संख्या भी निश्चित है। जैसे लाल, हरा, पीला, काला, बैगनी, नीला व सफेद। इन्हीं सात रंगों का प्रयोग कुमाऊँ की भिप्ति चित्राकृतियों अथवा थापों व पट्टों में किया जाता है। 
 
कुमाऊँ में प्रचलित मुख्य ऐपणों व चौकियों की सविस्तार चर्चा इस प्रकार की जा सकती है - 
सरस्वती पीठ - 
तीन प्रकार से बनाई जाती है। धरातल को पहले गेरु मिट्टी के घोल से लीप लेते हैं। फिर चावल पिष्ठिका (विस्तार) से रेखांकन किया जाता है। साह इसमें पीली आभा लाते हैं व ब्राह्मण विस्तार का रंग सफेद ही रहने देते हैं।
(अ) ९ (नौ) बिन्दुओं द्वारा इसका निर्माण होता है। इन बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़ा जाता है कि आठ (८) भद्र स्वरुप निकल आते हैं। यह कृति सरस्वती चौकी या अष्टदल कंवल कहलाती है। इसको बनाने के बाद ही इस पर देव प्रतिमाएँ स्थापित की जाती है।
 
(ब) सरस्वती पीठ में ९ (नौ) बिन्दु बनाये जाते हैं और इन्हें रेखा द्वारा इस प्रकार एक दुसरे से मिलाया जाता है कि ९ (नै) षोडश या स्वस्तिक बन जाते हैं। इस पीठ का निर्माण नवरात्रियों में देव स्थापना व पूजन हेतु किया जाता है। 
 
(स) एक तारा का निर्माण किया जाता है। इसके ५ (पांच) कोण होते हैं। इसे स्वस्तिक यंत्र, पंच शिखा या पंचानन भी कहा जाता है। यह चिन्ह सृष्टि की रचना का सूचक है। इसके ५ कोण पांच तत्वों - पृथ्वी, जल, आकाश, वायु, अग्नि - के द्योतक हैं। महा उग्र तारा यंत्र भी ५ कोणीय या शिखा वाला होता है। इस यंत्र को जटा शंकरी भी कहा जाता है। मुख्यत: इसका प्रयोग अध्र्य स्थापना व देव स्थल के मुख्य दीया जलाने के समय किया जाता है। इसे निर्मित कर इसके ऊपर मुख्य दिये को रख दिया जाता है। 
 
(द) सरस्वती या श्री यंत्र देवी चौकी २ (दो) समत्रिबाहु त्रिभुजों को एक दूसरे के विपरीत तथा ऊपर बैठाकर किया जाता है। इसमें ६ भुजाऐं तथा ६ कोण होते हैं। यह काली या नवदुर्गा पूजन के कार्य में निर्मित होती है।
 
महालक्ष्मी पूजन हेतु चौकी का निर्माण - इस चौकी का निर्माण ९ (नौ) बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। सरस्वती चौकी अथवा अष्टदल कंवल की ही भांति होती है। अन्तर मात्र यह होता है कि चौकी के चारों ओर दो पाँवों की छाप बनाई जाती है। इसका आयोजन इस प्रकार होता है कि पाँवों की छाप एक अलंकृत बेल की तरह दृष्टिगोचर होती है। कहीं-कहीं कोई परिवार ८ (अष्ट) कोणीय कमल का निर्माण करते हैं।
जनेऊ पीठ - जनेऊ पीठ या यंत्र का निर्माण षट्कोण के अन्दर प्रत्येक भुजा पर आठ (८) बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। इसी प्रकार मध्य भाग में बराबर दूरी में तथा समानान्तर ८ बिन्दुओं का अंकन किया जाता है। मध्य भागीय बिन्दुओं को रेखा द्वारा इस प्रकार जोड़कर व्यवस्थित किया जाता है कि रचना ७ श्री यंत्रों की छटा लिए हुए प्रकट होती है। इन्हें सप्तॠषि मण्डल कहा जाता है। यह हैं कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, जमदग्नि, गौतम, विश्वामित्र तथा वशिष्ठ। इस सम्पूर्ण यंत्र के शीष में मुकुट तथा दाईं व बाईं तरफ २-२ हाथ अथवा कांगें तथा चरण पीठ बनाई जाती है। इस यंत्र को मां गायत्री देवी के रुप में चतुर्भुजी माना जाता है। इस यंत्र का निर्माण जनेऊ या उपनयन संस्कार के समय अत्यावश्यक होता है।
 
शिव पीठ यंत्र - इस यंत्र स्वरुप अल्पना का आलेखन १२न्१२ बिन्दुओं द्वारा, दूसरे प्रकार में १६न्१६ बिन्दुओं द्वारा किया जाता है। बाह्य धरातल को कुण्डी (ताम्र पात्र) के स्वरुप में अंकित किया जाता है। ईषाण व ऊषाण का अंकन होता है। यह श्रावण मास में शिव पूजन हेतु बनाई जाती है।
 
सूर्य चौकी - इसका निर्माण नामकरण संस्कार के बाद नव शिशु को बाहर प्रकाश में लाये जाने पर किया जाता है। इसके अतिरिक्त इसका निर्माण सूर्य व्रत के उपलक्ष्य में रविवार को पौष माह में भी किया जाता है। इसमें चन्द्र, सूर्य, शुक्र (विष्णु-लक्ष्मी), अठ जल (अष्ट कोणीय यंत्र), शंख, घंटा, कुण्डी या चक्र आसन, आरती, गड़ु़वा, धूपदान पुन: आसन निर्मित किया जाता है।
 
स्यो - नामकरण संस्कार के बाद छटी का चाक विसर्जन करने नौला जाते हैं। तब आंगन में स्यो का चित्रांकन अल्पना द्वारा होता है। ब्राह्मणों तथा साहों में अलग-अलग प्रकार का स्यो बनता है। ब्राह्मणों में कमल दलो का सिंहासन सदृश स्यो निर्मित होता है। सबसे नीचे ५ कमल पंखुड़ियाँ निर्मित की जाती है, उनके स्वर ४,३,२,१ के हिसाब से निर्माण होता है। ऊपर शीर्षमुकुट नीचे पद वेदी बनती है। साहों में स्यो कलश या गडुवे के रुप में बनता है।
 
नाता - साहों में नातों का निर्माण व मान्यता विशिष्ट है। नाते दो समय अथवा कालों में बनाये जाते हैं। इनका अलंकरण व रेखांकन केवल चूल्हे या भोजन कक्ष में होताहै। जो नाते चैत्र मास में बनाये जाते हैं उन्हें चैतु नाता कहते हैं। इसके बाद दीपावली में नातों को बनाया जाता है। यह भी ऐपण का प्रकार है जो केवल पीली मिट्टी के धरातल पर बिस्वार से अंकित किया जाता है। बाईं और विशिष्ट शैली में अंगुलियों की पोरों से ३ मानवीय आकृतियां बनाई जाती हैं जिनके हाथ एक दूसरे के हाथों को पकड़े हुए बनाये जाते हैं। यह सामंती युगीन मान्यता की अभिव्यक्ति है कि अमुक परिवार में भोजन कक्ष में ब्राह्मण, क्षत्रिय व वैश्य ३ सवर्ण जातियों के लोग ही भोजन खाने के अधिकारी हैं। दाईं ओर लक्ष्मी व नारायण का नाता रेखांकित किया जाता है जो पवित्रता व धन धान्य दाता व पालककर्त्ता समझे जाते हैं। मध्य में धान की बालियों के प्रतीक चिन्हों के अंकन द्वारा परिवार के सदस्यों तथा निकट सम्बन्धियों की संख्या दर्शाई जाती है। यह एक प्रकार से सम्मिलित परिवार की सदस्य संख्या का लेखा जोखा अंकित करता है। यह दो प्रकार से बनाये जाते हैं (अ) अल्मोड़ा शैली (ब) बागेश्वर शैली।
 
धुँया - इसका आलेखन दीपावली के दिन अमावस्या के बाद बड़ी एकादशी (१२ दिन के बाद) को किया जाता है। इसे बूढ़ी दीपावली कहते हैं। इसका आलेखन सूप में किया जाता है। इसकी कल्पना सूप से समान पंख युक्त पक्षी की होती है। कुछ लोग गरुढ़ आरुढ़ नारायण की बात इसके लिए कहते हैं। मान्यता है कि पारिवारिक क्लेश, दरिद्रता को दूर करने की कल्पना से इनका निर्माण होता है।
 
धूलि अध्र्य की चौकी - यह कमल के आकार की अल्पना है। इसका कलेवर गड़ु़वा (टोंटीदार कलश) की तरह अंकित किया जाता है। केन्द्र स्थल यज्ञ वेदी के समतुल्य अंकित किया जाता है। आड़ी तिरछी चार रेखाऐं बनाई जाती हैं, जो अरणी-भरणी यज्ञ काष्ठ की द्योतक होती है। इसका फैलाव केन्द्र स्थल से बाहर की ओर बढ़ता जाता है। अंकन के लिए कमल दल के प्रधानता दी जाती है। इसका स्वरुप गोलाई लिये हुए कलश की तरह बनाया जाता है। दोनों ओर २-२ हाथ की तरह फांगे अलंकृत हाथी की सूँड की तरह बनाये जाते हैं। इनके अन्तिम सिरे पर गगरी बनाई जाती है। यह विष्णु स्वरुप पवित्र समझा जाता है। शीर्ष के मुकुट व नीचे पाँवों की ओर पाठ निर्मित की जाती है। इसमें विष्णु प्रतीक शंख, चक्र, गदा, पद्म अंकित किये जाते हैं। विवाह की र सर्वप्रथम इसी से प्रारम्भ होती है। कन्या का पिता वर का स्वागत, चरण प्रक्षालन व अध्र्य दान संकल्प सहित, वर को इसी चौकी पर खड़ा करके कन्या का दान करता है तथा भेंट देता है।
अब उन चित्रांकनों का विवरण दिया जा रहा है जिनमें चावल पिष्ठिका घोल व गेरु का प्रयोग नहीं किया जाता वरन् विभिन्न रंगों - लाल, चटख लाल, हरा, पीला, नीला, बौजनी, काला व सफेद - को प्रयोग में लाया जाता है।
 
मुहाली, द्वार मातृ, माई तथा विजन - इनका निर्माण विवाहोत्सव में मुख्य द्वार के सौन्दर्यीकरण के लिये किया जाता है। माई, विजन व द्वार मातृ बुरी दृष्टि व अशुभ को दूर करने की कामना से चित्रित किये जाते हैं।
 
विवाह का ज्यूति पट्टा - इसमें महाकाली, महालक्ष्मी व महासरस्वती केन्द्र में बनाई जाती है। इनके साथ गणेश, सूर्य, चन्द्र व १६ मातृकाएं अंकित की जाती है। इन्हें चौकोर रेखिकीय चौखट में अंकित कर बाहर की ओर मछिया सिंगालिया अथवा खोडस वरों से अलंकृत किया जाता है। शीर्ष पर बड़े हिमालय व छोटे हिमालय का अंकन किया जाता है। इन सबके शीर्ष पर 'हलयाली बोट' - हरा पेड़ जो कल्पतरु माना जाता है, कमल (८ पंखुडियों वाला), शुक - सारिका (लक्ष्मी-नारायण) व दो हरे तोतों का निर्माण किया जाता है। राधा कृष्ण का चित्रांकन मनुष्याकृति में किया जाता है। शुकसारिका, शेष नाग की शय्या में लेटे हुए विष्णु व चरणों के पास लक्ष्मी तथा नाभि से उत्पन्न कमल पर ब्रह्मा की कल्पना को विशिष्ट रेखाओं द्वारा निर्मित किया जाता है। 
 
