एक तरुण ने
जैसे ही अपनी यौबन की दहलीज पर
अपने पाऊ रखे ही थे कि
मौत उसे निगल गई !
पंखे से झूलती उसकी लाश
मौन होकर ......
अपने ऊपर हुए अत्याचारों का
सबूत दे रही थी !
उसका वो मुरझाया चेहरा
उसकी वो लटकी गर्दन
कह रही थी .......
तुम सबने मिलकर मुझे मारा है ?
मुझे मारा है ...
मेरी माँ/बापा कि महत्वाकंशावोने
जो बार बार मुझ पर लादी जाती रही है
बिना मेरी , भावनाओं को समझे !
मुझे मारा है.....;
मेरे स्कूल के माहोल ने
जिसने मुझे बार बार प्रताड़ित किया है
कचोटा हैं , मुझे अन्दर ही अन्दर
हीन भावानौ के बीज बौ बौ कर !
मुझे मारा है ..
मेरे सीनियरो के घमंड ने
जो मुझे सरे आम हँसी का पात्र बनाकर
बार बा र मुझे लजित करते रहे
सब के सामने !
मै,
मरना नही चाता था
परन्तु मेरे पास ....,
इसके सिवा कोई बिकल्प भी नही था !
एक बिकल्प था
" बिद्रोह का ....//"
"बिद्रोह " .... किस किस से करता ?
सब के सब तो
अपने अपने चक्रब्यू में मुझे
फसाते जा रहे थे .....
जिससे बाहर निकलना
मेरे लिए ना मुमकिन सा था !
मुझे मारा है ....
मेरे अंदर के झुझते " मै ' ने
जो लड़ते लड़ते हार गया था
अपने आप से !
मै मर गया हूँ तो क्या ?
जीने कि लालसा और
उमीदो कि किरन अभी भी
सेष है .................!
जब तुम सकब लोग .,
मेरी भावनाओं को और
मेरी पीड़ा को समझ लोगे
तब.....
तब , कोई नही मरेगा
और नहीं मारेगा
वो ........
जियेगा एक सुनहरे भविषय के लिए !
पराशर गौर
५ फरबरी २०१० ३.४५ दिन में
Sunday, February 7, 2010
Thursday, February 4, 2010
मोबाइल टावर
एक बार राजधानी के सबसे बड़े मोबाइल टावर में कौवो का सेमीनार हुआ। मुद्दा था वर्तमान हालातों का केसे सामना किया जाय ।
पहले काग देवता के नाम से हमें पूजा जाता था । रोज सुबह लोग अपनी छतों पर कुछ न कुछ खाने को रख ही देते थे । अब तो लोंगों के पेट खुद ही इतने बढ़ गए हैं कि उनका पेट ही नहीं भरता ।
जितना मिल जाय उतना ही कम । कूड़ेदान में भी फेंकते हैं तो सिर्फ पोलीथीन की पोटली । उसे भी खोलो तो पोलीथीन के अन्दर पोलीथीन । आखिरी में भी निकलता है रबर....पल्स्टिक...और भी पता नहीं क्या-क्या । अब तो उन्हें छूने का भी मन नही करता ।
व्रत - त्यौहार तो लोग जैसे भूल ही गए । अच्छा खाना खीर..... घी...... पकोड़ी........ पूड़ी......... सब्जी.....। मुह में पानी आ जाता है...।
अब तो कई दिन पानी भी नसीव नहीं होता। नहरों के ऊपर गाड़ियाँ दौड़ रही हैं । नानियाँ कबाड़ से पटी पडी हैं । सरकारी नलों का तो यह हाल है कि लम्बी-लम्बी लाइनें ....। इंसानो का ही नंबर नहीं आता .....।
पेड़ों के झुरमुट में दिल खोलकर कांव – कांव.. ...... भी नहीं कर सकते । रोज कट रहें हैं । मकान पर मकान बन रहें हैं ।
न अन्न न पानी न सत्कार..........
जरा किसी के घर के आगे कांव – कांव..... करो तो खाने दौड़ता है....
सेमीनार का पहला चरण तो योंही रोने धोने में बीत गया । दुसरे चरण में था कैसे इन बिषम परिस्थितियों का सामना किया जाय पर आधारित प्रयोग ।
पहले प्रयोग का बिषय था होशियारी जिसे एक ख़ास कौवे ने तैयार किया था । अपनी होशियारी से उसने देश बिदेश के कई सेमिनारों में भागीदारी निभाई। बिषय पर आधारित एक घडा सामने रखा गया, जिसके तले में कुछ पानी था । सभी से कहा गया पानी पीना है पर कैसे ........?
