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उत्तराखंडी ई-पत्रिका

उत्तराखंडी ई-पत्रिका

Tuesday, March 9, 2010

टीरी तेरी याद

औन्दि छ आज,
देखि थै कबरी यूं आंख्यौंन,
बिसरी नि सकदु सच मा,
आज भी त्वैसी छ मायामोन.

सन-७९ मा देखि थै,
फिल्म हाल मा फिल्म आशा,
टीरी आज समैईं पांणी का पेट,
होंणी छ मन मा घोर निराशा.

शीशा हो या दिल,
बल आखिर टूटि जान्दु छ,
त्वै तैं हेरी टीरी आज,
सुण्यु गीत याद दिलान्दु छ.

दगड़्या दिगविजय डोभाल जी,
"मेरु गौं डूबिगी भैजी" यनु बतौंदा,
"ज़िग्यांसु" का मयाळु मन मा,
एक करुणा भाव जागौन्दा.

एक नौनु डुब्याँ गौं कू,
गौं का एक बौडा तैं बतौंदु,
"तख देख बौडा डाम बणिगी,
डूबिगिन सुपिन्या हमारा,
कखन देखण प्यारु गौं,
गवांड़्या अर दगड़्या प्यारा".

जैन भी देखि होली टीरी,
ऊँ तैं "टीरी तेरी याद" आली,
मिटी नि सकदी मन सी सबका,
ज्युन्दा ज्यू सदानि सताली.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु",
(सर्वाधिकार सुरक्षित ४.३.२०१०)
ग्राम:बागी-नौसा,पट्टी. चन्द्रबदनी, टिहरी गढ़वाल.
निवास: "दर्द भरी दिल्ली"
E-mail: j_jayara@yahoo.com

आंसू मत बहाओ

जो हो गया है,
जो हो रहा है,
वो तो होना ही था,
और होता ही रहेगा,
इसलिए मत बहाओ,
आँखों से आंसू,
जब धरती पर पानी,
खत्म हो जायेगा,
शायद इनकी जरूरत पड़े.

दिल की व्यथा,
व्यक्त करते हैं आंसू,
सोचता है,
अपने मन में,
कवि "ज़िग्यांसु",
कभी कभी कवि मन,
पहाड़ तेरी याद में,
हो जाता है क्वांसु.

रखूंगा जब कदम,
उत्तराखंड की धरती में,
देखूँगा मिलन,
अलकनंदा और भागीरथी का,
हर्षित होगा कवि मन,
तब आँखों से निकलेंगे,
ख़ुशी के आंसू,
"आंसू मत बहाओ",
बिना बात के,
कहता है कवि "ज़िग्यांसु"

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ३.३.२०१०)
E-mail: j_jayara@yahoo.com

सरलता ….

गीली लकड़ी
सुलगता चूल्हा
फून्कनी से फूंकते-फूंकते
आंसुओं की धार |
पीसती चक्की
गोदी में नन्ही
पाँव हिलाकर उसे सुलाती
उड़ते आटे से सफेद बाल |
गोबर से सने हाथ
रोता नन्हा
कोहनी से थपथपाती
पोंछती उसकी नाक |
भरी दोपहरी
पसीने से नहाती
खेत गुडाई
गीतों की तान |
कास माँ..... जैसी
सरलता ………
उधार ही मिल जाये
तो जीवन धन्य हो जाये |

copyright@*****विजय कुमार 'मधुर'

महंगाई

राजशी ठाट
भोगने वाले
क्या जाने
पीर …….
उस मजदूर की
जो दिन भर
खटकर
जुटाता है
दिहाडी
खिलाता था पहले
बच्चों को
दो बकत की रोटी
अब एक बकत की |

तनख्वा

बनिए की नौकरी
कमरतोड़ मेंहनत
तनख्वा चन्द रुप्प्ली
लड्खडाती सेहत |

copyright@विजय कुमार 'मधुर'