यज्ञोपवीत का ज्यूति पट्टा - इसका निर्माण विवाह ज्यूति की ही तरह होता है। मुख्य अन्तर यह है कि शीर्ष पर विष्णु-लक्ष्मी या कृष्ण-राधा की मानवीय प्रतिमा का रेखांकन नहीं होता। दूसरा अन्तर है शीर्ष पर बाईं ओर सप्त ॠषि मण्डल का जनेऊ पीरु की तरह बनाया जाता है तथा दाहिनी ओर छापरी (भिक्षा पक्ष का निर्माण) किया जाता है। मान्यता है कि 'गिरह जाग' पर बालक चुन्डित मुन्डित हो एक कौपीन मात्र पहनकर ब्रह्मचर्याश्रम में प्रविष्ट करता है तथा विद्या अध्ययन के लिए काशी में अपने गुरु के पास जाता है। ब्रह्मचर्याश्रम में भिक्षा द्वारा ही अपना व गुरु पोषण का दायित्व वहन करता है। अध्ययन के उपरान्त उसका उपनयन व यज्ञोपवीत संस्कार किया जाता है। अत: इस अवसर पर ज्यूति पट्टे की पूजा अर्चना की जाती है। 
 
छट्टी की ज्यूति व सामान्य ज्यूति - यह ज्यूति पट्टा भी विवाह ज्यूति पट्टे की तरह ही होता है। परन्तु इसमें शीर्ष पर लक्ष्मी नारायण या राधकृष्ण की मानवीय अवयवों से युक्त प्रतिमा का आलेखन नहीं किया जाता है। बाकी अलंकरण व स्वरुप का विन्यास अन्य ज्यूतियों की तरह ही किया जाता है।
 
ज्यूति मातृका चौकी - इसका निर्माण काष्ठ चौकी को हल्दी से रंग दिया जाता है। इसमें समस्त अलंकरण लाल रंग की रेखाओं द्वारा निर्मित किये जाते हैं। इसमें न तो किसी प्रकार के 'वर' बनाये जाते हैं और न 'छज्जा' बेल को बनाया जाता है। अन्य सभी प्रतीक व अलंकरण विवाह ज्यूति की तरह ही होते हैं। इसमें भी लक्ष्मी नारायण या राधा कृष्ण की युगल मानवीय आकृति नहीं बनाई जाती।
 
जन्माष्टमी का पट्टा या थापा - सर्वप्रथम शिव पार्वती बनाये जाते हैं। उसके उपरान्त दशावतार निर्मित किये जाते है। शिव की जटाओं से गंगा व यमुना का उद्गम निर्मित किया जाता है। इसके उपरान्त कृष्ण की विस्तृत लीलाएं दर्शायी जाती हैं। इनकी अभिव्यक्ति पूर्णत: सुखसागर, भागवत के अतिरिक्त ब्रह्मपुराण व विष्णुपुराण के अनुसार होती है। इसमें गोवर्धन धारण इत्यादि को अंकित किया जाता है। चारों ओर सुन्दर गौ पुच्छ लता निर्मित की जाती है।
 
हरशयनी पट्टा - इस थापे में विष्णु को शेषनाग की शैय्या पर लेटा हुआ तथा चरणों को दबाते हुए लक्ष्मी दर्शाई जाती है। क्षीरसागर का निर्माण किया जाता है। प्रतीक रुप से नीले गहन जल में मछली तथा कछुवा और नाभि से उत्पन्न कमल व उस पर चार मुख वाले ब्रह्म रेखांकित किये जाते है। चारों ओर घंटी या लगुली बेल बनाई जाती है।
 
हर बोधिनी पट्टा - इसे तुलसी विवाह के अवसर पर मात्र लाल रंग से निर्मित किया जाता है। यह एक प्रकार की चौकी होती है। इसे १२ (बारह) बिन्दुओं से निर्मित किया जाता है। उसमें ४ भद व एक कँवल बनता है। इसे भी चारों ओर से सुन्दर लता व पुष्पों के निर्माण से भव्य रुप दिया जाता है। इसे 'बाल भद्र' के नाम से जाना जाता है। 
 
दूर्वाष्टमी और डोर दुवज्योड़ा पट्टा - इसमें सात रानिया, एक नौला (जल भरने का कूप), नौले में बच्चा बनाया जाता है। बच्चे के एक हाथ में माँ के गले में पड़े तागे को पकड़ रखा है। यह तागा डोर कहलाता है तथा हाथ में भुज दण्ड की तरह ३ पल्ले का धागा औरतें धारण करती हैं। इन्हें दुबज्योड़ा कहते हैं। यह एक प्रकार से स्रियों द्वारा जनेऊ की तरह पवित्र समझकर धारण किया जाता है। इन पर २-२ चिड़ियाँ बैठाई जाती है। इसका निर्माण लोक कथा पर आधारित है।
 
ॠषिपंचमी व नागपंचमी पट्टा - इसमें वामनावतार (विष्णु) तथआ सप्त ॠषि बनाये जाते हैं। विशेष आकृति युक्त नाग जोड़े में होते हैं।
 
महालक्ष्मी का पट्टा - इसमें ३ छत्र बनाये जाते हैं। ८ पंखुड़ियों वाले कमल में चार भुजाओं वाली महालक्ष्मी को बनाया जाता है। बाईं तरफ के हाथों में चक्र व पद्म बनाया जाता है तथा दाईं तरफ के हाथों में त्रिशूल। नीचे ९ बिन्दु वाली सरस्वती चौकी या 'घृत कंवल' बनाया जाता है। लक्ष्मी के दोनों ओर दो-दो हाथी सूंड उठाकर जल कलश से लक्ष्मी का प्रक्षालन करते हैं। उसके नीचे दोनों ओर अठजल (जल कुण्ड आठ भुजाओं वाले) बनाये जाते हैं।
 
नवदुर्गा पट्टा - यह पट्टा साह वंश में ही प्रचलित है और कुमाऊँ की मान्यताओं, धार्मिक विश्वासों व अंकन शैली का प्रतीक है। इसमें मुख्यत: पीला, लाल, नीला, काला तथा हरा रंग प्रयोग में लाया जाता है। इसका धरातल पीला बनाया जाता है। उसके उपरान्त ही अन्य प्रतीक, आकृतियाँ तथा मंत्रों का आलेखन होता है। चौकोर या आयताकार पट्टे के चारों ओर सुन्दर किनारे का निर्माण किया जाता है। उसके उपरान्त ही मुख्य पट्टे का आलेखन प्रारम्भ होता है। इसका प्रयोग विशेषरुप से आश्विन मास की नवरात्रियों में भगवती पूजन व व्रत के लिए होता है।
 
कुमाऊँ में भिप्ति - चित्रण व अलंकरण की कोटि के अन्तर्गत वर-बूंद आते हैं, जो निम्न प्रकार के हैं - सूरजी वर, गुलाब चमेली वर, मुष्टि वर, अलमोड़िया खोडस, गलीची वर, विशिष्ट गलीचीवर, कटारी वर, २० बिन्दु का संगलिया वर, २२ बिन्दु का संगलिया वर, १६ बिन्दु का भद्र वर, १९ बिन्दु का भद्र, स्वास्तिक फूल या ६ फूल वर, २४ बिन्दु का, ६ फूल वर, २२ बिन्दु का, घौर तिलक ३७ बिन्दु का वर, हर हर मण्डल वर, ३७ बिन्दु का नींबू वर, ९ (नौ) बिन्दु का मछिया वर, खोड्स वर या खोड्स वर, २२ बिन्दु का, खोड्स वर २४ बिन्दु का, खोड्स वर ६ बिन्दु का, खोड्स वर १२ बिन्दु का।
 
कुमाऊँनी ऐपणों को अगर सूक्ष्मता से देखा जाए तो बोध होता है कि इन पर बंगाल का स्पष्ट प्रभाव है। भले ही कुछ प्रतीक व नाम शुद्ध कुमाऊँनी भाषा व क्षेत्र के ही हैं परन्तु पूर गठन बंगाल की अल्पना के प्रभाव से पूर्ण दिखाई देता है। १६वीं सदी के तारानाथ, जो तिब्बती इतिहासकार थे, द्वारा लिखित इतिहासकार से ज्ञात होता है कि ७वीं सदी में पश्चिमी भारत में 'भाखड़' से एक चित्र शैली प्रचलित हुई और ९वीं सदी से पूर्वी भारत में भी एक शैली का प्रचलन हो चला था। पहले नेपाल के चित्रकार पश्चिम भारतीय शैली में काम करते थे परन्तु बाद को उन्होंने पूर्वी शैली को अपना लिया। यह पूर्वी शैली ही आगे चलकर 'सेन' और 'पाल' शैली कहलाई। इस शैली में जहाँ चित्रों का निर्माण मात्र लाल, पीला, नीला, काला, सफेज, बैगनी रंगो में होता था, वहीं चित्रांकन उसी प्रकार होता था जिस प्रकार कुमाऊँ में लिख थापों व वर बूंदों में। बंगाल में सेन व पाल शासन में अनेक वज्रयानी (तांत्रिक) स्थविर प्रगट हुए तथा उस समय तांत्रिक बैद्ध (वज्रयानी) केवल नेपाल, बिहार तथा बंगाल में ही शेष रह गए थे और तिब्बत बज्रयानी लामावाद का दुर्ग बन चुका था। इसलिए कुमाऊँ के वर बूंद, जो १२ या १३ प्रकार के हैं, के विषय में कुमाऊँ की वयोवृद्ध जानकारों का कहना है कि यह कला भोट देश अर्थात् तिब्बत से आयी है। मान्यतानुसार शिव का स्थान कैलाश पर्वत तथा विष्णु का मानसरोवर दोनों भोट प्रदेश (तिब्बत) में हैं। इसी प्रकार शिव-पार्वती व विष्णु की पूजा अर्चना के लिए हर हर मण्डल व गौर तिलक का निर्माण किया जाता है।
 
कुमाऊँनी ऐपणों में चावल पिष्टि के घोल का प्रयोग करते हैं, उसी प्रकार बंगाल के ऐपणों का निर्माण व आलेखन होता है। बंगाल में कृषि विषयक लौकिक आचार तथा अनुष्ठान की अल्पना है। कुमाऊँ में भी इसी प्रयोजन के लिए लोक संस्कृति में हरेला, डिकरा, बिरुड़िया व डोर दुबज्योड़ पूजा का विधान व थापे तथा ऐपण हैं।
 
कुमाऊँ में लक्ष्मी व्रत व पूजा के लिए अल्पना द्वारा षट् कोणीय श्रीयंत्र का मध्य में निर्माण कर अथवा सरस्वती पीठ का निर्माण कर अष्ट दल कमल से घेर दिया जाता है। तत्पश्चात चारों सम्पूर्ण क्षेत्र को विभिन्न पुष्पों व लताओं के प्रतीकों से भर दिया जाता है।
 