सबने कहा कौन नहीं जनता चतुर कोवे की कहानी । सभी एक साथ उड़ने को तैयार हो गए । देखो वह तो एक ही कौआ था इसलिए एक-एक कर पूरा करो । एक सयाना कौआ झटपट आगे आया... ये तो बड़ा आसान है....., मैं अभी पूरा करता हूँ इसे । ठीक है। वो फटाफट उड़ गया। लेकिन काफी देर बाद वापस आया अपनी चोंच पर एक छोटा सा पत्थर लेकर। क्यों भई इतनी देर बाद क्यों लौटे। एसे तो तुम दस दिन में भी नहीं भर पावोगे इसको। मैं क्या करता भला दूर-दूर तक कंही पत्थरों का नामो निशान ही नहीं नजर आता। जहाँ देखो ईंट ही ईंट।
तभी एक नौजवान कौआ जिसके सर के बाल खड़े दोनों पर ढीले अजीव सी चाल में आगे बढ़ा। सभी
उसको देख एक साथ हंस पड़े। यह क्या? कल का बच्चा ! ठीक से तो चलाना आता नहीं ! नौजवान ने इधर उधर नजर दौडाई और कुछ दूर से एक कागज़ की गोली सी उठा कर लाया। इससे पानी पिएगा.... हा....हा.......... । जरा दिखा तो दो.... क्या लिखा है इसमे। उसने सबको कागज़ दिखाया। जिस पर लिखा था पांच दिन में कंप्यूटर सीखें । हा... हा....हम और कंप्यूटर। आजा बेटा ! इधर आजा ! तेरे बस का कुछ नहीं ।
नौजवान ने गर्दन झटकी पानी का जायजा लिया और नीचे झुककर पानी के आस - पास चोंच मारनी शुरू कर दी । चंद मिनटों में ही पानी हाशिल । उसने खूब पानी पिया। और फिर कागज की गोली बनाकर उसे मटके में ठूंस शान से खडा हो गया। सबकी आँखें फटी की फटी रह गयी । अचानक नौजवान की नजर टावर में चढ़ते किसी पर पडी । भागो.....भागो..... । सबके सब समिनार अधूरा छोड़ उड़ गए। दरअसल जिस टावर पर सेमीनार चल रहा था उस पर मालिक के ज्यादतियों से तंग आकर अपने हक़ के लिए एक बिल्ली चढ़ गयी।
विजय कुमार "मधुर"
पहले काग देवता के नाम से हमें पूजा जाता था । रोज सुबह लोग अपनी छतों पर कुछ न कुछ खाने को रख ही देते थे । अब तो लोंगों के पेट खुद ही इतने बढ़ गए हैं कि उनका पेट ही नहीं भरता ।
जितना मिल जाय उतना ही कम । कूड़ेदान में भी फेंकते हैं तो सिर्फ पोलीथीन की पोटली । उसे भी खोलो तो पोलीथीन के अन्दर पोलीथीन । आखिरी में भी निकलता है रबर....पल्स्टिक...और भी पता नहीं क्या-क्या । अब तो उन्हें छूने का भी मन नही करता ।
व्रत - त्यौहार तो लोग जैसे भूल ही गए । अच्छा खाना खीर..... घी...... पकोड़ी........ पूड़ी......... सब्जी.....। मुह में पानी आ जाता है...।
अब तो कई दिन पानी भी नसीव नहीं होता। नहरों के ऊपर गाड़ियाँ दौड़ रही हैं । नानियाँ कबाड़ से पटी पडी हैं । सरकारी नलों का तो यह हाल है कि लम्बी-लम्बी लाइनें ....। इंसानो का ही नंबर नहीं आता .....।
पेड़ों के झुरमुट में दिल खोलकर कांव – कांव.. ...... भी नहीं कर सकते । रोज कट रहें हैं । मकान पर मकान बन रहें हैं ।
न अन्न न पानी न सत्कार..........
जरा किसी के घर के आगे कांव – कांव..... करो तो खाने दौड़ता है....
सेमीनार का पहला चरण तो योंही रोने धोने में बीत गया । दुसरे चरण में था कैसे इन बिषम परिस्थितियों का सामना किया जाय पर आधारित प्रयोग ।
पहले प्रयोग का बिषय था होशियारी जिसे एक ख़ास कौवे ने तैयार किया था । अपनी होशियारी से उसने देश बिदेश के कई सेमिनारों में भागीदारी निभाई। बिषय पर आधारित एक घडा सामने रखा गया, जिसके तले में कुछ पानी था । सभी से कहा गया पानी पीना है पर कैसे ........?
