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Tuesday, June 1, 2010

"कौथिग"....मेळा

व जगा, जख होन्दु छ,
मन्ख्यौं कू मेल,
भिंडि दिनु मा,
पैदा होन्दु छ उलार,
लंगि संग्यौं सी मिलिक,
ऊँचि धार या खाळ मा,
जख लग्दा छन "कौथिग",
खास करिक बैशाख का मैना,
अपणा मुल्क उत्तराखण्ड मा.

मन मा पैदा होन्दि छ जिज्ञासा,
जब कखि दूर बाटा बिटि,
दिखेन्दि छ मन्ख्यौं की भीड़,
होन्दु छ ढोलु कू घम्मग्याट,
कौथिग जाँदा मन्ख्यौं कू रग्गर्याट,
स्वाळी, पकोड़ी, जलेबी, पापड़ी,
चूड़ी, झुमकी,माळा, फोन्दणी,
खटै,मिठै लड्डू अर बर्फी,
"कौथिग" मा घूम्दि चर्खी,
कल्पना करिक याद ऐगि,
अपणा मुल्क का "कौथिग" की.


रचनाकार: जगमोहन सिंह जयाड़ा "जिज्ञासु"
(सर्वाधिकार सुरक्षित २२.४.२०१०

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