कुमाऊँ में विवाहोत्सव अवसर पर रंगों द्वारा भी चित्रों का निर्माण किया जाता है जैसे - ज्यूति पट्टा (विवाह का), वर बूंद, मातृका चौकी (काष्ठ पर), पंच पात्रों (पांच प्रकार के बर्तन) व जाल के साथ भेंट की जाने वाली विवाह चौकी। यह वर व कन्या पक्ष दोनों बनाते है।
by पं. भास्कर जोशी

म्यर गेवाड़ घाटी की अमर प्रेम कथा

यह कहानी कोई हज़ार साल पुरानी है, कुमांऊं के पहले राजवंश कत्‍यूर के किसी वंशज को लेकर यह कहानी है, उस समय कत्‍यूरों की राजधानी बैराठ वर्तमान चौखुटिया थी। जनश्रुतियों के अनुसार बैराठ में तब राजा दुलाशाह शासन करते थे, उनकी कोई संतान नहीं थी, इसके लिए उन्‍होंने कई मनौतियां मनाई। अन्‍त में उन्‍हें किसी ने बताया कि वह बागनाथ (बागेश्वर) में शिव की अराधना करे तो उन्‍हें संतान की प्राप्‍ति हो सकती है। वह बागनाथ के मंदिर गये वहां उनकी मुलाकात भोट के व्‍यापारी सुनपत शौका और उसकी पत्‍नी गांगुली से हुई, वह भी संतान की चाह में वहां आये थे। दोनों ने आपस में समझौता किया कि यदि संतानें लड्का और लड्की हुई तो उनकी आपस में शादी कर देंगें। ऐसा ही हुआ भगवान बागनाथ की कृपा से बैराठ के राजा का पुत्र हुआ, उसका नाम मालूशाही रखा गया। सुनपत शौका के घर में लडकी हुई, उसका नाम राजुला रखा गया। समय बीतता गया, जहां बैराठ में मालू बचपन से जवानी में कदम रखने लगा वहीं भोट में राजुला का सौन्‍दर्य लोगों में चर्चा का विषय बन गया। वह जिधर भी निकलती उसका लावण्‍य सबको अपनी ओर खींचता था।
 
पुत्र जन्म के बाद राजा दोलूशाही ने ज्योतिषी को बुलाया और बच्चे के भाग्य पर विचार करने को कहा। ज्योतिषी ने बताया कि “हे राजा! तेरा पुत्र बहुरंगी है, लेकिन इसकी अल्प मृत्यु का योग है, इसका निवारण करने के लिये जन्म के पांचवे दिन इसका ब्याह किसी नौरंगी कन्या से करना होगा।” राजा ने अपने पुरोहित को शौका देश भेजा और उसकी कन्या राजुला से ब्याह करने की बात की, सुनपति तैयार हो गये और खुशी-खुशी अपनी नवजात पुत्री राजुला का प्रतीकात्मक विवाह मालूशाही के साथ कर दिया। लेकिन विधि का विधान कुछ और था, इसी बीच राजा दोलूशाही की मृत्यु हो गई। इस अवसर का फायदा दरबारियों ने उठाया और यह प्रचार कर दिया कि जो बालिका मंगनी के बाद अपने ससुर को खा गई, अगर वह इस राज्य में आयेगी तो अनर्थ हो जायेगा। इसलिये मालूशाही से यह बात गुप्त रखी जाये।
 
धीरे-धीरे दोनों जवान होने लगे….राजुला जब युवा हो गई तो सुनपति शौका को लगा कि मैंने इस लड़की को रंगीली वैराट में ब्याहने का वचन राजा दोलूशाही को दिया था, लेकिन वहां से कोई खबर नहीं है, यही सोचकर वह चिंतित रहने लगा। 
एक दिन राजुला ने अपनी मां से पूछा कि
 
” मां दिशाओं में कौन दिशा प्यारी?
पेड़ों में कौन पेड़ बड़ा, गंगाओं में कौन गंगा?
देवों में कौन देव? राजाओं में कौन राजा और देशों में कौन देश?”
 
उसकी मां ने उत्तर दिया ” दिशाओं में प्यारी पूर्व दिशा, जो नवखंड़ी पृथ्वी को प्रकाशित करती है, पेड़ों में पीपल सबसे बड़ा, क्योंकि उसमें देवता वास करते हैं। गंगाओं में सबसे बड़ी भागीरथी, जो सबके पाप धोती है। देवताओं में सबसे बड़े महादेव, जो आशुतोष हैं। राजाओं में राजा है राजा रंगीला मालूशाही और देशों में देश है रंगीली वैराट”
 
तब राजुला धीमे से मुस्कुराई और उसने अपनी मां से कहा कि ” हे मां! मेरा ब्याह रंगीले वैराट में ही करना। इसी बीच हूण देश का राजा विक्खीपाल सुनपति शौक के यहां आया और उसने अपने लिये राजुला का हाथ मांगा और सुनपति को धमकाया कि अगर तुमने अपनी कन्या का विवाह मुझसे नहीं किया तो हम तुम्हारे देश को उजाड़ देंगे। इस बीच में मालूशाही ने सपने में राजुला को देखा और उसके रुप को देखकर मोहित हो गया और उसने सपने में ही राजुला को वचन दिया कि मैं एक दिन तुम्हें ब्याह कर ले जाऊंगा। यही सपना राजुला को भी हुआ, एक ओर मालूशाही का वचन और दूसरी ओर हूण राजा विखीपाल की धमकी, इस सब से व्यथित होकर राजुला ने निश्च्य किया कि वह स्व्यं वैराट देश जायेगी और मालूशाही से मिलेगी। उसने अपनी मां से वैराट का रास्ता पूछा, लेकिन उसकी मां ने कहा कि बेटी तुझे तो हूण देश जाना है, वैराट के रास्ते से तुझे क्या मतलब। तो रात में चुपचाप एक हीरे की अंगूठी लेकर राजुला रंगीली वैराट की ओर चल पड़ी।
 
वह पहाड़ों को पारकर मुनस्यारी और फिर बागेश्वर पहुंची, वहां से उसे कफू पक्षी ने वैराट का रास्ता दिखाया। लेकिन इस बीच जब मालूशाही ने शौका देश जाकर राजुला को ब्याह कर लाने की बात की तो उसकी मां ने पहले बहुत समझाया, उसने खाना-पीना और अपनी रानियों से बात करना भी बंद कर दिया। लेकिन जब वह नहीं माना तो उसे बारह वर्षी निद्रा जड़ी सुंघा दी गई, जिससे वह गहरी निद्रा में सो गया। इसी दौरान राजुला मालूशाही के पास पहुंची और उसने मालूशाही को उठाने की काफी कोशिश की, लेकिन वह तो जड़ी के वश में था, सो नहीं उठ पाया, निराश होकर राजुला ने उसके हाथ में साथ लाई हीरे की अंगूठी पहना दी और एक पत्र उसके सिरहाने में रख दिया और रोते-रोते अपने देश लौट गई। सब सामान्य हो जाने पर मालूशाही की निद्रा खोल दी गई, जैसे ही मालू होश में आया उसने अपने हाथ में राजुला की पहनाई अंगूठी देखी तो उसे सब याद आया और उसे वह पत्र भी दिखाई दिया जिसमें लिखा था कि ” हे मालू मैं तो तेरे पास आई थी, लेकिन तू तो निद्रा के वश में था, अगर तूने अपनी मां का दूध पिया है तो मुझे लेने हूण देश आना, क्योंकि मेरे पिता अब मुझे वहीं ब्याह रहे हैं।” यह सब देखकर राजा मालू अपना सिर पीटने लगे, अचानक उन्हें ध्यान आया कि अब मुझे गुरु गोरखनाथ की शरण में जाना चाहिये, तो मालू गोरखनाथ जी के पास चले आये।
 
गुरु गोरखनाथ जी धूनी रमाये बैठे थे, राजा मालू ने उन्हें प्रणाम किया और कहा कि मुझे मेरी राजुला से मिला दो, मगर गुरु जी ने कोई उत्तर नहीं दिया। उसके बाद मालू ने अपना मुकुट और राजसी कपड़े नदी में बहा दिये और धूनी की राख को शरीर में मलकर एक सफेद धोती पहन कर गुरु जी के सामने गया और कहा कि हे गुरु गोरखनाथ जी, मुझे राजुला चाहिये, आप यह बता दो कि मुझे वह कैसे मिलेगी, अगर आप नहीं बताओगे तो मैं यही पर विषपान करके अपनी जान दे दूंगा। तब बाबा ने आंखे खोली और मालू को समझाया कि जाकर अपना राजपाट सम्भाल और रानियों के साथ रह। उन्होंने यह भी कहा कि देख मालूशाही हम तेरी डोली सजायेंगे और उसमें एक लडकी को बिठा देंगे और उसका नाम रखेंगे, राजुला। लेकिन मालू नहीं माना, उसने कहा कि गुरु यह तो आप कर दोगे लेकिन मेरी राजुला के जैसे नख-शिख कहां से लायेंगे? तो गुरु जी ने उसे दीक्षा दी और बोक्साड़ी विद्या सिखाई, साथ ही तंत्र-मंत्र भी दिये ताकि हूण और शौका देश का विष उसे न लग सके।
 
तब मालू के कान छेदे गये और सिर मूड़ा गया, गुरु ने कहा, जा मालू पहले अपनी मां से भिक्षा लेकर आ और महल में भिक्षा में खाना खाकर आ। तब मालू सीधे अपने महल पहुंचा और भिक्षा और खाना मांगा, रानी ने उसे देखकर कहा कि हे जोगी तू तो मेरा मालू जैसा दिखता है, मालू ने उत्तर दिया कि मैं तेरा मालू नहीं एक जोगी हूं, मुझे खान दे। रानी ने उसे खाना दिया तो मालू ने पांच ग्रास बनाये, पहला ग्रास गाय के नाम रखा, दूसरा बिल्ली को दिया, तीसरा अग्नि के नाम छोड़ा, चौथा ग्रास कुत्ते को दिया और पांचवा ग्रास खुद खाया। तो रानी धर्मा समझ गई कि ये मेरा पुत्र मालू ही है, क्योंकि वह भी पंचग्रासी था। इस पर रानी ने मालू से कहा कि बेटा तू क्यों जोगी बन गया, राज पाट छोड़कर? तो मालू ने कहा-मां तू इतनी आतुर क्यों हो रही है, मैं जल्दी ही राजुला को लेकर आ जाऊंगा, मुझे हूणियों के देश जाना है, अपनी राजुला को लाने। रानी धर्मा ने उसे बहुत समझाया, लेकिन मालू फिर भी नहीं माना, तो रानी ने उसके साथ अपने कुछ सैनिक भी भेज दिये।
 