सबने कहा कौन नहीं जनता चतुर कोवे की कहानी । सभी एक साथ उड़ने को तैयार हो गए । देखो वह तो एक ही कौआ था इसलिए एक-एक कर पूरा करो । एक सयाना कौआ झटपट आगे आया... ये तो बड़ा आसान है....., मैं अभी पूरा करता हूँ इसे । ठीक है। वो फटाफट उड़ गया। लेकिन काफी देर बाद वापस आया अपनी चोंच पर एक छोटा सा पत्थर लेकर। क्यों भई इतनी देर बाद क्यों लौटे। एसे तो तुम दस दिन में भी नहीं भर पावोगे इसको। मैं क्या करता भला दूर-दूर तक कंही पत्थरों का नामो निशान ही नहीं नजर आता। जहाँ देखो ईंट ही ईंट।
तभी एक नौजवान कौआ जिसके सर के बाल खड़े दोनों पर ढीले अजीव सी चाल में आगे बढ़ा। सभी
उसको देख एक साथ हंस पड़े। यह क्या? कल का बच्चा ! ठीक से तो चलाना आता नहीं ! नौजवान ने इधर उधर नजर दौडाई और कुछ दूर से एक कागज़ की गोली सी उठा कर लाया। इससे पानी पिएगा.... हा....हा.......... । जरा दिखा तो दो.... क्या लिखा है इसमे। उसने सबको कागज़ दिखाया। जिस पर लिखा था पांच दिन में कंप्यूटर सीखें । हा... हा....हम और कंप्यूटर। आजा बेटा ! इधर आजा ! तेरे बस का कुछ नहीं ।
नौजवान ने गर्दन झटकी पानी का जायजा लिया और नीचे झुककर पानी के आस - पास चोंच मारनी शुरू कर दी । चंद मिनटों में ही पानी हाशिल । उसने खूब पानी पिया। और फिर कागज की गोली बनाकर उसे मटके में ठूंस शान से खडा हो गया। सबकी आँखें फटी की फटी रह गयी । अचानक नौजवान की नजर टावर में चढ़ते किसी पर पडी । भागो.....भागो..... । सबके सब समिनार अधूरा छोड़ उड़ गए। दरअसल जिस टावर पर सेमीनार चल रहा था उस पर मालिक के ज्यादतियों से तंग आकर अपने हक़ के लिए एक बिल्ली चढ़ गयी।
विजय कुमार "मधुर"
उत्तराखंड की वीरांगना श्रीमती मगनी देवी रावत"
साखनीधार, बद्रीनाथ मार्ग के निकट है,
श्रीमती मगनी देवी जी का गाँव,
बहादुरी की मिशाल उनकी,
विस्मय में डाल देती है,
जब उन्होंने जंगल में,
घास काटते हुए देखा,
तीन बच्चों पर वार करते हुए,
एक बर्बर रीछ को,
मजबूर कर दिया उसको,
धावा बोलकर पत्थर से,
भाग जाने को तुरंत,
जान बचाकर उल्टे पाँव.
रीछ से तीन बच्चों को बचाकर,
अपने को भी बचाया,
और अपने तीन बच्चों को भी,
माता विहीन होने से,
और प्राप्त किया,
इस महान कार्य के लिए,
भारत की राष्ट्रपति जी से,
"जीवन रक्षा पदक-२००८".
उत्तराखंडी समाज के लिए,
है न फक्र की बात,
मान बढाओ देवभूमि का,
श्रीमती मगनी देवी जी की तरह,
जिनको देखा कवि "ज़िग्यांसु" ने,
और ज़िग्यांसावश पूछा उनसे,
उनके साहसिक कार्य का,
आँखों देखा हाल उनकी जुबानी,
जिसे प्रस्ततु कर रहा हूँ,
कविता के रूप में,
क्योंकि मेरे मन में है,
उनके महान कार्य के लिए,
उनके प्रति सम्मान.
रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासू"
(सर्वाधिकार सुरक्षित,उद्धरण, प्रकाशन के लिए कवि,लेखक की अनुमति लेना वांछनीय है)
ग्राम: बागी नौसा, पट्टी. चन्द्रबदनी,
टेहरी गढ़वाल-२४९१२२
निवास: संगम विहार, नई दिल्ली
5.1.2010, दूरभास:9868795187
E-Mail: j_jayara@yahoo.com
सवाल - जबाब
तुम,
मुझ से पूछते हो की
मेरी मुठी क्यों भिंची है?
मेरे आँखों में अंगारे क्यों है ?
मेरे स्वासो में उच्च वास कैसा ?
तो ...
