धरती पर आई है,
तभी तो पहाड़ पर,
बुरांश की लाली छाई है,
पीले रंग में रंगि फ्योंलि,
उत्तराखंड अपने मैत आई है.
बनो बाराती आप भी,
पहाड़ी परिवेश में,
सज धजकर,
ऋतु बसंत आई है,
मन में उमंग छाई है,
मैं नहीं कह रहा हूँ,
पहाड़ से बहती हवा ने,
मेरे पास पहुँच कर,
यंग उत्तराखंडी मित्रों,
चुपके से बताई है.
लेकिन! मित्रों आज,
पहाड़ पर,
बचपन में देखी,
"बसंत की बरात" की झलक,
मन में उभर आई है,
तभी तो कवि "ज़िग्यांसु" ने,
आपको भी बताई है.
क्या आपके कदम?
उत्तराखंड की धरती की ओर,
"बसंत की बरात" में जाने को,
बढ़ रहे हैं,
कल्पना में पहाड़ पर,
ख़ुशी ख़ुशी चढ़ रहे हैं,
अगर नहीं ऐसा,
तो कल्पना में खोकर,
देख लो "बसंत की बरात",
सकून मिलेगा आपको,
क्या ख़ुशी की बात.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित ३.३.२०१०)
E-Mail: j_jayara@yahoo.com
M-9868795187
Wednesday, March 3, 2010
हठी यादें
मुट्ठी से रेत की तरह फिसल गई जिंदगी,
अबतो बस हथेलियों पर यादों के रेणु नजर आते हैं.
कीमत लगा के तू, तुम, आप पुकारते हैं लोग,
जो गर्दन घुमा बुलाले वो इशारे कहाँ नज़र आते हैं,
आड़े आया ना कोई मुश्किल में,
सब मशवरे (सलाह) दे हठ जातें हैं,
तुम्हारे मुस्कराने का कोई मतलब तो रहा होगा,
प्रीति के संकेत यूँ ही व्यर्थ तो नज़र नहीं आतें हैं.
तुम्हारी याद भी तुमसी हठी,
तुम जाके नहीं आये और तेरी याद के साये आके नहीं जातें है.
मोहन सिंह भैंसोरा,
सेक्टर-९/८८६, आर. के. पुरम,
नई दिल्ली
अबतो बस हथेलियों पर यादों के रेणु नजर आते हैं.
कीमत लगा के तू, तुम, आप पुकारते हैं लोग,
जो गर्दन घुमा बुलाले वो इशारे कहाँ नज़र आते हैं,
आड़े आया ना कोई मुश्किल में,
सब मशवरे (सलाह) दे हठ जातें हैं,
तुम्हारे मुस्कराने का कोई मतलब तो रहा होगा,
प्रीति के संकेत यूँ ही व्यर्थ तो नज़र नहीं आतें हैं.
तुम्हारी याद भी तुमसी हठी,
तुम जाके नहीं आये और तेरी याद के साये आके नहीं जातें है.
मोहन सिंह भैंसोरा,
सेक्टर-९/८८६, आर. के. पुरम,
नई दिल्ली
उम्मीद
तुम चले जाओगे तनहाइयाँ रह जाएँगी,
वक्त तो गुजरेगा, वक्त की बेवफाइयां रह जाएँगी,
मुझसे नाराज नाहो ऐ मेरी जिन्दगी, बस तेरी मेहेरबनियाँ रह जाएँगी.
देना होगा साथ तुझे मेरा वरना जिन्दगी कैसे कट पायेगी,
इस जहाँ के बाद गर और है जहाँ कोई,
तुझसे शायद मुलाकात वहीँ हो पायेगी.
मोहन सिंह भैंसोरा,
सेक्टर-९/८८६, आर. के. पुरम,
नई दिल्ली
वक्त तो गुजरेगा, वक्त की बेवफाइयां रह जाएँगी,
मुझसे नाराज नाहो ऐ मेरी जिन्दगी, बस तेरी मेहेरबनियाँ रह जाएँगी.
देना होगा साथ तुझे मेरा वरना जिन्दगी कैसे कट पायेगी,
इस जहाँ के बाद गर और है जहाँ कोई,
तुझसे शायद मुलाकात वहीँ हो पायेगी.
मोहन सिंह भैंसोरा,
सेक्टर-९/८८६, आर. के. पुरम,
नई दिल्ली
बुरु नि माण्यां होळी छ
यंग उत्तराखंड की महाराणिन,
सब्यौं तैं यनु सनकाई,
होळी फर छ न्युतु आपतैं,
घोटी घोटिक समझाई.
जब पौन्छिन महाराणी का महल,
यंग उत्तराखंड का सब्बि दगड़्या,
रंग लगाई सब्यौन खेली होळी,
मुक छन लाल पिंगळा बण्यां.
कै दगड़्यान करि मजाक,
"निशान" जी तैं भाँग पिलाई,
रंगमाता ह्वैक कविवर जी न,
महाराणी फर यनु बताई.
"चाँदी जनु रंग छ तेरु,
बुरांश जना गलोड़ा लाल,
एक तू ही रूपवान छैं राणी,
हौर छन कंगाल".