मालूशाही जोगी के वेश में घूमता हुआ हूण देश पहुंचा, उस देश में विष की बावडियां थी, उनका पानी पीकर सभी अचेत हो गये, तभी विष की अधिष्ठात्री विषला ने मालू को अचेत देखा तो, उसे उस पर दया आ गई और उसका विष निकाल दिया। मालू घूमते-घूमते राजुला के महल पहुंचा, वहां बड़ी चहल-पहल थी, क्योंकि विक्खी पाल राजुला को ब्याह कर लाया था। मालू ने अलख लगाई और बोला ’दे माई भिक्षा!’ तो इठलाती और गहनों से लदी राजुला सोने के थाल में भिक्षा लेकर आई और बोली ’ले जोगी भिक्षा’ पर जोगी उसे देखता रह गया, उसे अपने सपनों में आई राजुला को साक्षात देखा तो सुध-बुध ही भूल गया। जोगी ने कहा- अरे रानी तू तो बड़ी भाग्यवती है, यहां कहां से आ गई? राजुला ने कहा कि जोगी बता मेरी हाथ की रेखायें क्या कहती हैं, तो जोगी ने कहा कि ’मैं बिना नाम-ग्राम के हाथ नहीं देखता’ तो राजुला ने कहा कि ’मैं सुनपति शौका की लड़की राजुला हूं, अब बता जोगी, मेरा भाग क्या है’ तो जोगी ने प्यार से उसका हाथ अपने हाथ में लिया और कहा ’चेली तेरा भाग कैसा फूटा, तेरे भाग में तो रंगीली वैराट का मालूशाही था’। तो राजुला ने रोते हुये कहा कि ’हे जोगी, मेरे मां-बाप ने तो मुझे विक्खी पाल से ब्याह दिया, गोठ की बकरी की तरह हूण देश भेज दिया’। तो मालूशाही अपना जोगी वेश उतार कर कहता है कि ’ मैंने तेरे लिये ही जोगी वेश लिया है, मैं तुझे यहां से छुड़ा कर ले जाऊंगा’।
 
तब राजुला ने विक्खी पाल को बुलाया और कहा कि ये जोगी बड़ा काम का है और बहुत विद्यायें जानता है, यह हमारे काम आयेगा। तो विक्खीपाल मान जाता है, लेकिन जोगी के मुख पर राजा सा प्रताप देखकर उसे शक तो हो ही जाता है। उसने मालू को अपने महल में तो रख लिया, लेकिन उसकी टोह वह लेता रहा। राजुला मालु से छुप-छुप कर मिलती रही तो विक्खीपाल को पता चल गया कि यह तो वैराट का राजा मालूशाही है, तो उसने उसे मारने क षडयंत्र किया और खीर बनवाई, जिसमें उसने जहर डाल दिया और मालू को खाने पर आमंत्रित किया और उसे खीर खाने को कहा। खीर खाते ही मालू मर गया। उसकी यह हालत देखकर राजुला भी अचेत हो गई। उसी रात मालू की मां को सपना हुआ जिसमें मालू ने बताया कि मैं हूण देश में मर गया हूं। तो उसकी माता ने उसे लिवाने के लिये मालू के मामा मृत्यु सिंह (जो कि गढ़वाल की किसी गढ़ी के राजा थे) को सिदुवा-विदुवा रमौल और बाबा गोरखनाथ के साथ हून देश भेजा।
 
सिदुवा-विदुवा रमोल के साथ मालू के मामा मृत्यु सिंह हूण देश पहुंचे, बोक्साड़ी विद्या का प्रयोग कर उन्होंने मालू को जीवित कर दिया और मालू ने महल में जाकर राजुला को भी जगाया और फिर इसके सैनिको ने हूणियों को काट डाला और राजा विक्खी पाल भी मारा गया। तब मालू ने वैराट संदेशा भिजवाया कि नगर को सजाओ मैं राजुला को रानी बनाकर ला रहा हूं। मालूशाही बारात लेकर वैराट पहुंचा जहां पर उसने धूमधाम से शादी की। तब राजुला ने कहा कि ’मैंने पहले ही कहा था कि मैं नौरंगी राजुला हूं और जो दस रंग का होगा मैं उसी से शादी करुंगी। आज मालू तुमने मेरी लाज रखी, तुम मेरे जन्म-जन्म के साथी हो। अब दोनों साथ-साथ, खुशी-खुशी रहने लगे और प्रजा की सेवा करने लगे। यह कहानी भी उनके अजर-अमर प्रेम की दास्तान बन इतिहास में जड़ गई कि किस प्रकार एक राजा सामान्य सी शौके की कन्या के लिये राज-पाट छोड़्कर जोगी का भेष बनाकर वन-वन भटका।
 
यह कहानी शताब्दियों पुरानी है, पर पीड़ी दर पीड़ी यह कहानी आगे बड़ रही है, और सच ही कहा सच्चा प्यार कभी मरता नही है, हमेशा के लिए अमर हो जाता है।
By पं. भास्कर जोशी

कुमाँऊ का संक्षिप्त इतिहास

कुमाँऊ शब्द की उत्पत्ति कुर्मांचल से हुई है जिसका मतलब है कुर्मावतार (भगवान विष्णु का कछुआ रूपी अवतार) की धरती। कुमाँऊ मध्य हिमालय में स्थित है, इसके उत्तर में हिमालय, पूर्व में काली नदी, पश्चिम में गढ‌वाल और दक्षिण में मैदानी भाग। इस क्षेत्र में मुख्यतया ‘कत्यूरी’ और ‘चंद’ राजवंश के वंशजों द्धारा राज्य किया गया। उन्होंने इस क्षेत्र में कई मंदिरों का भी निर्माण कियाजो आजकल सैलानियों (टूरिस्ट) के आकर्षण का केन्द्र भी हैं। कुमाँऊ का पूर्व मध्ययुगीन इतिहास ‘कत्यूरी’ राजवंश का इतिहास ही है, जिन्होंने 7 वीं से 11 वीं शताब्दी तक राज्य किया। इनका राज्य कुमाँऊ, गढ‌वाल और पश्चिम नेपाल तक फैला हुआ था। अल्मोड‌ा शहर के नजदीक स्थित खुबसूरत जगह बैजनाथ इनकी राजधानी और कला का मुख्य केन्द्र था। इनके द्धारा भारी पत्थरों से निर्माण करवाये गये मंदिर वास्तुशिल्पीय कारीगरी की बेजोड‌ मिसाल थे। इन मंदिरों में से प्रमुख है ‘कटारमल का सूर्य मंदिर’ (अल्मोडा शहर के ठीक सामने, पूर्व के ओर की पहाड‌ी पर स्थित)। 900 साल पूराना ये मंदिर अस्त होते ‘कत्यूरी’ साम्राज्य के वक्त बनवाया गया था।
कुमाँऊ में ‘कत्यूरी’ साम्राज्य के बाद पिथौरागढ‌ के ‘चंद’ राजवंश का प्रभाव रहा। जागेश्वर का प्रसिद्ध शिव मंदिर इन्ही के द्धारा बनवाया गया था, इसकी परिधि में छोटे बड‌े कुल मिलाकर 164 मंदिर हैं।
ऐसा माना गया है कि ‘कोल’ शायद कुमाँऊ के मूल निवासी थे, द्रविडों से हारे जाने पर उनका कोई एक समुदाय बहुत पहले कुमाँऊ आकर बस गया। आज भी कुमाँऊ के शिल्पकार उन्हीं ‘कोल’ समुदाय के वंशज माने जाते हैं। बाद में ‘खस’ समुदाय के काफी लोग मध्य एशिया से आकर यहाँ के बहुत हिस्सों में बस गये। कुमाँऊ की ज्यादातर जनसंख्या इन्हीं ‘खस’ समुदाय की वंशज मानी जाती है। ऐसी कहावत है कि बाद में ‘कोल’ समुदाय के लोगों ने ‘खस’ समुदाय के सामने आत्मसमर्फण कर इनकी संस्कृति और रिवाज अपनाना शुरू कर दिया होगा। ‘खस’ समुदाय के बाद कुमाँऊ में ‘वैदिक आर्य’ समुदाय का आगमन हुआ। स्थानीय राजवंशों के इतिहास की शुरूआत के साथ ही यहाँ के ज्यादातर निवासी भारत के तमाम अलग अलग हिस्सों से आये ‘सवर्ण या ऊंची जात’ से प्रभावित होने लगे। आज के कुमाँऊ में ब्राह्मण, राजपूत, शिल्पकार, शाह (कभी अलग वर्ण माना जाता था) सभी जाति या वर्ण के लोग इसका हिस्सा हैं। संक्षेप में, कुमाँऊ को जानने के लिये हमेशा निम्न जातियों या समुदाय का उल्लेख किया जायेगा – शोक्य या शोक, बंराजिस, थारू, बोक्स, शिल्पकार, सवर्ण, गोरखा, मुस्लिम, यूरोपियन (औपनिवेशिक युग के समय), बंगाली, पंजाबी (विभाजन के बाद आये) और तिब्बती (सन् 1960 के बाद)।
6वीं शताब्दी (ए.डी) से पहले -   क्यूनीनदास या कूनीनदास   6वीं शताब्दी (ए.डी) के दौरान -   खस, नंद और मौर्य। ऐसी मान्यता है बिंदुसार के शासन के वक्त खस समुदाय द्धारा की गई बगावत अशोक द्धारा दबा दी गई। उस वक्त पुरूष प्रधान शासन माना जाता है। 633-643 ए.डी के दौरान यूवान च्वांग (ह्वेन-टीसेंग) के कुमाँऊ के कुछ हिस्सों का भ्रमण किया और उसने स्त्री राज्य का भी उल्लेख किया। ऐसा माना जाता है कि यह गोविशाण (आज का काशीपूर) क्षेत्र रहा होगा। कुमाँऊ के कुछ हिस्सों में उस वक्त ‘पौरवों’ ने भी शासन किया होगा।   6वी से 12वी शताब्दी (ए.डी) - इस दौरान कत्यूरी वंश ने सारे कुमाँऊ में शासन किया। 1191 और 1223 के दौरान दोती (पश्चिम नेपाल) के मल्ल राजवंश के अशोका मल्ल और क्रचल्ला देव ने कुमाँऊ में आक्रमण किया। कत्यूरी वंश छोटी छोटी रियासतों में सीमित होकर रह गया।   12वी शताब्दी (ए.डी) से -   चंद वंश के शासन की शुरूआत। चंद राजवंश ने पाली, अस्कोट, बारामंडल, सुई, दोती, कत्यूर द्धवाराहाट, गंगोलीहाट, लाखनपुर रियासतों में अधिकार कर अपने राज्य में मिला ली।   1261 – 1275 -   थोहर चंद   1344 – 1374 या 1360 – 1378 -   अभय चंद। कुछ ताम्रपत्र मिले जो चंद वंश के अलग अलग शासकों से संबन्धित थे लेकिन शासकों के नाम का पता नही चल पाया।   1374 – 1419 (ए.डी) - गरूड़ ज्ञानचंद   1437 – 1450 (ए.डी) -   भारती चंद   1565 – 1597 (ए.डी) -   रूद्र चंद   1597 – 1621 (ए.डी) -   लक्ष्मी चंद। चंद शासकों के दौरान नये शहरों की स्थापना और इनका विकास भी हुआ जैसे रूद्रपुर, बाजपुर, काशीपुर। 1779 – 1786 (ए.डी) -   कुमाँऊ के परमार राजकुमार, प्रद्धयुमन शाह ने प्रद्धयुमन चंद के नाम से राज्य किया और अंततः गोरखाओं के साथ खुरबुरा (देहरादून) के युद्ध में वीरगति को प्राप्त हुआ।   1788 – 1790 (ए.डी) -   महेन्द्र सिंह चंद, ऐसा माना जाता है कि यह चंद वंश का अंतिम शासक था। जिसने राजबुंगा (चंपावत) से शासन किया लेकिन बाद में अल्मोड‌ा से किया।   1790 – 1815 (ए.डी) -   कुमाँउ में गोरखाओं का राज्य रहा। गोरखाओं के निर्दयता और जुल्म से भरपूर शासन में चंद वंश के शासकों का पूरा ही नाश हो गया।   1814 – 1815 (ए.डी) -   नेपाल युद्ध। ईस्ट इंडिया कम्पनी ने गोरखाओं को पराजित कर कुमाऊँ में राज्य करना शुरू किया।
यदपि ब्रिटिश राज्य गोरखाओं (जिसको गोरख्योल कहा जाता था) से कम निर्दयता पूर्ण और बेहतर था लेकिन फिर भी ये विदेशी राज्य था। लेकिन फिर भी ब्रिटिश राज्य के दौरान ही कुमाँऊ में प्रगति की शुरूआत भी हुई। इसके बाद, कुमाँऊ में भी लोग विदेशी राज्य के खिलाफ उठ खड‌े हुए।

Thursday, December 1, 2011

आधुनिक गढवाली भाषा कहानियों की विशेषतायें और कथाकार


( Characteristics of Modern Garhwali Fiction and its Story Tellers)

                                                  भीष्म कुकरेती
                           कथा कहना और कथा सुनना मनुष्य का एक अभिन्न मानवीय गुण है . कथा वर्णन करने का

सरल व समझाने की सुन्दर कला है अथवा कथा प्रस्तुतीकरण का एक अबूझ नमूना है . यही कारण है कि प्रतेक बोली-भाषा में
लोक कथा एक आवश्यक विधा है. गढ़वाल में भी प्राचीन काल से ही लोक कथाओं का एक सशक्त भण्डार पाया जाता है .

