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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Tuesday, October 19, 2010

"जग्वाल"

धुरपाली कु द्वार सी
बस्गल्या नयार सी
देखणी छीन बाटू आँखी
कन्नी उल्लेरय्या जग्वाल सी

छौं डबराणू चकोर सी
छौं बोल्याणु सर्ग सी
त्वे देखि मनं तपणु च घाम छूछा
हिवालां का धामं सी

काजोल पाणी मा माछी सी
खुदेड चोली जण फफराणि सी
जिकुड़ी खुदैन्द खुद मा तेरी लाटा
घुर घुर जण घुघूती घुरयान्दी सी

देखणी छीन बाटू आँखी
कन्नी उल्लेरय्या "जग्वाल" सी
कन्नी उल्लेरय्या "जग्वाल" सी
कन्नी उल्लेरय्या "जग्वाल" सी

रचनाकार: गीतेश सिंह नेगी (सिंगापूर प्रवास से )
अस्थाई निवास: मुंबई /सहारनपुर
मूल निवासी: ग्राम महर गावं मल्ला ,पट्टी कोलागाड
पोस्ट-तिलखोली,पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड
स्रोत : म्यारा ब्लॉग " हिमालय की गोद से " एवं "पहाड़ी फोरम " मा पूर्व - प्रकाशित
( http://geeteshnegi.blogspot.com & http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,122.0.html)

"त्वे आण प्वाडलू

रंगली बसंत का रंग उडी जाण से पहली
फ्योंली और बुरांश का मुरझाण से पहली
रुमझुम बरखा का रुम्झुमाण से पहली
त्वे आण प्वाडलू

बस्गाल्य्या गद्नियुं का रौलियाँण से पहली
डालीयूँ मा चखुलियुं का च्खुलियाँण से पहली
फूलों फर भोंरा - पोतलियूं का मंडराण से पहली
त्वे आण प्वाडलू

उलैरय्या होली का हुल्करा कक्खी ख्वै जाण से पहली
दम्कद्दा भेलौं का बग्वाल मा बुझ जाण से पहली
हिन्सोला ,किन्गोड़ा और डांडीयों मा काफुल प़क जाण से पहली
त्वे आण प्वाडलू

छुंयाल धारा- पंदेरोउन का बिस्गान से पहली
गीतांग ग्वेर्रऊ का गीत छलेएजाण से पहली
बांझी पुंगडीयों का डीश, खुदेड घ्गुगती का घुराण से पहली
त्वे आण प्वाडलू

मालू , गुईराल , पयें और कुलैं बाटू देखेंण लग्गयाँ
और धई जन सी लगाण लग्गयाँ त्वे
खुदेड आग मा तेरी , उन्हका फुक्के जआण से पहली
त्वे आण प्वाडलू

आज चली जा कतागा भी दूर मी से किल्लेय भी
मेरु लाटा ! पर कभी मी से मुख ना लुक्केय
पर जब भी त्वे मेरी खुद लागली ,त्वे मेरी सौं
मुंड उठा की ,छाती ठोक्की की और हत्थ जोड़ी की
त्वे आण प्वाडलू
त्वे आण प्वाडलू
त्वे आण प्वाडलू

"मातृभूमि उत्तराखंड की वहीं धरती थेय सादर समर्पित जू आज भी आस लग्गे की निरंतर हमरी कुशल-कामना कन्नी चा सिर्फ इंही आस का दगडी की वहु कब्भी ता आला बोडि की अपणी माँ का और अपणा गौं का ध्वार "

रचनाकार: गीतेश सिंह नेगी (सिंगापूर प्रवास से )
अस्थाई निवास: मुंबई /सहारनपुर
मूल निवासी: ग्राम महर गावं मल्ला ,पट्टी कोलागाड
पोस्ट-तिलखोली,पौड़ी गढ़वाल ,उत्तराखंड
स्रोत :म्यारा ब्लॉग " हिमालय की गोद से " एवं "पहाड़ी फोरम " मा पूर्व - प्रकाशित

"म्यारु उत्तराखंड "

देखि की पहाडूं यूँ , कन मन खुदै गै
देखि की पहाडूं यूँ , कन मन खुदै गै
माँ थे अपड़ी भूली गयेनी , ढूध पिये कै
अरे माँ थे अपड़ी भूली गयेनी ,दूध पिये कै

