उत्तराखंडी ई-पत्रिका की गतिविधियाँ ई-मेल पर

Enter your email address:

Delivered by FeedBurner

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Thursday, April 1, 2010

प्रियतमा बिन उदास होता है बसन्त

प्रियतमा बिन उदास होता है बसन्त
ढलका कर ओंस की बूंद रोता है बसन्त

सुबह उडारी भरते पंछी भी लौट आते हैं
सांझ में खुद को अकेला पाता है बसन्त

खिलखिलाने को होती है जब भी जोर-जबर
हंसने से खुद को रोक जाता है बसन्त

इस आबो-हवा में कैसे जीने का मन करे
आसमान को ताकने पर डर जाता है बसन्त

ऐसे लाल, हरे, पीले, नीले होने से क्या फायदा
शायद आयेगी बहार ‘धनेश’ इन्तजार में रहता है बसन्त॥

Copyright@ Dhanesh Kothari

बसंत

बसंत
हर बार चले आते हो
ह्‍यूंद की ठिणी से निकल
गुनगुने माघ में
बुराँस सा सुर्ख होकर

बसंत
दूर डांड्यों में
खिलखिलाती है फ्योंली
हल्की पौन के साथ इठलाते हुए
नई दुल्हन की तरह

बसंत
तुम्हारे साथ
खेली जाती है होली
नये साल के पहले दिन
पूजी जाती है देहरी फूलों से
और/ हर बार शुरू होता है
एक नया सफर जिन्दगी का

बसंत
तुम आना हर बार
अच्छा लगता है हम सभी को
तुम आना मौल्यार लेकर
ताकि
सर्द रातों की यादों को बिसरा सकूं
बसंत तुम आना हर बार॥

Copyright@ Dhanesh Kothari

ऋतु बसंत में

पीली साड़ी पहन,
ऋतु बसंत में,
पहाड़ के एक पाखे में,
काट रही वह घास,
सोच रही लौटेंगे वे,
बहुत दिनों से दूर हैं,
बसंत की बयार आने से,
मन में जगि है आस.

कोलाहल करते पोथ्ले,
तोता, घुघती, हिल्वांस,
फूलों के लिए फूल्यारी,
घूम रहे खेतों और पाखों में,
फूल रही है सांस.

खिले हैं सर्वत्र बण में,
साखिनी, बुरांश,गुरयाळ,
ऋतु बसंत के रंग में रंगे,
हमारे प्यारे मुल्क
रंगीलो कुमाऊँ,
और छबीलो गढ़वाळ.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०.३.२०१०)
ग्राम: बागी-नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.

अलकनंदा

एक नदी ही नहीं,
सभ्यता और संस्कृति,
संजोए है पहाड़ की,
अपने में समाहित करके,
बह रही है निरंतर,
युगों से पहाड़ पर,
अल्कापुरी से सागर तक.

कल्पना करो,
यदि अलकनंदा नहीं होती,
तो पंच प्रयाग नहीं होते,
आस्तिक हमारे देश के,
पवित्र स्नान करके,
तटों पर इसके,
शुभ पर्वों पर,
पाप कैसे धोते?

निर्मल नीर अलकनंदा का,
कहीं कोलाहल करते हुए,
निरंतर बहता जाता,
प्रदूषित नहीं करना मुझे,
सन्देश अपना बताता.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ११.३.२०१०)
बागी-नौसा(चन्द्रबदनी), टिहरी गढ़वाल
E-mail: j_jayara@yahoo.com
Contact: 09868795187

अपना गाँव

जिंदगी रोशन करने के लिए,
सपने साथ लिए,
एक दिन छोड़ दिया मैंने भी,
पर्वतों की गोद में बसा,
अपना प्यारा गाँव.

मैं समय-समय पर जाता रहा,
जबकि मेरे गाँव में,
आज स्थाई रूप से,
पँहुच चुकी है,
बिजली, सड़क और पानी,
एक प्राइमरी स्कूल भी.

लेकिन! रुका नहीं सिलसिला,
गाँव को अल्विदा कहने वालों का,
रह गए सिर्फ कुछ मवासे,
आज जिनकी वजह से,
गाँव के कुछ घरों में,
अभी नहीं लगे ताले.


सोचता था रौनक रहेगी,
गाँव की चौपाल में,
खेत और खाल्याण में,
पानी के धारे में,
बरगद और पीपल के नीचे,
धारे के निकट तप्पड़ में,
लगते रहेंगे मंडाण,
संस्कृति की झलक और,
ब्यो बारात की रसाण.

गाँव ने कभी नहीं कहा,
तुम लौटकर मत आना,
शहर ने भी नहीं बुलाया,
गाँव में बिखरा है बचपन,
फिर भी न जाने क्योँ?
प्रवासी ग्रामवासिओं ने,
अपने गाँव को भुलाया,
कवि "ज़िग्यांसु" भूल न सका,
गाँव की याद ने सताया भी,
कसक उठी और रुलाया.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित १०.३.२०१०)
गढ़वाल की गाड़ी से बागी-नौसा, चन्द्रबदनी से दिल्ली.

पर्वतीय महिलाएं

तन से प्यारा होता है,
उन्हें घास का तिनका,
उत्तराखंड की पहाड़ियों पर,
पशुओं के लिए घास काटते,
कहीं दूर जलश्रोत से,
गागर में पानी लाते हुए,
जंगल से चूल्हे के लिए,
सूखी लकड़ी लाते हुए,
पति और परिवार की सेवा,
सच्चे भाव से करते हुए,
सामाजिक बुराईयौं से,
सर्वदा लड़ते हुए,
बीतता है कठिन जीवन जिनका,
वे हैं "पर्वतीय महिलाएं",
पहाड़ जैसे इरादों का संकल्प,
मन में धारण किए.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ९.३.२०१०)[/

Young Uttarakhand Cine Awards 2010

Young Uttarakhand Cine Awards
“Celebrating the Grandeur of Uttarakhand’s Cinema"

Visit and book Passes :- http://yucineawards.com