कवि "जिज्ञासु" देखण लग्युं छ,
होळी सी पैलि होळी का रंग,
मन मा यनु घंग्तोळ होयुं छ,
होळी खेलौं पर कैका संग?
रचनाकार: कवि "ज़िग्यांसु"
२६.२.२०१० (होळी उत्सव-२०१०)
सब्यौं तैं यनु सनकाई,
होळी फर छ न्युतु आपतैं,
घोटी घोटिक समझाई.
जब पौन्छिन महाराणी का महल,
यंग उत्तराखंड का सब्बि दगड़्या,
रंग लगाई सब्यौन खेली होळी,
मुक छन लाल पिंगळा बण्यां.
कै दगड़्यान करि मजाक,
"निशान" जी तैं भाँग पिलाई,
रंगमाता ह्वैक कविवर जी न,
महाराणी फर यनु बताई.
"चाँदी जनु रंग छ तेरु,
बुरांश जना गलोड़ा लाल,
एक तू ही रूपवान छैं राणी,
हौर छन कंगाल".
कवि "जिज्ञासु" देखण लग्युं छ,
होळी सी पैलि होळी का रंग,
मन मा यनु घंग्तोळ होयुं छ,
होळी खेलौं पर कैका संग?
रचनाकार: कवि "ज़िग्यांसु"
२६.२.२०१० (होळी उत्सव-२०१०)
सचिन! तुम्हें सलाम
क्रिकेट जगत के बादशाह,
कर दिया कैसा काम,
भारतवासी ही नहीं,
विश्व भर में कर रहे,
लोग तुम्हें सलाम.
बल्ले से जब करते हैं,
आप रनों की बारिश,
प्रतिद्वंदी टीम के खिलाड़ी.
सिर में खुजाते खारिश.
देखते हैं दर्शक जब,
आपके चौक्का छक्का,
हो जाते हैं उछल-उछल कर,
रोमांचित हक्का-बक्का.
ली होगी प्रेरणा पहाड़ से,
देखी होगी मसूरी,
तभी तो कर रहे हैं आप,
हसरत अपनी पूरी.
गावस्कर जी कह हैं रहे,
खड़े करो नए एवरेस्ट,
रिकार्डों की झड़ी लगा दो,
बनो दुनियां में बेस्ट.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
E-Mail: j_jayara@yahoo.com 25.2.2010
कर दिया कैसा काम,
भारतवासी ही नहीं,
विश्व भर में कर रहे,
लोग तुम्हें सलाम.
बल्ले से जब करते हैं,
आप रनों की बारिश,
प्रतिद्वंदी टीम के खिलाड़ी.
सिर में खुजाते खारिश.
देखते हैं दर्शक जब,
आपके चौक्का छक्का,
हो जाते हैं उछल-उछल कर,
रोमांचित हक्का-बक्का.
ली होगी प्रेरणा पहाड़ से,
देखी होगी मसूरी,
तभी तो कर रहे हैं आप,
हसरत अपनी पूरी.
गावस्कर जी कह हैं रहे,
खड़े करो नए एवरेस्ट,
रिकार्डों की झड़ी लगा दो,
बनो दुनियां में बेस्ट.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "ज़िग्यांसु"
E-Mail: j_jayara@yahoo.com 25.2.2010
द्वी छ्वटी कविता
(1)
बुरु नि मन्या
होरी च
लगनू रंग
पण मनमा
कुछ हौरी च |
2)
बुदीन्दा की गाणि
घ्यू की माणि
लप्लपांद जीभ
मुखडी देखि स्वाणि |
copyright@ विजय कुमार 'मधुर' vkumar64mca@gmail.com
बुरु नि मन्या
होरी च
लगनू रंग
पण मनमा
कुछ हौरी च |
2)
बुदीन्दा की गाणि
घ्यू की माणि
लप्लपांद जीभ
मुखडी देखि स्वाणि |
copyright@ विजय कुमार 'मधुर' vkumar64mca@gmail.com
दिलकी बात…….
मी करदू
सर्य साल इंतजार
होरी का बाना
त्वेसे भ्यटेणकु
मौका त मिलालू
लगौलू तेरी
गल्वड्यू पर रंग |
पण तू सदनी
म्यार आण से पैलिही
लपत्वले जांदी
हौरिही ही रंगुमा |
ईन्दा सोचियाली
बणिक टल्ली औलू
पह्ल्लू रंग त्वेपर
मीही लगौलू |
घम्चंदु छो
ब्वलण कु जो बात
डंका का चोटपर
सब्योंते बतौलू |
copyright@ विजय कुमार 'मधुर' vkumar64mca@gmail.com
सर्य साल इंतजार
होरी का बाना
त्वेसे भ्यटेणकु
मौका त मिलालू
लगौलू तेरी
गल्वड्यू पर रंग |
पण तू सदनी
म्यार आण से पैलिही
लपत्वले जांदी
हौरिही ही रंगुमा |
ईन्दा सोचियाली
बणिक टल्ली औलू
पह्ल्लू रंग त्वेपर
मीही लगौलू |
घम्चंदु छो
ब्वलण कु जो बात
डंका का चोटपर
सब्योंते बतौलू |
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