गढ़वाल में हर चूल्हे का, हर जात का, हर परिवार का, हर गाँव का , हर पट्टी का अपना विशिष्ठ लोक कथा भण्डार है
जहाँ तक लिखित आधुनिक गढ़वाली कथा साहित्य का प्रश्न है यह प्रिंटिंग व्यवषथा सुधरने व शिक्षा के साथ ही विकसित हुआ .

संपादकाचार्य विश्वम्बर दत्त चंदोला के अनुसार गढ़वाली गद्य की शुरुवात बाइबल की कथाओं के अनुबाद (१८२० ई. के करीब ) से हुयी ( सन्दर्भ: गाड मटयेकि गंगा १९७५ ) .
गढ़वालियों में सर्वप्रथम डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर पद प्राप्तकर्ता गोविन्द प्रसाद घिल्डियाल ने (उन्नीसवीं सदी के अंत में ) हितोपदेश कि कथाओं का अनुबाद पुस्तक छापी थी (सन्दर्भ :गाड म्यटेकि गंगा).

                                         आधुनिक गढ़वाली कहानियों के सदानंद कुकरेती
आधुनिक गढ़वाली कथाओं के जन्म दाता विशाल कीर्ति के संपादक, राष्ट्रीय महा विद्यालय सिलोगी,मल्ला ढागु के

संस्थापक सदा नन्द कुकरेती को जाता है . गढवाली ठाट के नाम से यह कहानी विशाल कीर्ति (१९१३ ) में प्रकाशित हुयी थी. इस कथा का आधा भाग
प्रसिद्ध कलाविद बी . मोहन नेगी , पौड़ी के पास सुरक्षित है . कथा में चरित्र निर्माण व चरित्र निर्वाह बड़ी कुशलता पुर्बक हुआ है . गढवा ळी विम्बो का प्रयोग अनोखा है , यथा :

"गुन्दरू की नाक बिटे सीम्प कि धार छोड़िक विलो मुख , वैकी झुगली इत्यादि सब मैला छन, गणेशु की सिरफ़ सीम्प की धारी छ पण सबि चीज सब साफ़ छन . यांको कारण , गुन्दरू की मा अळगसी' ख़ळचट अर लमडेर छ.

. भितर देखा धौं ! बोलेंद यख बखरा रौंदा होला . मेंल़ो (म्याळउ ) ख़णेक घुळपट होयुं च . भितर तकाकी क्वी चीज इनै क्वी चीज उनै . सरा भितर तब मार घिचर पिचर होई रये. अपणी अपणी जगा पर क्वी चीज नी. भांडा कूंडा ठोकरियों मा लमडणा रौंदन . पाणी का भांडों तलें द्याखो धौं . धूळ को क्या गद्दा जम्युं छ. युंका भितर पाणी पेण को भी ज्यू नि चांदो . नाज पाणी कि खाताफोळ , एक मणि पकौण कु निकाळण त द्वी माणी खते जान्दन , अर जु कै डूम डोकल़ा , डल्या , भिकलोई तैं देण कु बोला त हे राम ! यांको नौं नी .

रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी ' ने इस कथा को पुन : गुन्दरू कौंका घार स्वाळ पक्वड़ ' शीर्षक के नाम से 'हिलांस' में प्रकाशित किया था .
सदानंद कुकरेती ( १८८६-१९३८) का जन्म ग्वील-जसपुर , मल्ला ढागु , पौड़ी गढ़वाल में हुआ था .वे विशाल कीर्ति के सम्पादक भी थे

गढवाली ठाट के बारे में रामप्रसाद पहाड़ी का कथन सही है कि यह कथा दुनिया की १०० सर्वश्रेष्ठ कथाओं में आती है. कथा व्यंगात्मक अवश्य है और कथा में सुघड़ व आलसी , लापरवाह स्त्रियों के चरित्र की तुलना

हास्य, व्यंग्य शाली बहुत रोचक ढंग से हुआ है. कथा असलियत वादी तो है, वास्तविकता से भरपूर है, किन्तु पाठक को प्रगतिशीलता की ओर ल़े जाने में भी कामयाब है .कथा का प्रारभ व अंत बड़ी सुगमता व रोचकता से किया गया है भाषा सरल व गम्य है . भाषा के लिहाज से जहाँ ढागु के शब्द सम्पदा कथा में साफ़ दीखती है रमती है वहीं सदानंद कुकरेती ने पौड़ी व श्रीनगर कई शब्द व भौण भी कथा में समाहित किये हैं जो एक आश्चर्य है.

' गढवाली ठाट ' के बारे में अबोध बंधु बहुगुणा (सं -२) लिखते हैं ' सचमुच में गद्य का ऐसा नमूना मिलना गढ़वाली का बाधा भाग्य है. बंगाली, मराठी आदि भाषाओं में भी साहित्यिक गद्य की अभिव्यक्ति उस समय नहे पंहुची थी. यहाँ तक कि हिंदी में भी उस समय (सन १९१३ ई. में ) गद्य अभिव्यक्ति इतनी रटगादार , रौंस (आनन्द , रोचक ) भरी मार्मिक नहीं थी. इस तरह कि हू-ब-हू चित्रांकन शैली के लिए हिंदी भी तरसती थी.

गढवाल कि दिवंगत विभितियाँ के सम्पादक भक्त दर्शन का कथन है " सदानंद कुकरेती चुटीली शैली में प्रहसनपूर्ण कथा आलोचना के लिए प्रसिद्ध हैं "
डा अनिल डबराल का कहना है कि सदानंद कुकरेती कि अभिव्यक्ति की प्रासगिता आज भी बराबर बनी है .

भीष्म कुकरेती के अनुसार ( सन्दर्भ 1) सदानंद कुकरेती का स्थान ब्लादिमीर नबोकोव, फ्लेंनरी ओ'कोंनर, कैथरीन मैन्सफील्ड , अर्न्स्ट हेमिंगवे, फ्रांज काफ्का, शिरले जैक्सन , विलियम कारोल विलियम्स , डी .एच लौरेन्स , सी. पी गिलमैन, लिओ टाल्स्टोय , प्रेमचंद, इडगर पो , ओस्कार वाइल्ड जैसे संसार के सर्वश्रेष्ठ कथाकारों की श्रेणी में आते हैं

परुशराम नौटियाल : अबोध बंधु बहुगुणा ने गाड म्यटयेकि गंगा (पृ ४०) में लिखा है श्री परुशराम कि 'गोपू' आदि डो कहानियाँ इस दौरान ( १९१३- १९३६ ) प्रकाशित हुईं थीं
श्री देव सुमन : बहुगुणा के अनुसार श्री देव सुमन ने ' बाबा ' नाम कि कथा जेल में लिखी थी.
                                                      आधुनिक गढ़वाली का प्रथम कहानी संग्रह 'पांच फूल '

भगवती प्रसाद पांथरी (टिहरी रियासत , १९१४- स्वर्गीय ) ने ' १९४७ में पाँच फूल ' कथा संग्रह प्रकाशित किया जो कि गढवाली का प्रथम कहानी संग्रह है . 'पांच फूल' में 'गौं की ओर', 'ब्वारी', ' परिवर्तन',आशा', और न्याय पांच कहानियाँ है पांथरी की कथाएं प्रेरणादायक व नाटकीयता लिए हैं. अबोध के अनुसार ब्वारी यथार्थवादी कहानी है और इसे बहुगुणा कथा साहित्य हेतु विशिष्ठ दें बताता है

रैबार कहानी विशेषांक (१९५६ई. ) : सतेश्वर आज़ाद के सम्पादकत्व में डा शिवा नन्द नौटियाल, भगवती चारण निर्मोही, कैलाश पांथरी , दयाधर बमराड़ा, कैलाश पांथरी , उर्बीदत्त उपाध्याय व मथुरा दत्त नौटियाल की कहानियाँ प्रकाशित हुईं. . गढवाली साहित्य इतिहास में 'रैबार' का यह प्रथम गढवाली कथा विशेषांक एक सुनहरा पन्ना है (सन्दर्भ -४)

दयाधर बमराड़ा( धारकोट, बगड़स्यूं १९४३-दिवंगत ) दयाधर बमराड़ा अपने उपन्यास हेतु प्रसिद्ध है, इनकी कथा रैबार (१९५६ ) में छपी है
डा शिवा नन्द नौटियाल (कोठला , कण्डारस्यूं , पौड़ी ग. १९३६- ) चंद्रा देवी, पागल, हे जगदीश, चुप रा, दैणि ह्व़े जा, से ळी या आग (१९५६) , धार मांकी गैणि जैसी उत्कृष्ट कहानियां प्रकाश में आई हैं सभी कहानियां १९६० से पहले की ही हैं. डा अनिल के अनुसा r डा नौटियाल की अपणी विशिष्ठ क्षेत्रीय शैली कहानी में दिखती है

भगवती चरण निर्मोही (देव प्रयाग, १९११-१९९०) भगवती प्रसाद निर्मोही की कहानियाँ रैबार व मैती (१९७७ का करीब ) में प्रकाशित हुईं जिनकी प्रशंषा अबोध बंधु व डा अनिल डबराल ने की.
काशी राम पथिक की कथा ' भुला भेजी देई' मैती (१९७७ ) में छपी और यह कहानी सवर्ण व शिल्पकारों के सांस्कृतिक संबंधों की खोजबीन करती है.

उर्बी दत्त उपाध्याय (नवन, सितौनस्युं १९१३ दिवंगत ) के दो कथाएँ ' रैबार' में प्रकाशित हुईं
भगवती प्रसाद जोशी' हिमवंतवासी' (जोशियाणा , गंगा सलाण १९२०- दिवंगत ) डा अनिल के अनुसार जोशी सामान्य प्रसंगों को मनोहारी बनाने में प्रवीन है. चारत्रों को व्यक्तित्व प्रदान करने के मामले में जोशी व रमा प्रसाद पहाड़ी में साम्यता है. शैली में नये मानदंड मिलते हैं . वातावरण बनाने हेतु हिमवंतवासी प्रतीकों से विम्बों को सरस बाना देते हैं. भाषा में सल़ाणी पण साफ़ झलकता है.