उसका एक ही जबाब है .."तुम "
तुमने मेरे पेट पर लात मरकर
मेरे मुह का कौर छीन कर
मुझे ...
दर बदर भटकने पर नह्बुर किया है !
फिर भी पूछते हो की
मेरे आंखो में अंगारे क्यों ?
मेरी मुठीया क्यों भिची है ?
जबतक मुझे ...
मेरे सवालों का जबाब नहीं मिलता
तब तक ये ..
एसे ही रहेंगी तुम्हे घरती
सवाल करती !
पराशर गौर
१ फरबरी २०१० दिनमे १.३० पर
मुझ से पूछते हो की
मेरी मुठी क्यों भिंची है?
मेरे आँखों में अंगारे क्यों है ?
मेरे स्वासो में उच्च वास कैसा ?
तो ...
उसका एक ही जबाब है .."तुम "
तुमने मेरे पेट पर लात मरकर
मेरे मुह का कौर छीन कर
मुझे ...
दर बदर भटकने पर नह्बुर किया है !
फिर भी पूछते हो की
मेरे आंखो में अंगारे क्यों ?
मेरी मुठीया क्यों भिची है ?
जबतक मुझे ...
मेरे सवालों का जबाब नहीं मिलता
तब तक ये ..
एसे ही रहेंगी तुम्हे घरती
सवाल करती !
पराशर गौर
१ फरबरी २०१० दिनमे १.३० पर
कुलै की मरमत (बातो बतंगड़)
जब कैथी कवी चीज़ पसंद नि आदी, त, वो बातो बतंगड़ बाणै की अपणी मनै भनास कन निकलद , इत आप सबी जंणदन ! क्वी ताना मारी मरी निकलद , त क्वी , सु णे- सुणे, ! क्वी सुनै सुनै की , त क्वी बना बणे बणे .. की ! अर जू इनु काम क्या करदा ... ! वे आदिम थै इन कनम संतोष भी आंद !
हमरा गौं माँ जुमली कु नायु नायु ब्यो ह्वै ! सासूल बोली , " ब्वारी ... भोल सेरा सैणु जाण ! कमीज सुलार ना ... धोती पैरी जाण बाबा ! आर हां वेसी पैली " पाणी की कुल ' भी ठीक कन .. // सुबेर ज्ररा सिंक्व्ली उठी जय हो ! " व बिचरी फजल लेकी उठ अर सीध गे कूल थै ठीक कनु ! कूल दिखया त जगा जगा बीती छै टूटी ! जनी वीं पाणीम घुटु तेरी त धोती गीली सी हुण बैठी ! वीन सोची की गीली हुण त अच्हू च की ई थै घुण्ड घुण्डओ तक उठाई की बंधी देऊ ! स्यु वीन उन काई अर धोती फील्यु से उबू कैकी घुन्ड़ो तक बेटी दे !
काम करद करद द्फारी ह्वेगी ! ये दौरान गौं का पधान जी घर छा आणा ! जनि उन नी ब्योली थै वीकी धोती जवा घुंडा घुंडा मथी तक छै जई ! वी थै देखी भारी गुस्स्म फिगारीद फिगारीद सीध गौका पनचैत जैकी धत लगे बुन बैठा ... " अरे गौवालो सुणा ... ब्यो केकु नि हवे .. साबू क्त ह्वै ! ये जुमली कु क्या बाकि बातो ब्यो ह्वै ! वेकि ब्वारील त़ा, श्रम लाज बेची धैरियाल ! सुसुर जिठणु जमा नि दिखणे ! आज तक हम्रर गौमा क्य, कुल ठीक नि ह्वै चै क्या?
तबी कैल पूछी ' अजी पधान्जी . क्य हवाय ? क्यों छा इत्गा गुसम ? वे जुमली की ब्योरिल क्य कैदे इनु , ! "
कैदे अरे ... ..मित बुनू छो.., गौ इनमे बिग्ड्दा ... अगर जू अभी नि सुधरे जा ! त बादम भारी बात ह्वै जाली ! गौं का लोगक कथा ह्वया ! सबी छा
पुचणा सची क्य कई होलू वे ब्वोरिल इन की तबरी जुमली ब्योई भी अगी .. ! पधान जई से बोलन लेगी .. " क्य छा बुला लाब काब .. ! क्युओ छा बे बातो ब बतनगड़ बनाणा ! .. हे गौ वालो मिनी अपणी ब्वारी कु बोली की तू आज सलवार कुर्ता ना धोत्ती परी जै .. किलैकी स्यरा सैद अर कूल ठीक करद वो पाणीम
भीगी जाला ! ये से अछु की तू धीति पैरी जै ! धोती ताहि हम घुंडा हुन्दो तक त उठाई की कामत कई सकदा ना.. !
