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Wednesday, July 4, 2012

आक्रोश*********एक गढ़वाली कविता.

कवि -  डॉ नरेन्द्र गौनियाल 
 

पहाड़ अर पहाड़ी
द्वीइ हूणा छन नांगा
डाळी कटे
मन्खी भागा
पहाड़ नांगा
जगा-जगा मा
दारू कि
सरकारी दुकनि
दिन-रात पींदा
लटगिंदा-फर्किन्दा
बबडान्दा
हुयाँ रंदीन जांगा
पहाड़ी नांगा

व्यवस्था !
टक लगे सूण!!
ईं चिमुडतीं गिच्ची
अर अधपेट पुटग्यूंन
क्य कन्न हमन
सि दारू पेकि ?

आज
हमते चएंद
पुरू अनाज
सि सोमरस
त्वैते ही बिराज

तेरि बराबरी 
हमन क्य कन्न
त्यारा छन 
सि लग्यां ग्यल्का
अर हमारा सुक्सा

तेरि गाड़ी
हमरि नाड़ी
त्यारा हाथ
हमरि गैळी
तेरि जान 
हमारो जंजाळ
तेरि मौत
हमरि मुक्ति
त्यारो भोग
हमारो भाग
हमारो जोग
तेरि जुग्ति

त्वे खुणि
बिजुली-पाणि सब्बि धाणि
हम खुणि सिर्फ
गाणि ही गाणि

हमारा हाथों से लम्बा छन
त्यारा कळदार
तौंकी पकड़ जादा मजबूत च
हमरि मुठ्यों कि पकड़ से

तेरि तिकड़म
कैरि जान्द काम तमाम
अर चूंदा-चूंदा सुकि जांद
हमरि सुकीं हडग्यूं कु
अस्यो-पस्यो

पण देख !
अब हमरि
आंखि खुलि गैनी
अब हम चेति गयां
अब हम
लूछि सक्दन
अपणु गफ्फा
अपणु नफ्फ़ा..

  डॉ नरेन्द्र गौनियाल ..सर्वाधिकार सुरक्षित

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