बाँजी छीन सगोड़ी ,सयारा रगड़ बणी गयें
परदेशूं मा बस गईनी , अपणु गढ़ देश छोड़ी कै
माँ थे अपड़ी भूल गयीं , ढूध प्येई कै
अरे माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध प्येई कै


रूणा छीं पुन्गडा ,खिल्याण छैल्यी गेई
रोलूउं मा रुमुक पोडी , ग्युइर्र हर्ची गयें,
माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई की
अरे माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई की

पंदेरा - गदेरा भी सुक्की गयेनी ,अब रौई रौई कै
अरे ढंडयालू भी बौऊलै गेई , धेई लगयी लगयी कै
माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै
अरे माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै


बोली भाषा जल्याई याल , अंगरेजी फुकी कै
अरे गौं कु पता लापता ह्वै,कुजाअणि कब भट्टे
माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै
अरे माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै


ढोल - दमोऊ फुट गयीं ,म्यूजिक पोप सुनिके
गैथा की रोट्टी भूली ग्योऊ , डोसा पिज्जा खाई कै
माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै
अरे माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै


रुन्णु च केदार खंड ,खंड मानस बोल्याई गेई
अखंड छो जू रिश्ता , किलाई आज खंड खंड होए गयी
माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै
अरे माँ थे अपड़ी भूल गयीं ,ढूध पयेई कै

रूणा छीं शहीद ,शहीद "बाबा उत्तराखंडी " होए गेई
नाम धरयुं च उत्तराँचल ,कख म्यारु "उत्तराखंड " खोयेगे
माँ थे अपड़ी भूल गयौं ,किले तुम दूध पीयें कै
माँ थे अपड़ी भूल गयौं ,किले तुम ढूध पीयें कै
माँ थे अपड़ी भूल गयौं ,किले तुम ढूध पीयें कै



"देव भूमि उत्तराखंड का अमर सपूतों थेय सादर समर्पित "

स्वरचित रचना : "गीतेश सिंह नेगी "
स्रोत :म्यारा ब्लॉग "हिमालय की गोद से " एवं पहाड़ी फोरम मा पूर्व - प्रकाशित
( http://geeteshnegi.blogspot.com & http://www.pahariforum.net/forum/index.php/topic,122.0.html)

Let Us Learn Garhwali - 37

Bhishma Kukreti
बाळ लोक गीतुंन बराखड़ी ( बारहखड़ी ) सिखणो ब्यून्त
Learning Consonants of Devnagari Alphabet with twelve Vowels
After learning consonants , it is essential that we learn the combination of twelve vowles with each consonent and
Our forefathers brought the learning lessons in Folk Songs
बिजगनी क , कन्दन का
बै मती कि, दैणे की
उर्ताले कु, बड्डेरो कू
एकलगु के , द्विलगु कै
एक्ल्गन्या को , द्विलगन्या कौ
सिर बिन्दुं कं, द्विबास क:
--- ----- ---
आभार अबोध बंधु बहुगुणा , डा नन्द किशोर ढौंडियाल , डा मनोरमा ढौंडियाल , रजनी कुकरेती
Copyright for comments, Bhishma kukreti, bckukreti@gmail.com

बचपन का ऊ प्यारा दिन

जब मनख्यौं का मन मा,
याद बणिक ऊभरिक औन्दा,
पापी पराण क्वांसु होन्दु,
कुजाणि क्यौकु खूब सतौंदा.

खैणा तिमलौं की डाळी मा बैठि,
"ऊ बचपन का दिन" खूब बितैन,
सैडा गौं की काखड़ी मुंगरी,
छोरों दगड़ि छकि छक्किक खैन.

पिल्ला, थुच्चि, कबड्डी अर गारा,
खूब खेलिन गुल्ली डंडा,
बण फुन्ड खाई हिंसर किन्गोड़,
घोलु फर हेरदा पोथलौं का अंडा.

गौं का बण फुन्ड गोरु चरैन,
छोरों का दगड़ा गोरछ्यो खाई,
आम की दाणी खाण का खातिर,
आम की डाळी ढुंग्यौन ढुंग्याई.