" सब्युन एक स्वरमा बोली .. हां ..हां ...., किले ना.. किले ना ...! आजतक तक हम भी त इनी करी की अवा ! वी ब्वारिल इनु क्य नौ काम कैदे जू यु पधान जई थै बुरु लगी गे ! " देखा पधान जई आप बे बात पर छा नाराज हुणा .. नाराज हुणों यु क्वी तरिका नि ? आप ताहि अछु नि लगी त इतका हला कैनी की क्य जरूरत चै ! जुमली का ग़म जांदा अर बुल्ड की बिता इनु काम ठीक नी नई नई ब्योरी कु त वू बी समझी जादू अर बात भी रैजादी !
पराशर गौर
दिनाक २ फरबरी रात ९ ५३ २०१०
हमरा गौं माँ जुमली कु नायु नायु ब्यो ह्वै ! सासूल बोली , " ब्वारी ... भोल सेरा सैणु जाण ! कमीज सुलार ना ... धोती पैरी जाण बाबा ! आर हां वेसी पैली " पाणी की कुल ' भी ठीक कन .. // सुबेर ज्ररा सिंक्व्ली उठी जय हो ! " व बिचरी फजल लेकी उठ अर सीध गे कूल थै ठीक कनु ! कूल दिखया त जगा जगा बीती छै टूटी ! जनी वीं पाणीम घुटु तेरी त धोती गीली सी हुण बैठी ! वीन सोची की गीली हुण त अच्हू च की ई थै घुण्ड घुण्डओ तक उठाई की बंधी देऊ ! स्यु वीन उन काई अर धोती फील्यु से उबू कैकी घुन्ड़ो तक बेटी दे !
काम करद करद द्फारी ह्वेगी ! ये दौरान गौं का पधान जी घर छा आणा ! जनि उन नी ब्योली थै वीकी धोती जवा घुंडा घुंडा मथी तक छै जई ! वी थै देखी भारी गुस्स्म फिगारीद फिगारीद सीध गौका पनचैत जैकी धत लगे बुन बैठा ... " अरे गौवालो सुणा ... ब्यो केकु नि हवे .. साबू क्त ह्वै ! ये जुमली कु क्या बाकि बातो ब्यो ह्वै ! वेकि ब्वारील त़ा, श्रम लाज बेची धैरियाल ! सुसुर जिठणु जमा नि दिखणे ! आज तक हम्रर गौमा क्य, कुल ठीक नि ह्वै चै क्या?
तबी कैल पूछी ' अजी पधान्जी . क्य हवाय ? क्यों छा इत्गा गुसम ? वे जुमली की ब्योरिल क्य कैदे इनु , ! "
कैदे अरे ... ..मित बुनू छो.., गौ इनमे बिग्ड्दा ... अगर जू अभी नि सुधरे जा ! त बादम भारी बात ह्वै जाली ! गौं का लोगक कथा ह्वया ! सबी छा
पुचणा सची क्य कई होलू वे ब्वोरिल इन की तबरी जुमली ब्योई भी अगी .. ! पधान जई से बोलन लेगी .. " क्य छा बुला लाब काब .. ! क्युओ छा बे बातो ब बतनगड़ बनाणा ! .. हे गौ वालो मिनी अपणी ब्वारी कु बोली की तू आज सलवार कुर्ता ना धोत्ती परी जै .. किलैकी स्यरा सैद अर कूल ठीक करद वो पाणीम
भीगी जाला ! ये से अछु की तू धीति पैरी जै ! धोती ताहि हम घुंडा हुन्दो तक त उठाई की कामत कई सकदा ना.. !
" सब्युन एक स्वरमा बोली .. हां ..हां ...., किले ना.. किले ना ...! आजतक तक हम भी त इनी करी की अवा ! वी ब्वारिल इनु क्य नौ काम कैदे जू यु पधान जई थै बुरु लगी गे ! " देखा पधान जई आप बे बात पर छा नाराज हुणा .. नाराज हुणों यु क्वी तरिका नि ? आप ताहि अछु नि लगी त इतका हला कैनी की क्य जरूरत चै ! जुमली का ग़म जांदा अर बुल्ड की बिता इनु काम ठीक नी नई नई ब्योरी कु त वू बी समझी जादू अर बात भी रैजादी !