गढ़वाली कहानी का वेग-सारथी मोहन लाल नेगी (बेलग्राम, अठूर, टिहरी ग. १९३० -स्वर्गीय) प्रथम आधुनिक गढ़वाली कानी प्रकाशित होने के ठीक ५५ साल उपरान्त मोहन लाल नेगी ने गढवाली कहानी को नव अवतार दिया जब नेगी ने १९६७ में ' जोनी पर छपु किलै ?' नामक कथा संग्रह प्रकाशित किया . नेगी ने दूसरा कथा संग्रह ' बुरांस की पीड़ ' १९८७ में प्रकाशित हुआ. डा अनिल डबराल व अबोध अबन्धु बहुगुणा के अनुसार मोहन लाल नेगी के २१-२५ गढ़वाली में कहानियां प्रकाशित हुईं . नेगी के कहानियों में विषय विविधता है . मोहन लाल नेगी संवेदनाओं को विषय में मिलाने के विशेषग्य है. लोकोक्तियों का प्रयोग लेखक कि विशेष विशषता बन गयी है . डा अनिल अनुसार मोहन लाल नेगी भाषा क्रीडा में माहिर है. कहानियों में कथाक्रम व विषय अनुसार वातावरण तैयार करने में कथाकार सुवुग्य है. मोहन लाल के कथाओं में भाषा लक्ष्य पाने में समर्थ है. यह एक आश्चर्य ही है कि मोहन लाल नेगी के दोनों संग्रह २० साल के अंतराल में प्रकाशित हुए और दोनों संग्रहों में शैली व तकनीक में अधिक अंतर नही दिखता . डा अनिल डबराल के अनुसार ' इन तकनीकों के अधिक विकास का अवकाश नेगी जी को नही मिला'.

आचार्य गोपेश्वर कोठियाल ( उदखंडा , कुंजणि टि.ग. १९१०-२००२ ) आचार्य कोठियाल कि कुछ कथाएं १९७० से पहले युगवाणी आदि समाचार पत्रों में छपीं. कथाओं में टिहरी के विम्ब उभर कर आते हैं

शकुन्त जोशी (पौड़ी ग. ) जोशी की कथाएँ मैती (१९७७ ) में छपीं हैं तो काशीराम पथिक की (मैती १९७८ ) की 'भुला भेजी देई' व चन्द्र मोहन चमोली की सच्चा बेटा (बडुली १९७९) कथाओं का सन्दर्भ भी मिलता है ( सं. ४ )

पुरूषोत्तम डोभाल ( मुस्मोला, टि.ग. १९२० -दिवंगत ) डोभाल की प्रथम कहानी 'बाडुळी (१९७९ ) में प्रकाशित हुयी और डोभाल ने चार पाँच कथाएँ छपीं हैं. कथाएं सौम्य व सामाजिक परिश्थिति बताने में समर्थ हैं.

गढ़वाली कथाओं को शिष्टता हेतु का कथाकार अबोध बंधु बहुगुणा ( झाला,चलणस्यूं , पौ.ग १९२७-२००७ ): अबोध बंधु बहुगुणा ने गढ़वाली साहित्य के हर विधा में विद्वतापूर्ण 'मिळवाक'/भागीदारी ही नही दिया अपितु नेतृत्व भी प्रदान किया है . बहुगुणा ने गढवाली कथाओं को नया कलेवर दिया जिसे भीष्म कुकरेती अति शिष्टता की ओर ल़े जाने वाला मार्ग कहता है . बहुगुणा की कथाओं में वह सब कुछ है जो कथाओं में होना चाहिए. बहुगुणा ने भाषा में निपट /घोर ग्रामीण गढवालीपन को छोड़ संस्कृतनिष्ट भाषा को अपनाने की कोशिश भी की है . कथा कुमुद व रगड़वात दो कथा संग्रह गढवाली कथा साहित्य के नगीने हैं. अबोध बंधु की कथाएं बुद्धिजीवियों हेतु अधिक हैं. डा अनिल का मानना है कि बहुगुणा की कई कथाओं में बहुगुणा मनोवैज्ञानिक शैली में लेखक किशी शब्द विशेष का प्रयोग कर पाठक को बोध या चिन्ताधारा की दिशा निर्धारित कर देता है. अनिल डबराल का मानना है बहुगुणा कि कथाओं में लोक जीवन के प्रति अनुसंधानात्मक प्रवृति भी पायी जाती है बहुगुणा शब्दों के खिलाड़ी भी है तथापि शब्द , मुहावरों में गरिमा भी है . बहुगुणा ने भुग्त्युं भविष्य उप्न्यास भी प्रकाशित किया है. भीष्म कुकरेती ने अबोध को गढवाली साहित्य का सूर्य की संज्ञा दी है.
गढ़वाली कहानियों का परिपुष्ट कर्ता दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल ( पदाल्यूं , कुटूळस्यूं, पौड़ी ग., १९२३-२००२) भीष्म कुकरेती के अनुसार दुर्गा प्रसाद घिल्डियाल के बगैर गढवाली कथाओं के बारे में सोचा ही नही जा सकता . घिल्डियाल के तीन गढवाली कथा संग्रह 'गारी' (१९८४), 'म्वारी' (१९९८६) , और 'ब्वारी (१९८७ ) ' गढ़वाली साहित्य के धरोहर हैं. उच्याणा दुर्गाप्रसाद का उपन्यास भी गढवाली में छपा है. सभी ४० कहानियों की विषय वस्तु का केंद्र गढवाली जनमानस अथवा जीवन है . डा डबराल के अनुसार चरित्र चित्रण के मामले में दुर्गाप्रसाद घिल्डियाल सफल कथाकार है . घिल्डियाल का प्राकृत वातावरण से अधिक ध्यान देश -काल की ओर रहता है. डा अनिल के अनुसार घिल्डियाल को जितनी सफलता कथा वस्तु, विचार तत्व व पत्रों के निर्माण में मिली है उतनी सफलता भाषा सृजन में नही मिली है . यानी कि अलंकारिक नही अपितु सरल है

प्रयोगधर्मी भीष्म कुकरेती ( जसपुर , मल्ला ढान्गु पौ.ग. १९५२) भीष्म कुकरेती की पहली गढवाली कहानी ' कैरा कु कतल' (अलकनंदा १९८३ ) है जो की एक प्रकार से गढवाली में एक प्रायोगिक कहानी है. कथा में प्रतेक वाक्य में 'क' अक्षर अवश्य है याने की अनुप्राश अलंकार का प्रयोग है.कुकरेती की अब तक पचीस से अधिक कहानियाँ गढवाली में अलकनंदा, बुरांश, हिलांस, घाटी के गरजते स्वर, गढ़ ऐना आदि में प्रकाशित हुए हैं . अबोध बन्धु के अनुसार भीष्म कुकरेती की मुख्यतया चार प्रकार की कहानियाँ हैं - स्त्री दुःख व सम्वेदनात्मक (जैसे 'दाता की ब्वारी कन दुखायारी ' कीड़ी बौ' देखें सन्दर्भ -४ ) , व्यंग्य व हास्य मिश्रित कथाएँ जैसे 'वी .सी .आर को आण ' बाघ, मेरी वा प्रेमिका' 'प्रेमिका की खोज' आदि ( देखें कौन्ली किरण पृष्ठ १४७ ) या डा अनिल डबराल (पृष्ठ २४४) की समालोचना . तीसरा सामाजिक चेतना युक्त कहानियां जैसे ' बिट्ठ भिड्याणो सुख या सवर्ण स्पर्श सुख' व अन्य विवध कथाएँ जिनमे कई कथाएँ मनोविज्ञानिक (जैसे नारेण दा) कथाएँ हैं .

भीष्म कुकरेती विषय गत व शैलीगत प्रयोग से कतई नही घबराता व भीष्म की एक कथा ' घुघोति बसोती ' ( घाटी के गरजते स्वर (१९८९) स्त्री समलैंगिक संबंधों पर आधारित कथा है जिस पर मुंबई की शैल सुमन संस्था की एक बैठक में बड़ी बहस भी हुयी थी कि गढवाली में ऐसी कहानी की आवश्यकता है कि नही?.

डा अनिल के अनुसार भीष्म की कहानियों में चुटीलापन होता है.व अपनी बात सटीक ढंग से कहता है. वहीं बहुगुणा ने भीष्म की कहानियों में गहरी सम्वेदना पायी है.
भीष्म कुकरेती ने विदेशी भाषाओं की कुछ कथाओं का गढवाली में अनुवाद भी प्रकाशित किया है ( गढ़ ऐना १९८९-१९९०)

रमा प्रसाद घिल्डियाल 'पहाड़ी ' ( जन्म-बड़ेथ ढान्गु , पैत्रिक गाँव डांग श्रीनगर पौड़ी ग. १९११-२००२ ) की 'मेरी मूंगा कख होली' (हिलांस १९८१) व ' घूंड्या द्यूर ' (हिलांस १९८०) नाम कि दो कहानियाँ प्रकाशित हुईं . जहां मेरी मूंगा संस्मंरणात्मक शैली में है जिसमे बड़ेथ से व्यासचट्टी बैसाखी मेले जाने का वृतांत दीखता है, वंही घूंड्या द्यूर एक सामाजिक संस्कार पर चोट करती हुयी चेतना सम्वाहक कहानी है. डा अनिल डबराल (३ ) के अनुसार इस कथा का विषय पुरुष विशेष और ष्ट्री विशेष के सौन्दर्य वोध पर आधारित है .

नित्यानंद मैठाणी ( श्रीनगर, पौ.ग. १९३४ ) ने कुछेक मौलिक गढ़वाली कथाएँ दी हैं. किन्तु मैठाणी का योगदान आकाशवाणी में गढवाली कथाओं का बांचना , डोगरी , कश्मीरी कथाओं का अनुबाद आकश वाणी से आदि में खीं अधिक है . नित्यानंद की कथाओं में पैनापन, व नाटकीयता की विशषता है

नित्यानंद का उपन्यास ' निमाणी' गढवाली कथा साहित्य का एक चमकता मणि है .
कुसुम नौटियाल : कुसुम नौटियाल के दो कथाएं हिलांस ( काफळ १९८१, नाच दो मैना , १९८२ ) मै प्रकाशित हुईं.