भरोसा कू अकाळ

जख मा देखि छै आस कि छाया
वी पाणि अब कौज्याळ ह्‍वेगे
जौं जंगळूं कब्बि गर्जदा छा शेर
ऊंकू रज्जा अब स्याळ ह्‍वेगे
घड़ि पल भर नि बिसरै सकदा छा जौं हम
ऊं याद अयां कत्ति साल ह्‍वेगे
सैन्वार माणिं जु डांडी-कांठी लांघि छै हमुन्
वी अब आंख्यों कू उकाळ ह्‍वेगे
ढोल का तणकुला पकड़ी
नचदा छा जख द्‍यो-द्‍यब्ता मण्ड्याण मा
वख अब बयाळ ह्‍वेगे
जौं तैं मणदु छौ अपणुं, घैंटदु छौ जौं कि कसम
वी अब ब्योंत बिचार मा दलाल ह्‍वेगे
त अफ्वी सोचा समझा
जतगा सकदां
किलै कि
अब,
दुसरा का भरोसा कू त
अकाळ ह्‍वेगे

copyright@धनेश कोठारी

मंथन

होने दो हिने दो
आज विचरो का मंथन
विचारो से उत्पन होगी क्रांति
जग करेगा उसका अभिनन्दन !

सुना है की राजधानी
उंचा सुनती है
सता में बैठे लोग
अंधे,गूंगे, बहरे होते है
अब अंधे, गुंगो को ..
रहा दिखानी होगी
उनसे उनके ही राग में
उनसे बात करनी होगी
करना होगा दूर हमको
उनका वो गुंगा/अंधापन ... होने दो होने दो ..

भूखा - भूखा न सोयेगा अब
अधिकारों की बात करेगा
खोलेगा राज वो अब
पतित भ्रष्ट , भ्रष्टा चारो का
हटो ह्टो, दूर हटो, है
ग्रहण करेगी जनता आज राज सिंघ्खासन ..... होने दो होने दो

हासिये पर हो तुम
जनता का रथ मत रोको
बदने दो उसको उसके लक्ष्य तक
मत उसको टोको
रोक न पावोगे प्रभाऊ उसका
गर बिगड़ गई वो
सांस लेना होगा तुमको दूभर
गर बिफर गई वो ...
भुलोमत , मतभूलो
की है जनता जनार्धन .... होने दो ...

आम पथों से राज पथ तक
बस एक ही होगा नारा
हक़ दो, हक़ दो ...हटो
है राज हमारा .......
एक ही स्वर में नभ गूंजेगा तब
स्वीकार नही है , भ्रष्टो का शाशन .. होने दो ...

पराशर गौर
६ मार्च २०१० सुबह ७.२७ पर

Wednesday, March 3, 2010

बसंत की बरात

धरती पर आई है,
तभी तो पहाड़ पर,
बुरांश की लाली छाई है,
पीले रंग में रंगि फ्योंलि,
उत्तराखंड अपने मैत आई है.

बनो बाराती आप भी,
पहाड़ी परिवेश में,
सज धजकर,
ऋतु बसंत आई है,
मन में उमंग छाई है,
मैं नहीं कह रहा हूँ,
पहाड़ से बहती हवा ने,
मेरे पास पहुँच कर,
यंग उत्तराखंडी मित्रों,
चुपके से बताई है.

लेकिन! मित्रों आज,
पहाड़ पर,
बचपन में देखी,
"बसंत की बरात" की झलक,
मन में उभर आई है,
तभी तो कवि "ज़िग्यांसु" ने,
आपको भी बताई है.

क्या आपके कदम?
उत्तराखंड की धरती की ओर,
"बसंत की बरात" में जाने को,
बढ़ रहे हैं,
कल्पना में पहाड़ पर,
ख़ुशी ख़ुशी चढ़ रहे हैं,
अगर नहीं ऐसा,
तो कल्पना में खोकर,
देख लो "बसंत की बरात",
सकून मिलेगा आपको,
क्या ख़ुशी की बात.

रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ३.३.२०१०)
E-Mail: j_jayara@yahoo.com
M-9868795187