पराशर गौर
दिनाक २ फरबरी रात ९ ५३ २०१०
Tuesday, February 2, 2010
सरकरी लोन - लघु कथा
हे! बौऊ त्वेतेन हफोर पोस्टमैंन काका बुलाणु पदनू का घौर माँ |
किरणन चौक का किनर बटी बोली अर चलिगे | रुकमा जो जूठा भांडा लेकी छवण माँ जाण छा घंघ्त्तोल माँ पोदिगे| हे ! ब्वे पर्सीत वूनकू मंयोडर येई| चिठ्ठी होंदी त वू ज्योरून किरण का हाथ दे देनी छ. क....खी...कवी....तार....न....ना....मी....भी....निर्बई........ भांडा वखिम छोदिक दौड़ी-दौड़ी पोंचिगे पदनू का घौरमा|
मंगुतुकी ब्वारी ! बाबा मंगुतु का नोऊ एक रजिस्ट्री अन्यी | गों का पता पर अन्यी इन करा तुम्ही लेल्ल्यावा | पण ज्योरो इन बतावा या कख बटी अन्यीच|
ल्यावा अंग्वठा लगावा | रुकमा न अंग्वठा लगें अर रजिस्ट्री देदे पोस्टमैंन का हथमा| ज्योरो इन बतावा या अन्यी कख बटी छ | म्यारत डर का मार.....................................
पोस्टमैंन न सरि चिठ्ठी पैढी अर सार सुणई
बबा ! ये ब्लाक बटी अन्यीं छ | तुमरा ससुरा न वख बटी लौंन ले होलू हौज बणनुतै | लिख्युंच एक मैना भितर लोन लौटई दिया निथर वसूली का खातिर तहशील मा केस भ्यजे जालु.............. |
कर्ज ..........हमरा त स्यारा वि नि छन………..फेर...हौज… | हाँ..हाँ ज्योरो तुम त जणदै छौं म्यार ससुर जीतेन म्वरर्याँ त आठ साल ह्वेगैन | तब या रजिस्ट्री कख बटी | ब्वारी मी कुछ नि जंणदूं……… जन्दी ये कागज लायावा | मीतेन अबेर होनी छ……...हौरी जगु भी जाण अभी . ………पर ज्योरो......................... पोस्टमैंन झ्वाला उठाकी चलिगे| रुकमा मुंड पर हथ लगाकि खौलीसि रेगे | स्व्चण लेगे अब क्य हौलू..... |
copyright@विजय कुमार "मधुर"
किरणन चौक का किनर बटी बोली अर चलिगे | रुकमा जो जूठा भांडा लेकी छवण माँ जाण छा घंघ्त्तोल माँ पोदिगे| हे ! ब्वे पर्सीत वूनकू मंयोडर येई| चिठ्ठी होंदी त वू ज्योरून किरण का हाथ दे देनी छ. क....खी...कवी....तार....न....ना....मी....भी....निर्बई........ भांडा वखिम छोदिक दौड़ी-दौड़ी पोंचिगे पदनू का घौरमा|
मंगुतुकी ब्वारी ! बाबा मंगुतु का नोऊ एक रजिस्ट्री अन्यी | गों का पता पर अन्यी इन करा तुम्ही लेल्ल्यावा | पण ज्योरो इन बतावा या कख बटी अन्यीच|
ल्यावा अंग्वठा लगावा | रुकमा न अंग्वठा लगें अर रजिस्ट्री देदे पोस्टमैंन का हथमा| ज्योरो इन बतावा या अन्यी कख बटी छ | म्यारत डर का मार.....................................
पोस्टमैंन न सरि चिठ्ठी पैढी अर सार सुणई
बबा ! ये ब्लाक बटी अन्यीं छ | तुमरा ससुरा न वख बटी लौंन ले होलू हौज बणनुतै | लिख्युंच एक मैना भितर लोन लौटई दिया निथर वसूली का खातिर तहशील मा केस भ्यजे जालु.............. |
कर्ज ..........हमरा त स्यारा वि नि छन………..फेर...हौज… | हाँ..हाँ ज्योरो तुम त जणदै छौं म्यार ससुर जीतेन म्वरर्याँ त आठ साल ह्वेगैन | तब या रजिस्ट्री कख बटी | ब्वारी मी कुछ नि जंणदूं……… जन्दी ये कागज लायावा | मीतेन अबेर होनी छ……...हौरी जगु भी जाण अभी . ………पर ज्योरो......................... पोस्टमैंन झ्वाला उठाकी चलिगे| रुकमा मुंड पर हथ लगाकि खौलीसि रेगे | स्व्चण लेगे अब क्य हौलू..... |
copyright@विजय कुमार "मधुर"
Monday, February 1, 2010
एक , एस एम् एस
" मिन कख बोली अर क्या बोली ?"