सम्वेदनाओं का चितेरा सुदामा प्रसाद डबराल प्रेमी ( फल्दा, पटवालस्यूं , पौ.ग १९३१-) सुदामा प्रसाद डबराल 'प्रेमी' का गढवाली कथा संसार को काफी बड़ा है, सुदामा प्रसाद 'प्रेमी' के तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हुए हैं. गैत्री की ब्व़े ( १९८५ ) संग्रह में छपी. कथाएँ सरल, व प्रेरणा सूत्र लिए होती हैं. कथाओं में सरल बहाव होता है. कई कथाएँ ऐसी लगती हैं जैसी कोई लोक कथा हो.कथाकार सुदामा प्रसाद ने गढवाली कहावतों से कथाओं का अच्छा प्रयोग किया है. डा अनिल के अनुसार भाषा ढबाड़ी है(हिंदी -गढवाली मिश्रित)

सुधारवादी कथाकार डा. महावीर प्रसाद गैरोला ( दालढुंग , बडीयारगढ़, टि.ग १९२२-२००९ ) ने बीस से अधिक कथाएँ प्रकाशित की हैं व ड़ उपन्यास गढवाली में प्रकाशित हैं. हिंदी के मूर्धन्य कथाकार और समालोचक डा गंगा प्रसाद विमल डा महावीर गैरोला को सुधारवादी कथाकार मानते हैं किन्तु गैरोला की सुधारवादी कथाएं बोझिल नही रोचक हैं. डा महावीर प्रसाद की कथाओं में टिहरी की बोल चाल की बोली, टिहरी की ठसक अवश्य मिलती है. कभी कभी ऐसे शब्द भी मिलते हैं जो पौड़ी गढवाल से ब्रिटिश सत्ता व पढ़ाई लिखाई के कारण लुप्त हो गए हैं. संवाद, चरित्रों के चरित्र को उजागर करने में सक्षम हैं. कथा कहने का ढंग पारम्परिक है और अधिकतर कथाएं पीड़ा लिए अवश्य हैं किन्तु सुखांत में बदल जाती हैं

बालेन्दु बडोला ( मूल गाँव बडोली, चौन्दकोट , पौ .ग. ) बालेन्दु बडोला ने चालीस से अधिक कथाएं हिलांस (१९८५ के बाद ), चिट्ठी पतरी, युगवाणी जैसी पत्रिकाओं में प्रकाशित की हैं. बालेन्दु की कथाओं पर लोक कथाओं की शैल़ी का भी प्रभाव दीखता है . कथाएँ बहु विषयक हैं व कथा कहने का ढंग पारम्परिक है. चरित्र व विषय वस्तु आम गढवाली के व गढवाल सम्बन्धी हैं किन्तु कई कथाओं में चरित्र काल्पनिक भी लगते हैं . भाषा सरल व वहाव लिए होती है. ऐसा लगता है बालेन्दु परम्परा तोड़ने से बचता है . बालेन्दु की कहानियों में प्रेरणा दायक पन अधिक है किन्तु ऐसी कथाओं में रोचकता की कमी नही झलकती .गढवाली प्रतीकों के अतिरिक्त कई हिंदी कहावतों का गढवाली में अनुवाद भी मिलता है . वर्तमान में बालेन्दु की कथाएँ युगवाणी मासिक पत्रिका में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं . बालेन्दु बडोला ने बाल कथाएँ भी प्रकाशित किये हैं (हिलांस, चिट्ठी पतरी, युगवाणी ).

सदानंद जखमोला (चन्दा , शीला, पौ. ग. १९००-१९७७ ) के पाच कथाएँ प्रकाशित हूई जैसे छौं को वैद (गढ़ गौरव १९८४)
लोक मानस का चितेरा कथाकार प्रताप शिखर (कोटि, कुणजी , टिहरी ग. १९५२ ) प्रताप शिखर का कथा संग्रह 'कुरेड़ी फट गे ' (१९८९) में नौ कथाएँ संग्रहीत हैं. कथायों में समाज का असलियतवादी चित्रण है, कई कथाएँ रेखाचित्र भी बन जाती है, प्रताप शिखर टिहरी भाषा का प्रयोग करता है जो कि कथाओं को एक वैशिष्ठ्य प्रदान करने म सक्षम है .

कुसुम नौटियाल की दो ही कथाओं का जिक्र गढवाली साहित्यिक इतिहास में मिलता है (बहुगुणा १९९० ) और दोनों कथाएं हिलांस (१९८१, १९८२ ) में प्रकाशित हुयी हैं. कथाएं सम्वेदनशील हैं व गढवाली कथाओं को एक नया दौर देने की पहल में शामिल होने के कोशिश भी.

पूरण पंत पथिक ( अस्कोट, चौन्दकोट, पौ ग १९५१ ) पंत की दो कथाएं (हिलांस १९८३ व चिट्ठी २१ वां अंक ) प्रकाशित हुए हैं . कथाओं में कथात्व कम है विचार उत्प्रेरणा अधिक है ( डा अनिल ) . हाँ व्यंग्यात्मक पुट अवश्य मिलता है ( बहुगुणा , सं. ४ व ६ )

मनोविज्ञानी कथाकार काली प्रसाद घिल्डियाल (पदाल्युं, कटळस्यूं ,१९३०-) गढ़वाली नाटक वेत्ता काली प्रसाद घिल्डियाल की केवल तीन कहानियां प्रकाश में आई हैं (हिलांस १९८४ ) . काली प्रसाद की कहानियों में जटिल मनोविज्ञान मिलता है , जो कि गढवाली कथाओं के लिए एक गति शीलता का परिचायक भी बना . जटिल मनोविज्ञान को सरलता से काली प्रसाद घिल्डियाल कथा धरातल पर लाने में सक्षम है.

जबर सिंह कैंतुरा (रिंगोली , लोत्सू, टि.ग. १९५६-) : जबर सिंह कैंतुरा की कथाएं हिलांस (१९८६), धाद (१९८८) आदि पत्रिकाओं में दस -बाढ़ कथाएं प्रकाशित हुयी हैं. कथाओं में मानवीय सम्वेदना, संघर्ष, शोषण की नीति , पारवारिक सम्बन्ध प्रचुर मात्र में मिलता है (कैंतुरा की भीष्म कुकरेती से बातचीत ,ललित केशवान का पत्र व डा. अनिल डबराल ) . भाषा टिहरी की है व कई स्थानीय शब्द गढवाली शब्द भण्डार के लिए अमूल्य हैं. कैंतुरा का कथा संग्रह प्रकाशाधीन है

मोहन लाल ढौंडियाल ( दहेली , गुराड़स्यूं , १९५६ ) कवि ढौंडियाल के दो कथाएं हिलांस व धाद (१९८५-८६ ) में छपी हैं. कथाएँ सीख व परंपरा संबंधी हैं ( लेखक की भीष्म कुकरेती से बातचीत व केशवान )

विजय सिंह लिंगवाल : विजय सिंह लिंगवाल के एक कहानी ( हिलांस १९९८८) में प्रकाशित हुयी जो डा अनिल अनुसार सरल, सहज व मुहावरेदार है
जगदीश जीवट : जीवट के एक कहानी'दिन' धाद १९८८) प्रकाश में आई है जो सरस है.
विद्यावती डोभाल (सैंज,नियली, टि.ग. १९०२ -१९९३) कवित्री विद्यावती डोभाल की कहानी 'रुक्मी ' (धाद १९८९) उनकी प्रसिद्ध कहानियों में एक है
खुशहाल सिंह 'चिन्मय सायर' ( अन्दर्सौं, डाबरी , पौ ग. १९४८) कवि 'चिन्मय सायर' की एक लघु कथा 'धुवां' (चिट्ठी २१ वां अंक) में प्रकाशित हुयी.

विजय गौड़ : हिंदी के कवि विजय गौड़ की 'कथा 'भाप इंजिन ' (चिट्ठी २१ वां अंक ) गढवाली में अति आधुनिक कहानी मानी जाती है
विजय कुमार 'मधुर' (रडस्वा , रिन्ग्वाड़स्यूं १९६४ ) विजय कुमार 'मधुर' ने तीन कहानियाँ प्रकाशित हुयी हैं जैसे चिट्ठी -२१ वां अंक . एक बालकथा भी छपी है.

गिरधारी लाल थपलियाल 'कंकाल (श्रीकोट, पौ.ग. १९२९-१९८७) : नाटककार , कवि गिरधारी लाल थपलियाल 'कंकाल के एक ही कथा 'सुब्यदरी ' (धाद १९८८) प्रकाशित हुयी दिखती है . क्य्हा मुहावरे दार और चपल किसम की शैली में है

जगदम्बा प्रसाद भारद्वाज : भारद्वाज की एक ही कहानी मिलती है - सच्चु सुख की कहानी , धाद १९८८ . कहानी अभुवाक्ति कौशल का एक उम्दा नमूना है
सुरेन्द्र पाल : प्रसिद्ध गढवाली कवि की कथा 'दानौ बछरू' एवम 'नातो' (धाद १९८८) गढवाली कथा के मणि हैं

मोहन सैलानी : मोहन सैलानी के कथा ' घोल' (धाद १९९०) एक वेदना पूर्ण कहानी है.
महेंद्र सिंह रावत : रावत के एक ही कहानी गाणी (धाद १९९० ) प्रकासहित हुयी है .
सतेन्द्र सजवाण : सतेन्द्र सजवाण के एक कहानी 'मा कु त्याग ' (बुग्याल १९९५ ) प्रकाश में आई है .

बृजेंद्र सिंह नेगी (तोळी , मल्ला बदलपुर, पौ . ग. १९५८ ) बृजेंद्र की अब तक पचीस से अधिक कथाएं प्रकाशित हो चुकी हैं व अधिकतर युगवाणी मासिक में प्रकाशित हुयी है. सं २००० के पश्चात् ही 'उमाळ ' व छिट्गा' नाम से दो कथा संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं . कथा विषय गाँव, मानवीय सम्बन्ध , अंधविश्वास , समस्या संघर्ष , आदि हैं जो आम आदमी की रोजमर्रा जिन्दगी से सम्बन्ध रखते हैं. भाषा में सल़ाणी भाषा की प्रचुरता है , स्थानीय मुहावरों से कथा में वहाव आ जाता है . पारंपरिक शेली में लिखी कथाएं आम आदमी को लुभाती भी हैं (ललित केशवान का पत्र व भीष्म कुकरेती की लेखक से बातचीत ) )

ललित केशवान (सिरोंठी , इड्वाळस्यूं , अपु.ग. १९४०-) प्रसिद्ध गढवाली कवि केशवान की तीन कथाएं (हिलांस, १९८४, १९८५ ) व धाद में प्रकाश में आये हैं. कथाएं रोमांचित कर्ता अथवा सरल हैं .

ब्रह्मा नन्द बिंजोला ( खंदेड़ा , चौन्दकोट १९३८ ) कवि बिंजोला के आठ नौ कथाएं यत्र तत्र प्रकाशित हुईं व ललित केशवान के अनुसार ' फ़ौजी की ब्योली ' कथा संग्रह प्रकाशाधीन है. ललित केशवान के अनुसार कथाएं मार्मिक व गढवाल के जन जीवन सम्बंधीं हैं. कथायों में कवित्व का प्रभाव भी है.

राजाराम कुकरेती ( पुन्डारी, म्न्यार्स्युं १९२८-) राजाराम के कुछ कथाएं यत्र तत्र पत्र पत्रिकाओं में १९९० के पश्चात प्रकाशित हुईं ( ललित केशवान का लेखक को लम्बा पत्र, २०१० ) व २० कथाओं का संग्रह प्रकाशाधीन है

).
कन्हया लाल डंडरियाल ( नैली मवालस्युं , पौ.ग. १९३३-२००४ ) डंडरियाल ने दो तीन कथाये लिखी हैं (२)
लोकेश नवानी ( गंवाड़ी , किनगोड़ खाल , १९५६ ) लोकेश नवानी के चारेक कथाएं धाद, चिट्ठी , दस सालैक खबर सार (२००२) , मे प्रकाशित हुए हैं

गिरीश सुन्दरियाल (चूरेड़ गाँव, चौन्दकोट, १९६७ ) सुंदरियाल ने छ के करीब कहानियाँ लिखीं हैं जो 'चिट्ठी' के इकसवीं अंक मे छपी व कुछ कथाएं चिट्ठी पतरी (२००२) मे जैसे ' काची गाणि' आदि प्रकाशित हुईं. डा अनिल डबराल ने लिखा की ऐसी मादक, हृदयस्पर्शी , प्रगल्भ, कथा बिरली ही हैं.