थेगळ्याँ लत्ता कपड़ा पैर्यन,
चुभ्यन नांगा खुट्यौं फर कांडा,
हिंवाळि काँठी बुरांश देखिन,
जब जाँदा चन्द्रबदनी का डांडा.

स्कूल्या दिन ऊ कथगा प्यारा,
आँगळिन लिख्दा माटा मा,
प्यारू बचपन आज खत्युं छ,
गौं का न्योड़ु स्कूल का बाटा मा.

हे बचपन! अब बिछड़िग्यौं हम,
याद औन्दि चून्दा छन तरबर आंसू,
बचपन की बात आज बतौणु,
कवि: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु".

(रचना पहाड़ी फोरम, यंग उत्तराखंड, मेरा पहाड़ पर प्रकाशित)
दिनांक: १०.१०.२०१०,@सर्वाधिकार सुरक्षित

औंसी की रात

सड़क बणौण वाळा मजदूर,
सड़क का न्योड़ु,
एक पुंगड़ा मा,
टेंट का भितर बैठिक,
रात मा अबेर तक,
खाणौ-पेणौ खैक,
खेन्न लग्याँ था ताश,
सड़क बिटि एक जनानि की,
आवाज आई ऊँका पास,
"होटल कथगा दूर होलु",
"यख फुन्ड त जंगळ छ".

मजदूरून जब सुणि,
तब एक सयाणा मन्खिन बोलि,
अरे! चुपरा अर रण द्या,
खबानि कुछ यीं रात मा,
पर फिर भि,
ऊन जबाब दिनि,
झट सी एक जनानि,
जैंका मुण्ड मा पट्टी सी लगिं,
बदन मा चोळा सी पैरयुं,
टेंट भितर ऐक सामणी बैठी,
अर खाणौ का खातिर बोन्नि,
"मैकु रोठठी खलावा",
सब्बि मजदूरू न सोचि,
शायद अस्पताळ बिटि,
या भागिक अयिं छ,
दगड़ा का सयाणा मन्खिन,
जग्दु लम्पु वींका सामणी बिटि,
झट-पट कैक दूर सरकाई,
कखि बुझै नि द्यो,
यनु विचार मन मा आई.

जब ऊन पूछि, तू कु छैं?
"मैं भंडारी रावत छौं",
पट्टी. तळैं, पौड़ी गढ़वाल की,
वीं जनानिन बताई,
थोड़ी देर मा एक छोट्टा,
दगड़्या फर फट्ट भैरू आई,
अरे! भूतणि छ या,
सब्ब्यौं तैं या बात बताई,
वा जनानि अचाणचक्क,
कुजाणि कख भागिगी,
फेर नजर नि आई,
भौत साल पैलि,
१९७२ किछ या बात,
वे दिन थै बल बग्वाळ,
अर "औंसी की रात".

रचना: जगमोहन सिंह जयाड़ा " जिज्ञासु"
(दिनांक: २८.०९.१०)
एक सज्जन श्री कीर्ति सिंह थलवाल, प्रताप नगर, टिहरी गढ़वाल, जो दिल्ली भ्रमण पर आये थे, उनके द्वारा सुनाई लगभग १९७२ की आप बीती पर आधारित. वे उस समय पौड़ी-श्रीनगर मार्ग से बुगाणि को बन रही सड़क पर कार्यरत थे

Learn Garhwali -29

Bhishma Kukreti
ड़रयौण्या रस , भयानक रस ( Rapture of Fear )
वायु मसाण को भयो वर्ण मसाण
वर्ण मसाण को भयो बहतरी मसाण
बहतरी मसाण को भयो चौडिया मसाण
*** ****** ***** ******* **** **** *****
वीर मसाण , अधो मसाण मन्त्र दानौ मसाण
तन्त्र दानौ मसाण
बलुआ मसाण , कलुआ मसाण , तालू मसाण
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डैणी जोगणी को लेषवार , नाटक चेटको फेरवार
मण भर खेँतड़ी , मण भर गुदड़ी , लुव्वाकी टोपी बज्र की खंता
(रौख्वाळी गीत
इकबटोळ करण वाळ : डा शिवानन्द नौटियाल
Copyright @ Bhishma Kukreti for narration, bckukreti@gmail.com