हमरा गौमा " क्य बुलद अर क्य करद " वाली एक ददी छै ! वा सरया गौमा ये, ई नाम से जणै भी जांदी छै ! या उपाधी वी थै सुधी -सुधी नि मिली ! बर्षो क तजुर्बा अर अभ्यास से वीं हासिल कोरी !मयारू बुलाणो मतलब युच की , कुछ कैकी मील ! ! अब देखा ना हमरा पहाडमा , वखकी ब्वारियु थै उपाधी उ थै इनी मील जन्दीन मुफ्तमा , बिना कुछ करया ! उदाहरण का वास्ता केकु आदिम अगर मास्टर चा .., त , गौका सबी छोटा बड़ा वीथै मास्टरयाणी कैई की बुलोंदन ! लगिना फीती , ... बिना कुछ करया ! मजेकी बात बाठी या पैणा बटण दां भी, इनी बुलैजांद की मास्टरयाणी करो कु ! अब देखा ऩा सुबेदारै बीबी खुनै सुबोद्नी , डाक्टरी बीबी खुणई -डाक्टरीणी, सीपै की बीबी खुणई - सीपैणी त इनी वी द्दी पर भी भीती लगि गे छे वीकी क्या बुन आर क्यं कन पर ! कुछ अपबाद भी छन ये बिषय पर , जनकी नेता की बीबी खुणी कवी..., नेत्याणी नि बुलद ! गल्दारै बीबी खुणी, कवी भी गल्दारणी नि बुलद !
वी ददी की खाशियत छाई` की, पैली त, केका भी बारमा लम्बी लम्बी छोड़ी ! इनै उनै की लगे की ! सरया गौमा बबाल मचाई की बदनाम कैकी फिर बुल्दी छाई की मिन कबरी बोली, अर क्या बोली अर कैमा बोली ! एक मिनटम मुकरी जादी छई वा हमरा देसाका नेतौओ की जनी !
एक दा त, वीन गौका एक भला आदिम का वास्ता इनी बात, अर इनी छुई...., उभी, ठुसकी -फुसकी लगिकी बदनाम कैदी ! उ त फांस खाद खांद बचेदे लुखुल ! बादम पता लगी, की, ये सब काम वी दादी का छन ! जब भरी पंचैतं म , वीसे पुचैगी की तिल इनु किले कारी , अर इन किले बोली ? वा साफ़ मुकरी ग़े मिन बोली नि जू तुम छा बुना ! उदाहरण दे देकी बुन बैठी मिनट इनु बोली जैकू अर्थ समनी वालों ण गलत लगाई... ! मयारू फ्जितु से कवी जातीय दुश्मुनी अर ण वैल मयारू पुंगडो उज्याड खलाई त फिर इन किले बुलुलू ! वीक कु यु तर्क पंचैतं जत्गा छा सबी एक हैंक कु मुख दिखण लगिनी ! अब ब्वाल त क्या ब्वाला .. ?? अर , ददी उख बीटी चौड़ी छाती कैकी इन गे, जन बुलिंद वा कारगिल पर तिरंगा फैरैकी की जाणी होली ! या हाई स्कुल्म फर्स्ट आइ होली ! इनी कारनाम त वीन एक ना कई दफा कैनी ! हर दफा झूट बोली साफ़ निकललें की कला देखी ! गौ वालो न कतका दफा बोली को तू इलेक्शन में खड़ी ह्वेजा ! त्वेम नता बाणा सबी गुण छन ! पता वीकू जबाब क्या छो ?? फुन्डू फुका ... उ , नेताओं थै ! जू पांच साल तक भी नि रैन्दा ! अर जू रैनद भी छन, उ थै , आदिम त आदिम कुकर तक भी नि पुछुदू ! मी जब तक रो, अर जब तक चों , ई पध्बी पर बरकारा रोलु !
पता वीकू जबाब क्या छो ?? फुन्डू फुका ... उ , नेताओं थै ! जू पांच साल तक भी नि रैन्दा ! अर जू रैनद भी छन, उ थै , आदिम त आदिम कुकर तक भी नि पुछुदू ! मी जब तक रो, अर जब तक चों , ई पध्बी पर बरकारा रोलु !
ददील ईक हैंक्य पैंतरा फेंकी ... ब्याली एक , एस एम् एस कैल भेजी .. की पहलाणु इनु छो बुनू अर आज फिर एक एस एम् एस आई की ना जी ना... आपल गलत समझ दे मिट ये ना या चों बुनू ! अब बोला मी कख चों गलत न ..न..न.. अर मं क्या बोली ताबा ?