डा कुटज भारती (भैड़ गाँव , बदलपुर १९६६ ) : डा कुटज भारती की 'जी ! भुकण्या तैं घुरण्या ल़ीगे ' कहानी (खबर सार , १९९९ ) एक बहुत ही आनंद दायक, प्रहसनयुक्त , लोक लकीर की कहानी है
वीणा पाणी जोशी ( देहरादून १९३७) नब्बे के दशक के बाद ही कवित्री की गढवाली कथा ' कठ बुबा ' प्रकाश में आया .
डी एस रावत : डी एस रावत की एक कथा 'छावनी' चिट्ठी पतरी , १९९९) प्रकाश मे आई है , कथा एक बालक का सैनिक छावनी को अपने नजर से देखने का नजरिया है.

वीरेन्द्र पंवार ( केंद्र इड्वाल स्यूं 1962 ) कवि, समीक्षकवीरेन्द्र पंवार की एक कथा ही प्रकाश में आई है
अनसुया प्रसाद डंगवाल ( घीडी, बणेलस्यूं , पौ ग. १९४८ ) डंगवाल ने अब तक दस बारह कथाएं प्रकाशित की हैं और अधिकतर कथाएं शैलवाणी साप्ताहिक (२००० के पश्चात ) में प्रकाशित हुयी हैं . कथाएं सामाजिक विषयक हैं. भाषा चरित्रों के अनुरूप है. कथों से पाठक को आनंद पारपत होता है . भीष्म कुकरेती का मानना है की कथाएं ' रौन्सदार' हैं . कई कहानियाँ पाठक को सोचने को मजबूर कर देती हैं

राम प्रसाद डोभाल : राम प्रसाद डोभाल की दो कथाएं 'चिट्ठी पतरी ' (२०००) मे ' चैतु फेल बोडि पास ' नाम से प्रकाशित हुईं. एक कथा ' उर्ख्याल़ा की दीदी ' (चि.प. २००१) बालकथा है

सत्य आनंद बडोनी (टकोळी , ति.ग. १९६३ ) सत्य आनंद बडोनी की एक कथा मंगतू (चिट्ठी पतरी , २०००) प्रकाश मे आई है.
विमल थपलियाल 'रसाल' : विमल के एक कहानी ' खाडू -बोगठया' खबर सार (२०००) में प्रकाश में आई है, जो की दार्शनिक धरातल लिए हुई लोक कथा लीक पर चलती है. सम्वंदों में हिंदी का उपयोग वातावरण बनाने हेतु ही हुआ है. .

चंद्रमणि उनियाल : चंद्रमणि उनियाल की एक कथा 'रुकमा ददि ' चिट्ठी पतरी ' ( २००१) मे प्रकाशित हुयी. कथा चिट्ठी रूप मे है .
प्रीतम अपछ्याण (गड़कोट , च.ग १९७४ ) की पांचएक कथाएं २००० के बाद चिट्ठी पतरी मे छपीं. कथाएं व्यंग से भी भरपूर हैं व सामयिक भी हैं.

सर्वेश्वर दत्त कांडपाल : सर्वेश्वर दत्त कांडपाल के एक खाणी 'दादी चाणी ' (चिट्ठी पतरी २०००) प्रकाश मे आये जो की एक बुढ़िया का नए जमाने मे होते परिवर्तन की दशा बयान करती है.
संजय सुंदरियाल (चुरेड गाँव , चौन्दकोट, १९७९) संजय की दो कथाएं चिट्ठी पतरी (२००० के बाद) प्रकाशित हुईं.

सीताराम ममगाईं : सीताराम ममगाईं की लघु कथा ' अनुष्ठान ' चिट्ठी पतरी (२००२ ) प्रकाश मे आई
पाराशर गौड़ ( मिर्चौड़, अस्वाल्स्युं , पौ.ग., १९४७) 'जग्वाल' फिल्म के निर्माता पाराशर गौड़ की कथाएँ २००६ के बाद इन्टरनेट माध्यम पर प्रकाशित हुयी हैं. कथाएं व्यंग्य भाव लिए हैं और अधिकतर गढवाल में हुयी घटनाओं के समाचार बनने से सम्बन्धित हैं. भाषा सरल है, हाँ ट्विस्ट के मात्रा मे पाराशर कंजूसी करते दीखते नही हैं

गजेन्द्र नौटियाल : गजेन्द्र नौटियाल के एक कथा मान की टक्क 'चिट्ठी पतरी' (२००६) मे प्रकाशित हुयी. कथा मार्मिक है
नई वयार का प्रतिनधि ओम प्रकाश सेमवाल ( दरम्वाड़ी , जख्धर, रुद्रप्रयाग , १९६५ ) यह एक उत्साहवर्धक घटना है क़ि गढवाली साहित्य में ओम प्रकाश सेमवाल सरीखे नव जवान साहित्यकार पदार्पण कर रहे हैं. ओम प्रकाश का आना गढवाली साहित्य हेतु एक प्रात: कालीन पवन झोंका है जो उनींदे गढ़वाली कथा संसार को जगाने में सक्षम भूमिका अदा करेगा . कवि ओम प्रकाश सेमवाल का गढवाली कथा संग्रह ' मेरी पुफु ' (२००९), लोकेश नवानी के अनुसार इस सदी का उल्लेखनीय घटना भी है . कथा संग्रह में 'धर्मा', हरसू, फजितु, आस, ब्व़े, भात, ब्व़े, वबरी, नई कूड़ी , बेटी ब्वारी , बड़ा भैजी , मेरी पुफू, गुरु जी कथाएं समाहित हैं. कथाएँ मानवीव समीकरण व सम्बन्धों क़ि पड़ताल करते हैं.

गढवाली लोक नाट्य शाष्त्री डा दाता राम पुरोहित का कहना है क़ि कथाएँ डांडा -कांठाओं (पहाडी विन्यास ) के आइना हैं व कथाओं में गढ़वाली मिटटी की 'कुमराण' (धुप से जले मिट्टी की आकर्षक सुगंध) है. वहीं लोकेश नवानी लिखते हैं की सेमवाल एक शशक्त कथाकार हैं.

नामी गिरामी , जग प्रसिद्ध लोक गायक नरेंद्र सिंग नेगी का कहना है की जब गढवाली भाषाई कहानियों में एक रीतापन/खालीपन आ रहा था तब सेमवाल का क्थास्न्ग्ढ़ इस खालीपन को दूर करने में समर्थ होगा. वहीं गजल सम्राट मधुसुदन थपलियाल ने भूमिका में लिखा कि 'मेरी पुफू ' गढ़वाली साहित्य के लिए एक सकारात्मक सौगात है . थपलियाल का कहना इकदम सही है कि कथाओं में सम्वाद बड़े असरदार हैं और कथाएं परिपूर्ण दिखती हैं.

आशा रावत : (लखनऊ , १९५४) आशा रावत की पचीस से अधिक कहानियां शैलवाणी समाचार पत्र आदि मे प्रकाशित हुए हैं. एक कथासंग्रह ' शैल्वणी' प्रकाशन कोटद्वार मे प्रकाशाधीन है, कहानियां मार्मिक, समस्या मूलक, है. संवाद कथा मे वहाव को गति प्रदान करने मे सक्षम हैं.

शेर सिंह गढ़देशी : शेर सिंह गढ़देशी की परम्परावादी कथा 'नशलै सुधार' एक सुधारवादी कथा है (खबर सार (२००९)
सुधारवादी कथाकार जगदीश देवरानी ( डुडयख़ , लंगूर, १९२५): जगदीश देवरानी की ' चोळी के मर्यादा' , 'नैला पर दैला, 'गल्ती को सुधार' आदि पाँच कथाएं शैलवाणी साप्ताहिक कोट्द्वारा, में अक्टूबर व नवम्बर २०११ के अंक में क्रमगत में छपी हैं. शैलवाणी के सम्पादक व देवरानी से बातचीत पर ज्ञात हुआ कि आने वाले अंको में लगभग ३० अन्य गढवाली कहानियाँ प्रकाशाधीन है. कहानियां सुधारवादी हैं, परम्परागत हैं . भाषा संस्कार सल़ाणी है . भाषा सरल व संवाद चरित्र निर्माण व कथा के वेग में भागीदार हैं.

                                                                     गढवाली व्यंग्य चित्रों की कॉमिक कथाएं
गढवाली में व्यंग्य चित्रों के माध्यम से कोमिक कथाएं भी प्रकाशित हई हैं . व्यंग्य विधा के द्वारा कथा कहने का श्रेय भीष्म कुकरेती को जाता है. भीष्म कुकरेती ने दो व्यंग्य चित्र कॉमिक कथाये ' एक चोर की कळकळी कथा (जिस्मे एक चोर गढवाली साहित्यकारों के घर चोरी करने जाता है) व पर्वतीय मंत्रालय मा कम्पुटर आई ' प्रकाशित की हैं. दोनों व्यंग चित्रीय कॉमिक कथाएँ गढ़ ऐना (१९९०) में प्रकाशित हुए हैं . अबोध बंधु बहुगुणा ने इन कॉमिक कथाओं की सराहना की ( कौंळी किरण , पृष्ठ १४९)

                      अंत में कहा जा सकता है कि आधुनिक गढवाली कहानियाँ १९१३ से चलकर अब तक विकास मार्ग पर अग्रसर रही हैं . संख्या की दृष्टि से ना सही गुणात्मक दृष्टि से गढवाली भाषा की कहानियाँ विषय , कथ्य, कथानक, शैली , कथा वहाव, संवाद, जन चेतना, कथा मोड़, वार्ता , चरित्र चित्रण , पाठकों को कथा में उलझाए रखने की वृति व काला , पाठकों को सोचने को मजबूर करना, पाठकों को झटका देना, कथाकारों में प्रयोग करने की मस्सकत आदि के हिसाब से परिस्कृत हैं .

इसी तरह गढवाली कथा साहित्य में श्रृंगार, करूँ , वीर, बीभत्स, हास्य, अद्भुत रस व सभी ११० भावं से संपन रही हैं
नये कथाकारों के आने से भी प्रकट होता है कि गढवाली कथा साहित्य का भविष्य उज्ज्वल है.

सन्दर्भ :
१- भीष्म कुकरेती, २०११, गढवाळी कथाकार अर हौरी भाषाओं क कथाकार , शैलवाणी के (२०११-२०१२ ) पचास अंकों में क्रमगत लेख
२- अबोध बंधु बहुगुणा , १९७५ गाड म्यटयेकि गंगा, देहली (गढवाली गद्य साहित्य का क्रमिक विकास )

३- डा अनिल डबराल, २००७ गढ़वाली गद्य परम्परा ,
४- अबोध बंधु बहुगुणा , १९९०, गढ़वाली कहानी , गढवाल की जीवित विभूतियाँ और गढवाल का वैशिष्ठ्य, पृष्ठ २८७-२९०
५- ललित केशवान (२०१०) का भीष्म कुकरेती को लिखा लम्बा पत्र जिसमे १०० से अधिक गढवाली भाषा के लेखक लेखिआकों के बारे में जानकारी दी गयी है.

६- अबोध बन्धु बहुगुणा , २००० कौन्ली किरण
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