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Tuesday, December 6, 2016

गढवलि कविता ( जै उत्तराखंड जी )

जै कुमाऊ जै गढवाल
जै जै उत्तराखंड जी
तुम तेइ हासिल कनौ
ख्यलीं कतनै खंड जी

धुरपलिम बटेन झूट
धाद मरणु देखिल्या
सच लुक्युं डारा कु यख
अंध्यर मा तिखंड जी

फुन्ध्या फौंदारों की बार
गरिब गुरबा हणकट्ट
बांठु बिरणु खैकी पिल्ल
संड मुसटंड जी

डुबकि खूब मना छन
जौं फर सामर्थ च
बजट माछौं सि गबजट
योजनों की ढंड जी

द्यब्ता रिबड़ि बिगड़ि गैं
भलु कन क्वे हूंण तब
भगत गड़ण फर लग्यान
उच्याणो अर डण्ड जी
(स्वरचित - सुशील पोखरियाल)

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