पराशर गौड़
२८ जनबरी २०१० रात ८ ..४६ पर
हमरा गौमा " क्य बुलद अर क्य करद " वाली एक ददी छै ! वा सरया गौमा ये, ई नाम से जणै भी जांदी छै ! या उपाधी वी थै सुधी -सुधी नि मिली ! बर्षो क तजुर्बा अर अभ्यास से वीं हासिल कोरी !मयारू बुलाणो मतलब युच की , कुछ कैकी मील ! ! अब देखा ना हमरा पहाडमा , वखकी ब्वारियु थै उपाधी उ थै इनी मील जन्दीन मुफ्तमा , बिना कुछ करया ! उदाहरण का वास्ता केकु आदिम अगर मास्टर चा .., त , गौका सबी छोटा बड़ा वीथै मास्टरयाणी कैई की बुलोंदन ! लगिना फीती , ... बिना कुछ करया ! मजेकी बात बाठी या पैणा बटण दां भी, इनी बुलैजांद की मास्टरयाणी करो कु ! अब देखा ऩा सुबेदारै बीबी खुनै सुबोद्नी , डाक्टरी बीबी खुणई -डाक्टरीणी, सीपै की बीबी खुणई - सीपैणी त इनी वी द्दी पर भी भीती लगि गे छे वीकी क्या बुन आर क्यं कन पर ! कुछ अपबाद भी छन ये बिषय पर , जनकी नेता की बीबी खुणी कवी..., नेत्याणी नि बुलद ! गल्दारै बीबी खुणी, कवी भी गल्दारणी नि बुलद !
वी ददी की खाशियत छाई` की, पैली त, केका भी बारमा लम्बी लम्बी छोड़ी ! इनै उनै की लगे की ! सरया गौमा बबाल मचाई की बदनाम कैकी फिर बुल्दी छाई की मिन कबरी बोली, अर क्या बोली अर कैमा बोली ! एक मिनटम मुकरी जादी छई वा हमरा देसाका नेतौओ की जनी !
एक दा त, वीन गौका एक भला आदिम का वास्ता इनी बात, अर इनी छुई...., उभी, ठुसकी -फुसकी लगिकी बदनाम कैदी ! उ त फांस खाद खांद बचेदे लुखुल ! बादम पता लगी, की, ये सब काम वी दादी का छन ! जब भरी पंचैतं म , वीसे पुचैगी की तिल इनु किले कारी , अर इन किले बोली ? वा साफ़ मुकरी ग़े मिन बोली नि जू तुम छा बुना ! उदाहरण दे देकी बुन बैठी मिनट इनु बोली जैकू अर्थ समनी वालों ण गलत लगाई... ! मयारू फ्जितु से कवी जातीय दुश्मुनी अर ण वैल मयारू पुंगडो उज्याड खलाई त फिर इन किले बुलुलू ! वीक कु यु तर्क पंचैतं जत्गा छा सबी एक हैंक कु मुख दिखण लगिनी ! अब ब्वाल त क्या ब्वाला .. ?? अर , ददी उख बीटी चौड़ी छाती कैकी इन गे, जन बुलिंद वा कारगिल पर तिरंगा फैरैकी की जाणी होली ! या हाई स्कुल्म फर्स्ट आइ होली ! इनी कारनाम त वीन एक ना कई दफा कैनी ! हर दफा झूट बोली साफ़ निकललें की कला देखी ! गौ वालो न कतका दफा बोली को तू इलेक्शन में खड़ी ह्वेजा ! त्वेम नता बाणा सबी गुण छन ! पता वीकू जबाब क्या छो ?? फुन्डू फुका ... उ , नेताओं थै ! जू पांच साल तक भी नि रैन्दा ! अर जू रैनद भी छन, उ थै , आदिम त आदिम कुकर तक भी नि पुछुदू ! मी जब तक रो, अर जब तक चों , ई पध्बी पर बरकारा रोलु !
पता वीकू जबाब क्या छो ?? फुन्डू फुका ... उ , नेताओं थै ! जू पांच साल तक भी नि रैन्दा ! अर जू रैनद भी छन, उ थै , आदिम त आदिम कुकर तक भी नि पुछुदू ! मी जब तक रो, अर जब तक चों , ई पध्बी पर बरकारा रोलु !
ददील ईक हैंक्य पैंतरा फेंकी ... ब्याली एक , एस एम् एस कैल भेजी .. की पहलाणु इनु छो बुनू अर आज फिर एक एस एम् एस आई की ना जी ना... आपल गलत समझ दे मिट ये ना या चों बुनू ! अब बोला मी कख चों गलत न ..न..न.. अर मं क्या बोली ताबा ?
पराशर गौड़
२८ जनबरी २०१० रात ८ ..४६ पर
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